Lulla Family

अंग 914

अंग
914
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
काहू बिहावै माइ बाप पूत ॥
काहू बिहावै राज मिलख वापारा ॥
संत बिहावै हरि नाम अधारा ॥1॥
रचना साचु बनी ॥
सभ का एकु धनी ॥1॥ रहाउ ॥
काहू बिहावै बेद अरु बादि ॥
काहू बिहावै रसना सादि ॥
काहू बिहावै लपटि संगि नारी ॥
संत रचे केवल नाम मुरारी ॥2॥
काहू बिहावै खेलत जूआ ॥
काहू बिहावै अमली हूआ ॥
काहू बिहावै पर दरब चोुराए ॥
हरि जन बिहावै नाम धिआए ॥3॥
काहू बिहावै जोग तप पूजा ॥
काहू रोग सोग भरमीजा ॥
काहू पवन धार जात बिहाए ॥
संत बिहावै कीरतनु गाए ॥4॥
काहू बिहावै दिनु रैनि चालत ॥
काहू बिहावै सो पिड़ु मालत ॥
काहू बिहावै बाल पड़ावत ॥
संत बिहावै हरि जसु गावत ॥5॥
काहू बिहावै नट नाटिक निरते ॥
काहू बिहावै जीआइह हिरते ॥
काहू बिहावै राज महि डरते ॥
संत बिहावै हरि जसु करते ॥6॥
काहू बिहावै मता मसूरति ॥
काहू बिहावै सेवा जरूरति ॥
काहू बिहावै सोधत जीवत ॥
संत बिहावै हरि रसु पीवत ॥7॥
जितु को लाइआ तित ही लगाना ॥
ना को मूड़ु नही को सिआना ॥
करि किरपा जिसु देवै नाउ ॥ नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥8॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: किसी की उम्र माता-पिता-पुत्र आदि परिवार के मोह में गुजर रही है; किसी मनुष्य की उम्र राज भोग में। जमीन की मल्कियत। व्यापार आदि करने में गुजर रही है। (हे भाई ! सिर्फ) संत की उम्र परमात्मा के नाम के आसरे बीतती गुजरती है। 1। हे भाई ! परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। ये सारी सृष्टि उसी की पैदा की हुई है। एक वही हरेक जीव का मालिक है। 1। रहाउ। हे भाई ! किसी मनुष्य की उम्र वेद आदि धर्म-पुस्तकें पढ़ने और (धार्मिक) चर्चा में गुजर रही है; किसी मनुष्य की जिंदगी जीभ के स्वाद में बीत रही है; किसी की उम्र स्त्री के साथ काम-पूर्ति में गुजर जाती है। हे भाई ! संत ही सिर्फ परमात्मा के नाम में मस्त रहते हैं। 2। हे भाई ! किसी मनुष्य की उम्र जूआ खेलते हुए गुजर जाती है; कोई मनुष्य अफीम आदि नशे का आदी हो जाता है उसकी उम्र नशों में ही बीतती है; किसी की उम्र पराया धन चुराते हुए व्यतीत होती है; पर प्रभू के भक्तों की उम्र प्रभू का नाम सिमरते हुए गुजरती है। 3। हे भाई ! किसी मनुष्य की उम्र योग-साधना करते हुए। किसी की धूणियाँ तपाते हुए। किसी की देव-पूजा करते हुए गुजरती है; किसी व्यक्ति की उम्र रोगों में। ग़मों में। अनेकों भटकनों में बीतती है; किसी मनुष्य की सारी उम्र प्राणायाम करते हुए गुजर जाती है; पर संत की उम्र गुजरती है परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाते हुए। 4। हे भाई ! किसी की उम्र बीतती है दिन-रात चलते हुए। पर किसी की गुजर जाती है एक जगह पर ठिकाना बनाए बैठे हुए; किसी मनुष्य की उम्र बच्चे पढ़ाते हुए गुजर जाती है; संत की उम्र बीतती है परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाते हुए। 5। किसी मनुष्य की जिंदगी नटों वाले नाटक व नृत्य करते हुए गुजर जाती है; किसी मनुष्य की ये उम्र डाके मारते हुए गुजर जाती है; किसी मनुष्य की जिंदगी राज दरबार में (रह के) थर-थर काँपते हुए गुजरती है; संत की उम्र प्रभू की सिफत-सालाह करते हुए बीतती है। 6। (दुनियावी मुश्किलों के कारण) किसी की उम्र गिनते-गिनते बीत जाती है; (जिंदगी की) जरूरतें पूरी करने के लिए किसी की जिंदगी नौकरी करते हुए गुजर जाती है; किसी मनुष्य की सारी उम्र खोज करते हुए बीतती है; संत की उम्र बीतती है परमात्मा का नाम-अमृत पीते हुए। 7। पर। हे भाई ! जिस काम में परमात्मा ने जिसको लगाया है उसमें ही वह लगा हुआ है। ना कोई जीव मूर्ख है। ना ही कोई समझदार। हे नानक (कह-) प्रभू मेहर करके जिस मनुष्य को अपना नाम बख्शता है। मैं उससे सदके जाता हूँ। 8। 3।
रामकली महला 5 ॥
दावा अगनि रहे हरि बूट ॥
मात गरभ संकट ते छूट ॥
जा का नामु सिमरत भउ जाइ ॥
तैसे संत जना राखै हरि राइ ॥1॥
ऐसे राखनहार दइआल ॥
जत कत देखउ तुम प्रतिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
जलु पीवत जिउ तिखा मिटंत ॥
धन बिगसै ग्रिहि आवत कंत ॥
लोभी का धनु प्राण अधारु ॥
तिउ हरि जन हरि हरि नाम पिआरु ॥2॥
किरसानी जिउ राखै रखवाला ॥
मात पिता दइआ जिउ बाला ॥
प्रीतमु देखि प्रीतमु मिलि जाइ ॥
तिउ हरि जन राखै कंठि लाइ ॥3॥
जिउ अंधुले पेखत होइ अनंद ॥
गूंगा बकत गावै बहु छंद ॥
पिंगुल परबत परते पारि ॥
हरि कै नामि सगल उधारि ॥4॥
जिउ पावक संगि सीत को नास ॥
ऐसे प्राछत संतसंगि बिनास ॥
जिउ साबुनि कापर ऊजल होत ॥
नाम जपत सभु भ्रमु भउ खोत ॥5॥
जिउ चकवी सूरज की आस ॥
जिउ चात्रिक बूंद की पिआस ॥
जिउ कुरंक नाद करन समाने ॥
तिउ हरि नाम हरि जन मनहि सुखाने ॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जंगल की आग हरे पौधे में टिकी रहती है (उसको नहीं जलाती। बाकी जंगल को राख कर देती है); बच्चा माँ के पेट में दुखों से बचा रहता है; इसी तरह वह प्रभू-पातशाह जिसका नाम सिमरने से हरेक किस्म का डर दूर हो जाता है। अपने संत जनों की रक्षा करता है। 1। हे सबकी रक्षा करने के समर्थ प्रभू ! आप बड़ा ही दया का घर है। मैं जिधर देखता हूँ। आप ही सबकी पालना करता ह। 1। रहाउ। हे भाई ! जैसे पानी पीने से प्यास मिट जाती है। जैसे पति के घर आने पर स्त्री खुश हो जाती है। जैसे धन-पदार्थ लोभी मनुष्य की जिंदगी का सहारा बने रहते हैं। वैसे ही प्रभू के भक्तों का प्रभू के नाम से प्यार होता है। 2। हे भाई ! जैसे रखवाला खेती की रखवाली करता है। जैसे माता-पिता अपने बच्चे से प्यार करते हैं। जैसे कोई मित्र अपने मित्र को देख के (उसको) मिल के जाता है। वैसे ही परमात्मा अपने भक्तों को अपने गले से लगा के रखता है। 3। हे भाई ! जैसे यदि किसी अंधे व्यक्ति को देखने की शक्ति मिल जाए तो वह खुश होता है। अगर गूँगा बोलने लग जाए (तो वह खुश होता है। और) कई गीत गाने लग जाता है। कोई लंगड़ा पहाड़ों को पार लांघ सकने पर प्रसन्न होता है। इसी तरह परमात्मा के नाम की बरकति से (जो) दुनिया का उद्धार होता है (इससे वह बहुत खुश होता है)। 4। हे भाई ! जैसे आग से ठंड का नाश हो जाता है। वैसे संतों की संगति करने से पापों का नाश हो जाता है। हे भाई ! जैसे साबुन से कपड़े साफ-सुथरे हो जाते हैं। वैसे ही परमात्मा का नाम जपने से हरेक वहिम हरेक डर दूर हो जाता है। 5। हे भाई ! जैसे चकवी (चकवे को मिलने के लिए) सूरज (के चढ़ने) का इन्तजार करती रहती है। जैसे (प्यास बुझाने के लिए) पपीहे को बरखा की बूँदों की लालसा होती है। जैसे हिरन के कान घंडेहेड़े की आवाज में मस्त रहते हैं। वैसे ही संत जनों के मन को परमात्मा का नाम प्यारा लगता है। 6।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “किसी की उम्र माता-पिता-पुत्र आदि परिवार के मोह में गुजर रही है; किसी मनुष्य की उम्र राज भोग में।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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