अंग 897

अंग
897
रामकली
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ओुं नमो भगवंत गुसाई ॥
खालकु रवि रहिआ सरब ठाई ॥1॥ रहाउ ॥
जगंनाथ जगजीवन माधो ॥
भउ भंजन रिद माहि अराधो ॥
रिखीकेस गोपाल गोुविंद ॥
पूरन सरबत्र मुकंद ॥2॥
मिहरवान मउला तूही एक ॥
पीर पैकांबर सेख ॥
दिला का मालकु करे हाकु ॥
कुरान कतेब ते पाकु ॥3॥
नाराइण नरहर दइआल ॥
रमत राम घट घट आधार ॥
बासुदेव बसत सभ ठाइ ॥
लीला किछु लखी न जाइ ॥4॥
मिहर दइआ करि करनैहार ॥
भगति बंदगी देहि सिरजणहार ॥
कहु नानक गुरि खोए भरम ॥
एको अलहु पारब्रहम ॥5॥34॥45॥

हिन्दी अर्थ: हे भगवान ! हे धरती के पति ! आपको सर्व-व्यापक को नमस्कार है। आप (सारी) ख़लकत को पैदा करने वाला सब जगह मौजूद है। 1। रहाउ। हे जगत के नाथ ! हे जगत के जीवन ! हे माया के पति ! हे (जीवों का हरेक) डर नाश करने वाले ! हे हृदय में आराधना के योग्य ! हे इन्द्रियों के मालिक ! हे गोपाल ! हे गोविंद ! हे मुक्ति दाते ! आप सब जगह व्यापक है। 2। हे मेहरवान ! सिर्फ आप ही पीरों-पैगंबरों-शेखों (सबको) निजात देने वाला है। (हे भाई ! वही मौला सबके) दिलों का मालिक है। (सबके दिल की जानने वाला वह सदा) न्याय करता है। वह मौला कुरान व अन्य पश्चिमी धार्मिक पुस्तकों के बताए हुए स्वरूप से अलग है। 3। हे भाई ! वह दया का श्रोत परमात्मा स्वयं ही नारायण है स्वयं ही नरसिंह है। वह राम सबमें रमा हुआ है। हरेक हृदय का आसरा है। वही बासुदेव है जो सब जगह बस रहा है। उसका खेल बिल्कुल बयान नहीं की जा सकती। 4। हे सब जीवों के रचनहार ! हे सृजनहार ! मेहर करके दया करके आप स्वयं ही जीवों को अपनी भक्ति देता है अपनी बँदगी देता है। हे नानक ! कह- गुरू ने (जिस मनुष्य के) भुलेखे दूर कर दिए। उसको (मुसलमानों का) अल्लाह और (हिन्दुओं का) पारब्रहम एक ही दिखाई दे जाते हैं। 5। 34। 45।
रामकली महला 5 ॥
कोटि जनम के बिनसे पाप ॥
हरि हरि जपत नाही संताप ॥
गुर के चरन कमल मनि वसे ॥
महा बिकार तन ते सभि नसे ॥1॥
गोपाल को जसु गाउ प्राणी ॥
अकथ कथा साची प्रभ पूरन जोती जोति समाणी ॥1॥ रहाउ ॥
त्रिसना भूख सभ नासी ॥
संत प्रसादि जपिआ अबिनासी ॥
रैनि दिनसु प्रभ सेव कमानी ॥
हरि मिलणै की एह नीसानी ॥2॥
मिटे जंजाल होए प्रभ दइआल ॥
गुर का दरसनु देखि निहाल ॥
परा पूरबला करमु बणि आइआ ॥
हरि के गुण नित रसना गाइआ ॥3॥
हरि के संत सदा परवाणु ॥
संत जना मसतकि नीसाणु ॥
दास की रेणु पाए जे कोइ ॥
नानक तिस की परम गति होइ ॥4॥35॥46॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (पिछले) करोड़ों जन्मों के किए हुए पाप भी नाश हो जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए कोई दुख-कलेश छू नहीं सकते। हे प्राणी ! जिस मनुष्य के मन में गुरू के सोहणे चरण आ बसते हैं। उसके शरीर के बड़े-बड़े विकार (भी) सारे नाश हो जाते हैं। 1। हे प्राणी ! सृष्टि के पालनहार प्रभू की सिफतसालाह के गीत गाया करो। जो मनुष्य सर्व-व्यापक प्रभू की अटल और कभी ना खत्म करने वाली सिफत सालाह करता रहता है। उसकी जीवात्मा प्रभू की ज्योति में लीन रहती है। 1। रहाउ। उसके अंदर से (माया की) तृष्णा (माया की) भूख सब नाश हो जाती है हे प्राणी ! गुरू-संत की कृपा से जिस मनुष्य ने नाश-रहित प्रभू का नाम जपा। (क्योंकि उस से प्रभू का मिलाप हो जाता है।) वह दिन-रात (हर वक्त) प्रभू की सेवा-भक्ति करता रहता है। प्रभू के मिलाप का (बड़ा) लक्षण ये है 2। हे भाई ! जिन पर प्रभू जी दयावान होते हैं। उनके माया के मोह के बँधन टूट जाते हैं; गुरू का दर्शन करके वह सदा चढ़दीकला में रहते हैं। उनके पूर्बले जन्मों का किया हुआ काम उनका मददगार बनता है (उनके किए हुए पूर्बले कर्मों के संस्कार जाग उठते हैं)। अपनी जीभ से वह सदा प्रभू के गुण गाते हैं। 3। हे भाई ! प्रभू की भक्ति करने वाले बंदे (प्रभू की हजूरी में) सदा आदर-सत्कार पाते हैं। उन संत-जनों के माथे पर (नूर चमकता है। जो। मानो। प्रभू दर पर परवानगी का) चिन्ह है। हे नानक ! ऐसे प्रभू-सेवक के चरणों की धूड़ अगर कोई मनुष्य प्राप्त कर ले। तो उसकी बहुत उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। 4। 34। 46।
रामकली महला 5 ॥
दरसन कउ जाईऐ कुरबानु ॥
चरन कमल हिरदै धरि धिआनु ॥
धूरि संतन की मसतकि लाइ ॥
जनम जनम की दुरमति मलु जाइ ॥1॥
जिसु भेटत मिटै अभिमानु ॥
पारब्रहमु सभु नदरी आवै करि किरपा पूरन भगवान ॥1॥ रहाउ ॥
गुर की कीरति जपीऐ हरि नाउ ॥
गुर की भगति सदा गुण गाउ ॥
गुर की सुरति निकटि करि जानु ॥
गुर का सबदु सति करि मानु ॥2॥
गुर बचनी समसरि सुख दूख ॥
कदे न बिआपै त्रिसना भूख ॥
मनि संतोखु सबदि गुर राजे ॥
जपि गोबिंदु पड़दे सभि काजे ॥3॥
गुरु परमेसरु गुरु गोविंदु ॥
गुरु दाता दइआल बखसिंदु ॥
गुर चरनी जा का मनु लागा ॥
नानक दास तिसु पूरन भागा ॥4॥36॥47॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (गुरू के) दर्शन से सदके जाना चाहिए (हे भाई ! गुरू के) सुंदर चरणों का ध्यान हृदय में धर के (दर्शनों की खातिर स्वै भाव कुर्बान कर देना चाहिए)। (हे भाई ! गुरू के दर पर रहने वाले) संत-जनों की चरण-धूड़ माथे पर लगाया कर। (इस तरह) अनेकों जन्मों की खोटी मति की मैल उतर जाती है। 1। जिस गुरू को मिलने से (मन में से) अहंकार दूर हो जाता है। और पारब्रहम प्रभू हर जगह दिख जाता है, हे सभ गुणों वाले भगवान ! (मेरे पर) कृपा कर (मुझे वह गुरू मिला) । 1। रहाउ। हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम जपना चाहिए- यही है गुरू की शोभा (करनी)। हे भाई ! सदा प्रभू के गुण गाया कर- यही है गुरू की भगती। हे भाई ! परमात्मा को सदा अपने नजदीक बसता समझ- यही है गुरू के चरणों में ध्यान धरना। हे भाई ! गुरू के शबद को (सदा) सच्चा करके मान। 2। हे भाई ! गुरू के बचनों के द्वारा (सारे) सुख-दुख एक समान प्रतीत होने लगते हैं। माया की तृष्णा माया की भूख कभी अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। गुरू के शबद के द्वारा मन में संतोख पैदा हो जाता है। (मन) तृप्त हो जाता है। परमात्मा का नाम जप के सारे पर्दे ढके जाते हैं (लोक-परलोक में इज्जत बन जाती है)। 3। हे भाई ! गुरू परमात्मा (का रूप) है। गुरू गोबिंद (का रूप) है। गुरू दातार (प्रभू का रूप) है। गुरू दया के श्रोत बख्शणहार प्रभू (का रूप) है। हे नानक ! जिस मनुष्य का मन गुरू के चरणों में टिक जाता है। उस दास के पूरे भाग्य जाग उठते हैं। 4। 36। 47।

यह रामकली राग के क्रम का अंग 897 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

मूल गुरमुखी और विस्तृत अर्थ के लिए प्रोफ़ेसर साहिब सिंह का गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 897 देखिए। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ यही अंग संत सिंह खालसा के पाठ में भी उपलब्ध है। किसी शबद की शुरुआत या समापन पास के अंग पर हो तो उसे साथ खोल लीजिए।

इस पन्ने का रूप: देवनागरी लिप्यन्तरण के साथ हिन्दी अर्थ। हिन्दी अर्थ का उपलब्ध आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी, रचना-शीर्षक और दूसरे अनुवाद के लिए ऊपर दिए स्रोत साथ रखिए।
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