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अंग 909

अंग
909
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
एहु जोगु न होवै जोगी जि कुटंबु छोडि परभवणु करहि ॥
ग्रिह सरीर महि हरि हरि नामु गुर परसादी अपणा हरि प्रभु लहहि ॥8॥
इहु जगतु मिटी का पुतला जोगी इसु महि रोगु वडा त्रिसना माइआ ॥
अनेक जतन भेख करे जोगी रोगु न जाइ गवाइआ ॥9॥
हरि का नामु अउखधु है जोगी जिस नो मंनि वसाए ॥
गुरमुखि होवै सोई बूझै जोग जुगति सो पाए ॥10॥
जोगै का मारगु बिखमु है जोगी जिस नो नदरि करे सो पाए ॥
अंतरि बाहरि एको वेखै विचहु भरमु चुकाए ॥11॥
विणु वजाई किंगुरी वाजै जोगी सा किंगुरी वजाइ ॥
कहै नानकु मुकति होवहि जोगी साचे रहहि समाइ ॥12॥1॥10॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे जोगी ! आप ये जो अपना परिवार छोड़ के देश-रटन करता फिरता है। इसको जोग नहीं कहते। इस शरीर-घर में ही परमात्मा का नाम (बस रहा है। हे जोगी ! अपने अंदर ही) गुरू की कृपा के साथ आप अपने परमात्मा को पा सकेगा। 8। हे जोगी ! ये संसार (मानो) मिट्टी का बुत है। इसमें माया की तृष्णा का बड़ा रोग लगा हुआ है। हे जोगी ! अगर कोई मनुष्य (त्यागियों वाले) भेष आदि के अनेकों यत्न करता रहे। तो भी ये रोग दूर नहीं किया जा सकता। 9। हे जोगी ! (इस रोग को दूर करने के लिए) परमात्मा का नाम (ही) दवाई है (पर यह दवाई वही मनुष्य इस्तेमाल करता है) जिस पर (मेहर करके उसके) मन में (ये दवाई) बसाता है। (इस भेद को) वही मनुष्य समझता है जो गुरू के सन्मुख रहता है। वही मनुष्य प्रभू-मिलाप का ढंग सीखता है। 10। हे जोगी ! (जिस जोग का हम वर्णन कर रहे हैं उस) रोग का रास्ता मुश्किल है। ये रास्ता उस मनुष्य को मिलता है जिस पर (प्रभू) मेहर की निगाह करता है। वह मनुष्य अपने अंदर से मेर-तेर दूर कर लेता है। अपने अंदर और सारे संसार में सिर्फ एक परमात्मा को ही देखता है। 11। हे जोगी ! आप (अमृत नाम की) वह वीणा बजाया कर जो (अंतरात्मा में) बिना बजाए बजती है। नानक कहता है- हे जोगी ! (अगर आप हरी-नाम सिमरन की वीणा बजाएगा। तो) आप विकारों से मुक्ति (का मालिक) हैं जाएगा। और सदा कायम रहने वाले परमात्मा में टिका रहेगा। 12। 1।
रामकली महला 3 ॥
भगति खजाना गुरमुखि जाता सतिगुरि बूझि बुझाई ॥1॥
संतहु गुरमुखि देइ वडिआई ॥1॥ रहाउ ॥
सचि रहहु सदा सहजु सुखु उपजै कामु क्रोधु विचहु जाई ॥2॥
आपु छोडि नाम लिव लागी ममता सबदि जलाई ॥3॥
जिस ते उपजै तिस ते बिनसै अंते नामु सखाई ॥4॥
सदा हजूरि दूरि नह देखहु रचना जिनि रचाई ॥5॥
सचा सबदु रवै घट अंतरि सचे सिउ लिव लाई ॥6॥
सतसंगति महि नामु निरमोलकु वडै भागि पाइआ जाई ॥7॥
भरमि न भूलहु सतिगुरु सेवहु मनु राखहु इक ठाई ॥8॥
बिनु नावै सभ भूली फिरदी बिरथा जनमु गवाई ॥9॥
जोगी जुगति गवाई हंढै पाखंडि जोगु न पाई ॥10॥
सिव नगरी महि आसणि बैसै गुर सबदी जोगु पाई ॥11॥
धातुर बाजी सबदि निवारे नामु वसै मनि आई ॥12॥
एहु सरीरु सरवरु है संतहु इसनानु करे लिव लाई ॥13॥
नामि इसनानु करहि से जन निरमल सबदे मैलु गवाई ॥14॥
त्रै गुण अचेत नामु चेतहि नाही बिनु नावै बिनसि जाई ॥15॥
ब्रहमा बिसनु महेसु त्रै मूरति त्रिगुणि भरमि भुलाई ॥16॥
गुर परसादी त्रिकुटी छूटै चउथै पदि लिव लाई ॥17॥
पंडित पड़हि पड़ि वादु वखाणहि तिंना बूझ न पाई ॥18॥
बिखिआ माते भरमि भुलाए उपदेसु कहहि किसु भाई ॥19॥
भगत जना की ऊतम बाणी जुगि जुगि रही समाई ॥20॥
बाणी लागै सो गति पाए सबदे सचि समाई ॥21॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 3 ॥ हे संत जनो ! गुरू के सन्मुख रहने वाले ने ही परमात्मा की भक्ति के खजाने की कद्र को समझा है। गुरू ने (स्वयं ये कद्र) समझ (सिख को) बख्शी है। 1। हे संत जनो ! (परमात्मा लोक-परलोक में) उस मनुष्य को इज्जत देता है जो सदा गुरू के सन्मुख रहता है। 1। रहाउ। (हे संत जनो ! गुरू के सन्मुख रह के ही) आप सदा-स्थिर प्रभू में लीन रह सकते हैं। (आपके अंदर) आत्मिक अडोलता वाला सुख पैदा हैं सकता है और (आपके) अंदर से काम-क्रोध दूर हैं सकता है। 2। (हे संत जनो ! गुरू के सन्मुख मनुष्य ने ही) स्वै भाव छोड़ के (अपने अंदर परमात्मा के) नाम की लगन बनाई है और (अपने अंदर से) मैं-मेरी की आदत गुरू के शबद द्वारा जला दी है। 3। (हे संत जनो ! गुरमुख को ही ये समझ आती है कि) जीव जिस परमात्मा से पैदा होता है उसी के हुकम के अनुसार ही नाश हो जाता है। और आखिरी समय में सिर्फ प्रभू का नाम ही साथी बनता है। 4। (हे संत जनो !) जिस परमात्मा ने ये जगत की खेल बनाई है उसको इसमें हर जगह हाजिर-नाजिर देखो। इसमें अलग दूर ना समझो। 5। (हे संत जनो ! गुरू के सन्मुख हो के ही) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह का शबद मनुष्य के हृदय में बस सकता है और सदा-स्थिर प्रभू के साथ लगन लग सकती है। 6। (हे संत जनो ! जो) हरी-नाम किसी दुनियावी पदार्थ के बदले नहीं मिल सकता वह गुरू की साध-संगति में बड़ी किस्मत से मिल जाता है। 7। (हे संत जनो !) भटक के गलत रास्ते पर ना पड़े रहो। गुरू के दर-घर में बने रहो। (अपने मन को प्रभू-चरणों में ही) एक ही जगह टिकाए रखो। 8। (हे संत जनो ! परमात्मा के) नाम के बिना सारी दुनिया गलत रास्ते पर पड़ी हुई है। और अपना मानस जनम व्यर्थ गवा रही है। 9। (हे संत जनो ! धार्मिक भेष के) पाखण्ड से प्रभू का मिलाप हासिल नहीं होता; (जो जोगी निरा इस पाखण्ड में पड़ा हुआ है। उस) जोगी ने प्रभू-मिलाप की जुगती (हाथों से) गवा ली है। वह (व्यर्थ में) भटकता-फिरता है। 10। (हे संत जनो ! जो जोगी गुरू के शबद में जुड़ता है। उसने) गुरू-शबद की बरकति से प्रभू मिलाप हासिल कर लिया है। वह जोगी साध-संगति में टिका हुआ (मानो) आसन पर बैठा हुआ है। 11। (हे संत जनो ! जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। वह गुरू के शबद द्वारा अपने मन की। माया के पीछे भटकने की खेल समाप्त कर लेता है। 12। (हे संत जनो !) यह मनुष्य का शरीर एक सुंदर तालाब है। जो मनुष्य प्रभू-चरणों में सुरति जोड़े रखता है। (वह। मानो। इस तालाब में) स्नान कर रहा है। 13। (हे संत जनो !) जो मनुष्य प्रभू के नाम में स्नान करते हैं वे पवित्र जीवन वाले हैं। उन्होंने गुरू के शबद के द्वारा (अपने मन की विकारों वाली) मैल दूर कर ली है। 14। (हे संत जनो ! प्रभू की माया बड़ी प्रबल है) माया के तीन गुणों के कारण (जीव प्रभू की याद से) बेपरवाह रहते हैं। (प्रभू का) नाम याद नहीं करते। (हे संत जनो ! परमात्मा के) नाम के बिना हरेक जीव आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। 15। (हे संत जनो ! कोई बड़े से बड़ा भी हो) ब्रहमा (हो)। विष्णू (हो)। शिव (हो) (परमात्मा के नाम के बिना हरेक जीव माया के) तीन गुणों के पूर्ण प्रभाव तले रहता है। माया के तीन गुणों के प्रभाव के कारण (प्रभू-चरणों से टूटा हुआ हरेक जीव) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ जाता है। 16। (हे संत जनो !) गुरू कृपा से (प्रभू-नाम से जिस मनुष्य की) त्योड़ी (भाव। मन की खीझ) दूर होती है। (वह माया के तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर रह के) चौथी आत्मिक अवस्था में टिक के प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ता है। 17। (हे संत जनो !) पण्डित लोग (पुराण आदि पुस्तकें) पढ़ते हैं। इनको पढ़ के (श्रोताओं को देवताओं आदि के परस्पर) लड़ाई-झगड़े सुनाते हैं। (पर इस तरह) उनको (अपने आपको) ऊँचे आत्मिक जीवन की सूझ नहीं पड़ती। 18। माया के मोह में फसे हुए (वे पण्डित लोग) भटकना के कारण (खुद) गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं। फिर। हे भाई ! वे और किस को शिक्षा देते हैं। (उनकी शिक्षा से किसी और को कोई लाभ नहीं हो सकता)। 19। हे संत जनो ! परमात्मा की भक्ति करने वालों के बोल श्रेष्ठ हुआ करते हैं। वे बोल हरेक युग में (हरेक समय में ही सब पर) अपना असर डालते हैं। 20। (हे संत जनो ! जो मनुष्य गुरू की) बाणी में सुरति जोड़ता है। वह ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है; गुरू के शबद के द्वारा वह सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 21।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जोगी ! आप ये जो अपना परिवार छोड़ के देश-रटन करता फिरता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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