केवल ब्रहम पूरन तह बासनु ॥
भगत संगि प्रभु गोसटि करत ॥
तह हरख न सोग न जनम न मरत ॥3॥
करि किरपा जिसु आपि दिवाइआ ॥
साधसंगि तिनि हरि धनु पाइआ ॥
दइआल पुरख नानक अरदासि ॥
हरि मेरी वरतणि हरि मेरी रासि ॥4॥24॥35॥
महिमा न जानहि बेद ॥
ब्रहमे नही जानहि भेद ॥
अवतार न जानहि अंतु ॥
परमेसरु पारब्रहम बेअंतु ॥1॥
अपनी गति आपि जानै ॥
सुणि सुणि अवर वखानै ॥1॥ रहाउ ॥
संकरा नही जानहि भेव ॥
खोजत हारे देव ॥
देवीआ नही जानै मरम ॥
सभ ऊपरि अलख पारब्रहम ॥2॥
अपनै रंगि करता केल ॥
आपि बिछोरै आपे मेल ॥
इकि भरमे इकि भगती लाए ॥
अपणा कीआ आपि जणाए ॥3॥
संतन की सुणि साची साखी ॥
सो बोलहि जो पेखहि आखी ॥
नही लेपु तिसु पुंनि न पापि ॥
नानक का प्रभु आपे आपि ॥4॥25॥36॥
किछहू काजु न कीओ जानि ॥
सुरति मति नाही किछु गिआनि ॥
जाप ताप सील नही धरम ॥
किछू न जानउ कैसा करम ॥1॥
ठाकुर प्रीतम प्रभ मेरे ॥
तुझ बिनु दूजा अवरु न कोई भूलह चूकह प्रभ तेरे ॥1॥ रहाउ ॥
रिधि न बुधि न सिधि प्रगासु ॥
बिखै बिआधि के गाव महि बासु ॥
करणहार मेरे प्रभ एक ॥
नाम तेरे की मन महि टेक ॥2॥
सुणि सुणि जीवउ मनि इहु बिस्रामु ॥
पाप खंडन प्रभ तेरो नामु ॥
तू अगनतु जीअ का दाता ॥
जिसहि जणावहि तिनि तू जाता ॥3॥
जो उपाइओ तिसु तेरी आस ॥
सगल अराधहि प्रभ गुणतास ॥
नानक दास तेरै कुरबाणु ॥
बेअंत साहिबु मेरा मिहरवाणु ॥4॥26॥37॥
राखनहार दइआल ॥
कोटि भव खंडे निमख खिआल ॥
सगल अराधहि जंत ॥
मिलीऐ प्रभ गुर मिलि मंत ॥1॥
जीअन को दाता मेरा प्रभु ॥
पूरन परमेसुर सुआमी घटि घटि राता मेरा प्रभु ॥1॥ रहाउ ॥
ता की गही मन ओट ॥
बंधन ते होई छोट ॥
हिरदै जपि परमानंद ॥
मन माहि भए अनंद ॥2॥
तारण तरण हरि सरण ॥
जीवन रूप हरि चरण ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! जिस हृदय-घर में वह खजाना आ बसता है) वहाँ ऐसी समाधि बनी रहती है जिसमें कोई मायावी विचार नहीं उठते।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।