अंग 894

अंग
894
रामकली
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुंन समाधि गुफा तह आसनु ॥
केवल ब्रहम पूरन तह बासनु ॥
भगत संगि प्रभु गोसटि करत ॥
तह हरख न सोग न जनम न मरत ॥3॥
करि किरपा जिसु आपि दिवाइआ ॥
साधसंगि तिनि हरि धनु पाइआ ॥
दइआल पुरख नानक अरदासि ॥
हरि मेरी वरतणि हरि मेरी रासि ॥4॥24॥35॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! जिस हृदय-घर में वह खजाना आ बसता है) वहाँ ऐसी समाधि बनी रहती है जिसमें कोई मायावी विचार नहीं उठते। (पहाड़ों की कंद्रों की जगह उस हृदय-) गुफा में मनुष्य की सुरति टिकी रहती है। उस हृदय-घर में सिर्फ पूरन परमात्मा का निवास बना रहता है। (जिस भगत के हृदय में वह खजाना प्रगट हो जाता है उस) भगत से प्रभू मिलाप बना लेता है। उस हृदय में खुशी-ग़मी। जनम-मरण (के चक्करों का डर) का कोई असर नहीं होता। 3। (पर। जिसको प्रभू ने खुद किरपा करके ये धन दिलवाया है। हे भाई ! सिर्फ) उस मनुष्य ने गुरू की संगति में रह के वह नाम-धन पाया है हे दया के श्रोत अकाल-पुरख ! (आपके सेवक) नानक की भी यही आरजू है कि आपका नाम मेरा सरमाया बना रहे। आपका नाम मेरी हर वक्त की इस्तेमाल वाली चीज़ बनी रहे। 4। 24। 35।
रामकली महला 5 ॥
महिमा न जानहि बेद ॥
ब्रहमे नही जानहि भेद ॥
अवतार न जानहि अंतु ॥
परमेसरु पारब्रहम बेअंतु ॥1॥
अपनी गति आपि जानै ॥
सुणि सुणि अवर वखानै ॥1॥ रहाउ ॥
संकरा नही जानहि भेव ॥
खोजत हारे देव ॥
देवीआ नही जानै मरम ॥
सभ ऊपरि अलख पारब्रहम ॥2॥
अपनै रंगि करता केल ॥
आपि बिछोरै आपे मेल ॥
इकि भरमे इकि भगती लाए ॥
अपणा कीआ आपि जणाए ॥3॥
संतन की सुणि साची साखी ॥
सो बोलहि जो पेखहि आखी ॥
नही लेपु तिसु पुंनि न पापि ॥
नानक का प्रभु आपे आपि ॥4॥25॥36॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! प्रभू कितना बड़ा है- ये बात) (चारों) वेद (भी) नहीं जानते। अनेकों ब्रहमा भी (उसके) दिल की बात नहीं जानते। सारे अवतार भी उस (परमात्मा के गुणों) का अंत नहीं जानते। हे भाई ! पारब्रहम परमेश्वर बेअंत है। 1। (हे भाई !) परमात्मा कैसा है – ये बात वह खुद ही जानता है। (जीव) औरों से सुन-सुन के ही (परमात्मा के बारे में) वर्णन करता रहता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) अनेकों शिव जी परमात्मा के दिल की बात नहीं जानते। अनेकों देवते उसकी खोज करते-करते थक गए। देवियों में से भी कोई उसका भेद नहीं जानती। हे भाई ! परमात्मा सबसे बड़ा है। उसके सही स्वरूप का बयान नहीं किया जा सकता। 2। (हे भाई !) परमात्मा अपनी मौज में (जगत के सारे) करिश्मे कर रहा है। प्रभू खुद ही (जीवों को अपने चरणों से) विछोड़ता है। खुद ही मिलाता है। अनेकों जीवों को उसने भटकनों में डाला हुआ है। और अनेकों जीवों को अपनी भक्ति में जोड़ा हुआ है। (ये जगत उसका) अपना ही पैदा किया हुआ है। (इसको वह) खुद ही सूझ बख्शता है। 3। (हे भाई !) संत-जनों के बारे में सच्ची बात सुन। संत जन वह कुछ कहते हैं जो वे अपनी आँखों से देखते हैं। (संतजन कहते हैं कि) उस परमात्मा पर ना किसी पून्य और ना ही किसी पाप ने (कभी अपना) कोई असर किया है। हे भाई ! नानक का परमात्मा (अपने जैसा) स्वयं ही स्वयं है। 4। 25। 36।
रामकली महला 5 ॥
किछहू काजु न कीओ जानि ॥
सुरति मति नाही किछु गिआनि ॥
जाप ताप सील नही धरम ॥
किछू न जानउ कैसा करम ॥1॥
ठाकुर प्रीतम प्रभ मेरे ॥
तुझ बिनु दूजा अवरु न कोई भूलह चूकह प्रभ तेरे ॥1॥ रहाउ ॥
रिधि न बुधि न सिधि प्रगासु ॥
बिखै बिआधि के गाव महि बासु ॥
करणहार मेरे प्रभ एक ॥
नाम तेरे की मन महि टेक ॥2॥
सुणि सुणि जीवउ मनि इहु बिस्रामु ॥
पाप खंडन प्रभ तेरो नामु ॥
तू अगनतु जीअ का दाता ॥
जिसहि जणावहि तिनि तू जाता ॥3॥
जो उपाइओ तिसु तेरी आस ॥
सगल अराधहि प्रभ गुणतास ॥
नानक दास तेरै कुरबाणु ॥
बेअंत साहिबु मेरा मिहरवाणु ॥4॥26॥37॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ मैं इस तरह का कोई काम मिथ के नहीं करता। हे प्रभू ! ज्ञान-चर्चा में भी मेरी सुरति मेरी मति नहीं टिकती। जपों तपों सील धर्म को भी मैं नहीं जानता। हे प्रभू ! मुझे कोई समझ नहीं कि कर्म-काण्ड किस तरह के होते हैं;1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे मेरे ठाकुर ! यदि हम भूलें करते हैं। अगर हम (जीवन-राह में) चूकते हैं। तो भी हे प्रभू ! हम आपके ही हैं। आपके बिना हमारा और कोई नहीं। 1। रहाउ। हे मेरे प्रभू ! करामाती ताकतों की सूझ-बूझ और रौशनी मेरे अंदर नहीं। विकारों और रोगों के इस शरीर-पिंड में मेरा बसेरा है। हे मेरे सृजनहार ! मेरे मन में सिर्फ आपके नाम का सहारा है। 2। (आपका नाम) सुन-सुन के ही मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता हूँ। हे मेरे प्रभू ! मेरे मन में (सिर्फ) एक धरवास है कि आपका नाम पापों का नाश करने वाला है; प्रभू ! आपकी ताकतें गिनी नहीं जा सकतीं। आप ही जीवात्मा देने वाला है। जिस मनुष्य को आप समझ बख्शता है। उसने ही आपके साथ जान-पहचान डाली है। 3। जिस-जिस जीव को तूने पैदा किया है। उसको आपकी (सहायता की) ही आस है। हे गुणों के खजाने प्रभू ! सारे जीव आपकी ही आराधना करते हैं। आपका दास नानक आपसे बलिहार जाता है (और कहता है-) आप मेरा मालिक है। आप बेअंत है। आप सदा दया करने वाला है। 4। 26। 37।
रामकली महला 5 ॥
राखनहार दइआल ॥
कोटि भव खंडे निमख खिआल ॥
सगल अराधहि जंत ॥
मिलीऐ प्रभ गुर मिलि मंत ॥1॥
जीअन को दाता मेरा प्रभु ॥
पूरन परमेसुर सुआमी घटि घटि राता मेरा प्रभु ॥1॥ रहाउ ॥
ता की गही मन ओट ॥
बंधन ते होई छोट ॥
हिरदै जपि परमानंद ॥
मन माहि भए अनंद ॥2॥
तारण तरण हरि सरण ॥
जीवन रूप हरि चरण ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा सब जीवों की रक्षा करने में समर्थ है। दया का श्रोत है। अगर आँख फरकने जितने समय के लिए भी उसका ध्यान धरें। तो करोड़ों जन्मों के चक्कर काटे जाते हैं। सारे जीव उसीकी आराधना करते हैं। हे भाई ! गुरू को मिल के। गुरू का उपदेश ले के उस प्रभू को मिला जा सकता है। 1। हे भाई ! मेरा प्रभू सब जीवों को दातें देने वाला है। वह मेरा मालिक परमेश्वर प्रभू सबमें व्यापक है। हरेक शरीर में रमा हुआ है। 1। रहाउ। हे मन ! जिस व्यक्ति ने उस परमात्मा का आसरा ले लिया। (माया के मोह के) बँधनों से उसकी मुक्ति हो गई। सबसे ऊँचे सुख के मालिक प्रभू को हृदय में जप के मन में खुशियां ही खुशियां बन जाती हैं। 2। हे भाई ! परमात्मा का आसरा (संसार-समुंद्र से) पार लंघाने के लिए जहाज़ है। प्रभू के चरणों की ओट आत्मिक जीवन देने वाली है।

यह रामकली राग के क्रम का अंग 894 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

मूल गुरमुखी और विस्तृत अर्थ के लिए प्रोफ़ेसर साहिब सिंह का गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 894 देखिए। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ यही अंग संत सिंह खालसा के पाठ में भी उपलब्ध है। किसी शबद की शुरुआत या समापन पास के अंग पर हो तो उसे साथ खोल लीजिए।

इस पन्ने का रूप: देवनागरी लिप्यन्तरण के साथ हिन्दी अर्थ। हिन्दी अर्थ का उपलब्ध आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी, रचना-शीर्षक और दूसरे अनुवाद के लिए ऊपर दिए स्रोत साथ रखिए।
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