अंग 899

अंग
899
रामकली
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पंच सिंघ राखे प्रभि मारि ॥
दस बिघिआड़ी लई निवारि ॥
तीनि आवरत की चूकी घेर ॥
साधसंगि चूके भै फेर ॥1॥
सिमरि सिमरि जीवा गोविंद ॥
करि किरपा राखिओ दासु अपना सदा सदा साचा बखसिंद ॥1॥ रहाउ ॥
दाझि गए त्रिण पाप सुमेर ॥
जपि जपि नामु पूजे प्रभ पैर ॥
अनद रूप प्रगटिओ सभ थानि ॥
प्रेम भगति जोरी सुख मानि ॥2॥
सागरु तरिओ बाछर खोज ॥
खेदु न पाइओ नह फुनि रोज ॥
सिंधु समाइओ घटुके माहि ॥
करणहार कउ किछु अचरजु नाहि ॥3॥
जउ छूटउ तउ जाइ पइआल ॥
जउ काढिओ तउ नदरि निहाल ॥
पाप पुंन हमरै वसि नाहि ॥
रसकि रसकि नानक गुण गाहि ॥4॥40॥51॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! ज्यों-ज्यों मैंने प्रभू को सिमरा है) प्रभू ने (मेरे अंदर से) पाँच कामादिक शेर समाप्त कर दिए हैं। दस इन्द्रियों का दबाव भी मेरे ऊपर से दूर कर दिया है। माया के तीन गुणों की घुम्मन घेरी का चक्कर भी खत्म हो गया है। गुरू की संगति में (रहने के कारण) जनम-मरण के चक्कर के सारे डर भी खत्म हो गए हैं। 1। हे भाई ! मैं परमात्मा (का नाम) बार-बार सिमर के आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। मुझ दास को परमात्मा ने कृपा करके (खुद ही कामादिक विकारों से) बचा रखा है। सदा कायम रहने वाला मालिक सदा ही बख्शिशें करने वाला है। 1। रहाउ। उसके सुमेर पर्वत जितने हो चुके पाप घास के तीलों की तरह जल जाते हैं। हे भाई ! जब कोई जीव परमात्मा का नाम जप-जप के उसके चरण पूजने शुरू करता है। उसको आनंद-स्वरूप हरेक जगह पर बसता दिखाई दे गया जब किसी ने सुखों की मणि प्रभू की प्रेमा-भक्ति में अपनी सुरति जोड़ी। 2। (हे भाई ! जिसने भी नाम जपा। उसने) संसार-समुंदर ऐसे पार कर लिया जैसे (पानी से भरा हुआ) बछड़े के खुर का निशान है। ना उसे कोई दुख होता है ना ही कोई चिंता-फिक्र। प्रभू उसके अंदर यूं आ टिकता है जैसे समुंदर (मानो) एक छोटे से घड़े में आ टिके। हे भाई ! सृजनहार प्रभू के लिए ये कोई अनोखी बात नहीं। 3। (हे भाई !) जब (किसी जीव के हाथ से प्रभू का पल्ला) छूट जाता है। तब वह (मानो) पाताल में जा पड़ता है। जब प्रभू स्वयं उसको पाताल में से निकाल लेता है तो उसकी मेहर की निगाह से वह तन-मन से खिल उठता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) अच्छे-बुरे काम करने हम जीवों के वश में नहीं। (जिन पर वह मेहर करता है। वह लोग) बड़े प्रेम से उसके गुण गाते हैं। 4। 40। 51।
रामकली महला 5 ॥
ना तनु तेरा ना मनु तोहि ॥
माइआ मोहि बिआपिआ धोहि ॥
कुदम करै गाडर जिउ छेल ॥
अचिंतु जालु कालु चक्रु पेल ॥1॥
हरि चरन कमल सरनाइ मना ॥
राम नामु जपि संगि सहाई गुरमुखि पावहि साचु धना ॥1॥ रहाउ ॥
ऊने काज न होवत पूरे ॥
कामि क्रोधि मदि सद ही झूरे ॥
करै बिकार जीअरे कै ताई ॥
गाफल संगि न तसूआ जाई ॥2॥
धरत धोह अनिक छल जानै ॥
कउडी कउडी कउ खाकु सिरि छानै ॥
जिनि दीआ तिसै न चेतै मूलि ॥
मिथिआ लोभु न उतरै सूलु ॥3॥
पारब्रहम जब भए दइआल ॥
इहु मनु होआ साध रवाल ॥
हसत कमल लड़ि लीनो लाइ ॥
नानक साचै साचि समाइ ॥4॥41॥52॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ ना वह शरीर आपका है। और। ना ही (उस शरीर में बसता) मन आपका है। (हे भाई ! इस शरीर की खातिर) आप माया के मोह की ठॅगी में फसा रहता है। (देख !) जैसे भेड़ का बच्चा भेड़ के साथ कलोल (लाड कर करके खेलता) है (उस बिचारे पर) अचानक (मौत का) जाल आ पड़ता है। (उस पर) मौत अपना चक्कर चला देती है (यही हाल हरेक जीव का होता है)। 1। हे (मेरे) मन ! प्रभू के सुंदर चरणों की शरण पड़ा रह। परमात्मा का नाम जपता रहा कर। यही आपका असल मददगार है। पर ये सदा कायम रहने वाला नाम-धन आप गुरू की शरण पड़ कर ही पा सकेगा। 1। रहाउ। जीव के ये कभी ना खत्म हैं सकने वाले काम कभी पूरे नहीं होते; काम-वासना में। क्रोध में। माया के नशे में जीव सदा ही गिले-शिकवे करता रहता है। अपनी इस जीवात्मा (को सुख देने) की खातिर जीव विकार करता रहता है। पर (ईश्वर की याद से) बेखबर हो चुके जीव के साथ (दुनिया के पदार्थों में से) रक्ती भर भी नहीं जाता। 2। मूर्ख जीव अनेकों प्रकार की ठगी करता है। अनेकों फरेब करने जानता है। कौड़ी-कौड़ी कमाने की खातिर अपने सिर पर (दग़ा-फरेब के कारण बदनामी की) राख डालता फिरता है। जिस (प्रभू) ने (इसको ये सब कुछ) दिया है उसको ये बिल्कुल याद नहीं करता। (इसके अंदर) नाशवंत पदार्थों का लोभ टिका रहता है (इनकी) चुभन (इसके अंदर से) कभी दूर नहीं होती। 3। हे नानक ! परमात्मा जब किसी जीव पर दयावान होता है। उस जीव का ये मन गुरू के चरणों की धूल बनता है। गुरू उसको अपने सुंदर हाथों से अपने पल्ले से लगा लेता है। और। (वह भाग्यशाली) सदा ही सदा-स्थिर प्रभू में लीन हुआ रहता है। 4। 41। 52।
रामकली महला 5 ॥
राजा राम की सरणाइ ॥
निरभउ भए गोबिंद गुन गावत साधसंगि दुखु जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै रामु बसै मन माही ॥
सो जनु दुतरु पेखत नाही ॥
सगले काज सवारे अपने ॥
हरि हरि नामु रसन नित जपने ॥1॥
जिस कै मसतकि हाथु गुरु धरै ॥ सो दासु अदेसा काहे करै ॥
जनम मरण की चूकी काणि ॥
पूरे गुर ऊपरि कुरबाण ॥2॥
गुरु परमेसरु भेटि निहाल ॥
सो दरसनु पाए जिसु होइ दइआलु ॥
पारब्रहमु जिसु किरपा करै ॥
साधसंगि सो भवजलु तरै ॥3॥
अंम्रितु पीवहु साध पिआरे ॥
मुख ऊजल साचै दरबारे ॥
अनद करहु तजि सगल बिकार ॥
नानक हरि जपि उतरहु पारि ॥4॥42॥53॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य प्रकाश-स्वरूप परमात्मा का आसरा लेते हैं। परमात्मा के गुण गाते-गाते वे दुनिया के डरों से मुक्त हो जाते हैं; गुरू की संगति में रह के उनका (हरेक) दुख दूर हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा (का नाम) आ बसता है। वह मनुष्य मुश्किल से तैरे जाने वाले इस संसार-समुंद्र की तरफ़ देखता भी नहीं (उसके रास्ते में) यह कोई रुकावट नहीं डालता। वह मनुष्य अपने सारे काम सफल कर लेता है परमात्मा का नाम (अपनी) जीभ से नित्य जप-जप के । 1। हे भाई ! इस मनुष्य के माथे पर गुरू (अपना) हाथ रखता है। (प्रभू का वह) सेवक किसी तरह की भी कोई चिंता-फिक्र नहीं करता। उसके जनम-मरण के चक्कर का डर समाप्त हो जाता है वह मनुष्य पूरे गुरू पर से सदा सदके जाता है (अपना स्वै कुर्बान करता रहता है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है। परमेश्वर मिल जाता है। वह सदा खिला रहता है। (पर गुरू का परमेश्वर के) दर्शन वही मनुष्य प्राप्त करता है। जिस पर प्रभू स्वयं दयावान होता है। जिस व्यक्ति पर परमात्मा मेहर करता है। वह मनुष्य गुरू की संगति में (रह के) संसार-समुंदर से पार लांघ जाता है। 3। हे प्यारे संतजनो ! (आप भी) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीते रहो। सदा-स्थिर प्रभू के दरबार में आपके मुँह उज्जवल होंगे (वहाँ आपको आदर-सत्कार मिलेगा)। हे नानक ! (कह- हे संत जनो !) सारे विचार छोड़ के आत्मिक आनंद भोगते रहो। परमात्मा का नाम जप के आप संसार-समुंदर से पार लांघ जाएँगे। 4। 42। 53।

यह रामकली राग के क्रम का अंग 899 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

मूल गुरमुखी और विस्तृत अर्थ के लिए प्रोफ़ेसर साहिब सिंह का गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 899 देखिए। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ यही अंग संत सिंह खालसा के पाठ में भी उपलब्ध है। किसी शबद की शुरुआत या समापन पास के अंग पर हो तो उसे साथ खोल लीजिए।

इस पन्ने का रूप: देवनागरी लिप्यन्तरण के साथ हिन्दी अर्थ। हिन्दी अर्थ का उपलब्ध आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी, रचना-शीर्षक और दूसरे अनुवाद के लिए ऊपर दिए स्रोत साथ रखिए।
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