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अंग 898

अंग
898
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामकली महला 5 ॥
किसु भरवासै बिचरहि भवन ॥
मूड़ मुगध तेरा संगी कवन ॥
रामु संगी तिसु गति नही जानहि ॥
पंच बटवारे से मीत करि मानहि ॥1॥
सो घरु सेवि जितु उधरहि मीत ॥
गुण गोविंद रवीअहि दिनु राती साधसंगि करि मन की प्रीति ॥1॥ रहाउ ॥
जनमु बिहानो अहंकारि अरु वादि ॥
त्रिपति न आवै बिखिआ सादि ॥
भरमत भरमत महा दुखु पाइआ ॥
तरी न जाई दुतर माइआ ॥2॥
कामि न आवै सु कार कमावै ॥
आपि बीजि आपे ही खावै ॥
राखन कउ दूसर नही कोइ ॥
तउ निसतरै जउ किरपा होइ ॥3॥
पतित पुनीत प्रभ तेरो नामु ॥
अपने दास कउ कीजै दानु ॥
करि किरपा प्रभ गति करि मेरी ॥
सरणि गही नानक प्रभ तेरी ॥4॥37॥48॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे मूर्ख ! (प्रभू के बिना और) किस के सहारे आप जगत में चलता फिरता है हे मूर्ख ! (प्रभू के बिना और) आपका साथी कौन (बन सकता है) । हे मूर्ख ! परमात्मा (ही आपका असल) साथी है। उसके साथ आप जान-पहचान नहीं बनाता। (ये कामादिक) पाँच डाकू हैं। इनको आप अपने मित्र समझ रहा है। 1। हे मित्र ! उस दर-घर में बना रह। जिससे आप (संसार-समुंद्र से) पार लांघ सके। हे भाई ! गुरू की संगति में अपने मन का प्यार जोड़। (वहाँ टिक के) गोबिंद के गुण (सदा) दिन-रात गाने चाहिए। 1। रहाउ। जीव की उम्र अहंकार और झगड़े-बखेड़े में गुजरती जाती है। माया के स्वाद में (इसकी कभी) तसल्ली नहीं होती (कभी तृप्त नहीं होता)। भटकते-भटकते इसने बड़ा कष्ट पाया है। माया (मानो। एक समुंदर है। इस) से पार लांघना बहुत मुश्किल है। (प्रभू के नाम के बिना) इससे पार नहीं लांघा जा सकता। 2। जीव सदा वही काम करता रहता है जो (आखिर इसके) काम नहीं आती। (बुरे कामों के बीज) खुद बीज के (फिर) खुद ही (उनका दुख-फल) खाता है। (इस बिपता में से) बचाने-योग्य (परमात्मा के बिना) और कोई दूसरा नहीं। जब (परमात्मा की) मेहर होती है। तब ही इसमें से पार लंघता है। 3। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! आपका नाम विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाला है। (मुझे) अपने सेवक को (अपना नाम-) दान दे। हे प्रभू ! मेरी आत्मिक अवस्था ऊँची बना। मेहर कर मैंने आपका आसरा लिया है। 4। 37। 48।
रामकली महला 5 ॥
इह लोके सुखु पाइआ ॥
नही भेटत धरम राइआ ॥
हरि दरगह सोभावंत ॥
फुनि गरभि नाही बसंत ॥1॥
जानी संत की मित्राई ॥
करि किरपा दीनो हरि नामा पूरबि संजोगि मिलाई ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै चरणि चितु लागा ॥
धंनि धंनि संजोगु सभागा ॥
संत की धूरि लागी मेरै माथे ॥
किलविख दुख सगले मेरे लाथे ॥2॥
साध की सचु टहल कमानी ॥
तब होए मन सुध परानी ॥
जन का सफल दरसु डीठा ॥
नामु प्रभू का घटि घटि वूठा ॥3॥
मिटाने सभि कलि कलेस ॥
जिस ते उपजे तिसु महि परवेस ॥
प्रगटे आनूप गोुविंद ॥
प्रभ पूरे नानक बखसिंद ॥4॥38॥49॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की मित्रता प्राप्त होती है उसने) इस जगत में (आत्मिक) सुख भोगा। (परलोक में) उसका सामना धर्मराज से नहीं हुआ। वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में शोभा वाला बनता है। बार-बार जन्मों के चक्कर में (भी) नहीं पड़ता। 1। हे भाई ! पूर्बले संजोगों के कारण (आपको गुरू की मित्रता) प्राप्त हुई है। (गुरू ने) कृपा करके (मुझे) परमात्मा का नाम दे दिया है। (सो अब) मैंने गुरू की कद्र समझ ली है। 1। रहाउ। जब गुरू के चरणों में। मेरा चित्त जुड़ा था। हे भाई ! वह संजोग मुबारक थे। मुबारक थे। भाग्यशाली थे। हे भाई ! गुरू की चरण-धूड़ मेरे माथे पर लगी। मेरे सारे पाप और दुख दूर हो गए। 2। हे प्राणी ! जब जीव श्रद्धा धार के गुरू की सेवा-टहल करते हैं। तब उनके मन पवित्र हो जाते हैं। पर जिसने गुरू के दर्शन कर लिए। उसको इस नाम-फल की प्राप्ती हुई। हे प्राणी ! (वैसे तो) परमात्मा का नाम हरेक हृदय में बस रहा है। 3। हे नानक ! (गुरू के मिलाप की बरकति से) सारे (मानसिक) झगड़े और दुख मिट जाते हैं। जिस प्रभू से जीव पैदा हुए हैं उसी में उनकी लीनता हैं जाती है। सुंदर गोबिंद (हृदय में) प्रकट हो जाता है। वह बख्शनहार पूरन प्रभू 4। 38। 49।
रामकली महला 5 ॥
गऊ कउ चारे सारदूलु ॥
कउडी का लख हूआ मूलु ॥
बकरी कउ हसती प्रतिपाले ॥
अपना प्रभु नदरि निहाले ॥1॥
क्रिपा निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥
बरनि न साकउ बहु गुन तेरे ॥1॥ रहाउ ॥
दीसत मासु न खाइ बिलाई ॥
महा कसाबि छुरी सटि पाई ॥
करणहार प्रभु हिरदै वूठा ॥
फाथी मछुली का जाला तूटा ॥2॥
सूके कासट हरे चलूल ॥
ऊचै थलि फूले कमल अनूप ॥
अगनि निवारी सतिगुर देव ॥
सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥3॥
अकिरतघणा का करे उधारु ॥
प्रभु मेरा है सदा दइआरु ॥
संत जना का सदा सहाई ॥
चरन कमल नानक सरणाई ॥4॥39॥50॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (प्रभू की कृपा से विकारों की मार से बच के) शेर (हो चुका मन) ज्ञान-न्द्रियों को अपने वश में रखने लग जाता है। (विकारों में फसा हुआ जीव पहले) कौड़ी (की तरह तुच्छ हस्ती वाला हो गया था। अब उस) का मूल्य (जैसे) लोखों रुपए हैं गया। (हे भाई ! दुनियाँ के धन-पदार्थों के कारण मनुष्य का मन आम तौर पर अहंकार से हाथी बना रहता है। पर) (पहले अहंकारी) हाथी (मन) बकरी (वाले गरीबी स्वभाव) को (अपने अंदर) संभालता है। जब प्यारा प्रभू मेहर की निगाह से देखता है तो 1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! आपके अनेकों गुण हैं। मैं (सारे) बयान नहीं कर सकता। 1। रहाउ। (हे भाई ! जब अपना प्रभू मेहर की निगाह से देखता है तब) बिल्ली दिखाई दे रहे माँस को नहीं खाती (मायावी तृष्णा समाप्त हो जाती है। मन मायावी पदार्थों की तरफ़ नहीं देखता)। प्रभू (की कृपा से) बड़े कसाई (निर्दयी मन) ने अपने हाथों से छुरी फेंक दी (निर्दयता वाला स्वभाव त्याग दिया)। सब कुछ कर सकने वाला प्रभू जब (अपनी कृपा से जीव के) हृदय में आ बसा। तब (माया के मोह के जाल में) फसी हुई (जीव-) मछली का (माया के मोह का) जाल टूट गया। 2। (जब मेहर हुई तो) सूखे हुए काठ चुह-चुह करते हरे हो गए (मन का रूखापन दूर हो के जीव के अंदर दया पैदा हो गई)। ऊँचे टिब्बे पर सुंदर कमल फूल खिल उठे (जिस अहंकार भरे मन पर पहले हरी-नाम की बरखा का कोई असर नहीं होता था। वह अब खिल उठा है)। प्यारे सतिगुरू ने तृष्णा की आग दूर कर दी। सेवक को अपनी सेवा में जोड़ लिया। 3। वह एहसान-फरामोशों (का भी) पार-उतारा करता है। हे भाई ! मेरा प्रभू सदा दया का घर है। हे नानक ! प्रभू अपने संतों का सदा मददगार होता है। संत-जन सदा उसके सुंदर चरणों की शरण में पड़े रहते हैं। 4। 39। 50।
रामकली महला 5 ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 5 ॥ हे मूर्ख ! (प्रभू के बिना और) किस के सहारे आप जगत में चलता फिरता है हे मूर्ख ! (प्रभू के बिना और) आपका साथी कौन (बन सकता है)।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।