गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे भगवान ! हे धरती के पति ! आपको सर्व-व्यापक को नमस्कार है। आप (सारी) ख़लकत को पैदा करने वाला सब जगह मौजूद है। 1। रहाउ। हे जगत के नाथ ! हे जगत के जीवन ! हे माया के पति ! हे (जीवों का हरेक) डर नाश करने वाले ! हे हृदय में आराधना के योग्य ! हे इन्द्रियों के मालिक ! हे गोपाल ! हे गोविंद ! हे मुक्ति दाते ! आप सब जगह व्यापक है। 2। हे मेहरवान ! सिर्फ आप ही पीरों-पैगंबरों-शेखों (सबको) निजात देने वाला है। (हे भाई ! वही मौला सबके) दिलों का मालिक है। (सबके दिल की जानने वाला वह सदा) न्याय करता है। वह मौला कुरान व अन्य पश्चिमी धार्मिक पुस्तकों के बताए हुए स्वरूप से अलग है। 3। हे भाई ! वह दया का श्रोत परमात्मा स्वयं ही नारायण है स्वयं ही नरसिंह है। वह राम सबमें रमा हुआ है। हरेक हृदय का आसरा है। वही बासुदेव है जो सब जगह बस रहा है। उसका खेल बिल्कुल बयान नहीं की जा सकती। 4। हे सब जीवों के रचनहार ! हे सृजनहार ! मेहर करके दया करके आप स्वयं ही जीवों को अपनी भक्ति देता है अपनी बँदगी देता है। हे नानक ! कह- गुरू ने (जिस मनुष्य के) भुलेखे दूर कर दिए। उसको (मुसलमानों का) अल्लाह और (हिन्दुओं का) पारब्रहम एक ही दिखाई दे जाते हैं। 5। 34। 45।
रामकली महला 5 ॥ कोटि जनम के बिनसे पाप ॥ हरि हरि जपत नाही संताप ॥ गुर के चरन कमल मनि वसे ॥ महा बिकार तन ते सभि नसे ॥1॥ गोपाल को जसु गाउ प्राणी ॥ अकथ कथा साची प्रभ पूरन जोती जोति समाणी ॥1॥ रहाउ ॥ त्रिसना भूख सभ नासी ॥ संत प्रसादि जपिआ अबिनासी ॥ रैनि दिनसु प्रभ सेव कमानी ॥ हरि मिलणै की एह नीसानी ॥2॥ मिटे जंजाल होए प्रभ दइआल ॥ गुर का दरसनु देखि निहाल ॥ परा पूरबला करमु बणि आइआ ॥ हरि के गुण नित रसना गाइआ ॥3॥ हरि के संत सदा परवाणु ॥ संत जना मसतकि नीसाणु ॥ दास की रेणु पाए जे कोइ ॥ नानक तिस की परम गति होइ ॥4॥35॥46॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (पिछले) करोड़ों जन्मों के किए हुए पाप भी नाश हो जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए कोई दुख-कलेश छू नहीं सकते। हे प्राणी ! जिस मनुष्य के मन में गुरू के सोहणे चरण आ बसते हैं। उसके शरीर के बड़े-बड़े विकार (भी) सारे नाश हो जाते हैं। 1। हे प्राणी ! सृष्टि के पालनहार प्रभू की सिफतसालाह के गीत गाया करो। जो मनुष्य सर्व-व्यापक प्रभू की अटल और कभी ना खत्म करने वाली सिफत सालाह करता रहता है। उसकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में लीन रहती है। 1। रहाउ। उसके अंदर से (माया की) तृष्णा (माया की) भूख सब नाश हो जाती है हे प्राणी ! गुरू-संत की कृपा से जिस मनुष्य ने नाश-रहित प्रभू का नाम जपा। (क्योंकि उस से प्रभू का मिलाप हो जाता है।) वह दिन-रात (हर वक्त) प्रभू की सेवा-भक्ति करता रहता है। प्रभू के मिलाप का (बड़ा) लक्षण ये है 2। हे भाई ! जिन पर प्रभू जी दयावान होते हैं। उनके माया के मोह के बँधन टूट जाते हैं; गुरू का दर्शन करके वह सदा चढ़दीकला में रहते हैं। उनके पूर्बले जन्मों का किया हुआ काम उनका मददगार बनता है (उनके किए हुए पूर्बले कर्मों के संस्कार जाग उठते हैं)। अपनी जीभ से वह सदा प्रभू के गुण गाते हैं। 3। हे भाई ! प्रभू की भक्ति करने वाले बंदे (प्रभू की हजूरी में) सदा आदर-सत्कार पाते हैं। उन संत-जनों के माथे पर (नूर चमकता है। जो। मानो। प्रभू दर पर परवानगी का) चिन्ह है। हे नानक ! ऐसे प्रभू-सेवक के चरणों की धूड़ अगर कोई मनुष्य प्राप्त कर ले। तो उसकी बहुत उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। 4। 34। 46।
रामकली महला 5 ॥ दरसन कउ जाईऐ कुरबानु ॥ चरन कमल हिरदै धरि धिआनु ॥ धूरि संतन की मसतकि लाइ ॥ जनम जनम की दुरमति मलु जाइ ॥1॥ जिसु भेटत मिटै अभिमानु ॥ पारब्रहमु सभु नदरी आवै करि किरपा पूरन भगवान ॥1॥ रहाउ ॥ गुर की कीरति जपीऐ हरि नाउ ॥ गुर की भगति सदा गुण गाउ ॥ गुर की सुरति निकटि करि जानु ॥ गुर का सबदु सति करि मानु ॥2॥ गुर बचनी समसरि सुख दूख ॥ कदे न बिआपै त्रिसना भूख ॥ मनि संतोखु सबदि गुर राजे ॥ जपि गोबिंदु पड़दे सभि काजे ॥3॥ गुरु परमेसरु गुरु गोविंदु ॥ गुरु दाता दइआल बखसिंदु ॥ गुर चरनी जा का मनु लागा ॥ नानक दास तिसु पूरन भागा ॥4॥36॥47॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (गुरू के) दर्शन से सदके जाना चाहिए (हे भाई ! गुरू के) सुंदर चरणों का ध्यान हृदय में धर के (दर्शनों की खातिर स्वै भाव कुर्बान कर देना चाहिए)। (हे भाई ! गुरू के दर पर रहने वाले) संत-जनों की चरण-धूड़ माथे पर लगाया कर। (इस तरह) अनेकों जन्मों की खोटी मति की मैल उतर जाती है। 1। जिस गुरू को मिलने से (मन में से) अहंकार दूर हो जाता है। और पारब्रहम प्रभू हर जगह दिख जाता है, हे सभ गुणों वाले भगवान ! (मेरे पर) कृपा कर (मुझे वह गुरू मिला) । 1। रहाउ। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम जपना चाहिए- यही है गुरू की शोभा (करनी)। हे भाई ! सदा प्रभू के गुण गाया कर- यही है गुरू की भगती। हे भाई ! परमात्मा को सदा अपने नजदीक बसता समझ- यही है गुरू के चरणों में ध्यान धरना। हे भाई ! गुरू के शबद को (सदा) सच्चा करके मान। 2। हे भाई ! गुरू के बचनों के द्वारा (सारे) सुख-दुख एक समान प्रतीत होने लगते हैं। माया की तृष्णा माया की भूख कभी अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। गुरू के शबद के द्वारा मन में संतोख पैदा हो जाता है। (मन) तृप्त हो जाता है। परमात्मा का नाम जप के सारे पर्दे ढके जाते हैं (लोक-परलोक में इज्जत बन जाती है)। 3। हे भाई ! गुरू परमात्मा (का रूप) है। गुरू गोबिंद (का रूप) है। गुरू दातार (प्रभू का रूप) है। गुरू दया के श्रोत बख्शणहार प्रभू (का रूप) है। हे नानक ! जिस मनुष्य का मन गुरू के चरणों में टिक जाता है। उस दास के पूरे भाग्य जाग उठते हैं। 4। 36। 47।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भगवान ! हे धरती के पति ! आपको सर्व-व्यापक को नमस्कार है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।