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अंग 923

अंग
923
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: Bhatt (Baba) Sundar
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामकली सदु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जगि दाता सोइ भगति वछलु तिहु लोइ जीउ ॥
गुर सबदि समावए अवरु न जाणै कोइ जीउ ॥
अवरो न जाणहि सबदि गुर कै एकु नामु धिआवहे ॥
परसादि नानक गुरू अंगद परम पदवी पावहे ॥
आइआ हकारा चलणवारा हरि राम नामि समाइआ ॥
जगि अमरु अटलु अतोलु ठाकुरु भगति ते हरि पाइआ ॥1॥
हरि भाणा गुर भाइआ गुरु जावै हरि प्रभ पासि जीउ ॥
सतिगुरु करे हरि पहि बेनती मेरी पैज रखहु अरदासि जीउ ॥
पैज राखहु हरि जनह केरी हरि देहु नामु निरंजनो ॥
अंति चलदिआ होइ बेली जमदूत कालु निखंजनो ॥
सतिगुरू की बेनती पाई हरि प्रभि सुणी अरदासि जीउ ॥
हरि धारि किरपा सतिगुरु मिलाइआ धनु धनु कहै साबासि जीउ ॥2॥
मेरे सिख सुणहु पुत भाईहो मेरै हरि भाणा आउ मै पासि जीउ ॥
हरि भाणा गुर भाइआ मेरा हरि प्रभु करे साबासि जीउ ॥
भगतु सतिगुरु पुरखु सोई जिसु हरि प्रभ भाणा भावए ॥
आनंद अनहद वजहि वाजे हरि आपि गलि मेलावए ॥
तुसी पुत भाई परवारु मेरा मनि वेखहु करि निरजासि जीउ ॥
धुरि लिखिआ परवाणा फिरै नाही गुरु जाइ हरि प्रभ पासि जीउ ॥3॥
सतिगुरि भाणै आपणै बहि परवारु सदाइआ ॥
मत मै पिछै कोई रोवसी सो मै मूलि न भाइआ ॥
मितु पैझै मितु बिगसै जिसु मित की पैज भावए ॥
तुसी वीचारि देखहु पुत भाई हरि सतिगुरू पैनावए ॥
सतिगुरू परतखि होदै बहि राजु आपि टिकाइआ ॥
सभि सिख बंधप पुत भाई रामदास पैरी पाइआ ॥4॥
अंते सतिगुरु बोलिआ मै पिछै कीरतनु करिअहु निरबाणु जीउ ॥
केसो गोपाल पंडित सदिअहु हरि हरि कथा पड़हि पुराणु जीउ ॥
हरि कथा पड़ीऐ हरि नामु सुणीऐ बेबाणु हरि रंगु गुर भावए ॥
पिंडु पतलि किरिआ दीवा फुल हरि सरि पावए ॥
हरि भाइआ सतिगुरु बोलिआ हरि मिलिआ पुरखु सुजाणु जीउ ॥
रामदास सोढी तिलकु दीआ गुर सबदु सचु नीसाणु जीउ ॥5॥
बाबा सुन्दर गुरु अमरदास के परिवार से थे, उनकी एक रचना ग्रंथ में ‘सद’ के नाम से मिलती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली सदु सतिगुर प्रसादि ॥ जो अकाल-पुरख जगत में (जीवों को) दातें बख्शने वाला है। जो तीनों लोकों में भगती करने वालों को प्यार करता है। (उस अकाल-पुरख में गुरू अमरदास) सतिगुरू के शबद के द्वारा लीन (रहा) है। (और उस के बिना) किसी और को (उस जैसा) नहीं जानता। (गुरू अमरदास जी) सतिगुरू के शबद की बरकति से (अकाल-पुरख के बिना) किसी और को (उस जैसा) नहीं जानते (रहे) हैं। केवल एक ‘नाम’ को ध्याते (रहे) हैं; गुरू नानक और गुरू अंगद देव जी की कृपा से वह ऊँचे दर्जे को प्राप्त कर चुके हैं। (जो गुरू अमरदास) अकाल-पुरख के नाम में लीन था। (धुर से) उनके चलने की आवाज आ गई; (गुरू अमरदास जी ने) जगत में (रहते हुए) अमर। अटल। अतोल ठाकुर को भगती के द्वारा प्राप्त कर लिया हुआ था। 1। अकाल-पुरख की रजा गुरू (अमरदास जी) को प्यारी लगी। और सतिगुरू (जी) अकाल-पुरख के पास जाने को तैयार हो गए। गुरू अमरदास जी ने अकाल-पुरख के आगे ये विनती की- ‘(हे हरी !) मेरी अरदास है कि मेरी लाज रख। हे हरी ! अपने सेवकों की लाज रख। और माया से निर्मोह करने वाला अपना नाम बख्श। जमदूतों और काल को नाश करने वाला नाम देह। जो आखिर में (यहाँ से) चलने के वक्त साथी बने। सतिगुरू की की हुई यह विनती। यह अरदास। अकाल-पुरख प्रभू ने सुन ली। और मेहर करके उसने गुरू अमरदास जी को (अपने चरणों में) जोड़ लिया। और कहने लगे- शाबाश ! आप धन्य है। आप धन्य है। 2। हे मेरे सिखो ! हे मेरे पुत्रो ! हे मेरे भाईयो ! सुनो – “मेरे अकाल-पुरख को (ये) अच्छा लगा है (और उसने मुझे हुकम किया है।) ‘मेरे पास आओ’। अकाल-पुरख की रजा गुरू को मीठी लगी है। मेरा प्रभू (मुझे) शाबाश दे रहा है। हरि भाणा = अकाल-पुरख की रजा। गुर भाइआ = गुरू को मीठा लगा। करे साबासि = शाबाश कह रहा है। वह (मनुष्य) भगत है और पूरा गुरू है जिसको ईश्वर की मर्जी अच्छी लगती है; (उसके अंदर) आनंद के बाजे एक रस बजते हैं। अकाल-पुरख उसको खुद अपने गले से लगाता है आप मेरे पुत्र हैं। मेरे भाई हैं मेरा परिवार हो; मन में किआस कर के देखो। कि धुर से लिखा हुआ हुकम (कभी) टल नहीं सकता; (सो। इस वास्ते अब) गुरू। अकाल-पुरख के पास जा रहा है”। 3। गुरू (अमरदास जी) ने बैठ के अपनी मर्जी से (सारे) परिवार को बुला लिया; (और कहा-) ‘मेरे पीछे कोई रोए नहीं। मुझे वह (रोने वाला) बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगना। जिस मनुष्य को अपने मित्र की महिमा (होती) अच्छी लगती है। वह खुश होता है (जब) उसके मित्र को आदर मिलता है। आप भी। हे मेरे पुत्रो और भाईयो ! (अब) विचार के देख लो कि अकाल-पुरख गुरू को आदर दे रहा है (इसलिए आप भी खुश होवो)। (ये उपदेश दे के। फिर) गुरू (अमरदास जी) ने शारीरिक जामें में रहते हुए ही बैठ के खुद गुरू गद्दी (भी) स्थापित कर दी। (और) सारे सिखों को। साक-संबंधियों को। पुत्रों को और भाईयों को (गुरू) रामदास जी के चरणों से लगा दिया। 4। ज्योती-ज्योति समाने के वक्त गुरू अमरदास जी ने कहा- (हे भाई !) ‘मेरे पीछे निरोल कीर्तन करना। केशव गोपाल (अकाल-पुरख) के पंडितों को बुलाना। जो (आ कर) अकाल-पुरख की कथा वार्ता-रूप पुराण पढ़ें। (याद रखना। मेरे पीछे) अकाल-पुरख की कथा (ही) पढ़नी चाहिए। अकाल-पुरख का नाम ही सुनना चाहिए। बेबाण भी गुरू को (केवल) अकाल-पुरख का प्यार ही अच्छा लगता है। गुरू (तो) पिंड पतॅल। किरिया। दीया और फूल – इन सबको सत्त्संग पर से सदके करता है’। अकाल-पुरख को प्यारे लगे हुए गुरू ने (उस समय) ऐसा कहा। सतिगुरू को सुजान अकाल-पुरख मिल गया। गुरू अमरदास जी ने सोढी (गुरू) रामदास जी को (गुरिआई का) तिलक (और) गुरू की शबद रूपी सच्ची राहदारी बख्शी। 5।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “रामकली सदु सतिगुर प्रसादि ॥ जो अकाल-पुरख जगत में (जीवों को) दातें बख्शने वाला है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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