अंग
896
रामकली
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामकली महला 5 ॥
जिस की तिस की करि मानु ॥
आपन लाहि गुमानु ॥
जिस का तू तिस का सभु कोइ ॥
तिसहि अराधि सदा सुखु होइ ॥1॥
काहे भ्रमि भ्रमहि बिगाने ॥
नाम बिना किछु कामि न आवै मेरा मेरा करि बहुतु पछुताने ॥1॥ रहाउ ॥
जो जो करै सोई मानि लेहु ॥
बिनु माने रलि होवहि खेह ॥
तिस का भाणा लागै मीठा ॥
गुर प्रसादि विरले मनि वूठा ॥2॥
वेपरवाहु अगोचरु आपि ॥
आठ पहर मन ता कउ जापि ॥
जिसु चिति आए बिनसहि दुखा ॥
हलति पलति तेरा ऊजल मुखा ॥3॥
कउन कउन उधरे गुन गाइ ॥
गनणु न जाई कीम न पाइ ॥
बूडत लोह साधसंगि तरै ॥
नानक जिसहि परापति करै ॥4॥31॥42॥
जिस की तिस की करि मानु ॥
आपन लाहि गुमानु ॥
जिस का तू तिस का सभु कोइ ॥
तिसहि अराधि सदा सुखु होइ ॥1॥
काहे भ्रमि भ्रमहि बिगाने ॥
नाम बिना किछु कामि न आवै मेरा मेरा करि बहुतु पछुताने ॥1॥ रहाउ ॥
जो जो करै सोई मानि लेहु ॥
बिनु माने रलि होवहि खेह ॥
तिस का भाणा लागै मीठा ॥
गुर प्रसादि विरले मनि वूठा ॥2॥
वेपरवाहु अगोचरु आपि ॥
आठ पहर मन ता कउ जापि ॥
जिसु चिति आए बिनसहि दुखा ॥
हलति पलति तेरा ऊजल मुखा ॥3॥
कउन कउन उधरे गुन गाइ ॥
गनणु न जाई कीम न पाइ ॥
बूडत लोह साधसंगि तरै ॥
नानक जिसहि परापति करै ॥4॥31॥42॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू का दिया हुआ (ये शरीर आदि) है। उसीका ही मान। (ये शरीर आदि मेरा है मेरा है) अपना (ये अहंकार दूर कर)। हरेक जीव उसी प्रभू का ही बनाया हुआ है जिसका आप पैदा किया हुआ है। उस प्रभू का सिमरन करने से सदा आत्मिक सुख मिलता है। 1। हे प्रभू से विछुड़े हुए जीव ! क्यों (अपनत्व के) भुलेखे में पड़ कर भटक रहा है। परमात्मा के नाम के बिना (कोई और चीज किसी के) काम नहीं आती। (ये) मेरा (शरीर है। यह) मेरा (धन है) – ऐसा कह कह के (अनेकों ही जीव) बहुत पछताते हुए चले गए। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा जो कुछ करता है उसी को ठीक माना कर। (रजा को) माने बिना (मिट्टी में) मिल के मिट्टी हो जाएगा। हे भाई ! जिस किसी बंदे को परमात्मा की रजा मीठी लगती है गुरू की किरपा से उसके मन में परमात्मा खुद आ के बसता है। 2। हे मन ! जिस परमात्मा को किसी की मुथाजी नहीं। जीव की ज्ञान-इन्द्रियों की जिस तक पहुँच नहीं हो सकती। हे मन ! आठों पहर उसको जपा कर। अगर वह परमात्मा (आपके) चित्त में आ बसे। तो आपके सारे दुख नाश हैं जाएंगे। इस लोक में और परलोक में आपका मुँह उज्जवल रहेगा। 3। हे भाई ! परमात्मा के गुण गा गा के कौन-कौन संसार-समुंदर से पार लांघ गए। इस बात का लेखा नहीं किया जा सकता परमात्मा के गुण गाने का मूल्य नहीं पड़ सकता। लोहे जैसा कठोर-चित्त व्यक्ति भी गुरू की संगति में रह के पार लांघ जाता है। पर। हे नानक ! (गुण गाने का उद्यम वही मनुष्य) करता है जिसको धुर से ही ये दाति प्राप्त हुई हो। 4। 31। 42।
रामकली महला 5 ॥
मन माहि जापि भगवंतु ॥
गुरि पूरै इहु दीनो मंतु ॥
मिटे सगल भै त्रास ॥
पूरन होई आस ॥1॥
सफल सेवा गुरदेवा ॥
कीमति किछु कहणु न जाई साचे सचु अलख अभेवा ॥1॥ रहाउ ॥
करन करावन आपि ॥
तिस कउ सदा मन जापि ॥ तिस की सेवा करि नीत ॥
सचु सहजु सुखु पावहि मीत ॥2॥
साहिबु मेरा अति भारा ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
जन का राखा सोई ॥3॥
करि किरपा अरदासि सुणीजै ॥
अपणे सेवक कउ दरसनु दीजै ॥
नानक जापी जपु जापु ॥
सभ ते ऊच जा का परतापु ॥4॥32॥43॥
मन माहि जापि भगवंतु ॥
गुरि पूरै इहु दीनो मंतु ॥
मिटे सगल भै त्रास ॥
पूरन होई आस ॥1॥
सफल सेवा गुरदेवा ॥
कीमति किछु कहणु न जाई साचे सचु अलख अभेवा ॥1॥ रहाउ ॥
करन करावन आपि ॥
तिस कउ सदा मन जापि ॥ तिस की सेवा करि नीत ॥
सचु सहजु सुखु पावहि मीत ॥2॥
साहिबु मेरा अति भारा ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
तिसु बिनु अवरु न कोई ॥
जन का राखा सोई ॥3॥
करि किरपा अरदासि सुणीजै ॥
अपणे सेवक कउ दरसनु दीजै ॥
नानक जापी जपु जापु ॥
सभ ते ऊच जा का परतापु ॥4॥32॥43॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! अपने मन में भगवान का नाम जपा कर। पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य को) यह उपदेश दिया उस मनुष्य के सारे डर-सहम मिट जाते हैं। उसकी हरेक आशा पूरी हो जाती है। 1। हे भाई ! सबसे बड़े देवते प्रभू की सेवा-भक्ति (अवश्य) फलदायक है। वह प्रभू सदा कायम रहने वाला है। उस सदा-स्थिर अलख और अभेव प्रभू का रक्ती भर भी मूल्य बताया नहीं जा सकता। 1। रहाउ। हे (मेरे) मन ! जो प्रभू खुद सब कुछ करने-योग्य है और औरों से करवा सकता है। उसको सदा सिमरा कर। हे मित्र ! उस प्रभू की सदा सेवा-भक्ति किया कर। आप अटल सुख पाएगा। आप आत्मिक अडोलता हासिल कर लेगा। 2। हे भाई ! मेरा मालिक प्रभू बहुत गंभीर है। एक छिन में पैदा करके नाश भी कर सकता है। उसके बिना कोई और रक्षा करने वाला नहीं। वह प्रभू अपने सेवक का खुद ही रखवाला है।3। हे प्रभू !) कृपा करके मेरी आरजू सुन। अपने सेवक को दर्शन दे। हे नानक ! (उसके दर पेअरदास कर और कह- मैं आपका सेवक) सदा आपके नाम का जाप जपता रहूँ जिस परमात्मा का तेज-बल सबसे ऊँचा है । 4। 32। 43।
रामकली महला 5 ॥
बिरथा भरवासा लोक ॥
ठाकुर प्रभ तेरी टेक ॥
अवर छूटी सभ आस ॥
अचिंत ठाकुर भेटे गुणतास ॥1॥
एको नामु धिआइ मन मेरे ॥
कारजु तेरा होवै पूरा हरि हरि हरि गुण गाइ मन मेरे ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही कारन करन ॥
चरन कमल हरि सरन ॥
मनि तनि हरि ओही धिआइआ ॥
आनंद हरि रूप दिखाइआ ॥2॥
तिस ही की ओट सदीव ॥
जा के कीने है जीव ॥
सिमरत हरि करत निधान ॥
राखनहार निदान ॥3॥
सरब की रेण होवीजै ॥
आपु मिटाइ मिलीजै ॥
अनदिनु धिआईऐ नामु ॥
सफल नानक इहु कामु ॥4॥33॥44॥
बिरथा भरवासा लोक ॥
ठाकुर प्रभ तेरी टेक ॥
अवर छूटी सभ आस ॥
अचिंत ठाकुर भेटे गुणतास ॥1॥
एको नामु धिआइ मन मेरे ॥
कारजु तेरा होवै पूरा हरि हरि हरि गुण गाइ मन मेरे ॥1॥ रहाउ ॥
तुम ही कारन करन ॥
चरन कमल हरि सरन ॥
मनि तनि हरि ओही धिआइआ ॥
आनंद हरि रूप दिखाइआ ॥2॥
तिस ही की ओट सदीव ॥
जा के कीने है जीव ॥
सिमरत हरि करत निधान ॥
राखनहार निदान ॥3॥
सरब की रेण होवीजै ॥
आपु मिटाइ मिलीजै ॥
अनदिनु धिआईऐ नामु ॥
सफल नानक इहु कामु ॥4॥33॥44॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे मन ! दुनिया की मदद की आशा रखनी व्यर्थ है। हे मेरे ठाकुर ! हे मेरे प्रभू ! (मुझे तो) आपका ही आसरा है। (दुनिया से किसी मदद की) हरेक आशा (उसकी) समाप्त हैं जाती है। हे भाई ! जो मनुष्य गुणों के खजाने चिंता-रहित मालिक प्रभू को मिल जाता है। 1। हे मेरे मन ! सिर्फ परमात्मा का नाम सिमरा कर। सदा परमात्मा के गुण गाया कर। आपका यह काम जरूर सफल हैं जाएगा (भाव। अवश्य फलदायक होगा)। 1। रहाउ। हे प्रभू ! इस जगत-रचना को बनाने वाला आप ही है। (मैं तो सदा) आपके सुंदर चरणों की शरण में रहता हूँ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने अपने मन में हृदय में सिर्फ उस परमात्मा को ही सिमरा है। (गुरू ने) उसको आनंद-रूप प्रभू के दर्शन करवा दिए हैं। 2। हे मेरे मन ! सदा ही उसी प्रभू का आसरा लिए रख। जिसके पैदा किए हुए ये सारे जीव हैं। हे मन ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए (सारे) खजाने (मिल जाते हैं)। हे मन ! (जब और सहारे खत्म हो जाएं। तो) अंत में परमात्मा ही रक्षा कर सकने वाला है। 3। हे मेरे मन ! सबके चरणों की धूल बने रहना चाहिए। (अपने अंदर से) अहंकार दूर करके ही परमात्मा को मिला जा सकता है। हे मन ! परमात्मा का नाम हर वक्त सिमरना चाहिए। हे नानक ! (सिमरन करने का) ये काम अवश्य फल देता है। 4। 33। 44।
रामकली महला 5 ॥
कारन करन करीम ॥
सरब प्रतिपाल रहीम ॥
अलह अलख अपार ॥
खुदि खुदाइ वड बेसुमार ॥1॥
कारन करन करीम ॥
सरब प्रतिपाल रहीम ॥
अलह अलख अपार ॥
खुदि खुदाइ वड बेसुमार ॥1॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे जगत के मूल ! हे बख्शिश करने वाले ! हे सब जीवों को पालने वाले ! हे (सब पर) रहम करने वाले ! हे अल्लाह ! हे अलख ! हे अपार ! आप स्वयं ही सब का मालिक है। आप बड़ा बेअंत है। 1।
इस पन्ने का रूप: देवनागरी लिप्यन्तरण के साथ हिन्दी अर्थ। हिन्दी अर्थ का उपलब्ध आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी, रचना-शीर्षक और दूसरे अनुवाद के लिए ऊपर दिए स्रोत साथ रखिए।
यह रामकली राग के क्रम का अंग 896 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
मूल गुरमुखी और विस्तृत अर्थ के लिए प्रोफ़ेसर साहिब सिंह का गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 896 देखिए। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ यही अंग संत सिंह खालसा के पाठ में भी उपलब्ध है। किसी शबद की शुरुआत या समापन पास के अंग पर हो तो उसे साथ खोल लीजिए।