अंग
910
रामकली
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काइआ नगरी सबदे खोजे नामु नवं निधि पाई ॥22॥
काइआ नगरी सबदे खोजे नामु नवं निधि पाई ॥22॥
मनसा मारि मनु सहजि समाणा बिनु रसना उसतति कराई ॥23॥
लोइण देखि रहे बिसमादी चितु अदिसटि लगाई ॥24॥
अदिसटु सदा रहै निरालमु जोती जोति मिलाई ॥25॥
हउ गुरु सालाही सदा आपणा जिनि साची बूझ बुझाई ॥26॥
नानकु एक कहै बेनंती नावहु गति पति पाई ॥27॥2॥11॥
मनसा मारि मनु सहजि समाणा बिनु रसना उसतति कराई ॥23॥
लोइण देखि रहे बिसमादी चितु अदिसटि लगाई ॥24॥
अदिसटु सदा रहै निरालमु जोती जोति मिलाई ॥25॥
हउ गुरु सालाही सदा आपणा जिनि साची बूझ बुझाई ॥26॥
नानकु एक कहै बेनंती नावहु गति पति पाई ॥27॥2॥11॥
हिन्दी अर्थ: (हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू के) शबद के द्वारा अपने शरीर-नगर को खोजता है (अपने जीवन की पड़ताल करता रहता है। वह मनुष्य) परमात्मा का नाम-खजाना पा लेता है। 22। वह मनुष्य मन के मायावी विचारों (फुरनों) को मार के अपने मन को आत्मिक अडोलता में टिका लेता है; वह मनुष्य जीभ को पदार्थों के रसों की ओर से हटा के परमात्मा की सिफत-सालाह में जोड़ता है। 23। उस मनुष्य की आँखें (दुनियावी पदार्थों से हट के) आश्चर्य रूप परमात्मा को (हर जगह) देखती हैं। उसका चित्त अदृश्य प्रभू में टिका रहता है। 24। (हे संत जनो ! उस मनुष्य की) ज्योति उस नूरो-नूर-प्रभू में मिली रहती है जो इन आँखों से नहीं दिखता। और सदा निर्लिप रहता है। 25। हे संत जनो ! मैं भी अपने उस गुरू की ही सदा महिमा गायन करता (वडिआई करता) रहता हॅूँ जिसने (मुझे) सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सूझ बख्शी है। 26। हे संतजनो ! नानक एक यह विनती करता है (कि परमात्मा का नाम जपा करो) नाम से ही उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त होती है। नाम से ही (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है। 27। 2।
हरि की पूजा दुलंभ है संतहु कहणा कछू न जाई ॥1॥
रामकली महला 3 ॥
हरि की पूजा दुलंभ है संतहु कहणा कछू न जाई ॥1॥
संतहु गुरमुखि पूरा पाई ॥
नामो पूज कराई ॥1॥ रहाउ ॥
हरि बिनु सभु किछु मैला संतहु किआ हउ पूज चड़ाई ॥2॥
हरि साचे भावै सा पूजा होवै भाणा मनि वसाई ॥3॥
पूजा करै सभु लोकु संतहु मनमुखि थाइ न पाई ॥4॥
सबदि मरै मनु निरमलु संतहु एह पूजा थाइ पाई ॥5॥
पवित पावन से जन साचे एक सबदि लिव लाई ॥6॥
बिनु नावै होर पूज न होवी भरमि भुली लोकाई ॥7॥
गुरमुखि आपु पछाणै संतहु राम नामि लिव लाई ॥8॥
आपे निरमलु पूज कराए गुर सबदी थाइ पाई ॥9॥
पूजा करहि परु बिधि नही जाणहि दूजै भाइ मलु लाई ॥10॥
गुरमुखि होवै सु पूजा जाणै भाणा मनि वसाई ॥11॥
भाणे ते सभि सुख पावै संतहु अंते नामु सखाई ॥12॥
अपणा आपु न पछाणहि संतहु कूड़ि करहि वडिआई ॥13॥
पाखंडि कीनै जमु नही छोडै लै जासी पति गवाई ॥14॥
जिन अंतरि सबदु आपु पछाणहि गति मिति तिन ही पाई ॥15॥
एहु मनूआ सुंन समाधि लगावै जोती जोति मिलाई ॥16॥
सुणि सुणि गुरमुखि नामु वखाणहि सतसंगति मेलाई ॥17॥
गुरमुखि गावै आपु गवावै दरि साचै सोभा पाई ॥18॥
साची बाणी सचु वखाणै सचि नामि लिव लाई ॥19॥
भै भंजनु अति पाप निखंजनु मेरा प्रभु अंति सखाई ॥20॥
सभु किछु आपे आपि वरतै नानक नामि वडिआई ॥21॥3॥12॥
हरि की पूजा दुलंभ है संतहु कहणा कछू न जाई ॥1॥
संतहु गुरमुखि पूरा पाई ॥
नामो पूज कराई ॥1॥ रहाउ ॥
हरि बिनु सभु किछु मैला संतहु किआ हउ पूज चड़ाई ॥2॥
हरि साचे भावै सा पूजा होवै भाणा मनि वसाई ॥3॥
पूजा करै सभु लोकु संतहु मनमुखि थाइ न पाई ॥4॥
सबदि मरै मनु निरमलु संतहु एह पूजा थाइ पाई ॥5॥
पवित पावन से जन साचे एक सबदि लिव लाई ॥6॥
बिनु नावै होर पूज न होवी भरमि भुली लोकाई ॥7॥
गुरमुखि आपु पछाणै संतहु राम नामि लिव लाई ॥8॥
आपे निरमलु पूज कराए गुर सबदी थाइ पाई ॥9॥
पूजा करहि परु बिधि नही जाणहि दूजै भाइ मलु लाई ॥10॥
गुरमुखि होवै सु पूजा जाणै भाणा मनि वसाई ॥11॥
भाणे ते सभि सुख पावै संतहु अंते नामु सखाई ॥12॥
अपणा आपु न पछाणहि संतहु कूड़ि करहि वडिआई ॥13॥
पाखंडि कीनै जमु नही छोडै लै जासी पति गवाई ॥14॥
जिन अंतरि सबदु आपु पछाणहि गति मिति तिन ही पाई ॥15॥
एहु मनूआ सुंन समाधि लगावै जोती जोति मिलाई ॥16॥
सुणि सुणि गुरमुखि नामु वखाणहि सतसंगति मेलाई ॥17॥
गुरमुखि गावै आपु गवावै दरि साचै सोभा पाई ॥18॥
साची बाणी सचु वखाणै सचि नामि लिव लाई ॥19॥
भै भंजनु अति पाप निखंजनु मेरा प्रभु अंति सखाई ॥20॥
सभु किछु आपे आपि वरतै नानक नामि वडिआई ॥21॥3॥12॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 3 ॥ हे संत जनो ! परमात्मा की पूजा-भगती बड़ी मुश्किल से मिलती है। प्रभू की पूजा कितनी दुर्लभ है- इस संबन्धी कुछ भी बताया नहीं जा सकता। 1। (हे संत जनो !) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह सारे गुणों से भरपूर प्रभू को पा लेता है। नाम जपो। नाम ही जपो - गुरू ये पूजा कराता है। 1। रहाउ। (हे संत जनो ! दुनिया के लोग फूल-पत्रों आदि से देवताओं की पूजा करते हैं। पर) हे संत जनो ! मैं (परमात्मा की पूजा करने के लिए) कौन सी चीज उसके आगे भेटा करूँ। उस प्रभू के नाम के बिना (नाम के मुकाबले में) और हरेक चीज मैली है। 2। हे संत जनो ! अगर किसी मनुष्य को सदा कायम रहने वाले परमात्मा की रजा अच्छी लगने लग जाए तो उसकी तरफ से यही परमात्मा की पूजा है। (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा की) रजा को ही अपने मन में बसाता है (रजा को ही ठीक समझता है)। 3। हे संत जनो ! सारा जगत (अपनी ओर से) पूजा करता है। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की की हुई कोई भी पूजा (परमात्मा की हजूरी में) कबूल नहीं होती। 4। हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू के शबद से विकारों का प्रभाव अपने ऊपर नहीं पड़ने देता उसका मन पवित्र हो जाता है। उसकी यह पूजा प्रभू-दर पे प्रवान हो जाती है। 5। हे संत जनो ! ऐसे लोग पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के साथ एक-मेक हो जाते हैं; गुरू के शबद के द्वारा वह लोग एक परमात्मा में सुरति जोड़े रखते हैं। 6। हे संत जनो ! परमात्मा का नाम जपे बिना परमात्मा की किसी और किस्म की पूजा नहीं हो सकती। (नाम से टूट के) भुलेखे में पड़ के दुनिया गलत रास्ते पर पड़ी रहती है। 7। हे संत जनो ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य अपने जीवन को पड़तालता रहता है। और। परमात्मा के नाम में सुरति जोड़े रखता है। 8। हे संत जनो ! पवित्र प्रभू खुद ही (जीव को गुरू के शबद में जोड़ के उससे अपनी) पूजा-भगती कराता है। और। गुरू के शबद में उसकी लीनता के कारण उसकी की हुई पूजा परवान करता है। 9। (हे संत जनो ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य प्रभू की) पूजा तो करते हैं। परन्तु (पूजा का) सही तरीका नहीं जानते। माया के प्यार में फस के (मनमुख मनुष्य अपने मन को विकारों की) मैल चिपकाए रखते हैं। 10। (हे संत जनो !) जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह परमात्मा की भगती करनी जानता है (वह जानता है कि प्रभू की रजा में राजी रहना ही प्रभू की भक्ति है। इस वास्ते वह प्रभू की) रजा को अपने मन में बसाता है। 11। हे संत जनो ! गुरमुख मनुष्य भाणा मानने (प्रभू की मर्जी मानने) से (ही इस लोक में) सारे सुख प्राप्त कर लेता है; आखिरी वक्त भी प्रभू का नाम ही उसका साथी बनता है। 12। हे संत जनो ! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर) अपने जीवन को नहीं पड़तालते। माया के मोह में फंसे हुए वे मनुष्य अपने आप की ही शोभा करते रहते हैं। 13। हे संत जनो ! (धर्म का) पाखण्ड करने से मौत (के सहम से) निजात नहीं मिलती। जम (नाम-हीन लोगों को) यहाँ से उनकी इज्जत गवा के (परलोक) ले जाएगा। 14। हे संत जनो ! जिन लोगों के हृदय में गुरू का शबद बस जाता है। वे अपने जीवन को पड़तालते रहते हैं। उन्होंने ही ये बात समझी है कि परमात्मा कैसा है और कितना बड़ा (बेअंत) है। 15। (हे संत जनो ! जिनके अंदर गुरू-शबद बसता है उनका) ये मन ऐसी एकाग्रता बनाता है जहाँ माया के फुरने नहीं उठते। उनकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में लीन है। 16। (हे संत जनो !) गुरू के सन्मुख रहने वाले वे लोग साध-संगति में मिल बैठते हैं। (सत-संगियों से) प्रभू का नाम सुन-सुन के वे भी नाम उचारते रहते हैं। 17। (हे संत जनो !) गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू की सिफतसालाह के गीत गाता रहता है। अपने अंदर अहम्-अहंकार को दूर करता है। और। सदा-स्थिर प्रभू के दर पर शोभा पाता है। 18। (हे संत जनो ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य) सदा-स्थिर हरी की सिफत-सालाह की बाणी उचारता है। सदा-स्थिर-प्रभू का नाम उचारता है। सदा-स्थिर-प्रभू के नाम में सुरति जोड़े रखता है। 19। (हे संत जनो !) जीवों के सारे डर नाश करने वाला और घोर पाप दूर करने वाला परमात्मा आखिर (उनका) साथी बनता है (जो उसकी सिफत-सालाह में जुड़े रहते हैं)। 20। हे संत जनो ! ये सब कुछ (जो दिखाई दे रहा है। इस में) प्रभू स्वयं ही स्वयं हर जगह मौजूद है। हे नानक ! उसके नाम में जुड़ने से लोक-परलोक में सम्मान मिलता है। 21। 3। 12।
हम कुचल कुचील अति अभिमानी मिलि सबदे मैलु उतारी ॥1॥
रामकली महला 3 ॥
हम कुचल कुचील अति अभिमानी मिलि सबदे मैलु उतारी ॥1॥
संतहु गुरमुखि नामि निसतारी ॥
सचा नामु वसिआ घट अंतरि करतै आपि सवारी ॥1॥ रहाउ ॥
हम कुचल कुचील अति अभिमानी मिलि सबदे मैलु उतारी ॥1॥
संतहु गुरमुखि नामि निसतारी ॥
सचा नामु वसिआ घट अंतरि करतै आपि सवारी ॥1॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 3 ॥ हे संत जनो ! हम संसारी जीव (आम तौर पर) बद्-चलन। गंदे आचरण वाले अहंकारी बने रहते हैं। (किसी भाग्यशाली ने) गुरू के शबद में जुड़ के विकारों की मैल अपने मन से उतार दी होती है। 1। हे संत जनो ! गुरू के सन्मुख रहने से परमात्मा के नाम से (संसार-समुंदर से) पार-उतारा हो जाता है। जिस मनुष्य के हृदय में सदा-स्थिर प्रभू का नाम बस जाता है। (समझ लो कि) ईश्वर ने स्वयं उसकी इज्जत रख ली। 1। रहाउ।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 910 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९१० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।