अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य पर प्रभू जी अपनी कृपा करते हैं। वह मनुष्य गुरू-पारस को छू के खुद भी पारस बन जाता है। 2। हे संत जनो ! जो अनेकों जीव धार्मिक पहरावा पहने फिरते हैं और उस भेष के कारण अहंकारी हुए घूमते हैं। उन्होंने मानस जनम की खेल जूए में हार ली (समझो)। 3। पर। हे संत जनो ! कई लोग ऐसे हैं जो दिन-रात हर वक्त परमात्मा के नाम को अपने हृदय में टिका के परमात्मा की भक्ति करते रहते हैं। 4। जो मनुष्य हर वक्त नाम-रंग में रंगे रहते हैं। वे आत्मिक अडोलता में मस्त रहते हैं। आत्मिक अडोलता में टिक के वे अपने अंदर से अहंकार दूर कर लेते हैं। 5। हे संत जनो ! प्रभू का डर-अदब हृदय में रखे बिना प्रभू की भक्ति नहीं हो सकती। डर-अदब-प्रेम और भगती में टिकने वालों ने अपनी जिंदगी खूबसूरत बना ली। 6। प्रभू में जुड़ के आत्मिक जीवन की सूझ के द्वारा जो लोग विचारवान हो गए। उन्होंने गुरू के शबद के द्वारा अपने अंदर से माया का मोह जला लिया। 7। पर। हे संत जनो ! प्रभू स्वयं ही (जीवों से) अपनी भक्ति करवाता है। खुद ही भक्ति के खजाने बख्शता है। 8। हे संत जनो ! मैं उस प्रभू के गुणों का अंत नहीं पा सकता। (उसकी मेहर से ही) मैं उसके गुण गाता हूँ। गुरू के शबद द्वारा (उसके गुणों की) विचार करता हूँ। 9। हे संत जनो ! (उसकी कृपा से ही) मैं उसका नाम जपता हूँ। उसकी सिफत-सालाह करता हूँ। और अपने अंदर से अहंकार दूर करता हूँ। 10। हे संत जनो ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम खजाने कभी खत्म होने वाले नहीं हैं। पर ये नाम-पदार्थ गुरू से ही मिलता है। 11। हे संत जनो ! अपने भक्तों पर प्रभू स्वयं ही दयावान होता है और उनके अंदर खुद ही कृपा करके (नाम जपने की) सक्ता टिकाए रखता है। 12। (इसका नतीजा ये निकलता है कि) उन (भक्तजनों) को सदा-स्थिर प्रभू के नाम की हमेशा भूख लगी रहती है। वह ऊँची विचार के मालिक लोग गुरू के शबद द्वारा प्रभू के गुण गाते रहते हैं। 13। हे संत जनो ! ये जीवात्मा ये शरीर (जीवों को) सब कुछ उस परमात्मा का ही दिया हुआ है। (उसकी बख्शिशों का) विचार करना (बहुत) मुश्किल है। 14। हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू के शबद में सुरति जोड़ते हैं। वही संसार-समुंदर से पार लांघ जाते हैं। तैर जाते हैं। 15। हे संत जनो ! कोई विरला विचारवान ये बात समझता है कि सदा-स्थिर प्रभू के नाम के बिना कोई और (इस संसार-समुंदर से) पार नहीं लांघ सकता। 16। (पर। हे संत जनो ! यह नाम की दाति जीवों के बस की खेल नहीं। प्रभू ने) धुर-दरगाह से (जीवों के) माथे पर जो लेख लिख दिया वही प्राप्त होता है। और जीव प्रभू-चरणों में जुड़ के गुरू के शबद के द्वारा अपना जीवन संवारता है। 17। हे संत जनो ! जो शरीर गुरू के शबद-रंग में रंगा रहता है और सदा-स्थिर प्रभू के नाम में प्यार करता है वह शरीर सोना बन जाता है (शुद्ध सोने जैसा विकार-रहित पवित्र हो जाता है)। 18। (हे संत जनो ! वह शरीर पवित्र है) जो आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल (अमृत) से नाको-नाक भरा रहता है। पर ये नाम-अमृत गुरू के शबद द्वारा प्रभू के गुणों की विचार करके ही प्राप्त होता है। 19। (हे संत जनो !) जो मनुष्य (अपने इस शरीर में ही) प्रभू को तलाशते हैं वही उसका मिलाप हासिल कर लेते हैं। (शरीर से बाहर ढूँढने वाले) और लोग (भेष आदि के) गुमान में आफर-आफर के (अहंकार की हवा ले ले के) आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। 20। हे संत जनो ! निरी फोकी बातें करने वाले मनुष्य आत्मिक तौर पर मर जाते हैं। पर भक्तजन गुरू के द्वारा मिले प्रेम-प्यार से परमात्मा की भक्ति करते हैं। 21। हे संत जनो ! वही मनुष्य जोगी है (प्रभू चरणों में जुड़ा हुआ है) जो अपने अंदर से अहंकार मार के तृष्णा दूर करके उच्च आत्मिक जीवन से सांझ डालता है जगत के मूल प्रभू के गुणों को विचारता रहता है। 22। (हे प्रभू ! जीवों के बस की बात नहीं) जिस मनुष्य पर आपकी दया होती है। उसने ये बात समझी होती है कि गुरू (ही आपके नाम की दाति) देने वाला है। 23। हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू के दर पर नहीं आते। वह मनुष्य माया (के मोह) में फसे रहते हैं। (माया के कारण) अहंकारी हुए वे मनुष्य (माया के मोह में) डूब के आत्मिक मौत मरे रहते हैं। 24। हे संत जनो ! जब तक शरीर में सांस चल रही है तब तक प्रभू की सेवा-भक्ति करते रहना चाहिए। (प्रभू की भक्ति की बरकति से ही) प्रभू को जा मिलते हैं। 25। हे संत जनो ! अपने प्यारे प्रभू के साथ प्रीत-प्यार से मनुष्य दिन-रात हर वक्त (माया के मोह के हमलों से) सचेत रह सकता है। 26। (हे संत जनो ! तभी तो) मैं अपने गुरू से बलिहार जाता हूँ। गुरू से अपना तन-मन कुर्बान करता हूँ। वार वार जाता हूँ। 27। हे संत जनो ! गुरू के शबद द्वारा परमात्मा के गुणों की विचार करने वाले लोग (संसार-समुंद्र से) बच निकलते हैं। (जो भी मनुष्य ये उद्यम करता रहता है। उसके अंदर से) माया का मोह नाश हो जाता है। 28। (हे संत जनो ! ये कोई आसान खेल नहीं। माया के मोह की नींद में से) वही मनुष्य जागते हैं। जिन्हें प्रभू स्वयं जगाता है। ऐसे मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से विचारवान हो जाते हैं। 29। हे नानक ! (कह- हे संत जनो !) जो मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरते। वही मनुष्य आत्मिक तौर पर मरे रहते हैं। परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा के गुणों के विचार सदका आत्मिक जीवन वाले हो गए हैं। 30। 4। 13।
रामकली महला 3 ॥ नामु खजाना गुर ते पाइआ त्रिपति रहे आघाई ॥1॥ संतहु गुरमुखि मुकति गति पाई ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 3 ॥ हे संत जनो ! परमात्मा का नाम-खजाना गुरू के पास से मिलता है। (जिनको ये खजाना मिल जाता है। वे माया की तृष्णा की ओर से) पूरी तौर से तृप्त हो जाते हैं। 1। हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है। वह विकारों से निजात हासिल कर लेता है। वह उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य पर प्रभू जी अपनी कृपा करते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।