Lulla Family

अंग ९१५ · रामकली

अंग
915
रामकली
अंग बदलें या अंश चुनें · ३ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. तुमरी क्रिपा ते लागी प्रीति ॥
  2. जीअ जंत सभि पेखीअहि प्रभ सगल तुमारी धारना ॥1॥
  3. दरसनु भेटत पाप सभि नासहि हरि सिउ देइ मिलाई ॥1॥

तुमरी क्रिपा ते लागी प्रीति ॥

अंग ९१४ से चला आ रहा अंश

तुमरी क्रिपा ते लागी प्रीति ॥
दइआल भए ता आए चीति ॥
दइआ धारी तिनि धारणहार ॥
बंधन ते होई छुटकार ॥7॥
सभि थान देखे नैण अलोइ ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥
भ्रम भै छूटे गुर परसाद ॥
नानक पेखिओ सभु बिसमाद ॥8॥4॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आपकी मेहर से ही (आपके चरणों में किसी भाग्यशाली की) प्रीति बनती है। (हे भाई ! जिस मनुष्य पर जब प्रभू जी) दयावान होते हैं तब उसके हृदय में आ बसते हैं। हे भाई ! दया करने में समर्थ उस (प्रभू) ने (जिस व्यक्ति पर) दया की। (उस व्यक्ति को माया के मोह के) बँधनों से सदा के लिए खलासी मिल गई। 7। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की कृपा से (जिस मनुष्य के) सारे वहम सारे डर समाप्त हो जाते हैं। वह हर जगह उस आश्चर्य रूप परमात्मा को ही देखता है। वह मनुष्य आँखें खोल के सब जगह देखता है। उसको (कहीं भी) उस परमात्मा के बिना कोई और दूसरा नहीं दिखता। 8। 4।

जीअ जंत सभि पेखीअहि प्रभ सगल तुमारी धारना ॥1॥

रामकली महला 5 ॥
जीअ जंत सभि पेखीअहि प्रभ सगल तुमारी धारना ॥1॥
इहु मनु हरि कै नामि उधारना ॥1॥ रहाउ ॥
खिन महि थापि उथापे कुदरति सभि करते के कारना ॥2॥
कामु क्रोधु लोभु झूठु निंदा साधू संगि बिदारना ॥3॥
नामु जपत मनु निरमल होवै सूखे सूखि गुदारना ॥4॥
भगत सरणि जो आवै प्राणी तिसु ईहा ऊहा न हारना ॥5॥
सूख दूख इसु मन की बिरथा तुम ही आगै सारना ॥6॥
तू दाता सभना जीआ का आपन कीआ पालना ॥7॥
अनिक बार कोटि जन ऊपरि नानकु वंञै वारना ॥8॥5॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! ये सारे जीव-जंतु जो दिखाई दे रहे हैं। ये सारे आपके ही आसरे हैं। 1। (हे भाई ! काम-क्रोध-लोभ-झूठ-निंदा आदि से) इस मन को परमात्मा के नाम से ही बचाया जा सकता है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा इस रचना को एक-छिन में पैदा करके फिर नाश भी कर सकता है। ये सारे करतार के ही खेल हैं। 2। हे भाई ! काम-क्रोध-लोभ-झूठ-निंदा आदि विकारों को गुरू की संगति में रह के (अपने मन में से चीर-फाड़ के) दूर कर सकते हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए (मनुष्य का) मन पवित्र हो जाता है। (मनुष्य की उम्र) निरोल आत्मिक आनंद में ही बीतती है। 4। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की बँदगी करने वाले लोगों की शरण में आता है। वह मनुष्य इस लोक में और परलोक में भी (विकारों के हाथों अपनी मनुष्य जीवन की बाजी) हारता नहीं। 5। हे भाई ! इस मन की सुखों की माँग और दुखों की तरफ से पुकार। प्रभू आपके आगे ही की जा सकती है। 6। हे प्रभू ! आप सारे जीवों को ही दातें देने वाले हैं। अपने पैदा किए जीवों को आप स्वयं ही पालने वाले हैं। 7। हे प्रभू ! (आपका दास) नानक आपके भक्तों (के चरणों) से अनेकों बार करोड़ों बार बलिहार जाता है। 8। 5।

दरसनु भेटत पाप सभि नासहि हरि सिउ देइ मिलाई ॥1॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

रामकली महला 5 असटपदी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दरसनु भेटत पाप सभि नासहि हरि सिउ देइ मिलाई ॥1॥
मेरा गुरु परमेसरु सुखदाई ॥
पारब्रहम का नामु द्रिड़ाए अंते होइ सखाई ॥1॥ रहाउ ॥
सगल दूख का डेरा भंना संत धूरि मुखि लाई ॥2॥
पतित पुनीत कीए खिन भीतरि अगिआनु अंधेरु वंञाई ॥3॥
करण कारण समरथु सुआमी नानक तिसु सरणाई ॥4॥
बंधन तोड़ि चरन कमल द्रिड़ाए एक सबदि लिव लाई ॥5॥
अंध कूप बिखिआ ते काढिओ साच सबदि बणि आई ॥6॥
जनम मरण का सहसा चूका बाहुड़ि कतहु न धाई ॥7॥
नाम रसाइणि इहु मनु राता अंम्रितु पी त्रिपताई ॥8॥
संतसंगि मिलि कीरतनु गाइआ निहचल वसिआ जाई ॥9॥
पूरै गुरि पूरी मति दीनी हरि बिनु आन न भाई ॥10॥
नामु निधानु पाइआ वडभागी नानक नरकि न जाई ॥11॥
घाल सिआणप उकति न मेरी पूरै गुरू कमाई ॥12॥
जप तप संजम सुचि है सोई आपे करे कराई ॥13॥
पुत्र कलत्र महा बिखिआ महि गुरि साचै लाइ तराई ॥14॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 असटपदी सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! गुरू के दर्शन प्राप्त होने से सारे पाप नाश हो जाते हैं। (गुरू मनुष्य को) परमात्मा के साथ जोड़ देता है। 1। हे भाई ! मेरा गुरू परमेश्वर (का रूप) है। सारे सुख देने वाला है। हे भाई ! गुरू परमात्मा का नाम (मनुष्य के हृदय में) पक्का कर देता है (और इस तरह) आखिरी वक्त भी (मनुष्य का) मित्र बनता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य) गुरू के चरणों की धूल (अपने) माथे पर लगाता है (उसके अंदर से) सारा ही दुखों का अड्डा ही समाप्त हो जाता है। 2। हे भाई ! (गुरू ने) अनेकों विकारियों को एक छिन में पवित्र कर दिया। (गुरू मनुष्य के अंदर से) आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी (का) अंधकार दूर कर देता है। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मालिक-प्रभू सारे जगत का मूल है और सभ ताकतों का मालिक है (गुरू के द्वारा ही) उसकी शरण पड़ा जा सकता है। 4। (हे भाई ! गुरू मनुष्य के माया के) बँधन तोड़ के (उसके अंदर) प्रभू के सुंदर चरणों को पक्की तरह से टिका देता है। (गुरू की कृपा से वह मनुष्य) गुरू-शबद के द्वारा एक प्रभू में ही सुरति जोड़े रखता है। 5। (हे भाई ! गुरू जिस मनुष्य को) माया (के मोह) के अंधे कूएं में से निकाल लेता है। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी में उसकी प्रीति बन जाती है। 6। (हे भाई ! गुरू की कृपा से उस मनुष्य का) जनम-मरण के चक्कर का सहम समाप्त हो जाता है। वह फिर और कहीं (किसी जून में) नहीं भटकता फिरता। 7। (हे भाई ! गुरू की मेहर से जिस मनुष्य का) ये मन सब रसों से श्रेष्ठ नाम-रस में रंगा जाता है। वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पी के (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। 8। (हे भाई !) गुरू-संत की संगत में मिल के जिस मनुष्य ने परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाने शुरू कर दिए। वह कभी ना डोलने वाले आत्मिक ठिकाने में टिक जाता है। 9। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने (आत्मिक जीवन के बारे में) पूरी समझ बख्श दी। उसको परमात्मा के नाम के बिना कोई और (दुनियावी वस्तु) प्यारी नहीं लगती। 10। हे नानक ! जिस भाग्यशाली ने (गुरू की शरण पड़ कर) नाम-खजाना पा लिया। वह (दुनियां के दुखों के) नर्क में नहीं पड़ता। 11। हे भाई ! तप आदिक की किसी मेहनत। विद्या आदि की किसी चतुराई। किसी शास्त्रार्थ की मुझे टेक-ओट नहीं। यह तो पूरे गुरू की बख्शिश है (कि उसने मुझे परमात्मा के नाम की दाति बख्शी है)। 12। हे भाई ! पूरे गुरू की शरण पड़ना ही मेरे लिए जप-तप-संजम और शारीरिक पवित्रता का साधन है। (पूरा गुरू) स्वयं ही (मेरे ऊपर मेहर) करता है (और मुझसे प्रभू की सेवा-भक्ति) करवाता है। 13। (हे भाई ! जो भी मनुष्य गुरू की शरण पड़ा) उसको पुत्र-स्त्री और बलवान माया के मोह में से गुरू ने सदा-स्थिर प्रभू (के नाम) में जोड़ के पार लंघा लिया। 14।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 915 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९१५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English