राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
संतन के प्राण अधार ॥ ऊचे ते ऊच अपार ॥3॥ सु मति सारु जितु हरि सिमरीजै ॥ करि किरपा जिसु आपे दीजै ॥ सूख सहज आनंद हरि नाउ ॥ नानक जपिआ गुर मिलि नाउ ॥4॥27॥38॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: परमात्मा संत जनों की जिंद का आसरा है। वह सबसे ऊँचा और बेअंत है। 3। हे भाई ! वह मति ग्रहण कर। जिससे परमात्मा का सिमरन किया जा सके। (पर वही मनुष्य ऐसी बुद्धि ग्रहण करता है) जिसको प्रभू कृपा करके खुद दे देता है। परमात्मा का नाम सुख आत्मिक अडोलता और आनंद (का श्रोत) है। हे नानक ! (जिसने) यह नाम (जपा है) गुरू को मिल के ही जपा है। 4। 27। 38।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! इस तरह के सारे ख्याल छोड़ दे कि (संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए) आप बड़ा समझदार है। सेवक वाली भावना से (गुरू के दर पर) सेवा किया कर। (जो मनुष्य गुरू के दर पर) अपना सारा स्वै भाव मिटा देता है। वही मन के चितवे हुए फल पा लेता है। 1। हे भाई ! अपने गुरू के उपदेश की तरफ। पूरा ध्यान रखा कर। आपकी (हरेक) आशा पूरी हैं जाएगी। आपका (हरेक) मन का फुरना पूरा हैं जाएगा। अपने गुरू से आप सारे खजाने हासिल कर लेगा। 1। रहाउ। प्रभू के बिना और किसी को (अलग हस्ती) नहीं जानता। हे भाई ! गुरू उस माया रहित निर्लिप प्रभू को ही (हर जगह) जानता है। (इस वास्ते गुरू को) निरा मनुष्य का रूप ही ना समझ। (गुरू के दर पर उसी मनुष्य को) आदर मिलता है जो (अपनी समझदारी का) अहंकार छोड़ देता है। 2। हे भाई ! प्रभू के रूप गुरू का ही ओट-आसरा पकड़। अन्य (आसरों की) सभी आशाएं (मन में से) दूर कर दे। (गुरू के दर से ही) परमात्मा का नाम खजाना मांगा कर। तब ही आप प्रभू की हजूरी में आदर-सत्कार प्राप्त करेगा। 3। हे भाई ! गुरू का बचन। गुरू का शबद-मंत्र (सदा) जपा कर। यही बढ़िया भक्ति है। यही है भक्ति की अस्लियत। हे नानक ! जिन मनुष्यों पर सतिगुरू जी दयावान होते हैं। वह दास सदा निहाल अवस्था (चढ़दीकला) में रहते हैं। 4। 28। 39।
रामकली महला 5 ॥ होवै सोई भल मानु ॥ आपना तजि अभिमानु ॥ दिनु रैनि सदा गुन गाउ ॥ पूरन एही सुआउ ॥1॥ आनंद करि संत हरि जपि ॥ छाडि सिआनप बहु चतुराई गुर का जपि मंतु निरमल ॥1॥ रहाउ ॥ एक की करि आस भीतरि ॥ निरमल जपि नामु हरि हरि ॥ गुर के चरन नमसकारि ॥ भवजलु उतरहि पारि ॥2॥ देवनहार दातार ॥ अंतु न पारावार ॥ जा कै घरि सरब निधान ॥ राखनहार निदान ॥3॥ नानक पाइआ एहु निधान ॥ हरे हरि निरमल नाम ॥ जो जपै तिस की गति होइ ॥ नानक करमि परापति होइ ॥4॥29॥40॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जो कुछ प्रभू की रजा में हो रहा है उसी को भला मान। अपनी (समझदारी) का गुमान छोड़ दे। दिन-रात हर वक्त परमात्मा के गुण गाता रह; बस ! यही है ठीक जीवन-मनोरथ। 1। (शांति के श्रोत) संत-हरी का नाम जपा कर और (इस तरह) आत्मिक आनंद (सदा) ले। हे भाई ! ये ख्याल छोड़ दे कि गुरू की अगुवाई के बिना संसार-समुंदर से पार लांघने के लिए आप बहुत समझदार और चतुर है। गुरू का पवित्र शबद-मंत्र जपा कर। 1। रहाउ। हे भाई ! एक परमात्मा की (सहायता की) आस अपने मन में टिकाए रख। परमात्मा का पवित्र नाम सदा जपता रह; गुरू के चरणों पर अपना सिर झुकाए रख। (इस तरह) आप संसार-समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 2। (हे भाई ! ये याद रख कि) दातें देने वाला प्रभू (सब कुछ) देने के समर्थ है। उसका अंत नहीं पड़ सकता। उसका इस पार उस पार का छोर नहीं मिल सकता। हे भाई ! जिस प्रभू के घर में सारे खजाने मौजूद हैं। वही आखिर रक्षा करने के योग्य है। 3। हे भाई ! ये खजाना पा लो जो परमात्मा के पवित्र नाम का है जो मनुष्य इस नाम को (सदा) जपता है उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। पर। हे नानक ! ये नाम-खजाना परमात्मा की मेहर से ही मिलता है। 4। 29। 40।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! परमात्मा के गुण गा के) इस मानस शरीर को सफल कर ले जो बड़ी मुश्किल से मिलता है। (सिफत-सालाह की बरकति से यहाँ से मानस जनम की बाजी) हार के दरगाह में नहीं जाएगा; आपको इस लोक में और परलोक में शोभा मिलेगी। (परमात्मा की सिफतसालाह) आपको आखिरी वक्त भी (माया के मोह के बँधनों से) छुड़ा लेगी। 1। (हे भाई !) परमात्मा के गुण गाया कर। आश्चर्य-रूप अकाल-पुरख का ध्यान धरा कर। (इस तरह आपका) ये लोक (और आपका) परलोक दोनों सुखी हैं जाएंगे। 1। रहाउ। (हे भाई !) उठते-बैठते (हर वक्त) परमात्मा का नाम जपा कर। (नाम की बरकति से) सारा दुख कलेश मिट जाता है। (नाम जपने से आपके) सारे वैरी (आपके) मित्र बन जाएंगे। आपका अपना मन (वैर आदि से) पवित्र हैं जाएगा। 2। (हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरना ही) सारे कामों से अच्छा काम है। सारे धर्मों से यही बढ़िया धर्म है। हे भाई ! परमात्मा का सिमरन करने से आपका पार उतारा हैं जाएगा। (सिमरन की बरकति से) अनेकों जन्मों (के विकारों की मैल) का भार उतर जाता है। 3। (हे भाई ! सिमरन करते हुए) आपकी (हरेक) आशा पूरी हैं जाएगी। आपकी जमों वाली फाही (भी) काटी जाएगी। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू का (ये नाम-सिमरन का) उपदेश (सदा) सुनना चाहिए। (इसकी बरकति से) आत्मिक सुख में आत्मिक अडोलता में टिका जाता है। 4। 30। 41।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा संत जनों की जिंद का आसरा है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।