अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: परमात्मा का नाम सुनते ही ऐसे होता है जैसे इसको बिच्छू डस गया हैं। 2। (हे भाई ! साकत मनुष्य) सदा ही माया की खातिर चिंता-फिक्र करता रहता है। यह कभी भी अपने मन में अपने मुँह से परमात्मा की सिफॅतसालाह नहीं करता। जो परमात्मा सब दातें देने वाला है। जिसको किसी का डर-भय नहीं। जो शरीरों की कैद से परे है। उससे यह मूर्ख साकत कभी प्यार नहीं डालता। 3। आप सब शाहों से बड़ा और सदा कायम रहने वाला शाह है। आपको किसी की मुथाजी नहीं। आप सब ताकतों का मालिक बादशाह है। (आपका पैदा किया हुआ जीव सदा माया के) मोह में डूबा हुआ (माया के साथ ही) चिपका रहता है। (इसके मन में) भटकना ही बनी रहती है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! इस संसार-समुंद्र में से) आपकी मेहर से ही पार हुआ जा सकता है। 4। 21। 32।
रामकली महला 5 ॥ रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥ आगै दरगह पावउ थाउ ॥ सदा अनंदु न होवी सोगु ॥ कबहू न बिआपै हउमै रोगु ॥1॥ खोजहु संतहु हरि ब्रहम गिआनी ॥ बिसमन बिसम भए बिसमादा परम गति पावहि हरि सिमरि परानी ॥1॥ रहाउ ॥ गनि मिनि देखहु सगल बीचारि ॥ नाम बिना को सकै न तारि ॥ सगल उपाव न चालहि संगि ॥ भवजलु तरीऐ प्रभ कै रंगि ॥2॥ देही धोइ न उतरै मैलु ॥ हउमै बिआपै दुबिधा फैलु ॥ हरि हरि अउखधु जो जनु खाइ ॥ ता का रोगु सगल मिटि जाइ ॥3॥ करि किरपा पारब्रहम दइआल ॥ मन ते कबहु न बिसरु गोुपाल ॥ तेरे दास की होवा धूरि ॥ नानक की प्रभ सरधा पूरि ॥4॥22॥33॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे प्रभू ! कृपा कर) मैं दिन-रात हरी का नाम जपता रहूँ। (और इस तरह) परलोक में आपकी हजूरी में जगह प्राप्त कर लूँ। (जो मनुष्य सदा नाम जपता है। उसको) सदा आनंद बना रहता है। उसे कभी चिंता नहीं व्यापती। अहंकार का रोग कभी उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। 1। परमात्मा के साथ गहरी सांझ रखने वाले हे संतजनो ! सदा परमात्मा की खोज करते रहो। हे प्राणी ! (सदा) परमात्मा का सिमरन करता रह; (सिमरन की बरकति से) बड़ी ही आश्चर्यजनक आत्मिक अवस्था बन जाएगी। आप सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेगा। 1। रहाउ। हे संत जनो ! सारे ध्यान से अच्छी तरह विचार के देख लो। परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी (संसार-समुंद्र से) पार नहीं लंघा सकता। (नाम के बिना) और सारे ही उपाय (मनुष्य के) साथ नहीं जाते (सहायता नहीं करते)। प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे रहने से संसार-समुंदर में से पार लांघा जा सकता है। 2। (हे संत जनों ! तीर्थ आदि पर) शरीर को धोने से (मन की विकारों वाली) मैल दूर नहीं होती। (बल्कि ये) अहंकार अपना दबाव बना लेता है (कि मैं तीर्थ-स्नान करके आया हूँ। व्यक्ति के अंदर) अंदर से और व बाहर से और होने का पसारा पसर जाता है (मनुष्य पाखण्डी हो जाता है)। हे संत जनो ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम की दवाई खाता है। उसका सारा (मानसिक) रोग दूर हो जाता है। 3। हे पारब्रहम ! हे दया के घर ! (मेरे ऊपर) मेहर कर। हे गोपाल ! आप मेरे मन से कभी भी ना बिसर। हे प्रभू ! मैं आपके दासों के चरणों की धूल बना रहूँ- नानक की ये चाहत पूरी कर। 4। 22। 33।
रामकली महला 5 ॥ तेरी सरणि पूरे गुरदेव ॥ तुधु बिनु दूजा नाही कोइ ॥ तू समरथु पूरन पारब्रहमु ॥ सो धिआए पूरा जिसु करमु ॥1॥ तरण तारण प्रभ तेरो नाउ ॥ एका सरणि गही मन मेरै तुधु बिनु दूजा नाही ठाउ ॥1॥ रहाउ ॥ जपि जपि जीवा तेरा नाउ ॥ आगै दरगह पावउ ठाउ ॥ दूखु अंधेरा मन ते जाइ ॥ दुरमति बिनसै राचै हरि नाइ ॥2॥ चरन कमल सिउ लागी प्रीति ॥ गुर पूरे की निरमल रीति ॥ भउ भागा निरभउ मनि बसै ॥ अंम्रित नामु रसना नित जपै ॥3॥ कोटि जनम के काटे फाहे ॥ पाइआ लाभु सचा धनु लाहे ॥ तोटि न आवै अखुट भंडार ॥ नानक भगत सोहहि हरि दुआर ॥4॥23॥34॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे सर्व-गुण भरपूर और सबसे बड़े देवते ! मैं आपकी शरण आया हूँ। आपके बिना मुझे कोई और (सहायता करने वाला) नहीं (दिखता)। आप सब ताकतों का मालिक है। आप हर जगह व्यापक परमेश्वर है। वही मनुष्य आपका ध्यान धर सकता है जिस पर आपकी बख्शिश हैं। 1। हे प्रभू ! आपका नाम (जीवों को संसार-समुंदर से) पार लंघाने के लिए जहाज है। मेरे मन ने एक आपकी ही ओट ली है। हे प्रभू ! आपके बिना मुझे कोई और (आसरे वाली) जगह नहीं सूझती। 1। रहाउ। हे मेरे गुरदेव ! आपका नाम जप-जप के मैं (यहाँ) आत्मिक जीवन हासिल कर रहा हूँ। आगे भी आपकी हजूरी में मैं (टिकने के योग्य) जगह प्राप्त कर सकूँगा। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपके नाम में लीन होता है। (उसके अंदर से) दुर्मति दूर हैं जाती है। उसके मन से दुख-कलेश और (माया के मोह का) अंधेरा चला जाता है। 2। (जो मनुष्य ये मर्यादा धारण करता है। उसका) प्यार (परमात्मा के) सुंदर चरणों से बन जाता है। (हे भाई ! परमात्मा का नाम जपना ही) पूरे गुरू की पवित्र जीवन मर्यादा है डर-रहित प्रभू उसके मन में आ बसता है (इसलिए उसका हरेक) डर दूर हो जाता है। जो मनुष्य अपनी जीभ से आत्मिक जीवन देने वाला नाम नित्य जपता है।3। (भक्ति के सदका) उनके पहले करोड़ों जन्मों के (माया के) बँधन काटे जाते हैं (जीव यहाँ जगत में हरी-नाम-धन का व्यापार करने आते हैं। प्रभू की भक्ति करने वाले बंदे) सदा कायम रहने वाला हरी-नाम-धन लाभ कमा लेते हैं (उनके पास इस नाम-धन के) कभी ना खत्म होने वाले खजाने (भर जाते हैं जिनमें) कभी घाटा नहीं पड़ता हे नानक ! परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा के दर पे शोभा पाते हैं। 4। 23। 34।
रामकली महला 5 ॥ रतन जवेहर नाम ॥ सतु संतोखु गिआन ॥ सूख सहज दइआ का पोता ॥ हरि भगता हवालै होता ॥1॥ मेरे राम को भंडारु ॥ खात खरचि कछु तोटि न आवै अंतु नही हरि पारावारु ॥1॥ रहाउ ॥ कीरतनु निरमोलक हीरा ॥ आनंद गुणी गहीरा ॥ अनहद बाणी पूंजी ॥ संतन हथि राखी कूंजी ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! प्यारे प्रभू का खजाना ऐसा है जिसमें उसका) नाम (ही) रतन और जवाहरात हैं। उसमें सत-संतोख और ऊँचे आत्मिक जीवन की सूझ कीमती पदार्थ हैं। वह खजाना सुख। आत्मिक अडोलता व दया के श्रोत हैं। पर। वह खजाना परमात्मा के भक्तों के सुपुर्द होया हुआ है। 1। (हे भाई !) प्यारे प्रभू का खजाना (ऐसा है कि उसको) खुद इस्तेमाल करते हुए और औरों को बाँटते हुए (उसमें) कमी नहीं आती। उस परमातमा के खजाने का अंत नहीं मिलता। उसकी हस्ती का उरला-परला छोर नहीं मिलता। 1। रहाउ। (हे भाई ! प्यारे प्रभू का खजाना ऐसा है जिसमें उसका) कीर्तन एक ऐसा हीरा है जिसका मूल्य नहीं पड़ सकता (उस कीर्तन की बरकति से) गुणों के मालिक समुंदर-प्रभू (के मिलाप) का आनंद (प्राप्त होता है)। (कीर्तन की बरकति से पैदा हुई) एक-रस जारी रहने वाली सिफत-सालाह की रौंअ (उस खजाने में मनुष्य के लिए) राशि-पूँजी है। (पर। परमात्मा ने इस खजाने की) कूँजी संतों के हाथ में रखी हुई है। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा का नाम सुनते ही ऐसे होता है जैसे इसको बिच्छू डस गया हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।