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अंग 900

अंग
900
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामकली महला 5 ॥
इंीधन ते बैसंतरु भागै ॥
माटी कउ जलु दह दिस तिआगै ॥
ऊपरि चरन तलै आकासु ॥
घट महि सिंधु कीओ परगासु ॥1॥
ऐसा संम्रथु हरि जीउ आपि ॥
निमख न बिसरै जीअ भगतन कै आठ पहर मन ता कउ जापि ॥1॥ रहाउ ॥
प्रथमे माखनु पाछै दूधु ॥
मैलू कीनो साबुनु सूधु ॥
भै ते निरभउ डरता फिरै ॥
होंदी कउ अणहोंदी हिरै ॥2॥
देही गुपत बिदेही दीसै ॥
सगले साजि करत जगदीसै ॥
ठगणहार अणठगदा ठागै ॥
बिनु वखर फिरि फिरि उठि लागै ॥3॥
संत सभा मिलि करहु बखिआण ॥
सिंम्रिति सासत बेद पुराण ॥
ब्रहम बीचारु बीचारे कोइ ॥
नानक ता की परम गति होइ ॥4॥43॥54॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे मन ! देख उस प्रभू की आश्चर्यजनक ताकतें !) लकड़ी से आग परे भागती है (लकड़ी में आग हर वक्त मौजूद है। पर उसको जलाती नहीं)। (समुंद्र का) पानी धरती को हर तरफ से त्यागे रहता है (धरती समुंद्र में रहती है। पर समुंद्र इसको डुबोता नहीं)। (वृक्ष के) पैर (जड़ें) ऊपर की ओर हैं। और सिर नीचे की तरफ है। घड़े में (छोटे-छोटे शरीरों में) समुंद्र-प्रभू अपना आप प्रकाशित करता है। 1। हे मन ! परमात्मा खुद बहुत सारी ताकतों का मालिक हैं वह परमात्मा अपने भक्तों के मन से आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं बिसरता। हे मन ! आप भी उसको आठों पहर जपा कर। 1। रहाउ। (हे भाई ! पहले दूध होता है। उस दूध को मथने से उस दूध का तत्व-मक्खन बाद में निकलता है। पर देख ! सृष्टि का तत्व-) मक्खन परमात्मा पहले ही मौजूद है। ओर (उसका पसारा-जगत) दूध बाद में (बनता) है (जगत-पसारे रूप दूध में तत्व-प्रभू-मक्खन सर्व-व्यापक है)। (जीवों की पालना के लिए) मैल को (माँ के लहू को) शुद्ध साबन जैसा सफेद दूध बना देता है। निर्भय-प्रभू का अंश जीव दुनिया के अनेकों डरों से डरता फिरता है। माया जीव को भगाए फिरती है। 2। हे भाई ! शरीर की मालिक आत्मा (शरीर में) छुपी रहती है। सिर्फ शरीर दिखाई देता है। सारे जीवों को पैदा करके जगत का मालिक प्रभू (अनेकों करिश्मे) करता रहता है। ठॅगनी-माया जीव को सदा ठॅगती रहती है। नाम की पूँजी से वंचित जीव बार-बार माया को चिपकता है। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) संत-सभा में मिल के व्याख्या करके (बेशक) देख लें स्मृतियों-शास्त्रों-वेद-पुराणों की (इस ठगने वाली माया से बचा नहीं जा सकता)। जो कोई मनुष्य सत्संग में परमात्मा के गुणों की विचार विचारता है उ सी की ही सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था बनती है। 4। 43। 54।
रामकली महला 5 ॥
जो तिसु भावै सो थीआ ॥
सदा सदा हरि की सरणाई प्रभ बिनु नाही आन बीआ ॥1॥ रहाउ ॥
पुतु कलत्रु लखिमी दीसै इन महि किछू न संगि लीआ ॥
बिखै ठगउरी खाइ भुलाना माइआ मंदरु तिआगि गइआ ॥1॥
निंदा करि करि बहुतु विगूता गरभ जोनि महि किरति पइआ ॥
पुरब कमाणे छोडहि नाही जमदूति ग्रासिओ महा भइआ ॥2॥
बोलै झूठु कमावै अवरा त्रिसन न बूझै बहुतु हइआ ॥
असाध रोगु उपजिआ संत दूखनि देह बिनासी महा खइआ ॥3॥
जिनहि निवाजे तिन ही साजे आपे कीने संत जइआ ॥
नानक दास कंठि लाइ राखे करि किरपा पारब्रहम मइआ ॥4॥44॥55॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जो कुछ प्रभू को अच्छा लगता है वही हो रहा है। (इस वास्ते) सदा ही उस प्रभू की शरण पड़ा रह। प्रभू के बिना कोई और दूसरा (कुछ करने के योग्य) नहीं। 1। रहाउ। हे भाई ! पुत्र। स्त्री। माया – ये जो कुछ दिखाई दे रहा है। इनमें से कुछ भी (अंत के समय जीव) अपने साथ नहीं ले के जाता। विषौ-विकारों की ठॅगबूटी खा के जीव गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। आखिर में ये माया। ये सुंदर घर (सब कुछ) छोड़ के चला जाता है। 1। हे भाई ! जीव दूसरों की निंदा कर कर के बहुत ख्वार होता रहता है। और अपने इस किए अनुसार जनम-मरण के चक्कर में जा पड़ता है। (ये आम असूल की बात है कि) पूर्बले किए कर्मों के संस्कार जीव को छोड़ते नहीं हैं। और बहुत भयानक जमदूत इसे काबू में किए रखता है। 2। (माया के मोह की ठॅगबूटी खा के माया की खातिर जीव) झूठ बोलता है (मुँह से बोलता और है। और।) करता कुछ और है। इसकी माया की भूख मिटती नहीं। माया की ‘हाय हाय’ सदा इसको लगी रहती है। संत जनों की निंदा करने के कारण (माया की तृष्णा का) ला-इलाज रोग (जीव के अंदर) पैदा हो जाता है इस बड़े क्षय रोग में ही इसका शरीर नाश हो जाता है। 3। (पर। हे भाई ! संत जनों की निंदा से जीव को कुछ भी हासिल नहीं होता) प्रभू ने स्वयं ही संत जनों को जीत का मालिक बनाया होता है। उन्हें उसी प्रभू ने पैदा किया हुआ है जिसने उनको आदर-सम्मान दिया हुआ है। हे नानक ! परमात्मा मेहर करके दया करके अपने दासों को खुद ही अपने गले से लगाए रखता है। 4। 44। 55।
रामकली महला 5 ॥
ऐसा पूरा गुरदेउ सहाई ॥
जा का सिमरनु बिरथा न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
दरसनु पेखत होइ निहालु ॥
जा की धूरि काटै जम जालु ॥
चरन कमल बसे मेरे मन के ॥
कारज सवारे सगले तन के ॥1॥
जा कै मसतकि राखै हाथु ॥
प्रभु मेरो अनाथ को नाथु ॥
पतित उधारणु क्रिपा निधानु ॥
सदा सदा जाईऐ कुरबानु ॥2॥
निरमल मंतु देइ जिसु दानु ॥
तजहि बिकार बिनसै अभिमानु ॥
एकु धिआईऐ साध कै संगि ॥
पाप बिनासे नाम कै रंगि ॥3॥
गुर परमेसुर सगल निवास ॥
घटि घटि रवि रहिआ गुणतास ॥
दरसु देहि धारउ प्रभ आस ॥
नित नानकु चितवै सचु अरदासि ॥4॥45॥56॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! पूरा गुरू ऐसी मदद करने वाला है कि उसका दिया हुआ हरी-सिमरन का उपदेश व्यर्थ नहीं जाता। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू के) दर्शन करने से (मनुष्य तन से मन से) खिल उठता है। उस गुरू के चरणों की धूल जमों की फाही काट देती है। हे भाई ! प्यारे गुरू के सुंदर चरण (जिस मनुष्य के हृदय में) आ बसते हैं। (उसके) मन के (उसके) शरीर के सारे काम (गुरू) सँवार देता है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे पर (गुरू अपना) हाथ रखता है उसको मेरा वह प्रभू (मिल जाता है) जो निआसरों का आसरा है। हे भाई ! गुरू विकारों में गिरे हुओं को विकारों से बचाने वाला है। गुरू कृपा का खजाना है। हे भाई ! गुरू से सदा ही बलिहार जाना चाहिए। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू अपना पवित्र उपदेश बख्शता है। सारे विकार उसको छोड़ जाते हैं उसका अहंकार दूर हो जाता है। हे भाई ! गुरू की संगति में रह के एक परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए। (गुरू के द्वारा) परमात्मा के प्रेम-रंग में रहने से सारे पापों का नाश हो जाता है। 3। हे भाई ! गुरू-परमात्मा सब जीवों में बसता है। सारे गुणों का खजाना हरेक हृदय में मौजूद है। हे प्रभू ! मुझे अपने दर्शन दे। मैं आपके दर्शनों की आस रखे बैठा हूँ। यही मेरी अरदास है कि (आपका सेवक) नानक सदा-स्थिर प्रभू को याद करता रहे। 4। 45। 56।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 5 ॥ (हे मन ! देख उस प्रभू की आश्चर्यजनक ताकतें !) लकड़ी से आग परे भागती है (लकड़ी में आग हर वक्त मौजूद है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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