ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गावहु राम के गुण गीत ॥
नामु जपत परम सुखु पाईऐ आवा गउणु मिटै मेरे मीत ॥1॥ रहाउ ॥
गुण गावत होवत परगासु ॥
चरन कमल महि होइ निवासु ॥1॥
संतसंगति महि होइ उधारु ॥
नानक भवजलु उतरसि पारि ॥2॥1॥57॥
गुरु पूरा मेरा गुरु पूरा ॥
राम नामु जपि सदा सुहेले सगल बिनासे रोग कूरा ॥1॥ रहाउ ॥
एकु अराधहु साचा सोइ ॥
जा की सरनि सदा सुखु होइ ॥1॥
नीद सुहेली नाम की लागी भूख ॥
हरि सिमरत बिनसे सभ दूख ॥2॥
सहजि अनंद करहु मेरे भाई ॥
गुरि पूरै सभ चिंत मिटाई ॥3॥
आठ पहर प्रभ का जपु जापि ॥
नानक राखा होआ आपि ॥4॥2॥58॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नरनरह नमसकारं ॥
जलन थलन बसुध गगन एक एकंकारं ॥1॥ रहाउ ॥
हरन धरन पुन पुनह करन ॥
नह गिरह निरंहारं ॥1॥
गंभीर धीर नाम हीर ऊच मूच अपारं ॥
करन केल गुण अमोल नानक बलिहारं ॥2॥1॥59॥
रूप रंग सुगंध भोग तिआगि चले माइआ छले कनिक कामिनी ॥1॥ रहाउ ॥
भंडार दरब अरब खरब पेखि लीला मनु सधारै ॥
नह संगि गामनी ॥1॥
सुत कलत्र भ्रात मीत उरझि परिओ भरमि मोहिओ इह बिरख छामनी ॥
चरन कमल सरन नानक सुखु संत भावनी ॥2॥2॥60॥
रागु रामकली महला 9 तिपदे ॥
रे मन ओट लेहु हरि नामा ॥
जा कै सिमरनि दुरमति नासै पावहि पदु निरबाना ॥1॥ रहाउ ॥
बडभागी तिह जन कउ जानहु जो हरि के गुन गावै ॥
जनम जनम के पाप खोइ कै फुनि बैकुंठि सिधावै ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु रामकली महला 5 घरु 2 दुपदे सतिगुर प्रसादि ॥ हे मेरे मित्र ! परमात्मा के गुणों के गीत (सदा) गाते रहो।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।