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अंग 893 · रामकली

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अंग
893
रामकली
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  1. नामु सुनत जनु बिछूअ डसाना ॥2॥
  2. रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥
  3. तेरी सरणि पूरे गुरदेव ॥
  4. रतन जवेहर नाम ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

नामु सुनत जनु बिछूअ डसाना ॥2॥

अंग 892 से चला आ रहा अंश

नामु सुनत जनु बिछूअ डसाना ॥2॥
माइआ कारणि सद ही झूरै ॥
मनि मुखि कबहि न उसतति करै ॥
निरभउ निरंकार दातारु ॥
तिसु सिउ प्रीति न करै गवारु ॥3॥
सभ साहा सिरि साचा साहु ॥
वेमुहताजु पूरा पातिसाहु ॥
मोह मगन लपटिओ भ्रम गिरह ॥
नानक तरीऐ तेरी मिहर ॥4॥21॥32॥

हिन्दी अर्थ: परमात्मा का नाम सुनते ही ऐसे होता है जैसे इसको बिच्छू डस गया हैं। 2। (हे भाई! साकत मनुष्य) सदा ही माया की खातिर चिंता-फिक्र करता रहता है। यह कभी भी अपने मन में अपने मुँह से परमात्मा की सिफॅतसालाह नहीं करता। जो परमात्मा सब दातें देने वाला है। जिसको किसी का डर-भय नहीं। जो शरीरों की कैद से परे है। उससे यह मूर्ख साकत कभी प्यार नहीं डालता। 3। आप सब शाहों से बड़े और सदा कायम रहने वाले शाह हैं। आपको किसी की मुथाजी नहीं। आप सब ताकतों के मालिक बादशाह हैं। (आपका पैदा किया हुआ जीव सदा माया के) मोह में डूबा हुआ (माया के साथ ही) चिपका रहता है। (इसके मन में) भटकना ही बनी रहती है। हे नानक! (कहें: हे प्रभू! इस संसार-समुंद्र में से) आपकी मेहर से ही पार हुआ जा सकता है। 4। 21। 32।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥

रामकली महला 5 ॥
रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥
आगै दरगह पावउ थाउ ॥
सदा अनंदु न होवी सोगु ॥
कबहू न बिआपै हउमै रोगु ॥1॥
खोजहु संतहु हरि ब्रहम गिआनी ॥
बिसमन बिसम भए बिसमादा परम गति पावहि हरि सिमरि परानी ॥1॥ रहाउ ॥
गनि मिनि देखहु सगल बीचारि ॥
नाम बिना को सकै न तारि ॥
सगल उपाव न चालहि संगि ॥
भवजलु तरीऐ प्रभ कै रंगि ॥2॥
देही धोइ न उतरै मैलु ॥
हउमै बिआपै दुबिधा फैलु ॥
हरि हरि अउखधु जो जनु खाइ ॥
ता का रोगु सगल मिटि जाइ ॥3॥
करि किरपा पारब्रहम दइआल ॥
मन ते कबहु न बिसरु गोुपाल ॥
तेरे दास की होवा धूरि ॥
नानक की प्रभ सरधा पूरि ॥4॥22॥33॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे प्रभू! कृपा करें) मैं दिन-रात हरी का नाम जपता रहूँ। (और इस तरह) परलोक में आपकी हजूरी में जगह प्राप्त कर लूँ। (जो मनुष्य सदा नाम जपता है। उसको) सदा आनंद बना रहता है। उसे कभी चिंता नहीं व्यापती। अहंकार का रोग कभी उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। 1। परमात्मा के साथ गहरी सांझ रखने वाले हे संतजनो! सदा परमात्मा की खोज करते रहें। हे प्राणी! (सदा) परमात्मा का सिमरन करते रहें; (सिमरन की बरकति से) बड़ी ही आश्चर्यजनक आत्मिक अवस्था बन जाएगी। आप सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेंगे। 1। रहाउ। हे संत जनो! सारे ध्यान से अच्छी तरह विचार के देख लें। परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी (संसार-समुंद्र से) पार नहीं लंघा सकता। (नाम के बिना) और सारे ही उपाय (मनुष्य के) साथ नहीं जाते (सहायता नहीं करते)। प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे रहने से संसार-समुंदर में से पार लांघा जा सकता है। 2। (हे संत जनों! तीर्थ आदि पर) शरीर को धोने से (मन की विकारों वाली) मैल दूर नहीं होती। (बल्कि ये) अहंकार अपना दबाव बना लेता है (कि मैं तीर्थ-स्नान करके आया हूँ। व्यक्ति के अंदर) अंदर से और व बाहर से और होने का पसारा पसर जाता है (मनुष्य पाखण्डी हो जाता है)। हे संत जनो! जो मनुष्य परमात्मा के नाम की दवाई खाता है। उसका सारा (मानसिक) रोग दूर हो जाता है। 3। हे पारब्रहम! हे दया के घर! (मेरे ऊपर) मेहर करें। हे गोपाल! आप मेरे मन से कभी भी ना बिसरें। हे प्रभू! मैं आपके दासों के चरणों की धूल बना रहूँ, नानक की ये चाहत पूरी करें। 4। 22। 33।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

तेरी सरणि पूरे गुरदेव ॥

रामकली महला 5 ॥
तेरी सरणि पूरे गुरदेव ॥
तुधु बिनु दूजा नाही कोइ ॥
तू समरथु पूरन पारब्रहमु ॥
सो धिआए पूरा जिसु करमु ॥1॥
तरण तारण प्रभ तेरो नाउ ॥
एका सरणि गही मन मेरै तुधु बिनु दूजा नाही ठाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जपि जपि जीवा तेरा नाउ ॥
आगै दरगह पावउ ठाउ ॥
दूखु अंधेरा मन ते जाइ ॥
दुरमति बिनसै राचै हरि नाइ ॥2॥
चरन कमल सिउ लागी प्रीति ॥
गुर पूरे की निरमल रीति ॥
भउ भागा निरभउ मनि बसै ॥
अंम्रित नामु रसना नित जपै ॥3॥
कोटि जनम के काटे फाहे ॥
पाइआ लाभु सचा धनु लाहे ॥
तोटि न आवै अखुट भंडार ॥
नानक भगत सोहहि हरि दुआर ॥4॥23॥34॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे सर्व-गुण भरपूर और सबसे बड़े देवते! मैं आपकी शरण आया हूँ। आपके बिना मुझे कोई और (सहायता करने वाला) नहीं (दिखता)। आप सब ताकतों के मालिक हैं। आप हर जगह व्यापक परमेश्वर हैं। वही मनुष्य आपका ध्यान धर सकता है जिस पर आपकी बख्शिश है। 1। हे प्रभू! आपका नाम (जीवों को संसार-समुंदर से) पार लंघाने के लिए जहाज है। मेरे मन ने एक आपकी ही ओट ली है। हे प्रभू! आपके बिना मुझे कोई और (आसरे वाली) जगह नहीं सूझती। 1। रहाउ। हे मेरे गुरदेव! आपका नाम जप-जप के मैं (यहाँ) आत्मिक जीवन हासिल कर रहा हूँ। आगे भी आपकी हजूरी में मैं (टिकने के योग्य) जगह प्राप्त कर सकूँगा। हे प्रभू! जो मनुष्य आपके नाम में लीन होता है। (उसके अंदर से) दुर्मति दूर हो जाती है। उसके मन से दुख-कलेश और (माया के मोह का) अंधेरा चला जाता है। 2। (जो मनुष्य ये मर्यादा धारण करता है। उसका) प्यार (परमात्मा के) सुंदर चरणों से बन जाता है। (हे भाई! परमात्मा का नाम जपना ही) पूरे गुरू की पवित्र जीवन मर्यादा है डर-रहित प्रभू उसके मन में आ बसता है (इसलिए उसका हरेक) डर दूर हो जाता है। जो मनुष्य अपनी जीभ से आत्मिक जीवन देने वाला नाम नित्य जपता है। 3। (भक्ति के सदका) उनके पहले करोड़ों जन्मों के (माया के) बँधन काटे जाते हैं (जीव यहाँ जगत में हरी-नाम-धन का व्यापार करने आते हैं। प्रभू की भक्ति करने वाले बंदे) सदा कायम रहने वाला हरी-नाम-धन लाभ कमा लेते हैं (उनके पास इस नाम-धन के) कभी ना खत्म होने वाले खजाने (भर जाते हैं जिनमें) कभी घाटा नहीं पड़ता हे नानक! परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा के दर पे शोभा पाते हैं। 4। 23। 34।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

रतन जवेहर नाम ॥

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रामकली महला 5 ॥
रतन जवेहर नाम ॥
सतु संतोखु गिआन ॥
सूख सहज दइआ का पोता ॥ हरि भगता हवालै होता ॥1॥
मेरे राम को भंडारु ॥
खात खरचि कछु तोटि न आवै अंतु नही हरि पारावारु ॥1॥ रहाउ ॥
कीरतनु निरमोलक हीरा ॥
आनंद गुणी गहीरा ॥
अनहद बाणी पूंजी ॥
संतन हथि राखी कूंजी ॥2॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई! प्यारे प्रभू का खजाना ऐसा है जिसमें उसका) नाम (ही) रतन और जवाहरात हैं। उसमें सत-संतोख और ऊँचे आत्मिक जीवन की सूझ कीमती पदार्थ हैं। वह खजाना सुख। आत्मिक अडोलता व दया के श्रोत हैं। पर, वह खजाना परमात्मा के भक्तों के सुपुर्द होया हुआ है। 1। (हे भाई!) प्यारे प्रभू का खजाना (ऐसा है कि उसको) खुद इस्तेमाल करते हुए और औरों को बाँटते हुए (उसमें) कमी नहीं आती। उस परमातमा के खजाने का अंत नहीं मिलता। उसकी हस्ती का उरला-परला छोर नहीं मिलता। 1। रहाउ। (हे भाई! प्यारे प्रभू का खजाना ऐसा है जिसमें उसका) कीर्तन एक ऐसा हीरा है जिसका मूल्य नहीं पड़ सकता (उस कीर्तन की बरकति से) गुणों के मालिक समुंदर-प्रभू (के मिलाप) का आनंद (प्राप्त होता है)। (कीर्तन की बरकति से पैदा हुई) एक-रस जारी रहने वाली सिफत-सालाह की रौंअ (उस खजाने में मनुष्य के लिए) राशि-पूँजी है। (पर, परमात्मा ने इस खजाने की) कूँजी संतों के हाथ में रखी हुई है। 2।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 893 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 893 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।