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अंग 891

अंग
891
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सहज समाधि धुनि गहिर गंभीरा ॥
सदा मुकतु ता के पूरे काम ॥
जा कै रिदै वसै हरि नाम ॥2॥
सगल सूख आनंद अरोग ॥
समदरसी पूरन निरजोग ॥
आइ न जाइ डोलै कत नाही ॥
जा कै नामु बसै मन माही ॥3॥
दीन दइआल गोुपाल गोविंद ॥
गुरमुखि जपीऐ उतरै चिंद ॥
नानक कउ गुरि दीआ नामु ॥
संतन की टहल संत का कामु ॥4॥15॥26॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। प्रभू में उसकी गहरी लगन टिकी रहती है। वह सदैव विकारों से आजाद रहता है। उसके सारे काम सफलहो जाते हैं। जिसके हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है। 2। उसको सारे सुख-आनंद प्राप्त रहते हैं। वह (मानसिक) रोगों से बचा रहता है। (माया के प्रभाव से वह) पूरी तौर पर निर्लिप रहता है। सब में परमात्मा की एक ज्योति देखता है। वह कहीं भटकता नहीं। कहीं डोलता नहीं। (हे भाई !) जिस मनुष्य के मन में हरी-नाम आ बसता है। 3। दीनों पर दया करने वाले गोपाल गोविंद का नाम (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर जपना चाहिए। (जो मनुष्य जपता है। उसकी) चिंता-फिक्र दूर हो जाती है। (हे भाई ! मुझे) नानक को गुरू ने प्रभू का नाम बख्शा है। संत जनों की टहल (की दाति) दी है। (हरी-नाम का सिमरन ही) गुरू का (बताया हुआ) काम है। 4। 15। 26।
रामकली महला 5 ॥
बीज मंत्रु हरि कीरतनु गाउ ॥
आगै मिली निथावे थाउ ॥
गुर पूरे की चरणी लागु ॥
जनम जनम का सोइआ जागु ॥1॥
हरि हरि जापु जपला ॥
गुर किरपा ते हिरदै वासै भउजलु पारि परला ॥1॥ रहाउ ॥
नामु निधानु धिआइ मन अटल ॥
ता छूटहि माइआ के पटल ॥
गुर का सबदु अंम्रित रसु पीउ ॥
ता तेरा होइ निरमल जीउ ॥2॥
सोधत सोधत सोधि बीचारा ॥
बिनु हरि भगति नही छुटकारा ॥
सो हरि भजनु साध कै संगि ॥
मनु तनु रापै हरि कै रंगि ॥3॥
छोडि सिआणप बहु चतुराई ॥
मन बिनु हरि नावै जाइ न काई ॥
दइआ धारी गोविद गोुसाई ॥
हरि हरि नानक टेक टिकाई ॥4॥16॥27॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा की सिफत (के गीत) गाया करो (परमात्मा को वश में करने का) यह सबसे श्रेष्ठ मंत्र है। (कीर्तन की बरकति से) परलोक में निआसरे जीवों को भी आसरा मिल जाता है। (हे भाई !) पूरे गुरू के चरणों में पड़ा रह। इस तरह कई जन्मों से (माया के मोह की) नींद में सोया हुआ आप जाग पड़ेगा। 1। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने) परमात्मा (के नाम) का जाप किया। (जिस मनुष्य के) हृदय में गुरू की कृपा से (परमात्मा का नाम) आ बसता है। वह संसार-समुंद्र से पार लांघ गया। 1। रहाउ। हे मन ! परमात्मा का नाम कभी ना समाप्त होने वाला खजाना है। इसको सिमरते रहो। तब ही आपके माया (के मोह) के पर्दे फटेंगे। हे मन ! गुरू का शबद आत्मिक जीवन देने वाला रस है। इसको पीता रह। तब ही आपकी जीवात्मा पवित्र होगी। 2। हे मन ! हमने बहुत विचार-विचार करके ये निर्णय निकाला है कि परमात्मा की भक्ति के बिना (माया के मोह से) खलासी नहीं हो सकती। प्रभू की वह भगती गुरू की संगति में (प्राप्त होती है। जिसको प्राप्त होती है। उसका) मन और तन परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा जाता है। 3। हे मन ! (अपनी) समझदारी और बहती चतुराई को छोड़ दे। (जैसे काई लगने के कारण जमीन में पानी नहीं जा पाता। वैसे ही अहंकार के कारण गुरू के उपदेश का असर नहीं होता)। परमात्मा के नाम के बिना ये (अहंकार रूपी) काई दूर नहीं होती। हे नानक ! (कह-) जिस मनुष्य पर धरती का पति प्रभू दया करता है। वह मनुष्य परमात्मा के नाम का आसरा लेता है। 4। 16। 17।
रामकली महला 5 ॥
संत कै संगि राम रंग केल ॥
आगै जम सिउ होइ न मेल ॥
अहंबुधि का भइआ बिनास ॥
दुरमति होई सगली नास ॥1॥
राम नाम गुण गाइ पंडित ॥
करम कांड अहंकारु न काजै कुसल सेती घरि जाहि पंडित ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का जसु निधि लीआ लाभ ॥
पूरन भए मनोरथ साभ ॥
दुखु नाठा सुखु घर महि आइआ ॥
संत प्रसादि कमलु बिगसाइआ ॥2॥
नाम रतनु जिनि पाइआ दानु ॥
तिसु जन होए सगल निधान ॥
संतोखु आइआ मनि पूरा पाइ ॥
फिरि फिरि मागन काहे जाइ ॥3॥
हरि की कथा सुनत पवित ॥
जिहवा बकत पाई गति मति ॥
सो परवाणु जिसु रिदै वसाई ॥
नानक ते जन ऊतम भाई ॥4॥17॥28॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे पण्डित ! गुरू की संगति में रह के परमात्मा के प्रेम का खेल खेला कर। आगे परलोक में आपका जमों से सामना नहीं होंगे। (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसकी) अहंकार वाली बुद्धि का नाश हो जाता है। उसके अंदर से सारी दुर्मति समाप्त हो जाती है। 1। हे पण्डित ! परमात्मा का नाम (जपा कर। परमात्मा के) गुण गाया कर। हे पण्डित ! तीर्थ-स्नान आदि मिथे हुए धार्मिक कामों के सिलसिले का अहंकार आपके किसी काम नहीं आएगा। (परमात्मा के गुण गा कर) आप आनंद से (जीवन व्यतीत करता हुआ प्रभू-चरनों वाले असल) घर में जा पहुँचेगा। 1। रहाउ। हे पण्डित ! जिस व्यक्ति ने परतात्मा की सिफतसालाह का खजाना पा लिया। उसके सारे मनोरथ पूरे हो गए। उसका (सारा) दुख दूर हो गया। उसके हृदय-घर में सुख आ बसा। संत-गुरू की कृपा से उसके हृदय का कमल-पुष्प खिल उठा। 2। (हे पण्डित ! आप जजमानों से दान माँगता फिरता है। पर) जिस मनुष्य ने (गुरू से) परमात्मा का नाम-रत्न-दान पा लिया है। उसको (मानो) सारे ही खजाने मिल गए। मन में पूर्ण-प्रभू को पाकर के उसके अंदर संतोख पैदा हो गया। फिर वह बार-बार (जजमानों से) माँगने क्यों जाएगा। 3। हे नानक ! (कह-हे पण्डित !) परमात्मा की सिफत-सालाह की बातें सुनने से (जीवन) पवित्र हो जाता है। जीभ से उचारने से उच्च आत्मिक अवस्था और सद्बुद्धि प्राप्त हो जाती है। हे पण्डित ! जिस मनुष्य के हृदय में (गुरू। परमात्मा की सिफत-सालाह) बसा देता है वह मनुष्य (परमात्मा के दर पर) कबूल हो जाता है। हे भाई ! प्रभू की सिफत-सालाह करने वाले वह बंदे ऊँचे जीवन वाले बन जाते हैं। 4। 17। 28।
रामकली महला 5 ॥
गहु करि पकरी न आई हाथि ॥
प्रीति करी चाली नही साथि ॥
कहु नानक जउ तिआगि दई ॥
तब ओह चरणी आइ पई ॥1॥
सुणि संतहु निरमल बीचार ॥
राम नाम बिनु गति नही काई गुरु पूरा भेटत उधार ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे संत जनो ! जिस मनुष्य ने इस माया को) बड़े ध्यान से भी पकड़ा। उसके भी हाथ में ना आई। जिसने (इससे) बड़ा प्यार भी किया। उसके साथ भी मिल के ये ना चली (साथ ना निभा सकी)। हे नानक ! कह- जब किसी मनुष्य ने इसको (मन से) छोड़ दिया। तब ये उसके चरणों में आ पड़ी। 1। हे संत जनो ! जीवन को पवित्र करने वाली ये विचार सुनो- परमात्मा के नाम के बिना ऊँची आत्मिक अवस्था बिल्कुल ही नहीं होती। (पर। नाम गुरू से ही मिलता है) पूरा गुरू मिलने से (माया के मोह से मुक्ति हो के) पार-उतारा हो जाता है। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।