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अंग 913

अंग
913
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
किनही कहिआ बाह बहु भाई ॥
कोई कहै मै धनहि पसारा ॥
मोहि दीन हरि हरि आधारा ॥4॥
किनही घूघर निरति कराई ॥
किनहू वरत नेम माला पाई ॥
किनही तिलकु गोपी चंदन लाइआ ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि धिआइआ ॥5॥
किनही सिध बहु चेटक लाए ॥
किनही भेख बहु थाट बनाए ॥
किनही तंत मंत बहु खेवा ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि सेवा ॥6॥
कोई चतुरु कहावै पंडित ॥
को खटु करम सहित सिउ मंडित ॥
कोई करै आचार सुकरणी ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि सरणी ॥7॥
सगले करम धरम जुग सोधे ॥
बिनु नावै इहु मनु न प्रबोधे ॥
कहु नानक जउ साधसंगु पाइआ ॥
बूझी त्रिसना महा सीतलाइआ ॥8॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: किसी ने कहा है कि मेरे बहुत सारे भाई हैं। मेरे बहुत सारे साथी हैं। कोई कहता है मैंने बहुत धन कमाया हुआ है। पर मुझ गरीब को सिर्फ परमात्मा का आसरा है। 4। (हे भाई !) किसी ने घुंघरू बाँध के (देवताओं के आगे) नाच शुरू किए हुए हैं। किसी ने (गले में) माला डाली हुई है और व्रत रखने के नियम धारे हुए हैं। किसी मनुष्य ने (माथे पर) गोपी चंदन का टीका लगाया हुआ है। पर मैं गरीब तो सिर्फ परमात्मा का नाम ही सिमरता हूँ। 5। (हे भाई !) किसी मनुष्य ने सिधों वाले नाटक-चेटक दिखाने शुरू किए हुए हैं। किसी मनुष्य ने साधुओं वाले कई भेष बनाए हुए हैं। किसी मनुष्य ने अनेकों प्रकार की तंत्रों-मंत्रों की दुकान चलाई हुई है। पर मैं गरीब सिर्फ परमात्मा की भगती ही करता हूँ। 6। (हे भाई !) कोई मनुष्य (अपने आप को) समझदार पंडित कहलवाता है। कोई मनुष्य (अपने आप को) शास्त्रों से सजाए हुए छे कर्मों से सजाए रखता है। कोई मनुष्य शास्त्रों के कर्म-कांड को श्रेष्ठ करणी समझ के करता रहता है। पर मैं गरीब सिर्फ परमात्मा की शरण पड़ा रहता हूँ। 7। (हे भाई ! हमने) सारे जुगों सारे कर्म-धर्म परख के देख लिए हैं। परमात्मा के नाम के बिना (माया के मोह की नींद में सोया हुआ) यह मन जागता नहीं। हे नानक ! कह- (हे भाई !) जब (किसी मनुष्य ने) साध-संगति प्राप्त कर ली। (उसके अंदर से माया की) तृष्णा बुझ गई। उसका मन ठंडा-ठार हो गया। 8। 1।
रामकली महला 5 ॥
इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥
माटी का ले देहुरा करिआ ॥
उकति जोति लै सुरति परीखिआ ॥
मात गरभ महि जिनि तू राखिआ ॥1॥
राखनहारु सम्हारि जना ॥
सगले छोडि बीचार मना ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि दीए तुधु बाप महतारी ॥
जिनि दीए भ्रात पुत हारी ॥
जिनि दीए तुधु बनिता अरु मीता ॥
तिसु ठाकुर कउ रखि लेहु चीता ॥2॥
जिनि दीआ तुधु पवनु अमोला ॥
जिनि दीआ तुधु नीरु निरमोला ॥
जिनि दीआ तुधु पावकु बलना ॥
तिसु ठाकुर की रहु मन सरना ॥3॥
छतीह अंम्रित जिनि भोजन दीए ॥
अंतरि थान ठहरावन कउ कीए ॥
बसुधा दीओ बरतनि बलना ॥
तिसु ठाकुर के चिति रखु चरना ॥4॥
पेखन कउ नेत्र सुनन कउ करना ॥
हसत कमावन बासन रसना ॥
चरन चलन कउ सिरु कीनो मेरा ॥
मन तिसु ठाकुर के पूजहु पैरा ॥5॥
अपवित्र पवित्रु जिनि तू करिआ ॥
सगल जोनि महि तू सिरि धरिआ ॥
अब तू सीझु भावै नही सीझै ॥
कारजु सवरै मन प्रभु धिआईजै ॥6॥
ईहा ऊहा एकै ओही ॥
जत कत देखीऐ तत तत तोही ॥
तिसु सेवत मनि आलसु करै ॥
जिसु विसरिऐ इक निमख न सरै ॥7॥
हम अपराधी निरगुनीआरे ॥
ना किछु सेवा ना करमारे ॥
गुरु बोहिथु वडभागी मिलिआ ॥
नानक दास संगि पाथर तरिआ ॥8॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू ने पिता की बूँद से आपको बनाया। आपका यह मिट्टी का पुतला घड़ दिया; जिस प्रभू ने बुद्धि। जीवात्मा और परखने के लिए ताकत आपके अंदर डाल के आपको माँ के पेट में (सही सलामत) रखा (उसको हमेशा याद रख)। 1। हे भाई ! सदा रक्षा कर सकने वाले परमात्मा को ययाद करा कर। हे मेरे मन ! (प्रभू की याद के बिना) और सारे विचार (जो विचार प्रभू की याद को भुलाते हैं। वह) छोड़ दे। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस प्रभू ने आपको माता-पिता दिए। जिस प्रभू ने आपको भाई पुत्र और नौकर दिए। जिस प्रभू ने आपको सत्री और सज्जन-मित्र दिए। उस मालिक प्रभू को सदा अपने चित्त में टिकाए रख। 2। हे भाई ! जिस प्रभू ने आपको किसी भी मूल्य पर ना मिल सकने वाली (अनमोल) हवा दी। जिस प्रभू ने आपको निर्मोलक पानी दिया। जिस प्रभू ने आपको आग दी। ईधन दिया। हे मन ! आप उस मालिक-प्रभू की शरण पड़ा रह। 3। हे भाई ! जिस परमात्मा ने आपको अनेकों किस्मों के स्वादिष्ट खाने दिए। इन खानों को हज़म करने के लिए आपके अंदर मेहदा आदि अंग बनाए। आपको धरती दी। आपको और कार्य-व्यवहार दिया। उस मालिक-प्रभू के चरण अपने चित्त में परोए रख। 4। जिसने) आपको (दुनिया के रंग-तमाशे) देखने के लिए आँखें दी हैं और सुनने के लिए कान दिए हैं। जिसने काम करने के लिए आपको हाथ दिए हैं। और नाक व जीभ दी है। जिसने चलने के लिए आपको पैर दिए हैं और सिर (सभी अंगों में) श्रेष्ठ बनाया है। हे मेरे मन ! उस मालिक प्रभू के पैर सदा पूजता रह (निम्रता धारण करके उस प्रभू का सिमरन करता रह। (हे भाई ! उस परमात्मा को सिमरा कर) जिसने गंदगी से आपको पवित्र बना दिया। जिसने आपको सारी जूनियों में सरदार बना दिया। आपकी मर्जी है अब आप (उसका सिमरन करके जिंदगी में) कामयाब हैं चाहे ना हैं। पर हे मन ! परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। (सिमरन करने से ही मानस जीवन का) मनोरथ सफल होता है। 6। हे भाई ! इस लोक में और परलोक में एक वह परमात्मा ही (सहायक) है। जहाँ कहीं भी देखा जाए वहीं-वहीं (परमात्मा ही) आपके साथ है। (पर देखिए मनुष्य के दुर्भाग्य !) उस परमात्मा को सिमरने से (मनुष्य) मन में आलस करता है। जिसके बिसरने से एक पल भर समय भी आसान नहीं गुजर सकता। 7। (हे भाई ! माया के मोह में फंस के) हम संसारी जीव पापी बन जाते हैं। हम ना कोई सेवा-भक्ति करते हैं। ना ही हमारे कर्म अच्छे होते हैं। हे दास नानक ! (कह-) जिन मनुष्यों को बहुत भाग्यों से गुरू-जहाज मिल गया। उस जहाज़ की संगति में वह पत्थर-दिल मनुष्य भी संसार से पार लांघ गए। 8। 2।
रामकली महला 5 ॥
काहू बिहावै रंग रस रूप ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (चाहे परमात्मा ही हरेक जीव का मालिक है फिर भी) किसी मनुष्य की उम्र रंग-तमाशों। दुनियां के सुंदर रूपों और पदार्थों के रसों-स्वादों में बीत रही है;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “किसी ने कहा है कि मेरे बहुत सारे भाई हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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