अंग 898

अंग
898
रामकली
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रामकली महला 5 ॥
किसु भरवासै बिचरहि भवन ॥
मूड़ मुगध तेरा संगी कवन ॥
रामु संगी तिसु गति नही जानहि ॥
पंच बटवारे से मीत करि मानहि ॥1॥
सो घरु सेवि जितु उधरहि मीत ॥
गुण गोविंद रवीअहि दिनु राती साधसंगि करि मन की प्रीति ॥1॥ रहाउ ॥
जनमु बिहानो अहंकारि अरु वादि ॥
त्रिपति न आवै बिखिआ सादि ॥
भरमत भरमत महा दुखु पाइआ ॥
तरी न जाई दुतर माइआ ॥2॥
कामि न आवै सु कार कमावै ॥
आपि बीजि आपे ही खावै ॥
राखन कउ दूसर नही कोइ ॥
तउ निसतरै जउ किरपा होइ ॥3॥
पतित पुनीत प्रभ तेरो नामु ॥
अपने दास कउ कीजै दानु ॥
करि किरपा प्रभ गति करि मेरी ॥
सरणि गही नानक प्रभ तेरी ॥4॥37॥48॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे मूर्ख ! (प्रभू के बिना और) किस के सहारे आप जगत में चलता फिरता है हे मूर्ख ! (प्रभू के बिना और) आपका साथी कौन (बन सकता है) । हे मूर्ख ! परमात्मा (ही आपका असल) साथी है। उसके साथ आप जान-पहचान नहीं बनाता। (ये कामादिक) पाँच डाकू हैं। इनको आप अपने मित्र समझ रहा है। 1। हे मित्र ! उस दर-घर में बना रह। जिससे आप (संसार-समुंद्र से) पार लांघ सके। हे भाई ! गुरू की संगति में अपने मन का प्यार जोड़। (वहाँ टिक के) गोबिंद के गुण (सदा) दिन-रात गाने चाहिए। 1। रहाउ। जीव की उम्र अहंकार और झगड़े-बखेड़े में गुजरती जाती है। माया के स्वाद में (इसकी कभी) तसल्ली नहीं होती (कभी तृप्त नहीं होता)। भटकते-भटकते इसने बड़ा कष्ट पाया है। माया (मानो। एक समुंदर है। इस) से पार लांघना बहुत मुश्किल है। (प्रभू के नाम के बिना) इससे पार नहीं लांघा जा सकता। 2। जीव सदा वही काम करता रहता है जो (आखिर इसके) काम नहीं आती। (बुरे कामों के बीज) खुद बीज के (फिर) खुद ही (उनका दुख-फल) खाता है। (इस बिपता में से) बचाने-योग्य (परमात्मा के बिना) और कोई दूसरा नहीं। जब (परमात्मा की) मेहर होती है। तब ही इसमें से पार लंघता है। 3। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! आपका नाम विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाला है। (मुझे) अपने सेवक को (अपना नाम-) दान दे। हे प्रभू ! मेरी आत्मिक अवस्था ऊँची बना। मेहर कर मैंने आपका आसरा लिया है। 4। 37। 48।
रामकली महला 5 ॥
इह लोके सुखु पाइआ ॥
नही भेटत धरम राइआ ॥
हरि दरगह सोभावंत ॥
फुनि गरभि नाही बसंत ॥1॥
जानी संत की मित्राई ॥
करि किरपा दीनो हरि नामा पूरबि संजोगि मिलाई ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै चरणि चितु लागा ॥
धंनि धंनि संजोगु सभागा ॥
संत की धूरि लागी मेरै माथे ॥
किलविख दुख सगले मेरे लाथे ॥2॥
साध की सचु टहल कमानी ॥
तब होए मन सुध परानी ॥
जन का सफल दरसु डीठा ॥
नामु प्रभू का घटि घटि वूठा ॥3॥
मिटाने सभि कलि कलेस ॥
जिस ते उपजे तिसु महि परवेस ॥
प्रगटे आनूप गोुविंद ॥
प्रभ पूरे नानक बखसिंद ॥4॥38॥49॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की मित्रता प्राप्त होती है उसने) इस जगत में (आत्मिक) सुख भोगा। (परलोक में) उसका सामना धर्मराज से नहीं हुआ। वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में शोभा वाला बनता है। बार-बार जन्मों के चक्कर में (भी) नहीं पड़ता। 1। हे भाई ! पूर्बले संजोगों के कारण (आपको गुरू की मित्रता) प्राप्त हुई है। (गुरू ने) कृपा करके (मुझे) परमात्मा का नाम दे दिया है। (सो अब) मैंने गुरू की कद्र समझ ली है। 1। रहाउ। जब गुरू के चरणों में। मेरा चित्त जुड़ा था। हे भाई ! वह संजोग मुबारक थे। मुबारक थे। भाग्यशाली थे। हे भाई ! गुरू की चरण-धूड़ मेरे माथे पर लगी। मेरे सारे पाप और दुख दूर हो गए। 2। हे प्राणी ! जब जीव श्रद्धा धार के गुरू की सेवा-टहल करते हैं। तब उनके मन पवित्र हो जाते हैं। पर जिसने गुरू के दर्शन कर लिए। उसको इस नाम-फल की प्राप्ती हुई। हे प्राणी ! (वैसे तो) परमात्मा का नाम हरेक हृदय में बस रहा है। 3। हे नानक ! (गुरू के मिलाप की बरकति से) सारे (मानसिक) झगड़े और दुख मिट जाते हैं। जिस प्रभू से जीव पैदा हुए हैं उसी में उनकी लीनता हैं जाती है। सुंदर गोबिंद (हृदय में) प्रकट हो जाता है। वह बख्शनहार पूरन प्रभू 4। 38। 49।
रामकली महला 5 ॥
गऊ कउ चारे सारदूलु ॥
कउडी का लख हूआ मूलु ॥
बकरी कउ हसती प्रतिपाले ॥
अपना प्रभु नदरि निहाले ॥1॥
क्रिपा निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥
बरनि न साकउ बहु गुन तेरे ॥1॥ रहाउ ॥
दीसत मासु न खाइ बिलाई ॥
महा कसाबि छुरी सटि पाई ॥
करणहार प्रभु हिरदै वूठा ॥
फाथी मछुली का जाला तूटा ॥2॥
सूके कासट हरे चलूल ॥
ऊचै थलि फूले कमल अनूप ॥
अगनि निवारी सतिगुर देव ॥
सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥3॥
अकिरतघणा का करे उधारु ॥
प्रभु मेरा है सदा दइआरु ॥
संत जना का सदा सहाई ॥
चरन कमल नानक सरणाई ॥4॥39॥50॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (प्रभू की कृपा से विकारों की मार से बच के) शेर (हो चुका मन) ज्ञान-न्द्रियों को अपने वश में रखने लग जाता है। (विकारों में फसा हुआ जीव पहले) कौड़ी (की तरह तुच्छ हस्ती वाला हो गया था। अब उस) का मूल्य (जैसे) लोखों रुपए हैं गया। (हे भाई ! दुनियाँ के धन-पदार्थों के कारण मनुष्य का मन आम तौर पर अहंकार से हाथी बना रहता है। पर) (पहले अहंकारी) हाथी (मन) बकरी (वाले गरीबी स्वभाव) को (अपने अंदर) संभालता है। जब प्यारा प्रभू मेहर की निगाह से देखता है तो 1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! आपके अनेकों गुण हैं। मैं (सारे) बयान नहीं कर सकता। 1। रहाउ। (हे भाई ! जब अपना प्रभू मेहर की निगाह से देखता है तब) बिल्ली दिखाई दे रहे माँस को नहीं खाती (मायावी तृष्णा समाप्त हो जाती है। मन मायावी पदार्थों की तरफ़ नहीं देखता)। प्रभू (की कृपा से) बड़े कसाई (निर्दयी मन) ने अपने हाथों से छुरी फेंक दी (निर्दयता वाला स्वभाव त्याग दिया)। सब कुछ कर सकने वाला प्रभू जब (अपनी कृपा से जीव के) हृदय में आ बसा। तब (माया के मोह के जाल में) फसी हुई (जीव-) मछली का (माया के मोह का) जाल टूट गया। 2। (जब मेहर हुई तो) सूखे हुए काठ चुह-चुह करते हरे हो गए (मन का रूखापन दूर हो के जीव के अंदर दया पैदा हो गई)। ऊँचे टिब्बे पर सुंदर कमल फूल खिल उठे (जिस अहंकार भरे मन पर पहले हरी-नाम की बरखा का कोई असर नहीं होता था। वह अब खिल उठा है)। प्यारे सतिगुरू ने तृष्णा की आग दूर कर दी। सेवक को अपनी सेवा में जोड़ लिया। 3। वह एहसान-फरामोशों (का भी) पार-उतारा करता है। हे भाई ! मेरा प्रभू सदा दया का घर है। हे नानक ! प्रभू अपने संतों का सदा मददगार होता है। संत-जन सदा उसके सुंदर चरणों की शरण में पड़े रहते हैं। 4। 39। 50।
रामकली महला 5 ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥

यह रामकली राग के क्रम का अंग 898 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

मूल गुरमुखी और विस्तृत अर्थ के लिए प्रोफ़ेसर साहिब सिंह का गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 898 देखिए। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ यही अंग संत सिंह खालसा के पाठ में भी उपलब्ध है। किसी शबद की शुरुआत या समापन पास के अंग पर हो तो उसे साथ खोल लीजिए।

इस पन्ने का रूप: देवनागरी लिप्यन्तरण के साथ हिन्दी अर्थ। हिन्दी अर्थ का उपलब्ध आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी, रचना-शीर्षक और दूसरे अनुवाद के लिए ऊपर दिए स्रोत साथ रखिए।
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