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अंग 891 · रामकली

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अंग
891
रामकली
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  1. सहज समाधि धुनि गहिर गंभीरा ॥
  2. बीज मंत्रु हरि कीरतनु गाउ ॥
  3. संत कै संगि राम रंग केल ॥
  4. गहु करि पकरी न आई हाथि ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

सहज समाधि धुनि गहिर गंभीरा ॥

अंग 890 से चला आ रहा अंश

सहज समाधि धुनि गहिर गंभीरा ॥
सदा मुकतु ता के पूरे काम ॥
जा कै रिदै वसै हरि नाम ॥2॥
सगल सूख आनंद अरोग ॥
समदरसी पूरन निरजोग ॥
आइ न जाइ डोलै कत नाही ॥
जा कै नामु बसै मन माही ॥3॥
दीन दइआल गोुपाल गोविंद ॥
गुरमुखि जपीऐ उतरै चिंद ॥
नानक कउ गुरि दीआ नामु ॥
संतन की टहल संत का कामु ॥4॥15॥26॥

हिन्दी अर्थ: सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। प्रभू में उसकी गहरी लगन टिकी रहती है। वह सदैव विकारों से आजाद रहता है। उसके सारे काम सफलहो जाते हैं। जिसके हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है। 2। उसको सारे सुख-आनंद प्राप्त रहते हैं। वह (मानसिक) रोगों से बचा रहता है। (माया के प्रभाव से वह) पूरी तौर पर निर्लिप रहता है। सब में परमात्मा की एक ज्योति देखता है। वह कहीं भटकता नहीं। कहीं डोलता नहीं। (हे भाई!) जिस मनुष्य के मन में हरी-नाम आ बसता है। 3। दीनों पर दया करने वाले गोपाल गोविंद का नाम (हे भाई!) गुरू की शरण पड़ कर जपना चाहिए। (जो मनुष्य जपता है। उसकी) चिंता-फिक्र दूर हो जाती है। (हे भाई! मुझे) नानक को गुरू ने प्रभू का नाम बख्शा है। संत जनों की टहल (की दाति) दी है। (हरी-नाम का सिमरन ही) गुरू का (बताया हुआ) काम है। 4। 15। 26।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

बीज मंत्रु हरि कीरतनु गाउ ॥

रामकली महला 5 ॥
बीज मंत्रु हरि कीरतनु गाउ ॥
आगै मिली निथावे थाउ ॥
गुर पूरे की चरणी लागु ॥
जनम जनम का सोइआ जागु ॥1॥
हरि हरि जापु जपला ॥
गुर किरपा ते हिरदै वासै भउजलु पारि परला ॥1॥ रहाउ ॥
नामु निधानु धिआइ मन अटल ॥
ता छूटहि माइआ के पटल ॥
गुर का सबदु अंम्रित रसु पीउ ॥
ता तेरा होइ निरमल जीउ ॥2॥
सोधत सोधत सोधि बीचारा ॥
बिनु हरि भगति नही छुटकारा ॥
सो हरि भजनु साध कै संगि ॥
मनु तनु रापै हरि कै रंगि ॥3॥
छोडि सिआणप बहु चतुराई ॥
मन बिनु हरि नावै जाइ न काई ॥
दइआ धारी गोविद गोुसाई ॥
हरि हरि नानक टेक टिकाई ॥4॥16॥27॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई!) परमात्मा की सिफत (के गीत) गाया करें (परमात्मा को वश में करने का) यह सबसे श्रेष्ठ मंत्र है। (कीर्तन की बरकति से) परलोक में निआसरे जीवों को भी आसरा मिल जाता है। (हे भाई!) पूरे गुरू के चरणों में पड़े रहें। इस तरह कई जन्मों से (माया के मोह की) नींद में सोए हुए आप जाग पड़ेंगे। 1। (हे भाई! जिस मनुष्य ने) परमात्मा (के नाम) का जाप किया। (जिस मनुष्य के) हृदय में गुरू की कृपा से (परमात्मा का नाम) आ बसता है। वह संसार-समुंद्र से पार लांघ गया। 1। रहाउ। हे मन! परमात्मा का नाम कभी ना समाप्त होने वाला खजाना है। इसको सिमरते रहें। तब ही आपके माया (के मोह) के पर्दे फटेंगे। हे मन! गुरू का शबद आत्मिक जीवन देने वाला रस है। इसको पीते रहें। तब ही आपकी जीवात्मा पवित्र होगी। 2। हे मन! हमने बहुत विचार-विचार करके ये निर्णय निकाला है कि परमात्मा की भक्ति के बिना (माया के मोह से) खलासी नहीं हो सकती। प्रभू की वह भगती गुरू की संगति में (प्राप्त होती है। जिसको प्राप्त होती है। उसका) मन और तन परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा जाता है। 3। हे मन! (अपनी) समझदारी और अत्यधिक चतुराई को छोड़ दें। (जैसे काई लगने के कारण जमीन में पानी नहीं जा पाता, वैसे ही अहंकार के कारण गुरू के उपदेश का असर नहीं होता)। परमात्मा के नाम के बिना ये (अहंकार रूपी) काई दूर नहीं होती। हे नानक! (कहें:) जिस मनुष्य पर धरती का पति प्रभू दया करता है। वह मनुष्य परमात्मा के नाम का आसरा लेता है। 4। 16। 27।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

संत कै संगि राम रंग केल ॥

रामकली महला 5 ॥
संत कै संगि राम रंग केल ॥
आगै जम सिउ होइ न मेल ॥
अहंबुधि का भइआ बिनास ॥
दुरमति होई सगली नास ॥1॥
राम नाम गुण गाइ पंडित ॥
करम कांड अहंकारु न काजै कुसल सेती घरि जाहि पंडित ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का जसु निधि लीआ लाभ ॥
पूरन भए मनोरथ साभ ॥
दुखु नाठा सुखु घर महि आइआ ॥
संत प्रसादि कमलु बिगसाइआ ॥2॥
नाम रतनु जिनि पाइआ दानु ॥
तिसु जन होए सगल निधान ॥
संतोखु आइआ मनि पूरा पाइ ॥
फिरि फिरि मागन काहे जाइ ॥3॥
हरि की कथा सुनत पवित ॥
जिहवा बकत पाई गति मति ॥
सो परवाणु जिसु रिदै वसाई ॥
नानक ते जन ऊतम भाई ॥4॥17॥28॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे पण्डित! गुरू की संगति में रह के परमात्मा के प्रेम का खेल खेला करें। आगे परलोक में आपका जमों से सामना नहीं होगा। (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसकी) अहंकार वाली बुद्धि का नाश हो जाता है। उसके अंदर से सारी दुर्मति समाप्त हो जाती है। 1। हे पण्डित! परमात्मा का नाम (जपा करें। परमात्मा के) गुण गाया करें। हे पण्डित! तीर्थ-स्नान आदि मिथे हुए धार्मिक कामों के सिलसिले का अहंकार आपके किसी काम नहीं आएगा। (परमात्मा के गुण गा कर) आप आनंद से (जीवन व्यतीत करते हुए प्रभू-चरनों वाले असल) घर में जा पहुँचेंगे। 1। रहाउ। हे पण्डित! जिस व्यक्ति ने परमात्मा की सिफतसालाह का खजाना पा लिया। उसके सारे मनोरथ पूरे हो गए। उसका (सारा) दुख दूर हो गया। उसके हृदय-घर में सुख आ बसा। संत-गुरू की कृपा से उसके हृदय का कमल-पुष्प खिल उठा। 2। (हे पण्डित! आप जजमानों से दान माँगते फिरते हैं। पर) जिस मनुष्य ने (गुरू से) परमात्मा का नाम-रत्न-दान पा लिया है। उसको (मानो) सारे ही खजाने मिल गए। मन में पूर्ण-प्रभू को पाकर के उसके अंदर संतोख पैदा हो गया। फिर वह बार-बार (जजमानों से) माँगने क्यों जाएगा। 3। हे नानक! (कहें-हे पण्डित!) परमात्मा की सिफत-सालाह की बातें सुनने से (जीवन) पवित्र हो जाता है। जीभ से उचारने से उच्च आत्मिक अवस्था और सद्बुद्धि प्राप्त हो जाती है। हे पण्डित! जिस मनुष्य के हृदय में (गुरू। परमात्मा की सिफत-सालाह) बसा देता है वह मनुष्य (परमात्मा के दर पर) कबूल हो जाता है। हे भाई! प्रभू की सिफत-सालाह करने वाले वह बंदे ऊँचे जीवन वाले बन जाते हैं। 4। 17। 28।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

गहु करि पकरी न आई हाथि ॥

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रामकली महला 5 ॥
गहु करि पकरी न आई हाथि ॥
प्रीति करी चाली नही साथि ॥
कहु नानक जउ तिआगि दई ॥
तब ओह चरणी आइ पई ॥1॥
सुणि संतहु निरमल बीचार ॥
राम नाम बिनु गति नही काई गुरु पूरा भेटत उधार ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे संत जनो! जिस मनुष्य ने इस माया को) बड़े ध्यान से भी पकड़ा। उसके भी हाथ में ना आई। जिसने (इससे) बड़ा प्यार भी किया। उसके साथ भी मिल के ये ना चली (साथ ना निभा सकी)। हे नानक! कहें: जब किसी मनुष्य ने इसको (मन से) छोड़ दिया, तब ये उसके चरणों में आ पड़ी। 1। हे संत जनो! जीवन को पवित्र करने वाली ये विचार सुनें, परमात्मा के नाम के बिना ऊँची आत्मिक अवस्था बिल्कुल ही नहीं होती। (पर, नाम गुरू से ही मिलता है) पूरा गुरू मिलने से (माया के मोह से मुक्ति हो के) पार-उतारा हो जाता है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 891 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 891 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।