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अंग ९१२ · रामकली

अंग
912
रामकली
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  1. एकु नामु वसिआ घट अंतरि पूरे की वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥
  2. किनही कीआ परविरति पसारा ॥

एकु नामु वसिआ घट अंतरि पूरे की वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥

अंग ९११ से चला आ रहा अंश

एकु नामु वसिआ घट अंतरि पूरे की वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥
आपे करता आपे भुगता देदा रिजकु सबाई ॥2॥
जो किछु करणा सो करि रहिआ अवरु न करणा जाई ॥3॥
आपे साजे स्रिसटि उपाए सिरि सिरि धंधै लाई ॥4॥
तिसहि सरेवहु ता सुखु पावहु सतिगुरि मेलि मिलाई ॥5॥
आपणा आपु आपि उपाए अलखु न लखणा जाई ॥6॥
आपे मारि जीवाले आपे तिस नो तिलु न तमाई ॥7॥
इकि दाते इकि मंगते कीते आपे भगति कराई ॥8॥
से वडभागी जिनी एको जाता सचे रहे समाई ॥9॥
आपि सरूपु सिआणा आपे कीमति कहणु न जाई ॥10॥
आपे दुखु सुखु पाए अंतरि आपे भरमि भुलाई ॥11॥
वडा दाता गुरमुखि जाता निगुरी अंध फिरै लोकाई ॥12॥
जिनी चाखिआ तिना सादु आइआ सतिगुरि बूझ बुझाई ॥13॥
इकना नावहु आपि भुलाए इकना गुरमुखि देइ बुझाई ॥14॥
सदा सदा सालाहिहु संतहु तिस दी वडी वडिआई ॥15॥
तिसु बिनु अवरु न कोई राजा करि तपावसु बणत बणाई ॥16॥
निआउ तिसै का है सद साचा विरले हुकमु मनाई ॥17॥
तिस नो प्राणी सदा धिआवहु जिनि गुरमुखि बणत बणाई ॥18॥
सतिगुर भेटै सो जनु सीझै जिसु हिरदै नामु वसाई ॥19॥
सचा आपि सदा है साचा बाणी सबदि सुणाई ॥20॥
नानक सुणि वेखि रहिआ विसमादु मेरा प्रभु रविआ स्रब थाई ॥21॥5॥14॥

हिन्दी अर्थ: उसके हृदय में परमात्मा का नाम ही बसा रहता है। (पर गुरू भी तब ही मिलता है जब) सारे गुणों के मालिक प्रभू की मेहर हो। 1। रहाउ। (हे संत जनो !) परमात्मा स्वयं ही सब जीवों को पैदा करने वाला है। (सब जीवों में व्यापक हो के) स्वयं ही (सारे भोग) भोगने वाला है। सारी दुनिया को (स्वयं ही) रिज़क देने वाला है। 2। हे संत जनो ! वह प्रभू स्वयं ही जो कुछ करना चाहता है कर रहा है। किसी जीव द्वारा उसके विपरीत कुछ और नहीं किया जा सकता। 3। हे संत जनो ! प्रभू खुद ही (सब जीवों की) घाड़त घड़ता है। खुद ही ये जगत पैदा करता है। हरेक जीव के सिर पर उसने खुद ही (माया के) जंजाल की (पोटली) चिपकाई हुई है। 4। हे संत जनो ! उस परमात्मा को ही सिमरते रहो। तब ही आत्मिक आनंद कर सकोगे। (पर सिमरता वही है जिसको) गुरू ने परमात्मा के चरणों में जोड़ा है। 5। हे संत जनो ! प्रभू खुद ही अपना आप (किसी जीव के हृदय में) प्रकट करता है। वह अलख है। उसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 6। (हे संत जनो ! जीवों को) आत्मिक मौत दे के (फिर) खुद ही प्रभू आत्मिक जीवन देता है। उसको किसी तरह का कोई रक्ती भर लालच नहीं। 7। हे संत जनो ! जगत में परमात्मा ने कई जीवों को दूसरों की मदद करने के समर्थ बना दिया है। कई जीव उसने कंगाल-मंगते बना दिए हैं। (वह जिन पर मेहर करता है उनसे) अपनी भक्ति परमात्मा स्वयं ही करवाता है। 8। हे संत जनो ! जिन लोगों ने एक परमात्मा के साथ जान-पहचान बना ली है वे बहुत भाग्यशाली हैं। वे सदा कायम रहने वाले प्रभू (की याद) में लीन रहते हैं। 9। हे संत जनो ! परमात्मा स्वयं (सबसे) सुंदर है (सबसे ज्यादा) समझदार (भी) खुद ही है। (उसके सौन्दर्य व समझदारी का) मूल्य बयान नहीं किया जा सकता। 10। हे संत जनो ! हरेक जीव के अंदर परमात्मा खुद ही दुख पैदा करता है। आप ही सुख (भी) देता है। वह स्वयं ही जीव को भटकना में डाल के उसको गलत राह पर डाल देता है। 11। हे संत जनो ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण ली। उसने उस बड़े दातार प्रभू के साथ सांझ डाल ली; पर माया के मोह में अंधी हुई दुनिया भटकती फिरती है। 12। हे संत जनो ! जिनको गुरू ने (नाम-अमृत की) कद्र बख्शी। जिन्होंने (इस तरह नाम-अमृत) चख लिया। उन्हें उसका आनंद आ गया (और। वे उस सदा नाम में जुड़े रहे)। 13। (हे संत जनो ! जीवों के वश की बात नहीं) कई जीवों को परमात्मा खुद हीअपने नाम से तुड़वा देता है। और कई जीवों को गुरू की शरण में ला के (अपने नाम की) सूझ बख्श देता है। 14। हे संत जनो ! उस परमात्मा की सिफत सालाह करते रहा करो सदा करते रहा करो। उस (प्रभू) की महानता बहुत बड़ी है। 15। हे संत जनो ! प्रभू के बिना (उसके बराबर का) और कोई बादशाह नहीं। उसने पूरा इन्साफ करके सिफत-सालाह करने की ये रीति चलाई है। 16। हे संत जनो ! उस परमात्मा का ही न्याय (करने वाला हुकम) सदा अटल है। किसी विरले (भाग्यशाली) को वह प्रभू (यह) हुकम मानने की प्रेरणा करता है। 17। हे प्राणियो ! जिस परमात्मा ने (लोगों के लिए) गुरू के सन्मुख रहने की मर्यादा चलाई हुई है। सदा उसका ध्यान धरते रहा करो। 18। हे संत जनो ! (जो मनुष्य) गुरू को मिलता है (भाव। गुरू की शरण पड़ता है)। जिस मनुष्य के हृदय में (गुरू। परमात्मा का) नाम बसाता है वह मनुष्य (जिंदगी की खेल में) कामयाब हो जाता है। 19। हे संत जनो ! (गुरू अपनी) बाणी के द्वारा (अपने) शबद से (शरण आए सिखों को ये उपदेश) सुनाता रहता है कि परमात्मा सदा कायम रहने वाला है परमात्मा कायम रहने वाला है। 20। हे नानक ! (कह- हे संत जनो !) परमात्मा आश्चर्यरूप है। मेरा परमात्मा सब जगह मौजूद है (हरेक जीव में व्यापक हो के) वह (हरेक के दिल की) सुन रहा है। (हरेक का काम) देख रहा है। २१।५।१४।

किनही कीआ परविरति पसारा ॥

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रामकली महला 5 असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किनही कीआ परविरति पसारा ॥
किनही कीआ पूजा बिसथारा ॥
किनही निवल भुइअंगम साधे ॥
मोहि दीन हरि हरि आराधे ॥1॥
तेरा भरोसा पिआरे ॥
आन न जाना वेसा ॥1॥ रहाउ ॥
किनही ग्रिहु तजि वण खंडि पाइआ ॥
किनही मोनि अउधूतु सदाइआ ॥
कोई कहतउ अनंनि भगउती ॥
मोहि दीन हरि हरि ओट लीती ॥2॥
किनही कहिआ हउ तीरथ वासी ॥
कोई अंनु तजि भइआ उदासी ॥
किनही भवनु सभ धरती करिआ ॥
मोहि दीन हरि हरि दरि परिआ ॥3॥
किनही कहिआ मै कुलहि वडिआई ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि ॥ (हे भाई !) किसी ने (सिर्फ) दुनियादारी का पसारा बिखेरा हुआ है। किसी ने (देवताओं आदि की) पूजा का आडंबर रचा हुआ है। किसी ने निउली कर्म और कुंडलनी नाड़ी के साधनों में रुची रखी हुई है। पर मैं गरीब परमात्मा का ही सिमरन करता हूँ। 1। हे मेरे प्यारे प्रभू ! मुझे सिर्फ आपका आसरा है। मैं कोई भेख करना नहीं जानता। 1। रहाउ। (हे भाई !) किसी ने घर छोड़ के जंगल के कोने में जा के डेरा डाला हुआ है। किसी ने अपने आप को मौन धारी त्यागी साधू कहलवाया हुआ है। कोई यह कहता है कि मैं अनन्य भगवती हूँ (अन्या सारे आसरे छोड़ कर सिर्फ भगवान का भक्त हूँ)। पर मुझ गरीब ने सिर्फ परमात्मा का आसरा लिया है। 2। (हे भाई !) किसी ने कहा है कि मैं तीर्थों पर ही निवास रखता हूँ। कोई मनुष्य अन्न छोड़ के (दुनियादारी से) उपराम हुआ बैठा है। किसी ने सारी धरती का रटन करने का बीड़ा उठाया हुआ है। पर मैं गरीब सिर्फ परमात्मा के दर पर ही आ पड़ा हुआ हूँ। 3। (हे भाई !) किसी ने कहा कि मैं ऊँचे खानदान की इज्जत वाला हूँ।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 912 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९१२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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