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अंग ९०८ · रामकली

अंग
908
रामकली
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  1. ब्रहमा बिसनु महेस इक मूरति आपे करता कारी ॥12॥
  2. सरमै दीआ मुंद्रा कंनी पाइ जोगी खिंथा करि तू दइआ ॥

ब्रहमा बिसनु महेस इक मूरति आपे करता कारी ॥12॥

अंग ९०७ से चला आ रहा अंश

ब्रहमा बिसनु महेस इक मूरति आपे करता कारी ॥12॥
काइआ सोधि तरै भव सागरु आतम ततु वीचारी ॥13॥
गुर सेवा ते सदा सुखु पाइआ अंतरि सबदु रविआ गुणकारी ॥14॥
आपे मेलि लए गुणदाता हउमै त्रिसना मारी ॥15॥
त्रै गुण मेटे चउथै वरतै एहा भगति निरारी ॥16॥
गुरमुखि जोग सबदि आतमु चीनै हिरदै एकु मुरारी ॥17॥
मनूआ असथिरु सबदे राता एहा करणी सारी ॥18॥
बेदु बादु न पाखंडु अउधू गुरमुखि सबदि बीचारी ॥19॥
गुरमुखि जोगु कमावै अउधू जतु सतु सबदि वीचारी ॥20॥
सबदि मरै मनु मारे अउधू जोग जुगति वीचारी ॥21॥
माइआ मोहु भवजलु है अवधू सबदि तरै कुल तारी ॥22॥
सबदि सूर जुग चारे अउधू बाणी भगति वीचारी ॥23॥
एहु मनु माइआ मोहिआ अउधू निकसै सबदि वीचारी ॥24॥
आपे बखसे मेलि मिलाए नानक सरणि तुमारी ॥25॥9॥

हिन्दी अर्थ: (हे अवधू ! उस मनुष्य को यह समझ आ जाती है कि) ईश्वर स्वयं ही सब कुछ करने में समर्थ है। ब्रहमा-विष्णु और शिव उस एक परमात्मा (की एक-एक ताकत) के स्वरूप (मिथे गए) हैं। 12। (हे अवधू ! वह मनुष्य) हरेक आत्मा के मालिक परमात्मा (की याद) को अपने सोच-मण्डल में टिकाता है और (जंगलों और पहाड़ों में भटकने की जगह) अपने शरीर को (विकारों से) पवित्र रख के इस संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 13। (हे अवधू ! उस मनुष्य ने) गुरू की बताई हुई सेवा से ही सदा के लिए आत्मिक आनंद पा लिया है। उसके अंदर (पवित्र) आत्मिक गुण पैदा करने वाला गुरू का शबद सदा टिका रहता है। 14। (हे अवधू ! जिस पर प्रभू कृपा करता है उसको) आत्मिक गुण पैदा करने वाला परमात्मा स्वयं ही (गुरमुखों की) संगति में मिलाता है। उसके अंदर से अहंकार और माया की तृष्णा समाप्त कर देता है। 15। (वह मनुष्य गुरू के शबद की बरकति से) माया के तीन गुणों का प्रभाव मिटा लेता है। उस उच्च आत्मिक अवस्था में टिका रहता है जहाँ इन तीनों का जोर नहीं चलता। (जंगलों पहाड़ों में भटकने के बजाय उसको) यह भक्ति ही आकर्षित करती है। 16। (हे अवधू !) गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ने के योग (-साधन) के द्वारा अपने आत्मिक जीवन को परखता रहता है और अपने हृदय में एक परमात्मा (की याद और प्रीत) को बसाए रखता है। 17। (हे अवधू ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का मन सदा) गुरू के शबद में रंगा रहता है। (इस वास्ते उसका) मन (विकारों में डोलने की जगह प्रभू-प्रीति में) टिका रहता है। (मानस जीवन में) ये ही करने-योग्य काम उसको श्रेष्ठ लगता है। 18। हे अवधू ! वेद (आदि धर्म-पुस्तकों) को (पढ़ के उनकी) चर्चा को (वह मनुष्य) नहीं कबूलता (पसंद नहीं करता। आत्मिक जीवन के राह में इसको वह) पाखण्ड (समझता है)। वह तो गुरू की शरण पड़ के गुरू के शबद की बरकति से ऊँची आत्मिक विचार का मालिक बनता है। 19। हे अवधू ! (जिस मनुष्य का उद्धार परमात्मा करता है वह) गुरू के बताए हुए राह पर चलता है। यही जोग (वह) कमाता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह ऊँची आत्मिक विचार का मालिक बनता है। यही है उसका जत और सत (कायम रखने का तरीका)। 20। हे अवधू ! उस मनुष्य ने जोग की (परमात्मा के साथ जुड़ने की) ये जुगति समझी है कि वह गुरू के शबद में जुड़ के (अहंकार-ममता आदि से) मुर्दा हो जाता है अपने मन को (विकारों से) काबू में रखता है। 21। हे अवधू ! माया का मोह बवण्डर है (जिस मनुष्य का परमात्मा उद्धार करता है वह) गुरू के शबद में जुड़ के (इसमें से) पार लांघ जाता है और अपनी कुलों का भी उद्धार कर लेता है। 22। हे अवधू ! जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ते हैं वे चारों युगों में ही सूरमे हैं। (भाव। किसी भी समय में कामादिक विकार उन पर जोर नहीं डाल सकते)। गुरू की बाणी की बरकति से वे परमात्मा की भक्ति को अपनी सोच-मण्डल में टिकाए रखते हैं। 23। हे अवधू ! मनुष्य का ये मन माया के मोह में फंस जाता है (पर इसमें से निकलने का ये तरीका नहीं कि मनुष्य जंगलों में या पहाड़ों की गुफाओं में जा छिपे। इसमें से) वही मनुष्य निकलता है जो गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा की सिफतसालाह को अपने सोच-मंडल में टिकाता है। 24। सो। हे नानक ! (प्रभू के दर पर अरदास कर- हे प्रभू !) मैं आपकी शरण आया हूँ (मुझे माया के मोह में फसने से बचा ले)। (माया के मोह से बचना जीवों के अपने वश की बात नहीं। अरदास सुन के) परमात्मा स्वयं ही कृपा करता है और अपनी संगति में मिलाता है। 25। 9।

सरमै दीआ मुंद्रा कंनी पाइ जोगी खिंथा करि तू दइआ ॥

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रामकली महला 3 असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सरमै दीआ मुंद्रा कंनी पाइ जोगी खिंथा करि तू दइआ ॥
आवणु जाणु बिभूति लाइ जोगी ता तीनि भवण जिणि लइआ ॥1॥
ऐसी किंगुरी वजाइ जोगी ॥
जितु किंगुरी अनहदु वाजै हरि सिउ रहै लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सतु संतोखु पतु करि झोली जोगी अंम्रित नामु भुगति पाई ॥
धिआन का करि डंडा जोगी सिंङी सुरति वजाई ॥2॥
मनु द्रिड़ु करि आसणि बैसु जोगी ता तेरी कलपणा जाई ॥
काइआ नगरी महि मंगणि चड़हि जोगी ता नामु पलै पाई ॥3॥
इतु किंगुरी धिआनु न लागै जोगी ना सचु पलै पाइ ॥
इतु किंगुरी सांति न आवै जोगी अभिमानु न विचहु जाइ ॥4॥
भउ भाउ दुइ पत लाइ जोगी इहु सरीरु करि डंडी ॥
गुरमुखि होवहि ता तंती वाजै इन बिधि त्रिसना खंडी ॥5॥
हुकमु बुझै सो जोगी कहीऐ एकस सिउ चितु लाए ॥
सहसा तूटै निरमलु होवै जोग जुगति इव पाए ॥6॥
नदरी आवदा सभु किछु बिनसै हरि सेती चितु लाइ ॥
सतिगुर नालि तेरी भावनी लागै ता इह सोझी पाइ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 3 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि ॥ हे जोगी ! (इस काँच की मुंद्राओं की जगह) आप अपने कानों में (ऊँचा आत्मिक जीवन बनाने के लिए) मेहनत की मुंद्राएं डाल ले और दया को आप अपनी गोदड़ी बना। हे जोगी ! जनम-मरन के चक्कर का डर याद रख - ये राख आप अपने शरीर पर मल। (जब आप ऐसा उद्यम करेगा। तो समझ लेना कि) आपने जगत का मोह जीत लिया। 1। हे जोगी ! आप ऐसी वीणा बजाया कर। जिस वीणा के बजाने से (मनुष्य के अंदर) ऊँचे आत्मिक जीवन का एक-रस आनंद पैदा हो जाता है। और मनुष्य परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है। 1। रहाउ। हे जोगी ! (दूसरों की) सेवा (किया कर। और अपने अंदर) संतोख (धारण कर। इन दोनों) को खप्पर और झोली बना। आत्मिक जीवन देने वाला नाम (अपने हृदय में बसाए रखो) ये चूरमा (आप अपने खप्पर में) डाल। हे जोगी ! प्रभू चरणों में चित्त जोड़े रखने को आप (अपने हाथ का) डंडा बना; प्रभू में सुरति टिकाए रख- ये सिंगी बजाया कर। 2। हे जोगी ! (प्रभू की याद में) अपने मन को पक्का कर- (इस) आसन पर बैठा कर। (इस अभ्यास से) आपके मन की खिझ दूर हो जाएगी। (आप आटा मांगने के लिए नगर की ओर चल पड़ता है। इसकी जगह) अगर आप अपने शरीर नगर के अंदर ही (टिक के परमात्मा के दर से उसके नाम का दान) मांगना शुरू कर दे। तो। हे जोगी ! आपको (परमात्मा का) नाम प्राप्त हो जाएगा। 3। हे जोगी ! (जो किंगरी आप बजा रहा है) इस किंगरी से प्रभू के चरणों में ध्यान नहीं जुड़ सकता। ना ही इस तरह सदा-स्थिर प्रभू का मिलाप हो सकता है। हे जोगी ! (आपकी) इस किंगरी से मन में शांति नहीं पैदा हो सकती। ना ही मन में से अहंकार खत्म हो सकता है। 4। हे जोगी ! आप अपने इस शरीर को (किंगरी की) डंडी बना और (इस शरीर-डंडी को) डर और प्यार के दो तूंबे जोड़ (भाव। अपने अंदर प्रभू का भय और प्यार पैदा कर)। हे जोगी ! अगर आप हर वक्त गुरू के सन्मुख हुआ रहे तो (हृदय की प्रेम-) तार बज पड़ेगी। इस तरह (आपके अंदर से) तृष्णा समाप्त हो जाएगी। 5। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की रजा के अनुसार चलता है और एक परमात्मा के चरणों में चित्त जोड़े रखता है वह मनुष्य (असल) जोगी कहलवाता है। (उसके अंदर से) सहम दूर हो जाता है। उसका हृदय पवित्र हो जाता है। और। इस तरह वह मनुष्य परमात्मा के मिलाप का तरीका तलाश लेता है। 6। (हे जोगी ! जगत में जो कुछ) आँखों से दिखाई दे रहा है (ये) सब कुछ नाशवंत है (इसका मोह त्याग के) आप परमात्मा के साथ अपना चित्त जोड़े रख। (पर। हे जोगी !) ये समझ तब ही पड़ेगी जब गुरू के साथ आपकी श्रद्धा बनेगी। 7।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 908 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी; महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ९०८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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