कैसे बूझै जब मोहिआ है माइआ ॥1॥ रहाउ ॥
कहत कबीर छोडि बिखिआ रस इतु संगति निहचउ मरणा ॥
रमईआ जपहु प्राणी अनत जीवण बाणी इन बिधि भव सागरु तरणा ॥2॥
जां तिसु भावै ता लागै भाउ ॥
भरमु भुलावा विचहु जाइ ॥
उपजै सहजु गिआन मति जागै ॥
गुर प्रसादि अंतरि लिव लागै ॥3॥
इतु संगति नाही मरणा ॥
हुकमु पछाणि ता खसमै मिलणा ॥1॥ रहाउ दूजा ॥
माइआ मोहु मनि आगलड़ा प्राणी जरा मरणु भउ विसरि गइआ ॥
कुटंबु देखि बिगसहि कमला जिउ पर घरि जोहहि कपट नरा ॥1॥
दूड़ा आइओहि जमहि तणा ॥ तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥
कोई कोई साजणु आइ कहै ॥
मिलु मेरे बीठुला लै बाहड़ी वलाइ ॥ मिलु मेरे रमईआ मै लेहि छडाइ ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक अनिक भोग राज बिसरे प्राणी संसार सागर पै अमरु भइआ ॥
माइआ मूठा चेतसि नाही जनमु गवाइओ आलसीआ ॥2॥
बिखम घोर पंथि चालणा प्राणी रवि ससि तह न प्रवेसं ॥
माइआ मोहु तब बिसरि गइआ जां तजीअले संसारं ॥3॥
आजु मेरै मनि प्रगटु भइआ है पेखीअले धरमराओ ॥
तह कर दल करनि महाबली तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥4॥
जे को मूं उपदेसु करतु है ता वणि त्रिणि रतड़ा नाराइणा ॥
ऐ जी तूं आपे सभ किछु जाणदा बदति त्रिलोचनु रामईआ ॥5॥2॥
अचरज एकु सुनहु रे पंडीआ अब किछु कहनु न जाई ॥
सुरि नर गण गंध्रब जिनि मोहे त्रिभवण मेखुली लाई ॥1॥
राजा राम अनहद किंगुरी बाजै ॥
जा की दिसटि नाद लिव लागै ॥1॥ रहाउ ॥
भाठी गगनु सिंङिआ अरु चुंङिआ कनक कलस इकु पाइआ ॥
तिसु महि धार चुऐ अति निरमल रस महि रसन चुआइआ ॥2॥
एक जु बात अनूप बनी है पवन पिआला साजिआ ॥
तीनि भवन महि एको जोगी कहहु कवनु है राजा ॥3॥
ऐसे गिआन प्रगटिआ पुरखोतम कहु कबीर रंगि राता ॥
अउर दुनी सभ भरमि भुलानी मनु राम रसाइन माता ॥4॥3॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे प्रभू !) इस तरह तूने जगत को भुलेखे में डाला हुआ है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।