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अंग 925

अंग
925
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामकली महला 5 ॥
हरि हरि धिआइ मना खिनु न विसारीऐ ॥
राम रामा राम रमा कंठि उर धारीऐ ॥
उर धारि हरि हरि पुरखु पूरनु पारब्रहमु निरंजनो ॥
भै दूरि करता पाप हरता दुसह दुख भव खंडनो ॥
जगदीस ईस गोुपाल माधो गुण गोविंद वीचारीऐ ॥
बिनवंति नानक मिलि संगि साधू दिनसु रैणि चितारीऐ ॥1॥
चरन कमल आधारु जन का आसरा ॥
मालु मिलख भंडार नामु अनंत धरा ॥
नामु नरहर निधानु जिन कै रस भोग एक नराइणा ॥
रस रूप रंग अनंत बीठल सासि सासि धिआइणा ॥
किलविख हरणा नाम पुनहचरणा नामु जम की त्रास हरा ॥
बिनवंति नानक रासि जन की चरन कमलह आसरा ॥2॥
गुण बेअंत सुआमी तेरे कोइ न जानई ॥
देखि चलत दइआल सुणि भगत वखानई ॥
जीअ जंत सभि तुझु धिआवहि पुरखपति परमेसरा ॥
सरब जाचिक एकु दाता करुणा मै जगदीसरा ॥
साधू संतु सुजाणु सोई जिसहि प्रभ जी मानई ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा सोइ तुझहि पछानई ॥3॥
मोहि निरगुण अनाथु सरणी आइआ ॥
बलि बलि बलि गुरदेव जिनि नामु द्रिड़ाइआ ॥
गुरि नामु दीआ कुसलु थीआ सरब इछा पुंनीआ ॥
जलने बुझाई सांति आई मिले चिरी विछुंनिआ ॥
आनंद हरख सहज साचे महा मंगल गुण गाइआ ॥
बिनवंति नानक नामु प्रभ का गुर पूरे ते पाइआ ॥4॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे (मेरे) मन ! सदा ही परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए। रक्ती भर समय के लिए भी उसको भुलाना नहीं चाहिए। हे भाई ! उस सुंदर राम को हमेशा ही गले से हृदय में परो के रखना चाहिए। हे भाई ! सब गुणों के मालिक पारब्रहम निर्लिप रही सर्व-व्यापक हरी को सदा अपने हृदय में परोए रख। वह हरी सारे डरों को दूर करने वाला है। सारे पाप नाश करने वाला है। जनम-मरण के चक्करों को खत्म करने वाला है। उन दुखों को नाश करने वाला है जो बहुत मुश्किल से बर्दाश्त किए जा सकते हैं। जगत के मालिक। सबके मालिक। सृष्टि के पालनहार। माया के पति प्रभू के गुणों को सदा चित्त में बसाए रखना चाहिए; नानक विनती करता है- (हे भाई !) गुरू की संगति में मिल के दिन-रात उसको याद करते रहना चाहिए। 1। हे भाई ! परमात्मा के सुंदर चरण ही भगत-जनों के वास्ते जीवन का सहारा हैं आसरा हैं। बेअंत प्रभू का नाम हृदय में टिकाना ही भक्त-जनों के लिए धन-पदार्थ है जमीन की मल्कियत है। खजाना है। हे भाई ! जिनके हृदय में परमात्मा का नाम-खजाना बस रहा है। उनके लिए नारायण का नाम जपना ही दुनियां के रसों-भोगों का आनंद है। हे भाई ! बेअंत और निर्लिप प्रभू का नाम हरेक सांस के साथ जपते रहना ही उनके लिए दुनिया के रूप-रस और रंग-तमाशे हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम सारे पाप दूर करने वाला है। प्रभू का नाम ही भक्त-जनों के लिए प्रायश्चित कर्म है। नाम ही मौत का डर दूर करने वाला है। नानक विनती करता है- (हे भाई !) परमात्मा के सुंदर चरणों का आसरा ही भगत-जनों के लिए (जिंदगी का) सरमाया है। 2। हे मेरे स्वामी ! आपके गुण बेअंत हैं। कोई भी जीव (आपके गुणों का अंत) नहीं जानता। (जो भी कोई मनुष्य आपके कुछ गुणों का बयान करता है। वह) आप दयालु के करिश्में देख के (अथवा) भगत-जनों से सुन के (ही) बयान करता है। हे जीवों के मालिक ! हे परमेश्वर ! सारे जीव-जंतु आपको ध्याते हैं। हे तरस-रूप प्रभू ! हे जगत के ईश्वर ! आप अकेला ही दाता है। सारे जीव (आपके दर से) मांगते हैं। हे भाई ! जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं आदर बख्शता है वही साधू है वही सुजान संत है। नानक विनती करता है – हे प्रभू ! जिस जीव पर आप कृपा करता है। वही आपको पहचानता है (आपके साथ गहरी सांझ डालता है)। 3। हे भाई ! मैं गुण-हीन था। मैं निआसरा था (गुरू की कृपा से मैं प्रभू की) शरण आ पड़ा हूँ। (उस) गुरू से सदके जाता हूँ। लिहार जाता हूँ। कुर्बान जाता हूँ। जिसने (मेरे हृदय में प्रभू का) नाम पक्का कर दिया है। गुरू ने (जिस किसी को भी परमात्मा का) नाम दिया (उसके अंदर) आत्मिक आनंद बन गया। (उसकी) सारी मुरादें पूरी हो गई; (गुरू ने उसके अंदर से) ईष्या खत्म कर दी। (उसके अंदर) ठंड पड़ गई। वह (प्रभू से) चिरों से विछुड़ा हुआ (दोबारा) मिल गया। (हे भाई ! जिसने भी गुरू की शरण पड़ कर) बड़ा आनंद पैदा करने वाले हरी-गुण गाने आरम्भ किए। उसके अंदर अटल आत्मिक अडोलता की खुशियां और आनंद बन गए। नानक विनती करता है- हे भाई ! परमात्मा का (ऐसा) नाम पूरे गुरू से (ही) मिलता है। 4। 2।
रामकली महला 5 ॥
रुण झुणो सबदु अनाहदु नित उठि गाईऐ संतन कै ॥
किलविख सभि दोख बिनासनु हरि नामु जपीऐ गुर मंतन कै ॥
हरि नामु लीजै अमिउ पीजै रैणि दिनसु अराधीऐ ॥
जोग दान अनेक किरिआ लगि चरण कमलह साधीऐ ॥
भाउ भगति दइआल मोहन दूख सगले परहरै ॥
बिनवंति नानक तरै सागरु धिआइ सुआमी नरहरै ॥1॥
सुख सागर गोबिंद सिमरणु भगत गावहि गुण तेरे राम ॥
अनद मंगल गुर चरणी लागे पाए सूख घनेरे राम ॥
सुख निधानु मिलिआ दूख हरिआ क्रिपा करि प्रभि राखिआ ॥
हरि चरण लागा भ्रमु भउ भागा हरि नामु रसना भाखिआ ॥
हरि एकु चितवै प्रभु एकु गावै हरि एकु द्रिसटी आइआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! नित्य उठ के (उद्यम करके) साध-संगति में जा के परमात्मा की सिफतसालाह की मीठी-मीठी सुर वाली बाणी एक-रस गानी चाहिए। हे भाई ! परमात्मा का नाम सारे पापों और ऐबों का नाश करने वाला है। यह हरी-नाम गुरू की शिक्षा पर चल कर जपना चाहिए। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपना चाहिए। आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-जल पीना चाहिए। दिन-रात परमात्मा की आराधना करनी चाहिए। प्रभू के सुंदर-चरणों में जुड़ के (मानो) अनेकों योग-साधनों का। अनेकों दान-पुन्यों का। अनेकों ऐसी और क्रियाओं का साधन हो जाता है। हे भाई ! दया के श्रोत मोहन-प्रभू का प्यार प्रभू की भक्ति सारे दुख दूर कर देती है। नानक कहता है- हे भाई ! मालिक प्रभू को सिमर के मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 1। हे सुखों के समुंद्र गोबिंद ! (आपके) भगत (आपका) सिमरन (करते हैं)। आपके गुण गाते हैं; गुरू के चरणों में लग के उनको अनेकों आनंद खुशियां और सुख प्राप्त हो जाते हैं। (हे भाई ! जिसको गुरू मिल जाता है उसको) सुखों का खजाना हरी-नाम मिल जाता है। प्रभू ने कृपा करके जिस मनुष्य की (दुख आदि से) रक्षा की। उसके सारे दुख निर्वित हो गए। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के चरणों में जुड़ गया। जिसने परमात्मा का नाम अपनी जीभ से उचारना शुरू कर दिया। उसका हरेक किस्म का भरम-वहम और डर दूर हो गया। नानक विनती करता है- हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू ने कृपा की। उसको पूरा गुरू मिल गया।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 5 ॥ हे (मेरे) मन ! सदा ही परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।