अंग
890
रामकली
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
त्रितीअ बिवसथा सिंचे माइ ॥
बिरधि भइआ छोडि चलिओ पछुताइ ॥2॥
चिरंकाल पाई द्रुलभ देह ॥
नाम बिहूणी होई खेह ॥
पसू परेत मुगध ते बुरी ॥
तिसहि न बूझै जिनि एह सिरी ॥3॥
सुणि करतार गोविंद गोपाल ॥
दीन दइआल सदा किरपाल ॥
तुमहि छडावहु छुटकहि बंध ॥
बखसि मिलावहु नानक जग अंध ॥4॥12॥23॥
बिरधि भइआ छोडि चलिओ पछुताइ ॥2॥
चिरंकाल पाई द्रुलभ देह ॥
नाम बिहूणी होई खेह ॥
पसू परेत मुगध ते बुरी ॥
तिसहि न बूझै जिनि एह सिरी ॥3॥
सुणि करतार गोविंद गोपाल ॥
दीन दइआल सदा किरपाल ॥
तुमहि छडावहु छुटकहि बंध ॥
बखसि मिलावहु नानक जग अंध ॥4॥12॥23॥
हिन्दी अर्थ: (जवानी गुजर जाने पर) उम्र के तीसरे पड़ाव में माया जोड़ने लग जाता है। (आखिर जब) बुड्ढा हो जाता है तो अफसोस करते हुए (संचित किए हुए धन को) छोड़ के (यहाँ से) चला जाता है। 2। (हे भाई !) बड़े चिरों बाद जीव को ये दुर्लभ मानुख देह मिलती है। पर नाम से वंचित रह के ये शरीर मिट्टी हो जाता है। (नाम के बिना। विकारों के कारण) मूर्ख जीव की ये देही पशुओं और प्रेतों से भी बुरी (समझें)। जिस परमात्मा ने (इसकी) ये मनुष्य देह बनाई उसको कभी याद नहीं करता। 3। हे करतार ! हे गोबिंद ! हे गोपाल ! हे दीनों पर दया करने वाले ! हे सदा ही कृपा के श्रोत ! आप खुद ही जीवों के माया के बँधन तोड़े तब ही टूट सकते हैं। हे नानक ! (कह-) बेचारे जीव भी क्या करें। हे करतार ! (माया के मोह में) अंधे हुए इस जगत को तूने खुद ही मेहर करके (अपने चरणों में) जोड़े रख। 4। 12। 23।
रामकली महला 5 ॥
करि संजोगु बनाई काछि ॥
तिसु संगि रहिओ इआना राचि ॥
प्रतिपारै नित सारि समारै ॥
अंत की बार ऊठि सिधारै ॥1॥
नाम बिना सभु झूठु परानी ॥
गोविद भजन बिनु अवर संगि राते ते सभि माइआ मूठु परानी ॥1॥ रहाउ ॥
तीरथ नाइ न उतरसि मैलु ॥
करम धरम सभि हउमै फैलु ॥
लोक पचारै गति नही होइ ॥
नाम बिहूणे चलसहि रोइ ॥2॥
बिनु हरि नाम न टूटसि पटल ॥
सोधे सासत्र सिम्रिति सगल ॥
सो नामु जपै जिसु आपि जपाए ॥
सगल फला से सूखि समाए ॥3॥
राखनहारे राखहु आपि ॥
सगल सुखा प्रभ तुमरै हाथि ॥
जितु लावहि तितु लागह सुआमी ॥
नानक साहिबु अंतरजामी ॥4॥13॥24॥
करि संजोगु बनाई काछि ॥
तिसु संगि रहिओ इआना राचि ॥
प्रतिपारै नित सारि समारै ॥
अंत की बार ऊठि सिधारै ॥1॥
नाम बिना सभु झूठु परानी ॥
गोविद भजन बिनु अवर संगि राते ते सभि माइआ मूठु परानी ॥1॥ रहाउ ॥
तीरथ नाइ न उतरसि मैलु ॥
करम धरम सभि हउमै फैलु ॥
लोक पचारै गति नही होइ ॥
नाम बिहूणे चलसहि रोइ ॥2॥
बिनु हरि नाम न टूटसि पटल ॥
सोधे सासत्र सिम्रिति सगल ॥
सो नामु जपै जिसु आपि जपाए ॥
सगल फला से सूखि समाए ॥3॥
राखनहारे राखहु आपि ॥
सगल सुखा प्रभ तुमरै हाथि ॥
जितु लावहि तितु लागह सुआमी ॥
नानक साहिबु अंतरजामी ॥4॥13॥24॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (जैसे कोई दर्जी कपड़ा नाप-काट के मनुष्य के शरीर के लिए कमीज वगैरह बनाता है वैसे ही परमात्मा ने जिंद और शरीर के) मिलाप (का अवसर) बना के (जीवात्मा के लिए शरीर-चोली) नाप-काट के बना दी। उस (शरीर-चोली) के साथ बेसमझ जीव उलझा रहता है। सदा इस शरीर को पालता-पोसता रहता है। और सदा इसकी सांभ-संभाल करता रहता है। अंत के समय जीव (इसको छोड़ के) उठ चलता है। 1। हे जीव ! परमात्मा के नाम के बिना यह सारा आडंबर नाशवंत है। हे प्राणी ! जो लोग परमात्मा के भजन के बिना और पदार्थों के साथ मस्त रहते हैं। वह सारे माया (के मोह) में ठगे जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! माया के मोह की यह) मैल तीर्थों पर स्नान करके नहीं उतरेगी। (तीर्थ-स्नान आदि ये) सारे (मिथे हुए) धार्मिक कर्म अहंकार का पसारा ही हैं। (तीर्थ-स्नान कर्मों के द्वारा अपने धार्मिक होने की बाबत) लोगों तसल्ली कराने से उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती। परमात्मा के नाम से वंचित जीव (यहाँ से) दुखी हो हो के ही जाएंगे। 2। (हे भाई !) परमात्मा के नाम के बिना (माया के मोह का) पर्दा नहीं टूटेगा। सारे ही शास्त्र और स्मृतियाँ विचारने से भी (ये पर्दा दूर नहीं होगा)। पर वही सख्श नाम जपता है जिसको प्रभू स्वयं नाम जपने के लिए प्रेरित करता है। (जो लोग नाम जपते हैं) उनको (मनुष्य जीवन के) सारे फल प्राप्त होते हैं। वह लोग (सदा) आनंद में टिके रहते हैं। 3। हे सबकी रक्षा करने के समर्थ प्रभू ! आप खुद ही (माया के मोह से हम जीवों की) रक्षा कर सकता है। हे प्रभू ! सारे सुख आपके अपने हाथ में हैं। हे मालिक प्रभू ! आप जिस काम में (हमें) लगाता है। हम उसी काम में लग पड़ते हैं। हे नानक ! (कह-) मालिक प्रभू सबके दिलों की जानने वाला है। 4। 13। 24।
रामकली महला 5 ॥
जो किछु करै सोई सुखु जाना ॥
मनु असमझु साधसंगि पतीआना ॥
डोलन ते चूका ठहराइआ ॥
सति माहि ले सति समाइआ ॥1॥
दूखु गइआ सभु रोगु गइआ ॥
प्रभ की आगिआ मन महि मानी महा पुरख का संगु भइआ ॥1॥ रहाउ ॥
सगल पवित्र सरब निरमला ॥
जो वरताए सोई भला ॥
जह राखै सोई मुकति थानु ॥
जो जपाए सोई नामु ॥2॥
अठसठि तीरथ जह साध पग धरहि ॥
तह बैकुंठु जह नामु उचरहि ॥
सरब अनंद जब दरसनु पाईऐ ॥
राम गुणा नित नित हरि गाईऐ ॥3॥
आपे घटि घटि रहिआ बिआपि ॥
दइआल पुरख परगट परताप ॥
कपट खुलाने भ्रम नाठे दूरे ॥
नानक कउ गुर भेटे पूरे ॥4॥14॥25॥
जो किछु करै सोई सुखु जाना ॥
मनु असमझु साधसंगि पतीआना ॥
डोलन ते चूका ठहराइआ ॥
सति माहि ले सति समाइआ ॥1॥
दूखु गइआ सभु रोगु गइआ ॥
प्रभ की आगिआ मन महि मानी महा पुरख का संगु भइआ ॥1॥ रहाउ ॥
सगल पवित्र सरब निरमला ॥
जो वरताए सोई भला ॥
जह राखै सोई मुकति थानु ॥
जो जपाए सोई नामु ॥2॥
अठसठि तीरथ जह साध पग धरहि ॥
तह बैकुंठु जह नामु उचरहि ॥
सरब अनंद जब दरसनु पाईऐ ॥
राम गुणा नित नित हरि गाईऐ ॥3॥
आपे घटि घटि रहिआ बिआपि ॥
दइआल पुरख परगट परताप ॥
कपट खुलाने भ्रम नाठे दूरे ॥
नानक कउ गुर भेटे पूरे ॥4॥14॥25॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ जो कुछ परमात्मा करता है उसी को ही वह सुख समझता है। उसका (पहला) बेसमझ मन गुरू की संगति में पतीज जाता है; (गुरू की कृपा से प्रभू-चरणों में) टिकाया हुआ उसका मन डोलने से हट जाता है। (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू का मिलाप हो जाता है। वह) सदा-स्थिर-प्रभू (का नाम) ले कर उस सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है ।1। उसका सारा दुख सारे रोग दूर हो जाते हैं। प्रभू की रजा उसको मीठी लगने लग जाती है। (हे भाई !) जिस मनुष्य को गुरू का मिलाप हो जाता है।1। रहाउ। उस मनुष्य के सारे उद्यम पवित्र होते हैं उसके सारे काम निर्मल होते हैं। जो कुछ परमात्मा करता है। उस मनुष्य को वही वही काम भले लगते हैं। (गुरू) जहाँ उसको रखता है वही उसके लिए विकारों से मुक्ति की जगह होती है; (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू का मिलाप हो जाता है। गुरू) उससे परमात्मा का नाम ही सदा जपाता है; 2। (हे भाई !) जहाँ गुरमुखि व्यक्ति (अपने) पैर रखते हैं वह स्थान अढ़सठ तीर्थ समझो। (क्योंकि) जहाँ संतजन परमात्मा का नाम उचारते हैं वह जगह सचखंड बन जाती है। जब गुरमुखों के दर्शन किए जाते हैं तब सारे आत्मिक आनंद प्राप्त हो जाते हैं। (गुरमुखों की संगति में) सदा परमात्मा के गुण गाए जा सकते हैं। सदा प्रभू की सिफतसालाह गाई जा सकती है। 3। (अब नानक को दिखाई दे रहा है कि) परमात्मा खुद ही हरेक शरीर में मौजूद है। दया के श्रोत अकाल-पुरख का तेज-प्रताप प्रत्यक्ष (हर जगह दिखाई दे रहा है); (गुरू की कृपा से मन के) किवाड़ खुल गए हैं। और सारे भरम कहीं दूर भाग गए हैं (हे भाई !) नानक को पूरे गुरू जी मिल गए हैं। 4। 14। 24।
रामकली महला 5 ॥
कोटि जाप ताप बिस्राम ॥
रिधि बुधि सिधि सुर गिआन ॥
अनिक रूप रंग भोग रसै ॥
गुरमुखि नामु निमख रिदै वसै ॥1॥
हरि के नाम की वडिआई ॥
कीमति कहणु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
सूरबीर धीरज मति पूरा ॥
कोटि जाप ताप बिस्राम ॥
रिधि बुधि सिधि सुर गिआन ॥
अनिक रूप रंग भोग रसै ॥
गुरमुखि नामु निमख रिदै वसै ॥1॥
हरि के नाम की वडिआई ॥
कीमति कहणु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
सूरबीर धीरज मति पूरा ॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ करोड़ों जपों-तपों (का फल उसके अंदर) आ बसता है। उसकी बुद्धि (ऊँची हो जाती है) वह रिद्धियों-सिद्धियों (का मालिक हो जाता है); उस व्यक्ति की देवताओं वाली सूझ-बूझ हो जाती है। वह (मानो) अनेकों रूपों-रंगों और मायावी पदार्थों का रस लेता है। (हे भाई !) गुरू के द्वारा (जिस मनुष्य के) हृदय में आँख झपकने जितने समय के लिए भी हरी-नाम बसता है।1। (हे भाई !) परमात्मा के नाम की महत्वता बयान नहीं की जा सकती। हरी-नाम का मूल्य नहीं आँका जा सकता। 1। रहाउ। (हे भाई !) वह मनुष्य (विकारों के मुकाबले में) शूरवीर व बहादुर है। सम्पूर्ण बुध्दि व धैर्य का स्वामी है।
इस पन्ने का रूप: देवनागरी लिप्यन्तरण के साथ हिन्दी अर्थ। हिन्दी अर्थ का उपलब्ध आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी, रचना-शीर्षक और दूसरे अनुवाद के लिए ऊपर दिए स्रोत साथ रखिए।
यह रामकली राग के क्रम का अंग 890 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
मूल गुरमुखी और विस्तृत अर्थ के लिए प्रोफ़ेसर साहिब सिंह का गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 890 देखिए। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ यही अंग संत सिंह खालसा के पाठ में भी उपलब्ध है। किसी शबद की शुरुआत या समापन पास के अंग पर हो तो उसे साथ खोल लीजिए।