काहू बिहावै राज मिलख वापारा ॥
संत बिहावै हरि नाम अधारा ॥1॥
रचना साचु बनी ॥
सभ का एकु धनी ॥1॥ रहाउ ॥
काहू बिहावै बेद अरु बादि ॥
काहू बिहावै रसना सादि ॥
काहू बिहावै लपटि संगि नारी ॥
संत रचे केवल नाम मुरारी ॥2॥
काहू बिहावै खेलत जूआ ॥
काहू बिहावै अमली हूआ ॥
काहू बिहावै पर दरब चोुराए ॥
हरि जन बिहावै नाम धिआए ॥3॥
काहू बिहावै जोग तप पूजा ॥
काहू रोग सोग भरमीजा ॥
काहू पवन धार जात बिहाए ॥
संत बिहावै कीरतनु गाए ॥4॥
काहू बिहावै दिनु रैनि चालत ॥
काहू बिहावै सो पिड़ु मालत ॥
काहू बिहावै बाल पड़ावत ॥
संत बिहावै हरि जसु गावत ॥5॥
काहू बिहावै नट नाटिक निरते ॥
काहू बिहावै जीआइह हिरते ॥
काहू बिहावै राज महि डरते ॥
संत बिहावै हरि जसु करते ॥6॥
काहू बिहावै मता मसूरति ॥
काहू बिहावै सेवा जरूरति ॥
काहू बिहावै सोधत जीवत ॥
संत बिहावै हरि रसु पीवत ॥7॥
जितु को लाइआ तित ही लगाना ॥
ना को मूड़ु नही को सिआना ॥
करि किरपा जिसु देवै नाउ ॥ नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥8॥3॥
दावा अगनि रहे हरि बूट ॥
मात गरभ संकट ते छूट ॥
जा का नामु सिमरत भउ जाइ ॥
तैसे संत जना राखै हरि राइ ॥1॥
ऐसे राखनहार दइआल ॥
जत कत देखउ तुम प्रतिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
जलु पीवत जिउ तिखा मिटंत ॥
धन बिगसै ग्रिहि आवत कंत ॥
लोभी का धनु प्राण अधारु ॥
तिउ हरि जन हरि हरि नाम पिआरु ॥2॥
किरसानी जिउ राखै रखवाला ॥
मात पिता दइआ जिउ बाला ॥
प्रीतमु देखि प्रीतमु मिलि जाइ ॥
तिउ हरि जन राखै कंठि लाइ ॥3॥
जिउ अंधुले पेखत होइ अनंद ॥
गूंगा बकत गावै बहु छंद ॥
पिंगुल परबत परते पारि ॥
हरि कै नामि सगल उधारि ॥4॥
जिउ पावक संगि सीत को नास ॥
ऐसे प्राछत संतसंगि बिनास ॥
जिउ साबुनि कापर ऊजल होत ॥
नाम जपत सभु भ्रमु भउ खोत ॥5॥
जिउ चकवी सूरज की आस ॥
जिउ चात्रिक बूंद की पिआस ॥
जिउ कुरंक नाद करन समाने ॥
तिउ हरि नाम हरि जन मनहि सुखाने ॥6॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “किसी की उम्र माता-पिता-पुत्र आदि परिवार के मोह में गुजर रही है; किसी मनुष्य की उम्र राज भोग में।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।