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अंग 892 · रामकली

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अंग
892
रामकली
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  1. जब उस कउ कोई देवै मानु ॥
  2. आतम रामु सरब महि पेखु ॥
  3. दीनो नामु कीओ पवितु ॥
  4. कउडी बदलै तिआगै रतनु ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

जब उस कउ कोई देवै मानु ॥

अंग 891 से चला आ रहा अंश

जब उस कउ कोई देवै मानु ॥
तब आपस ऊपरि रखै गुमानु ॥
जब उस कउ कोई मनि परहरै ॥
तब ओह सेवकि सेवा करै ॥2॥
मुखि बेरावै अंति ठगावै ॥
इकतु ठउर ओह कही न समावै ॥
उनि मोहे बहुते ब्रहमंड ॥
राम जनी कीनी खंड खंड ॥3॥
जो मागै सो भूखा रहै ॥
इसु संगि राचै सु कछू न लहै ॥
इसहि तिआगि सतसंगति करै ॥
वडभागी नानक ओहु तरै ॥4॥18॥29॥

हिन्दी अर्थ: हे संत जनो! जब कोई मनुष्य उस (माया) को आदर देता है (संभाल-संभाल के रखने का यत्न करता है) तब वह अपने ऊपर बहुत मान करती है (रूठ-रूठ के भाग जाने का प्रयत्न करती है)। पर जब कोई मनुष्य उसको अपने मन से उतार देता है, तब वह उसकी दासी बन के सेवा करती है। 2। हे संत जनो! (वह माया हरेक प्राणी को) मुँह से परचाती है। पर आखिर धोखा दे जाती है; किसी एक जगह वह कतई नहीं टिकती। उस माया ने अनेकों ब्रहमण्डों (के जीवों) को अपने मोह में फसाया हुआ है। पर संत जनों ने (उसके मोह को) टुकड़े-टुकड़े कर दिया है। 3। हे संत जनो! जो मनुष्य (हर वक्त माया की मांग ही) मांगता रहता है। वह तृप्त नहीं होता। (उसकी भूख उसकी तृष्णा कभी खत्म नहीं होती)। जो मनुष्य इस माया (के मोह) में ही मस्त रहता है। उसको (आत्मिक जीवन के धन में से) कुछ नहीं मिलता। पर हे नानक! इस (माया के मोह) को छोड़ के जो मनुष्य भले लोगों की संगति करता है। वह बहुत भाग्यशाली मनुष्य (माया के मोह की रुकावटों से) पार लांघ जाता है। 4। 18। 29।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

आतम रामु सरब महि पेखु ॥

रामकली महला 5 ॥
आतम रामु सरब महि पेखु ॥
पूरन पूरि रहिआ प्रभ एकु ॥
रतनु अमोलु रिदे महि जानु ॥
अपनी वसतु तू आपि पछानु ॥1॥
पी अंम्रितु संतन परसादि ॥
वडे भाग होवहि तउ पाईऐ बिनु जिहवा किआ जाणै सुआदु ॥1॥ रहाउ ॥
अठ दस बेद सुने कह डोरा ॥
कोटि प्रगास न दिसै अंधेरा ॥
पसू परीति घास संगि रचै ॥
जिसु नही बुझावै सो कितु बिधि बुझै ॥2॥
जानणहारु रहिआ प्रभु जानि ॥
ओति पोति भगतन संगानि ॥
बिगसि बिगसि अपुना प्रभु गावहि ॥
नानक तिन जम नेड़ि न आवहि ॥3॥19॥30॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई!) सर्व-व्यापक परमात्मा को सब जीवों में (बसता) देखें। एक परमात्मा ही पूर्ण तौर पर सबमें मौजूद है। हे भाई! हरी-नाम एक एैसा रतन है जिसका मूल्य नहीं पाया जा सकता। यह रत्न जिसके हृदय में बस रहा है। उसके साथ सांझ डालें। (दुनिया के सारे पदार्थ बेगाने हो जाते हैं। ये हरी-नाम ही) आपकी अपनी चीज है। आप खुद ही इस चीज को पहचानें। 1। (हे भाई! संत जनों की संगति में टिके रहें। और) संत-जनों की मेहर से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया करें। पर ये अमृत तब ही मिलता है यदि (मनुष्य के) बड़े भाग्य हैं। इस नाम को जीभ से जपे बिना कोई (इस अमृत-नाम का) क्या स्वाद जान सकता है। 1। रहाउ। (पर हे भाई!) बहरा मनुष्य अठारह पुराण और चार वेद कैसे सुन सकता है। अंधे व्यक्ति को करोड़ों सूरजों की रौशनी भी नहीं दिखाई देती। पशु का प्यार घास से ही होता है। पशु घास से ही खुश रहता है। (जीव माया के मोह में पड़ कर अंधा-बहरा हुआ रहता है। पशू के समान हो जाता है। इसको अपने-आप हरी-नाम की समझ नहीं पड़ सकती। और) जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं समझ ना बख्शे। वह किसी तरह भी समझ नहीं सकता। 2। हे भाई! सबके दिल की जानने वाला परमात्मा हमेशा हरेक के दिल की जानता है। वह अपने भक्तों से इस तरह मिला रहता है जैसे ताना-पेटा। हे नानक! जो मनुष्य खुश हो-हो के अपने प्रभू (के गुणों) को गाते रहते हैं। जम दूत उनके नजदीक नहीं आते। 3। 19। 30।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

दीनो नामु कीओ पवितु ॥

रामकली महला 5 ॥
दीनो नामु कीओ पवितु ॥
हरि धनु रासि निरास इह बितु ॥
काटी बंधि हरि सेवा लाए ॥
हरि हरि भगति राम गुण गाए ॥1॥
बाजे अनहद बाजा ॥
रसकि रसकि गुण गावहि हरि जन अपनै गुरदेवि निवाजा ॥1॥ रहाउ ॥
आइ बनिओ पूरबला भागु ॥
जनम जनम का सोइआ जागु ॥
गई गिलानि साध कै संगि ॥
मनु तनु रातो हरि कै रंगि ॥2॥
राखे राखनहार दइआल ॥
ना किछु सेवा ना किछु घाल ॥
करि किरपा प्रभि कीनी दइआ ॥
बूडत दुख महि काढि लइआ ॥3॥
सुणि सुणि उपजिओ मन महि चाउ ॥
आठ पहर हरि के गुण गाउ ॥
गावत गावत परम गति पाई ॥
गुर प्रसादि नानक लिव लाई ॥4॥20॥31॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई! जिस मनुष्य को गुरू ने परमात्मा का) नाम दे दिया। (उसका जीवन) पवित्र बना दिया। (जिसको गुरू ने) हरी-नाम-धन राशि पूँजी (बख्शी, दुनिया वाला) ये धन (देख के)। वह (इस दुनियावी धन की लालच में नहीं फसता और) उपराम-चित्त रहता है। (गुरू ने जिस मनुष्य के जीवन-राह में से माया के मोह की) रुकावट काट दी। उसको उसने परमात्मा की भक्ति में जोड़ दिया। वह मनुष्य (सदा) परमात्मा की भगती करता है। (सदा) परमात्मा के गुण गाता रहता है। ॥ 1॥ उनके अंदर (इस तरह खिलाव बना रहता है। जैसे उनके अंदर) एक-रस बाजे बज रहे हैं। (हे भाई! जिन मनुष्यों पर) अपने (प्यारे) गुरदेव ने मेहर की। हरी के वह सेवक बड़े आनंद से हरी के गुण गाते रहते हैं। 1। रहाउ। (संगति के सदका) उसका पहले जन्मों के अच्छे भाग्य मिलने का सबब आ बनता है। (गुरू की संगति की बरकति से माया के मोह की नींद में से) कई जन्मों से सोया हुआ (मन) जाग जाता है। (हे भाई!) गुरू की संगति में (रहने से मनुष्य के अंदर से दूसरों के लिए) नफरत दूर हो जाती है। मनुष्य का मन और तन परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा जाता है। 2। (हे भाई! गुरू की संगति में रहने से जिस मनुष्य पर) उसको दुखों में डूबते को (प्रभू ने बाँह से पकड़ कर) बचा लिया। प्रभू ने उसकी की हुई सेवा नहीं देखी। कोई मेहनत नहीं देखी। प्रभू ने कृपा की। दया की। (दुखों से) बचाने में समर्था वाले ने दया के श्रोत से उसकी रक्षा की। 3। हे नानक! (गुरू की संगति में रह के परमात्मा की सिफत सालाह) बार-बार सुन के (जिस मनुष्य के) मन में (सिफत-सालाह करने का) चाव पैदा हो गया। वह आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा के गुण गाने लग पड़ा। (गुण) गाते हुए उसने सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर ली। गुरू की कृपा से उसने (प्रभू के चरणों में) सुरति जोड़ ली। 4। 20। 31।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

कउडी बदलै तिआगै रतनु ॥

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रामकली महला 5 ॥
कउडी बदलै तिआगै रतनु ॥
छोडि जाइ ताहू का जतनु ॥
सो संचै जो होछी बात ॥
माइआ मोहिआ टेढउ जात ॥1॥
अभागे तै लाज नाही ॥
सुख सागर पूरन परमेसरु हरि न चेतिओ मन माही ॥1॥ रहाउ ॥
अंम्रितु कउरा बिखिआ मीठी ॥
साकत की बिधि नैनहु डीठी ॥
कूड़ि कपटि अहंकारि रीझाना ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (परमात्मा का नाम अमूल्य रत्न है। इसके मुकाबले में माया कौड़ी के बराबर है; पर साकत मनुष्य) कौड़ी की खातिर (कीमती) रतन को छोड़ देता है। उसी की ही प्राप्ति का यत्न करता है जो साथ छोड़ जाती है। उसी (माया) को ही इकट्ठी करता रहता है जिसकी पूछ-प्रतीति थोड़ी सी ही है। माया के मोह में फंसा हुआ (साकत) अकड़-अकड़ के चलता है। 1। हे बद्-नसीब (साकत)! आपको (कभी ये) शर्म नहीं आती कि जो सर्व-व्यापक परमात्मा सारे सुखों का समुंद्र है उसको आप अपने मन में याद नहीं करते। 1। रहाउ। शाक्त (रॅब से टूटे हुए) को आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (अमृत) कड़वा लगता है और माया मीठी लगती है। (हे भाई!) रॅब से टूटे हुए मनुष्य की (बुरी) हालत (हमने) देखी है। (साकत हमेशा) नाशवंत पदार्थ में। ठॅगी (करने) में और अहंकार में ही खुश रहता है।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 892 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 892 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।