राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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जब उस कउ कोई देवै मानु ॥ तब आपस ऊपरि रखै गुमानु ॥ जब उस कउ कोई मनि परहरै ॥ तब ओह सेवकि सेवा करै ॥2॥ मुखि बेरावै अंति ठगावै ॥ इकतु ठउर ओह कही न समावै ॥ उनि मोहे बहुते ब्रहमंड ॥ राम जनी कीनी खंड खंड ॥3॥ जो मागै सो भूखा रहै ॥ इसु संगि राचै सु कछू न लहै ॥ इसहि तिआगि सतसंगति करै ॥ वडभागी नानक ओहु तरै ॥4॥18॥29॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! जब कोई मनुष्य उस (माया) को आदर देता है (संभाल-संभाल के रखने का यत्न करता है) तब वह अपने ऊपर बहुत मान करती है (रूठ-रूठ के भाग जाने का प्रयत्न करती है)। पर जब कोई मनुष्य उसको अपने मन से उतार देता है। तब वह उसकी दासी बन के सेवा करती है। 2। हे संत जनो ! (वह माया हरेक प्राणी को) मुँह से परचाती है। पर आखिर धोखा दे जाती है; किसी एक जगह वह कतई नहीं टिकती। उस माया ने अनेकों ब्रहमण्डों (के जीवों) को अपने मोह में फसाया हुआ है। पर संत जनों ने (उसके मोह को) टुकड़े-टुकड़े कर दिया है। 3। हे संत जनो ! जो मनुष्य (हर वक्त माया की मांग ही) मांगता रहता है। वह तृप्त नहीं होता। (उसकी भूख उसकी तृष्णा कभी खत्म नहीं होती)। जो मनुष्य इस माया (के मोह) में ही मस्त रहता है। उसको (आत्मिक जीवन के धन में से) कुछ नहीं मिलता। पर हे नानक ! इस (माया के मोह) को छोड़ के जो मनुष्य भले लोगों की संगति करता है। वह बहुत भाग्यशाली मनुष्य (माया के मोह की रुकावटों से) पार लांघ जाता है। 4। 18। 29।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई !) सर्व-व्यापक परमात्मा को सब जीवों में (बसता) देख। एक परमात्मा ही पूर्ण तौर पर सबमें मौजूद है। हे भाई ! हरी-नाम एक एैसा रतन है जिसका मूल्य नहीं पाया जा सकता। यह रत्न जिसके हृदय में बस रहा है। उसके साथ सांझ डाल। (दुनिया के सारे पदार्थ बेगाने हो जाते हैं। ये हरी-नाम ही) आपकी अपनी चीज है। आप खुद ही इस चीज को पहचान। 1। (हे भाई ! संत जनों की संगति में टिका रह। और) संत-जनों की मेहर से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया कर। पर ये अमृत तब ही मिलता है यदि (मनुष्य के) बड़े भाग्य हैं। इस नाम को जीभ से जपे बिना कोई (इस अमृत-नाम का) क्या स्वाद जान सकता है। 1। रहाउ। (पर हे भाई !) बहरा मनुष्य अठारह पुराण और चार वेद कैसे सुन सकता है। अंधे व्यक्ति को करोड़ों सूरजों की रौशनी भी नहीं दिखाई देती। पशु का प्यार घास से ही होता है। पशु घास से ही खुश रहता है। (जीव माया के मोह में पड़ कर अंधा-बहरा हुआ रहता है। पशू के समान हो जाता है। इसको अपने-आप हरी-नाम की समझ नहीं पड़ सकती। और) जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं समझ ना बख्शे। वह किसी तरह भी समझ नहीं सकता। 2। हे भाई ! सबके दिल की जानने वाला परमात्मा हमेशा हरेक के दिल की जानता है। वह अपने भक्तों से इस तरह मिला रहता है जैसे ताना-पेटा। हे नानक ! जो मनुष्य खुश हो-हो के अपने प्रभू (के गुणों) को गाते रहते हैं। जम दूत उनके नजदीक नहीं आते। 3। 19। 30।
रामकली महला 5 ॥ दीनो नामु कीओ पवितु ॥ हरि धनु रासि निरास इह बितु ॥ काटी बंधि हरि सेवा लाए ॥ हरि हरि भगति राम गुण गाए ॥1॥ बाजे अनहद बाजा ॥ रसकि रसकि गुण गावहि हरि जन अपनै गुरदेवि निवाजा ॥1॥ रहाउ ॥ आइ बनिओ पूरबला भागु ॥ जनम जनम का सोइआ जागु ॥ गई गिलानि साध कै संगि ॥ मनु तनु रातो हरि कै रंगि ॥2॥ राखे राखनहार दइआल ॥ ना किछु सेवा ना किछु घाल ॥ करि किरपा प्रभि कीनी दइआ ॥ बूडत दुख महि काढि लइआ ॥3॥ सुणि सुणि उपजिओ मन महि चाउ ॥ आठ पहर हरि के गुण गाउ ॥ गावत गावत परम गति पाई ॥ गुर प्रसादि नानक लिव लाई ॥4॥20॥31॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू ने परमात्मा का) नाम दे दिया। (उसका जीवन) पवित्र बना दिया। (जिसको गुरू ने) हरी-नाम-धन राशि पूँजी (बख्शी। दुनिया वाला) ये धन (देख के)। वह (इस दुनियावी धन की लालच में नहीं फसता और) उपराम-चित्त रहता है। (गुरू ने जिस मनुष्य के जीवन-राह में से माया के मोह की) रुकावट काट दी। उसको उसने परमात्मा की भक्ति में जोड़ दिया। वह मनुष्य (सदा) परमात्मा की भगती करता है। (सदा) परमात्मा के गुण गाता रहता है। ॥ 1॥ उनके अंदर (इस तरह खिलाव बना रहता है। जैसे उनके अंदर) एक-रस बाजे बज रहे हैं। (हे भाई ! जिन मनुष्यों पर) अपने (प्यारे) गुरदेव ने मेहर की। हरी के वह सेवक बड़े आनंद से हरी के गुण गाते रहते हैं। 1। रहाउ। (संगति के सदका) उसका पहले जन्मों के अच्छे भाग्य मिलने का सबब आ बनता है। (गुरू की संगति की बरकति से माया के मोह की नींद में से) कई जन्मों से सोया हुआ (मन) जाग जाता है। (हे भाई !) गुरू की संगति में (रहने से मनुष्य के अंदर से दूसरों के लिए) नफरत दूर हो जाती है। मनुष्य का मन और तन परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा जाता है। 2। (हे भाई ! गुरू की संगति में रहने से जिस मनुष्य पर) उसको दुखों में डूबते को (प्रभू ने बाँह से पकड़ कर) बचा लिया। प्रभू ने उसकी की हुई सेवा नहीं देखी। कोई मेहनत नहीं देखी। प्रभू ने कृपा की। दया की। (दुखों से) बचाने में समर्था वाले ने दया के श्रोत से उसकी रक्षा की। 3। हे नानक ! (गुरू की संगति में रह के परमात्मा की सिफत सालाह) बार-बार सुन के (जिस मनुष्य के) मन में (सिफत-सालाह करने का) चाव पैदा हो गया। वह आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा के गुण गाने लग पड़ा। (गुण) गाते हुए उसने सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर ली। गुरू की कृपा से उसने (प्रभू के चरणों में) सुरति जोड़ ली। 4। 20। 31।
रामकली महला 5 ॥ कउडी बदलै तिआगै रतनु ॥ छोडि जाइ ताहू का जतनु ॥ सो संचै जो होछी बात ॥ माइआ मोहिआ टेढउ जात ॥1॥ अभागे तै लाज नाही ॥ सुख सागर पूरन परमेसरु हरि न चेतिओ मन माही ॥1॥ रहाउ ॥ अंम्रितु कउरा बिखिआ मीठी ॥ साकत की बिधि नैनहु डीठी ॥ कूड़ि कपटि अहंकारि रीझाना ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (परमात्मा का नाम अमूल्य रत्न है। इसके मुकाबले में माया कौड़ी के बराबर है; पर साकत मनुष्य) कौड़ी की खातिर (कीमती) रतन को छोड़ देता है। उसी की ही प्राप्ति का यत्न करता है जो साथ छोड़ जाती है। उसी (माया) को ही इकट्ठी करता रहता है जिसकी पूछ-प्रतीति थोड़ी सी ही है। माया के मोह में फंसा हुआ (साकत) अकड़-अकड़ के चलता है। 1। हे बद्-नसीब (साकत) ! आपको (कभी ये) शर्म नहीं आती कि जो सर्व-व्यापक परमात्मा सारे सुखों का समुंद्र है उसको आप अपने मन में याद नहीं करता। 1। रहाउ। शाक्त (रॅब से टूटे हुए) को आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (अमृत) कड़वा लगता है और माया मीठी लगती है। (हे भाई !) रॅब से टूटे हुए मनुष्य की (बुरी) हालत (हमने) देखी है। (साकत हमेशा) नाशवंत पदार्थ में। ठॅगी (करने) में और अहंकार में ही खुश रहता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे संत जनो ! जब कोई मनुष्य उस (माया) को आदर देता है (संभाल-संभाल के रखने का यत्न करता है) तब वह अपने ऊपर बहुत मान करती है (रूठ-रूठ के भाग जाने का प्रयत्न करती है)।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।