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अंग ९१३ · रामकली

अंग
913
रामकली
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  1. किनही कहिआ बाह बहु भाई ॥
  2. इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥
  3. काहू बिहावै रंग रस रूप ॥

किनही कहिआ बाह बहु भाई ॥

अंग ९१२ से चला आ रहा अंश

किनही कहिआ बाह बहु भाई ॥
कोई कहै मै धनहि पसारा ॥
मोहि दीन हरि हरि आधारा ॥4॥
किनही घूघर निरति कराई ॥
किनहू वरत नेम माला पाई ॥
किनही तिलकु गोपी चंदन लाइआ ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि धिआइआ ॥5॥
किनही सिध बहु चेटक लाए ॥
किनही भेख बहु थाट बनाए ॥
किनही तंत मंत बहु खेवा ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि सेवा ॥6॥
कोई चतुरु कहावै पंडित ॥
को खटु करम सहित सिउ मंडित ॥
कोई करै आचार सुकरणी ॥
मोहि दीन हरि हरि हरि सरणी ॥7॥
सगले करम धरम जुग सोधे ॥
बिनु नावै इहु मनु न प्रबोधे ॥
कहु नानक जउ साधसंगु पाइआ ॥
बूझी त्रिसना महा सीतलाइआ ॥8॥1॥

हिन्दी अर्थ: किसी ने कहा है कि मेरे बहुत सारे भाई हैं। मेरे बहुत सारे साथी हैं। कोई कहता है मैंने बहुत धन कमाया हुआ है। पर मुझ गरीब को सिर्फ परमात्मा का आसरा है। 4। (हे भाई !) किसी ने घुंघरू बाँध के (देवताओं के आगे) नाच शुरू किए हुए हैं। किसी ने (गले में) माला डाली हुई है और व्रत रखने के नियम धारे हुए हैं। किसी मनुष्य ने (माथे पर) गोपी चंदन का टीका लगाया हुआ है। पर मैं गरीब तो सिर्फ परमात्मा का नाम ही सिमरता हूँ। 5। (हे भाई !) किसी मनुष्य ने सिधों वाले नाटक-चेटक दिखाने शुरू किए हुए हैं। किसी मनुष्य ने साधुओं वाले कई भेष बनाए हुए हैं। किसी मनुष्य ने अनेकों प्रकार की तंत्रों-मंत्रों की दुकान चलाई हुई है। पर मैं गरीब सिर्फ परमात्मा की भगती ही करता हूँ। 6। (हे भाई !) कोई मनुष्य (अपने आप को) समझदार पंडित कहलवाता है। कोई मनुष्य (अपने आप को) शास्त्रों से सजाए हुए छे कर्मों से सजाए रखता है। कोई मनुष्य शास्त्रों के कर्म-कांड को श्रेष्ठ करणी समझ के करता रहता है। पर मैं गरीब सिर्फ परमात्मा की शरण पड़ा रहता हूँ। 7। (हे भाई ! हमने) सारे जुगों सारे कर्म-धर्म परख के देख लिए हैं। परमात्मा के नाम के बिना (माया के मोह की नींद में सोया हुआ) यह मन जागता नहीं। हे नानक ! कह- (हे भाई !) जब (किसी मनुष्य ने) साध-संगति प्राप्त कर ली। (उसके अंदर से माया की) तृष्णा बुझ गई। उसका मन ठंडा-ठार हो गया। 8। 1।

इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥

रामकली महला 5 ॥
इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥
माटी का ले देहुरा करिआ ॥
उकति जोति लै सुरति परीखिआ ॥
मात गरभ महि जिनि तू राखिआ ॥1॥
राखनहारु सम्हारि जना ॥
सगले छोडि बीचार मना ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि दीए तुधु बाप महतारी ॥
जिनि दीए भ्रात पुत हारी ॥
जिनि दीए तुधु बनिता अरु मीता ॥
तिसु ठाकुर कउ रखि लेहु चीता ॥2॥
जिनि दीआ तुधु पवनु अमोला ॥
जिनि दीआ तुधु नीरु निरमोला ॥
जिनि दीआ तुधु पावकु बलना ॥
तिसु ठाकुर की रहु मन सरना ॥3॥
छतीह अंम्रित जिनि भोजन दीए ॥
अंतरि थान ठहरावन कउ कीए ॥
बसुधा दीओ बरतनि बलना ॥
तिसु ठाकुर के चिति रखु चरना ॥4॥
पेखन कउ नेत्र सुनन कउ करना ॥
हसत कमावन बासन रसना ॥
चरन चलन कउ सिरु कीनो मेरा ॥
मन तिसु ठाकुर के पूजहु पैरा ॥5॥
अपवित्र पवित्रु जिनि तू करिआ ॥
सगल जोनि महि तू सिरि धरिआ ॥
अब तू सीझु भावै नही सीझै ॥
कारजु सवरै मन प्रभु धिआईजै ॥6॥
ईहा ऊहा एकै ओही ॥
जत कत देखीऐ तत तत तोही ॥
तिसु सेवत मनि आलसु करै ॥
जिसु विसरिऐ इक निमख न सरै ॥7॥
हम अपराधी निरगुनीआरे ॥
ना किछु सेवा ना करमारे ॥
गुरु बोहिथु वडभागी मिलिआ ॥
नानक दास संगि पाथर तरिआ ॥8॥2॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू ने पिता की बूँद से आपको बनाया। आपका यह मिट्टी का पुतला घड़ दिया; जिस प्रभू ने बुद्धि। जीवात्मा और परखने के लिए ताकत आपके अंदर डाल के आपको माँ के पेट में (सही सलामत) रखा (उसको हमेशा याद रख)। 1। हे भाई ! सदा रक्षा कर सकने वाले परमात्मा को ययाद करा कर। हे मेरे मन ! (प्रभू की याद के बिना) और सारे विचार (जो विचार प्रभू की याद को भुलाते हैं। वह) छोड़ दे। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस प्रभू ने आपको माता-पिता दिए। जिस प्रभू ने आपको भाई पुत्र और नौकर दिए। जिस प्रभू ने आपको सत्री और सज्जन-मित्र दिए। उस मालिक प्रभू को सदा अपने चित्त में टिकाए रख। 2। हे भाई ! जिस प्रभू ने आपको किसी भी मूल्य पर ना मिल सकने वाली (अनमोल) हवा दी। जिस प्रभू ने आपको निर्मोलक पानी दिया। जिस प्रभू ने आपको आग दी। ईधन दिया। हे मन ! आप उस मालिक-प्रभू की शरण पड़ा रह। 3। हे भाई ! जिस परमात्मा ने आपको अनेकों किस्मों के स्वादिष्ट खाने दिए। इन खानों को हज़म करने के लिए आपके अंदर मेहदा आदि अंग बनाए। आपको धरती दी। आपको और कार्य-व्यवहार दिया। उस मालिक-प्रभू के चरण अपने चित्त में परोए रख। 4। जिसने) आपको (दुनिया के रंग-तमाशे) देखने के लिए आँखें दी हैं और सुनने के लिए कान दिए हैं। जिसने काम करने के लिए आपको हाथ दिए हैं। और नाक व जीभ दी है। जिसने चलने के लिए आपको पैर दिए हैं और सिर (सभी अंगों में) श्रेष्ठ बनाया है। हे मेरे मन ! उस मालिक प्रभू के पैर सदा पूजता रह (निम्रता धारण करके उस प्रभू का सिमरन करता रह। (हे भाई ! उस परमात्मा को सिमरा कर) जिसने गंदगी से आपको पवित्र बना दिया। जिसने आपको सारी जूनियों में सरदार बना दिया। आपकी मर्जी है अब आप उसका सिमरन करके जीवन में सफल हों चाहे न हों। पर हे मन ! परमात्मा का सिमरन करना चाहिए। (सिमरन करने से ही मानस जीवन का) मनोरथ सफल होता है। 6। हे भाई ! इस लोक में और परलोक में एक वह परमात्मा ही (सहायक) है। जहाँ कहीं भी देखा जाए वहीं-वहीं (परमात्मा ही) आपके साथ है। (पर देखिए मनुष्य के दुर्भाग्य !) उस परमात्मा को सिमरने से (मनुष्य) मन में आलस करता है। जिसके बिसरने से एक पल भर समय भी आसान नहीं गुजर सकता। 7। (हे भाई ! माया के मोह में फंस के) हम संसारी जीव पापी बन जाते हैं। हम ना कोई सेवा-भक्ति करते हैं। ना ही हमारे कर्म अच्छे होते हैं। हे दास नानक ! (कह-) जिन मनुष्यों को बहुत भाग्यों से गुरू-जहाज मिल गया। उस जहाज़ की संगति में वह पत्थर-दिल मनुष्य भी संसार से पार लांघ गए। 8। 2।

काहू बिहावै रंग रस रूप ॥

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रामकली महला 5 ॥
काहू बिहावै रंग रस रूप ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (चाहे परमात्मा ही हरेक जीव का मालिक है फिर भी) किसी मनुष्य की उम्र रंग-तमाशों। दुनियां के सुंदर रूपों और पदार्थों के रसों-स्वादों में बीत रही है;

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 913 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९१३ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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