मोहरी पुतु सनमुखु होइआ रामदासै पैरी पाइ जीउ ॥
सभ पवै पैरी सतिगुरू केरी जिथै गुरू आपु रखिआ ॥
कोई करि बखीली निवै नाही फिरि सतिगुरू आणि निवाइआ ॥
हरि गुरहि भाणा दीई वडिआई धुरि लिखिआ लेखु रजाइ जीउ ॥
कहै सुंदरु सुणहु संतहु सभु जगतु पैरी पाइ जीउ ॥6॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साजनड़ा मेरा साजनड़ा निकटि खलोइअड़ा मेरा साजनड़ा ॥
जानीअड़ा हरि जानीअड़ा नैण अलोइअड़ा हरि जानीअड़ा ॥
नैण अलोइआ घटि घटि सोइआ अति अंम्रित प्रिअ गूड़ा ॥
नालि होवंदा लहि न सकंदा सुआउ न जाणै मूड़ा ॥
माइआ मदि माता होछी बाता मिलणु न जाई भरम धड़ा ॥
कहु नानक गुर बिनु नाही सूझै हरि साजनु सभ कै निकटि खड़ा ॥1॥
गोबिंदा मेरे गोबिंदा प्राण अधारा मेरे गोबिंदा ॥
किरपाला मेरे किरपाला दान दातारा मेरे किरपाला ॥
दान दातारा अपर अपारा घट घट अंतरि सोहनिआ ॥
इक दासी धारी सबल पसारी जीअ जंत लै मोहनिआ ॥
जिस नो राखै सो सचु भाखै गुर का सबदु बीचारा ॥
कहु नानक जो प्रभ कउ भाणा तिस ही कउ प्रभु पिआरा ॥2॥
माणो प्रभ माणो मेरे प्रभ का माणो ॥
जाणो प्रभु जाणो सुआमी सुघड़ु सुजाणो ॥
सुघड़ सुजाना सद परधाना अंम्रितु हरि का नामा ॥
चाखि अघाणे सारिगपाणे जिन कै भाग मथाना ॥
तिन ही पाइआ तिनहि धिआइआ सगल तिसै का माणो ॥
कहु नानक थिरु तखति निवासी सचु तिसै दीबाणो ॥3॥
मंगला हरि मंगला मेरे प्रभ कै सुणीऐ मंगला ॥
सोहिलड़ा प्रभ सोहिलड़ा अनहद धुनीऐ सोहिलड़ा ॥
अनहद वाजे सबद अगाजे नित नित जिसहि वधाई ॥
सो प्रभु धिआईऐ सभु किछु पाईऐ मरै न आवै जाई ॥
चूकी पिआसा पूरन आसा गुरमुखि मिलु निरगुनीऐ ॥
कहु नानक घरि प्रभ मेरे कै नित नित मंगलु सुनीऐ ॥4॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब गुरू अमरदास जी ने बचन किया (कि सारे गुरू रामदास जी के चरणों में लगें।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।