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अंग ९१४ · रामकली

अंग
914
रामकली
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  1. काहू बिहावै माइ बाप पूत ॥
  2. दावा अगनि रहे हरि बूट ॥

काहू बिहावै माइ बाप पूत ॥

अंग ९१३ से चला आ रहा अंश

काहू बिहावै माइ बाप पूत ॥
काहू बिहावै राज मिलख वापारा ॥
संत बिहावै हरि नाम अधारा ॥1॥
रचना साचु बनी ॥
सभ का एकु धनी ॥1॥ रहाउ ॥
काहू बिहावै बेद अरु बादि ॥
काहू बिहावै रसना सादि ॥
काहू बिहावै लपटि संगि नारी ॥
संत रचे केवल नाम मुरारी ॥2॥
काहू बिहावै खेलत जूआ ॥
काहू बिहावै अमली हूआ ॥
काहू बिहावै पर दरब चोुराए ॥
हरि जन बिहावै नाम धिआए ॥3॥
काहू बिहावै जोग तप पूजा ॥
काहू रोग सोग भरमीजा ॥
काहू पवन धार जात बिहाए ॥
संत बिहावै कीरतनु गाए ॥4॥
काहू बिहावै दिनु रैनि चालत ॥
काहू बिहावै सो पिड़ु मालत ॥
काहू बिहावै बाल पड़ावत ॥
संत बिहावै हरि जसु गावत ॥5॥
काहू बिहावै नट नाटिक निरते ॥
काहू बिहावै जीआइह हिरते ॥
काहू बिहावै राज महि डरते ॥
संत बिहावै हरि जसु करते ॥6॥
काहू बिहावै मता मसूरति ॥
काहू बिहावै सेवा जरूरति ॥
काहू बिहावै सोधत जीवत ॥
संत बिहावै हरि रसु पीवत ॥7॥
जितु को लाइआ तित ही लगाना ॥
ना को मूड़ु नही को सिआना ॥
करि किरपा जिसु देवै नाउ ॥ नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥8॥3॥

हिन्दी अर्थ: किसी की उम्र माता-पिता-पुत्र आदि परिवार के मोह में गुजर रही है; किसी मनुष्य की उम्र राज भोग में। जमीन की मल्कियत। व्यापार आदि करने में गुजर रही है। (हे भाई ! सिर्फ) संत की उम्र परमात्मा के नाम के आसरे बीतती गुजरती है। 1। हे भाई ! परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। ये सारी सृष्टि उसी की पैदा की हुई है। एक वही हरेक जीव का मालिक है। 1। रहाउ। हे भाई ! किसी मनुष्य की उम्र वेद आदि धर्म-पुस्तकें पढ़ने और (धार्मिक) चर्चा में गुजर रही है; किसी मनुष्य की जिंदगी जीभ के स्वाद में बीत रही है; किसी की उम्र स्त्री के साथ काम-पूर्ति में गुजर जाती है। हे भाई ! संत ही सिर्फ परमात्मा के नाम में मस्त रहते हैं। 2। हे भाई ! किसी मनुष्य की उम्र जूआ खेलते हुए गुजर जाती है; कोई मनुष्य अफीम आदि नशे का आदी हो जाता है उसकी उम्र नशों में ही बीतती है; किसी की उम्र पराया धन चुराते हुए व्यतीत होती है; पर प्रभू के भक्तों की उम्र प्रभू का नाम सिमरते हुए गुजरती है। 3। हे भाई ! किसी मनुष्य की उम्र योग-साधना करते हुए। किसी की धूणियाँ तपाते हुए। किसी की देव-पूजा करते हुए गुजरती है; किसी व्यक्ति की उम्र रोगों में। ग़मों में। अनेकों भटकनों में बीतती है; किसी मनुष्य की सारी उम्र प्राणायाम करते हुए गुजर जाती है; पर संत की उम्र गुजरती है परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते हुए। 4। हे भाई ! किसी की उम्र बीतती है दिन-रात चलते हुए। पर किसी की गुजर जाती है एक जगह पर ठिकाना बनाए बैठे हुए; किसी मनुष्य की उम्र बच्चे पढ़ाते हुए गुजर जाती है; संत की उम्र बीतती है परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाते हुए। 5। किसी मनुष्य की जिंदगी नटों वाले नाटक व नृत्य करते हुए गुजर जाती है; किसी मनुष्य की ये उम्र डाके मारते हुए गुजर जाती है; किसी मनुष्य की जिंदगी राज दरबार में (रह के) थर-थर काँपते हुए गुजरती है; संत की उम्र प्रभू की सिफत-सालाह करते हुए बीतती है। 6। (दुनियावी मुश्किलों के कारण) किसी की उम्र गिनते-गिनते बीत जाती है; (जिंदगी की) जरूरतें पूरी करने के लिए किसी की जिंदगी नौकरी करते हुए गुजर जाती है; किसी मनुष्य की सारी उम्र खोज करते हुए बीतती है; संत की उम्र बीतती है परमात्मा का नाम-अमृत पीते हुए। 7। पर। हे भाई ! जिस काम में परमात्मा ने जिसको लगाया है उसमें ही वह लगा हुआ है। ना कोई जीव मूर्ख है। ना ही कोई समझदार। हे नानक (कह-) प्रभू मेहर करके जिस मनुष्य को अपना नाम बख्शता है। मैं उससे सदके जाता हूँ। 8। 3।

दावा अगनि रहे हरि बूट ॥

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रामकली महला 5 ॥
दावा अगनि रहे हरि बूट ॥
मात गरभ संकट ते छूट ॥
जा का नामु सिमरत भउ जाइ ॥
तैसे संत जना राखै हरि राइ ॥1॥
ऐसे राखनहार दइआल ॥
जत कत देखउ तुम प्रतिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
जलु पीवत जिउ तिखा मिटंत ॥
धन बिगसै ग्रिहि आवत कंत ॥
लोभी का धनु प्राण अधारु ॥
तिउ हरि जन हरि हरि नाम पिआरु ॥2॥
किरसानी जिउ राखै रखवाला ॥
मात पिता दइआ जिउ बाला ॥
प्रीतमु देखि प्रीतमु मिलि जाइ ॥
तिउ हरि जन राखै कंठि लाइ ॥3॥
जिउ अंधुले पेखत होइ अनंद ॥
गूंगा बकत गावै बहु छंद ॥
पिंगुल परबत परते पारि ॥
हरि कै नामि सगल उधारि ॥4॥
जिउ पावक संगि सीत को नास ॥
ऐसे प्राछत संतसंगि बिनास ॥
जिउ साबुनि कापर ऊजल होत ॥
नाम जपत सभु भ्रमु भउ खोत ॥5॥
जिउ चकवी सूरज की आस ॥
जिउ चात्रिक बूंद की पिआस ॥
जिउ कुरंक नाद करन समाने ॥
तिउ हरि नाम हरि जन मनहि सुखाने ॥6॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जंगल की आग हरे पौधे में टिकी रहती है (उसको नहीं जलाती। बाकी जंगल को राख कर देती है); बच्चा माँ के पेट में दुखों से बचा रहता है; इसी तरह वह प्रभू-पातशाह जिसका नाम सिमरने से हरेक किस्म का डर दूर हो जाता है। अपने संत जनों की रक्षा करता है। 1। हे सबकी रक्षा करने के समर्थ प्रभू ! आप बड़ा ही दया का घर हैं। मैं जिधर देखता हूँ। आप ही सबकी पालना करते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जैसे पानी पीने से प्यास मिट जाती है। जैसे पति के घर आने पर स्त्री खुश हो जाती है। जैसे धन-पदार्थ लोभी मनुष्य की जिंदगी का सहारा बने रहते हैं। वैसे ही प्रभू के भक्तों का प्रभू के नाम से प्यार होता है। 2। हे भाई ! जैसे रखवाला खेती की रखवाली करता है। जैसे माता-पिता अपने बच्चे से प्यार करते हैं। जैसे कोई मित्र अपने मित्र को देख के (उसको) मिल के जाता है। वैसे ही परमात्मा अपने भक्तों को अपने गले से लगा के रखता है। 3। हे भाई ! जैसे यदि किसी अंधे व्यक्ति को देखने की शक्ति मिल जाए तो वह खुश होता है। अगर गूँगा बोलने लग जाए (तो वह खुश होता है। और) कई गीत गाने लग जाता है। कोई लंगड़ा पहाड़ों को पार लांघ सकने पर प्रसन्न होता है। इसी तरह परमात्मा के नाम की बरकति से (जो) दुनिया का उद्धार होता है (इससे वह बहुत खुश होता है)। 4। हे भाई ! जैसे आग से ठंड का नाश हो जाता है। वैसे संतों की संगति करने से पापों का नाश हो जाता है। हे भाई ! जैसे साबुन से कपड़े साफ-सुथरे हो जाते हैं। वैसे ही परमात्मा का नाम जपने से हरेक वहिम हरेक डर दूर हो जाता है। 5। हे भाई ! जैसे चकवी (चकवे को मिलने के लिए) सूरज (के चढ़ने) का इन्तजार करती रहती है। जैसे (प्यास बुझाने के लिए) पपीहे को बरखा की बूँदों की लालसा होती है। जैसे हिरन के कान घंडेहेड़े की आवाज में मस्त रहते हैं। वैसे ही संत जनों के मन को परमात्मा का नाम प्यारा लगता है। 6।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 914 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९१४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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