किसु भरवासै बिचरहि भवन ॥
मूड़ मुगध तेरा संगी कवन ॥
रामु संगी तिसु गति नही जानहि ॥
पंच बटवारे से मीत करि मानहि ॥1॥
सो घरु सेवि जितु उधरहि मीत ॥
गुण गोविंद रवीअहि दिनु राती साधसंगि करि मन की प्रीति ॥1॥ रहाउ ॥
जनमु बिहानो अहंकारि अरु वादि ॥
त्रिपति न आवै बिखिआ सादि ॥
भरमत भरमत महा दुखु पाइआ ॥
तरी न जाई दुतर माइआ ॥2॥
कामि न आवै सु कार कमावै ॥
आपि बीजि आपे ही खावै ॥
राखन कउ दूसर नही कोइ ॥
तउ निसतरै जउ किरपा होइ ॥3॥
पतित पुनीत प्रभ तेरो नामु ॥
अपने दास कउ कीजै दानु ॥
करि किरपा प्रभ गति करि मेरी ॥
सरणि गही नानक प्रभ तेरी ॥4॥37॥48॥
इह लोके सुखु पाइआ ॥
नही भेटत धरम राइआ ॥
हरि दरगह सोभावंत ॥
फुनि गरभि नाही बसंत ॥1॥
जानी संत की मित्राई ॥
करि किरपा दीनो हरि नामा पूरबि संजोगि मिलाई ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै चरणि चितु लागा ॥
धंनि धंनि संजोगु सभागा ॥
संत की धूरि लागी मेरै माथे ॥
किलविख दुख सगले मेरे लाथे ॥2॥
साध की सचु टहल कमानी ॥
तब होए मन सुध परानी ॥
जन का सफल दरसु डीठा ॥
नामु प्रभू का घटि घटि वूठा ॥3॥
मिटाने सभि कलि कलेस ॥
जिस ते उपजे तिसु महि परवेस ॥
प्रगटे आनूप गोुविंद ॥
प्रभ पूरे नानक बखसिंद ॥4॥38॥49॥
गऊ कउ चारे सारदूलु ॥
कउडी का लख हूआ मूलु ॥
बकरी कउ हसती प्रतिपाले ॥
अपना प्रभु नदरि निहाले ॥1॥
क्रिपा निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥
बरनि न साकउ बहु गुन तेरे ॥1॥ रहाउ ॥
दीसत मासु न खाइ बिलाई ॥
महा कसाबि छुरी सटि पाई ॥
करणहार प्रभु हिरदै वूठा ॥
फाथी मछुली का जाला तूटा ॥2॥
सूके कासट हरे चलूल ॥
ऊचै थलि फूले कमल अनूप ॥
अगनि निवारी सतिगुर देव ॥
सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥3॥
अकिरतघणा का करे उधारु ॥
प्रभु मेरा है सदा दइआरु ॥
संत जना का सदा सहाई ॥
चरन कमल नानक सरणाई ॥4॥39॥50॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 5 ॥ हे मूर्ख ! (प्रभू के बिना और) किस के सहारे आप जगत में चलता फिरता है हे मूर्ख ! (प्रभू के बिना और) आपका साथी कौन (बन सकता है)।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।