जिस की तिस की करि मानु ॥
आपन लाहि गुमानु ॥
जिस का तू तिस का सभु कोइ ॥
तिसहि अराधि सदा सुखु होइ ॥1॥
काहे भ्रमि भ्रमहि बिगाने ॥
नाम बिना किछु कामि न आवै मेरा मेरा करि बहुतु पछुताने ॥1॥ रहाउ ॥
जो जो करै सोई मानि लेहु ॥
बिनु माने रलि होवहि खेह ॥
तिस का भाणा लागै मीठा ॥
गुर प्रसादि विरले मनि वूठा ॥2॥
वेपरवाहु अगोचरु आपि ॥
आठ पहर मन ता कउ जापि ॥
जिसु चिति आए बिनसहि दुखा ॥
हलति पलति तेरा ऊजल मुखा ॥3॥
कउन कउन उधरे गुन गाइ ॥
गनणु न जाई कीम न पाइ ॥
बूडत लोह साधसंगि तरै ॥
नानक जिसहि परापति करै ॥4॥31॥42॥
मन माहि जापि भगवंतु ॥
गुरि पूरै इहु दीनो मंतु ॥
मिटे सगल भै त्रास ॥
पूरन होई आस ॥1॥
सफल सेवा गुरदेवा ॥
कीमति किछु कहणु न जाई साचे सचु अलख अभेवा ॥1॥ रहाउ ॥
करन करावन आपि ॥
तिस कउ सदा मन जापि ॥ तिस की सेवा करि नीत ॥
सचु सहजु सुखु पावहि मीत ॥2॥
साहिबु मेरा अति भारा ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
जन का राखा सोई ॥3॥
करि किरपा अरदासि सुणीजै ॥
अपणे सेवक कउ दरसनु दीजै ॥
नानक जापी जपु जापु ॥
सभ ते ऊच जा का परतापु ॥4॥32॥43॥
बिरथा भरवासा लोक ॥
ठाकुर प्रभ तेरी टेक ॥
अवर छूटी सभ आस ॥
अचिंत ठाकुर भेटे गुणतास ॥1॥
एको नामु धिआइ मन मेरे ॥
कारजु तेरा होवै पूरा हरि हरि हरि गुण गाइ मन मेरे ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही कारन करन ॥
चरन कमल हरि सरन ॥
मनि तनि हरि ओही धिआइआ ॥
आनंद हरि रूप दिखाइआ ॥2॥
तिस ही की ओट सदीव ॥
जा के कीने है जीव ॥
सिमरत हरि करत निधान ॥
राखनहार निदान ॥3॥
सरब की रेण होवीजै ॥
आपु मिटाइ मिलीजै ॥
अनदिनु धिआईऐ नामु ॥
सफल नानक इहु कामु ॥4॥33॥44॥
कारन करन करीम ॥
सरब प्रतिपाल रहीम ॥
अलह अलख अपार ॥
खुदि खुदाइ वड बेसुमार ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू का दिया हुआ (ये शरीर आदि) है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।