ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जगि दाता सोइ भगति वछलु तिहु लोइ जीउ ॥
गुर सबदि समावए अवरु न जाणै कोइ जीउ ॥
अवरो न जाणहि सबदि गुर कै एकु नामु धिआवहे ॥
परसादि नानक गुरू अंगद परम पदवी पावहे ॥
आइआ हकारा चलणवारा हरि राम नामि समाइआ ॥
जगि अमरु अटलु अतोलु ठाकुरु भगति ते हरि पाइआ ॥1॥
हरि भाणा गुर भाइआ गुरु जावै हरि प्रभ पासि जीउ ॥
सतिगुरु करे हरि पहि बेनती मेरी पैज रखहु अरदासि जीउ ॥
पैज राखहु हरि जनह केरी हरि देहु नामु निरंजनो ॥
अंति चलदिआ होइ बेली जमदूत कालु निखंजनो ॥
सतिगुरू की बेनती पाई हरि प्रभि सुणी अरदासि जीउ ॥
हरि धारि किरपा सतिगुरु मिलाइआ धनु धनु कहै साबासि जीउ ॥2॥
मेरे सिख सुणहु पुत भाईहो मेरै हरि भाणा आउ मै पासि जीउ ॥
हरि भाणा गुर भाइआ मेरा हरि प्रभु करे साबासि जीउ ॥
भगतु सतिगुरु पुरखु सोई जिसु हरि प्रभ भाणा भावए ॥
आनंद अनहद वजहि वाजे हरि आपि गलि मेलावए ॥
तुसी पुत भाई परवारु मेरा मनि वेखहु करि निरजासि जीउ ॥
धुरि लिखिआ परवाणा फिरै नाही गुरु जाइ हरि प्रभ पासि जीउ ॥3॥
सतिगुरि भाणै आपणै बहि परवारु सदाइआ ॥
मत मै पिछै कोई रोवसी सो मै मूलि न भाइआ ॥
मितु पैझै मितु बिगसै जिसु मित की पैज भावए ॥
तुसी वीचारि देखहु पुत भाई हरि सतिगुरू पैनावए ॥
सतिगुरू परतखि होदै बहि राजु आपि टिकाइआ ॥
सभि सिख बंधप पुत भाई रामदास पैरी पाइआ ॥4॥
अंते सतिगुरु बोलिआ मै पिछै कीरतनु करिअहु निरबाणु जीउ ॥
केसो गोपाल पंडित सदिअहु हरि हरि कथा पड़हि पुराणु जीउ ॥
हरि कथा पड़ीऐ हरि नामु सुणीऐ बेबाणु हरि रंगु गुर भावए ॥
पिंडु पतलि किरिआ दीवा फुल हरि सरि पावए ॥
हरि भाइआ सतिगुरु बोलिआ हरि मिलिआ पुरखु सुजाणु जीउ ॥
रामदास सोढी तिलकु दीआ गुर सबदु सचु नीसाणु जीउ ॥5॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “रामकली सदु सतिगुर प्रसादि ॥ जो अकाल-पुरख जगत में (जीवों को) दातें बख्शने वाला है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।