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अंग 90

अंग
90
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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मः 3 ॥
सबदि रती सोहागणी सतिगुर कै भाइ पिआरि ॥
सदा रावे पिरु आपणा सचै प्रेमि पिआरि ॥
अति सुआलिउ सुंदरी सोभावंती नारि ॥
नानक नामि सोहागणी मेली मेलणहारि ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जीवित पति वाली (गुरमुख जीव) स्त्री (वह है जो) गुरू के शबद द्वारा सतिगुरू के प्रेम प्यार में सदा अपने हरी पति (की याद) का आनन्द लेती है। वह सुंदर नारी बहुत सुहाने रूप वाली व शोभा वाली है। हे नानक ! नाम में (जुड़ी होने करके) (गुरमुख) सुहागन को मेलणहार हरी ने (अपने में) मिला लिया है।2।
पउड़ी ॥
हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥
हरि तुधनो करहि सभ नमसकारु जिनि पापै ते राखिआ ॥
हरि निमाणिआ तूं माणु हरि डाढी हूं तूं डाढिआ ॥
हरि अहंकारीआ मारि निवाए मनमुख मूड़ साधिआ ॥
हरि भगता देइ वडिआई गरीब अनाथिआ ॥17॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! सब जीव आपकी (ही) सिफत सलाह करते हैं, जिनको तूने (उन्हें माया में) फंसे हुओं को निकाला है। हे हरी ! सब जीव आपके आगे सिर निवाते हैं, जिसे तूने (उनको) पापों से बचाया है। हे हरी ! जिन्हें कहीं आदर नहीं मिलता, आप उनका मान बनता है। हे हरी ! आप सर्वश्रेष्ठ है। (हे भाई !) प्रभू अहंकारियों को मार के (भाव, विपता में डाल के) झुकाता है, और मूर्ख मनमुखों को सीधे राह डालता है। प्रभू गरीब व अनाथ भगतों को आदर बख्शता है।17।
सलोक मः 3 ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिसु वडिआई वडी होइ ॥
हरि का नामु उतमु मनि वसै मेटि न सकै कोइ ॥
किरपा करे जिसु आपणी तिसु करमि परापति होइ ॥
नानक कारणु करते वसि है गुरमुखि बूझै कोइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो मनुष्य सतिगुरू के भाणे में जीवन व्यतीत करता है, उसका (हरी की दरगाह में) बड़ा आदर होता है, प्रभू का उत्तम नाम उस के मन में घर करता है (टिकता है)। और कोई (मायावी पदार्थ उत्तम ‘नाम’ के संस्कारों को उसके हृदय में से) दूर नहीं कर सकता। जिस पे (हरी खुद) अपनी मेहर करे, उस को उस मेहर सदका (उत्तम नाम) प्राप्त होता है (पर नाम प्राप्ति का कारण, भाव भाणा मानने का उद्यम, मनुष्य के अपने वश में नहीं), कोई गुरमुख जीव ही समझता है कि, हे नानक ! कारण सृजनहार के बस में है।1।
मः 3 ॥
नानक हरि नामु जिनी आराधिआ अनदिनु हरि लिव तार ॥
माइआ बंदी खसम की तिन अगै कमावै कार ॥
पूरै पूरा करि छोडिआ हुकमि सवारणहार ॥
गुर परसादी जिनि बुझिआ तिनि पाइआ मोख दुआरु ॥
मनमुख हुकमु न जाणनी तिन मारे जम जंदारु ॥
गुरमुखि जिनी अराधिआ तिनी तरिआ भउजलु संसारु ॥
सभि अउगण गुणी मिटाइआ गुरु आपे बखसणहारु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ हे नानक ! जिन्होंने हर रोज एक रस प्रभू के नाम का सिमरन किया है, पति प्रभू की दासी माया उनकी सेवा में रहती है (भाव, वे लोग माया के पीछे नही घूमते, माया उनकी सेवक बनती है), (क्योंकि) सवाँरनेवाले (प्रभू) के हुकम में पूरे (गुरू) ने उन्हें पूर्ण कर दिया है (और वे माया के पीछे डोलते नहीं) सतिगुरू की कृपा से जिसने (ये भेद) समझ लिया है, उसने मुक्ति का दर ढूँढ लिया है। मनमुख लोग (प्रभू का) हुकम नहीं पहचानते, (इस करके) उन्हें जालिम जम दंड देता है। गुरू के सन्मुख हो के जिन्होंने सिमरन किया, वे संसार सागर से तर गए हैं, (क्योंकि सतिगुरू ने) गुणों से (अर्थात, उनके हृदय में गुण प्रगट करके उनके) सारे अवगुण मिटा दिये हैं। गुरू बड़ा बख्शिंद है।2।
पउड़ी ॥
हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥
हरि जेवडु नाही कोई जाणु हरि धरमु बीचारदा ॥
काड़ा अंदेसा किउ कीजै जा नाही अधरमि मारदा ॥
सचा साहिबु सचु निआउ पापी नरु हारदा ॥
सालाहिहु भगतहु कर जोड़ि हरि भगत जन तारदा ॥18॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। भगत जनों को प्रभू पे (ये) भरोसा है कि प्रभू अंतरजामी है,(और इसलिए) प्रभू न्याय की विचार करता है। यदि (ये भरोसा हो कि) प्रभू अन्याय से नहीं मारता, तो कोई फिक्र डर नहीं रहता। प्रभू खुद अभॅुल है और उसका न्याय भी अभॅुल है, (इस ‘मार’ के सदके ही) पापी मनुष्य (पापों से) तौबा करता है। हे भगत जनों ! विनम्र हो के प्रभू की सिफत सलाह करो, प्रभू अपने भक्तों को विकारों से बचा लेता है।18।
सलोक मः 3 ॥
आपणे प्रीतम मिलि रहा अंतरि रखा उरि धारि ॥
सालाही सो प्रभ सदा सदा गुर कै हेति पिआरि ॥
नानक जिसु नदरि करे तिसु मेलि लए साई सुहागणि नारि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (मन चाहता है कि) अपने प्यारे को (सदा) मिली रहूँ, अंदर दिल में परो के रखूँ और सतिगुरू के लगाए प्रेम में सदा उस प्रभू की सिफत सलाह करती रहूँ। (पर) हे नानक ! जिस तरफ (वह प्यारा प्यार से) देखता है, उस को (ही अपने साथ) मेलता है, और वही स्त्री सुहागन (जीवित पति वाली) कहलाती है।1।
मः 3 ॥
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
माणस ते देवते भए धिआइआ नामु हरे ॥
हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि तरे ॥
नानक सहजि समाइअनु हरि आपणी क्रिपा करे ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू जिस (जीव) पर मेहर की नजर करता है, वह (जीव) सतिगुरू की बतायी कृत करके प्रभू से मिल जाता है। हरी नाम का सिमरन करके जीव मनुष्य (-स्वभाव) से देवताबन जाते हैं। जिनका अहम् दूर करके उस प्रभू ने अपने साथ मिलाया है, वह गुरू के शबदों के द्वारा विकारों से बच जाते हैं। हे नानक ! प्रभू ने अपनी मेहर करके उन्हें अडोल अवस्था में टिका दिया।2।
पउड़ी ॥
हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥
आपणी आपि करे परतीति आपे सेव घालीअनु ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू ने (भगत जनों से) स्वयं ही अपनी भक्ति कराके (भगती की बरकति से उनको अपनी) वडिआई दिखाई है। प्रभू (भगतों के दिल में) अपना भरोसा स्वयं (उत्पन्न) करता है तथा उनसे स्वयं ही सेवा उसने कराई है।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “महला 3॥ जीवित पति वाली (गुरमुख जीव) स्त्री (वह है जो) गुरू के शबद द्वारा सतिगुरू के प्रेम प्यार में सदा अपने हरी पति (की याद) का आनन्द लेती है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।