कोई कहै मै धनहि पसारा ॥
मोहि दीन हरि हरि आधारा ॥4॥
किनही घूघर निरति कराई ॥
किनहू वरत नेम माला पाई ॥
किनही तिलकु गोपी चंदन लाइआ ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि धिआइआ ॥5॥
किनही सिध बहु चेटक लाए ॥
किनही भेख बहु थाट बनाए ॥
किनही तंत मंत बहु खेवा ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि सेवा ॥6॥
कोई चतुरु कहावै पंडित ॥
को खटु करम सहित सिउ मंडित ॥
कोई करै आचार सुकरणी ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि सरणी ॥7॥
सगले करम धरम जुग सोधे ॥
बिनु नावै इहु मनु न प्रबोधे ॥
कहु नानक जउ साधसंगु पाइआ ॥
बूझी त्रिसना महा सीतलाइआ ॥8॥1॥
इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥
माटी का ले देहुरा करिआ ॥
उकति जोति लै सुरति परीखिआ ॥
मात गरभ महि जिनि तू राखिआ ॥1॥
राखनहारु सम्हारि जना ॥
सगले छोडि बीचार मना ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि दीए तुधु बाप महतारी ॥
जिनि दीए भ्रात पुत हारी ॥
जिनि दीए तुधु बनिता अरु मीता ॥
तिसु ठाकुर कउ रखि लेहु चीता ॥2॥
जिनि दीआ तुधु पवनु अमोला ॥
जिनि दीआ तुधु नीरु निरमोला ॥
जिनि दीआ तुधु पावकु बलना ॥
तिसु ठाकुर की रहु मन सरना ॥3॥
छतीह अंम्रित जिनि भोजन दीए ॥
अंतरि थान ठहरावन कउ कीए ॥
बसुधा दीओ बरतनि बलना ॥
तिसु ठाकुर के चिति रखु चरना ॥4॥
पेखन कउ नेत्र सुनन कउ करना ॥
हसत कमावन बासन रसना ॥
चरन चलन कउ सिरु कीनो मेरा ॥
मन तिसु ठाकुर के पूजहु पैरा ॥5॥
अपवित्र पवित्रु जिनि तू करिआ ॥
सगल जोनि महि तू सिरि धरिआ ॥
अब तू सीझु भावै नही सीझै ॥
कारजु सवरै मन प्रभु धिआईजै ॥6॥
ईहा ऊहा एकै ओही ॥
जत कत देखीऐ तत तत तोही ॥
तिसु सेवत मनि आलसु करै ॥
जिसु विसरिऐ इक निमख न सरै ॥7॥
हम अपराधी निरगुनीआरे ॥
ना किछु सेवा ना करमारे ॥
गुरु बोहिथु वडभागी मिलिआ ॥
नानक दास संगि पाथर तरिआ ॥8॥2॥
काहू बिहावै रंग रस रूप ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “किसी ने कहा है कि मेरे बहुत सारे भाई हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।