एकु नामु वसिआ घट अंतरि पूरे की वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥ आपे करता आपे भुगता देदा रिजकु सबाई ॥2॥ जो किछु करणा सो करि रहिआ अवरु न करणा जाई ॥3॥ आपे साजे स्रिसटि उपाए सिरि सिरि धंधै लाई ॥4॥ तिसहि सरेवहु ता सुखु पावहु सतिगुरि मेलि मिलाई ॥5॥ आपणा आपु आपि उपाए अलखु न लखणा जाई ॥6॥ आपे मारि जीवाले आपे तिस नो तिलु न तमाई ॥7॥ इकि दाते इकि मंगते कीते आपे भगति कराई ॥8॥ से वडभागी जिनी एको जाता सचे रहे समाई ॥9॥ आपि सरूपु सिआणा आपे कीमति कहणु न जाई ॥10॥ आपे दुखु सुखु पाए अंतरि आपे भरमि भुलाई ॥11॥ वडा दाता गुरमुखि जाता निगुरी अंध फिरै लोकाई ॥12॥ जिनी चाखिआ तिना सादु आइआ सतिगुरि बूझ बुझाई ॥13॥ इकना नावहु आपि भुलाए इकना गुरमुखि देइ बुझाई ॥14॥ सदा सदा सालाहिहु संतहु तिस दी वडी वडिआई ॥15॥ तिसु बिनु अवरु न कोई राजा करि तपावसु बणत बणाई ॥16॥ निआउ तिसै का है सद साचा विरले हुकमु मनाई ॥17॥ तिस नो प्राणी सदा धिआवहु जिनि गुरमुखि बणत बणाई ॥18॥ सतिगुर भेटै सो जनु सीझै जिसु हिरदै नामु वसाई ॥19॥ सचा आपि सदा है साचा बाणी सबदि सुणाई ॥20॥ नानक सुणि वेखि रहिआ विसमादु मेरा प्रभु रविआ स्रब थाई ॥21॥5॥14॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: उसके हृदय में परमात्मा का नाम ही बसा रहता है। (पर गुरू भी तब ही मिलता है जब) सारे गुणों के मालिक प्रभू की मेहर हो। 1। रहाउ। (हे संत जनो !) परमात्मा स्वयं ही सब जीवों को पैदा करने वाला है। (सब जीवों में व्यापक हो के) स्वयं ही (सारे भोग) भोगने वाला है। सारी दुनिया को (स्वयं ही) रिज़क देने वाला है। 2। हे संत जनो ! वह प्रभू स्वयं ही जो कुछ करना चाहता है कर रहा है। किसी जीव द्वारा उसके विपरीत कुछ और नहीं किया जा सकता। 3। हे संत जनो ! प्रभू खुद ही (सब जीवों की) घाड़त घड़ता है। खुद ही ये जगत पैदा करता है। हरेक जीव के सिर पर उसने खुद ही (माया के) जंजाल की (पोटली) चिपकाई हुई है। 4। हे संत जनो ! उस परमात्मा को ही सिमरते रहो। तब ही आत्मिक आनंद कर सकोगे। (पर सिमरता वही है जिसको) गुरू ने परमात्मा के चरणों में जोड़ा है। 5। हे संत जनो ! प्रभू खुद ही अपना आप (किसी जीव के हृदय में) प्रकट करता है। वह अलख है। उसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 6। (हे संत जनो ! जीवों को) आत्मिक मौत दे के (फिर) खुद ही प्रभू आत्मिक जीवन देता है। उसको किसी तरह का कोई रक्ती भर लालच नहीं। 7। हे संत जनो ! जगत में परमात्मा ने कई जीवों को दूसरों की मदद करने के समर्थ बना दिया है। कई जीव उसने कंगाल-मंगते बना दिए हैं। (वह जिन पर मेहर करता है उनसे) अपनी भक्ति परमात्मा स्वयं ही करवाता है। 8। हे संत जनो ! जिन लोगों ने एक परमात्मा के साथ जान-पहचान बना ली है वे बहुत भाग्यशाली हैं। वे सदा कायम रहने वाले प्रभू (की याद) में लीन रहते हैं। 9। हे संत जनो ! परमात्मा स्वयं (सबसे) सुंदर है (सबसे ज्यादा) समझदार (भी) खुद ही है। (उसके सौन्दर्य व समझदारी का) मूल्य बयान नहीं किया जा सकता। 10। हे संत जनो ! हरेक जीव के अंदर परमात्मा खुद ही दुख पैदा करता है। आप ही सुख (भी) देता है। वह स्वयं ही जीव को भटकना में डाल के उसको गलत राह पर डाल देता है। 11। हे संत जनो ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण ली। उसने उस बड़े दातार प्रभू के साथ सांझ डाल ली; पर माया के मोह में अंधी हुई दुनिया भटकती फिरती है। 12। हे संत जनो ! जिनको गुरू ने (नाम-अमृत की) कद्र बख्शी। जिन्होंने (इस तरह नाम-अमृत) चख लिया। उन्हें उसका आनंद आ गया (और। वे उस सदा नाम में जुड़े रहे)। 13। (हे संत जनो ! जीवों के वश की बात नहीं) कई जीवों को परमात्मा खुद हीअपने नाम से तुड़वा देता है। और कई जीवों को गुरू की शरण में ला के (अपने नाम की) सूझ बख्श देता है। 14। हे संत जनो ! उस परमात्मा की सिफत सालाह करते रहा करो सदा करते रहा करो। उस (प्रभू) की महानता बहुत बड़ी है। 15। हे संत जनो ! प्रभू के बिना (उसके बराबर का) और कोई बादशाह नहीं। उसने पूरा इन्साफ करके सिफत-सालाह करने की ये रीति चलाई है। 16। हे संत जनो ! उस परमात्मा का ही न्याय (करने वाला हुकम) सदा अटल है। किसी विरले (भाग्यशाली) को वह प्रभू (यह) हुकम मानने की प्रेरणा करता है। 17। हे प्राणियो ! जिस परमात्मा ने (लोगों के लिए) गुरू के सन्मुख रहने की मर्यादा चलाई हुई है। सदा उसका ध्यान धरते रहा करो। 18। हे संत जनो ! (जो मनुष्य) गुरू को मिलता है (भाव। गुरू की शरण पड़ता है)। जिस मनुष्य के हृदय में (गुरू। परमात्मा का) नाम बसाता है वह मनुष्य (जिंदगी की खेल में) कामयाब हो जाता है। 19। हे संत जनो ! (गुरू अपनी) बाणी के द्वारा (अपने) शबद से (शरण आए सिखों को ये उपदेश) सुनाता रहता है कि परमात्मा सदा कायम रहने वाला है परमात्मा कायम रहने वाला है। 20। हे नानक ! (कह- हे संत जनो !) परमात्मा आश्चर्यरूप है। मेरा परमात्मा सब जगह मौजूद है (हरेक जीव में व्यापक हो के) वह (हरेक के दिल की) सुन रहा है। (हरेक का काम) देख रहा है। 21। 1। 5।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि ॥ (हे भाई !) किसी ने (सिर्फ) दुनियादारी का पसारा बिखेरा हुआ है। किसी ने (देवताओं आदि की) पूजा का आडंबर रचा हुआ है। किसी ने निउली कर्म और कुंडलनी नाड़ी के साधनों में रुची रखी हुई है। पर मैं गरीब परमात्मा का ही सिमरन करता हूँ। 1। हे मेरे प्यारे प्रभू ! मुझे सिर्फ आपका आसरा है। मैं कोई भेख करना नहीं जानता। 1। रहाउ। (हे भाई !) किसी ने घर छोड़ के जंगल के कोने में जा के डेरा डाला हुआ है। किसी ने अपने आप को मौन धारी त्यागी साधू कहलवाया हुआ है। कोई यह कहता है कि मैं अनन्य भगवती हूँ (अन्या सारे आसरे छोड़ कर सिर्फ भगवान का भक्त हूँ)। पर मुझ गरीब ने सिर्फ परमात्मा का आसरा लिया है। 2। (हे भाई !) किसी ने कहा है कि मैं तीर्थों पर ही निवास रखता हूँ। कोई मनुष्य अन्न छोड़ के (दुनियादारी से) उपराम हुआ बैठा है। किसी ने सारी धरती का रटन करने का बीड़ा उठाया हुआ है। पर मैं गरीब सिर्फ परमात्मा के दर पर ही आ पड़ा हुआ हूँ। 3। (हे भाई !) किसी ने कहा कि मैं ऊँचे खानदान की इज्जत वाला हूँ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसके हृदय में परमात्मा का नाम ही बसा रहता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।