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अंग 889

अंग
889
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
निहचल आसनु बेसुमारु ॥2॥
डिगि न डोलै कतहू न धावै ॥
गुर प्रसादि को इहु महलु पावै ॥
भ्रम भै मोह न माइआ जाल ॥
सुंन समाधि प्रभू किरपाल ॥3॥
ता का अंतु न पारावारु ॥
आपे गुपतु आपे पासारु ॥
जा कै अंतरि हरि हरि सुआदु ॥
कहनु न जाई नानक बिसमादु ॥4॥9॥20॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! उस आत्मिक अवस्था का आसन (माया के आगे) कभी डोलता नहीं। वह अवस्था कैसी है- इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 2। हे भाई ! उस अवस्था में पहुँचा हुआ मनुष्य (माया के मोह में) गिर के डाँवाडोल नहीं होता। (उस ठिकाने को छोड़ के) किसी और के पास नहीं भटकता। पर कोई विरला मनुष्य गुरू की कृपा से वह ठिकाना हासिल करता है। वहाँ दुनियां की भटकनें। दुनियां के डर। माया का मोह। माया के जाल- ये कोई भी छू नहीं सकते। कृपा के श्रोत प्रभू में मनुष्य की ऐसी सुरति जुड़ती है कि कोई भी मायावी विचार नजदीक नहीं फटकता। 3। जिसका अंत नहीं पाया जा सकता। जिसके स्वरूप का इसपार-उस पार का किनारा नहीं दिख सकता। उसको यह जगत-पसारा उस प्रभू का अपना ही रूप दिखता है। इस जगत-पसारे में वह प्रभू खुद ही छुपा हुआ दिखता है। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के नाम का स्वाद टिक जाता है। हे नानक ! हरी के नाम के स्वाद का बयान नहीं किया जा सकता। वह स्वाद अद्भुत ही होता है। 4। 9। 20।
रामकली महला 5 ॥
भेटत संगि पारब्रहमु चिति आइआ ॥
संगति करत संतोखु मनि पाइआ ॥
संतह चरन माथा मेरो पउत ॥
अनिक बार संतह डंडउत ॥1॥
इहु मनु संतन कै बलिहारी ॥
जा की ओट गही सुखु पाइआ राखे किरपा धारी ॥1॥ रहाउ ॥
संतह चरण धोइ धोइ पीवा ॥
संतह दरसु पेखि पेखि जीवा ॥
संतह की मेरै मनि आस ॥
संत हमारी निरमल रासि ॥2॥
संत हमारा राखिआ पड़दा ॥
संत प्रसादि मोहि कबहू न कड़दा ॥
संतह संगु दीआ किरपाल ॥
संत सहाई भए दइआल ॥3॥
सुरति मति बुधि परगासु ॥
गहिर गंभीर अपार गुणतासु ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपाल ॥
नानक संतह देखि निहाल ॥4॥10॥21॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! संत जनों से मिलते हुए परमात्मा (मेरे) चित्त में आ बसा है। संतजनों की संगति करते हुए मैंने मन में संतोष पा लिया है। (प्रभू मेहर करे) मेरा माथा संत जनों के चरणों में पड़ा रहे। मैं अनेकों बार संतजनों को नमस्कार करता हूँ। 1। हे भाई ! मेरा ये मन संतजनों से सदके जाता है। जिनका आसरा ले के मैंने (आत्मिक) आनंद हासिल किया है। संत जन कृपा करके (विकार आदि से) रक्षा करते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (यदि प्रभू कृपा करे तो) मैं संत जनों के चरण धो-धो के पीता रहॅूँ। संत जनों के दर्शन कर-कर के मुझे आत्मिक जीवन मिलता रहता है। मेरे मन में संत जनों की सहायता का धरवास बना रहता है। संत जनों की संगति ही मेरे वास्ते पवित्र सरमाया है। 2। हे भाई ! संत जनों ने (विकार आदि से) मेरी इज्जत बचा ली है। संतजनों की कृपा से मुझे कभी भी कोई चिंता-फिकर नहीं व्यापता। कृपा के श्रोत परमात्मा ने खुद ही संत जनों का साथ बख्शा है। जब संत जन मददगार बनते हैं। तो प्रभू दयावान हो जाता है। 3। (हे भाई ! संत जनों की संगति की बरकति से मेरी) सुरति में। मति में। बुद्धि में (आत्मिक जीवन की) रौशनी हो जाती है। अथाह। बेअंत। गुणों का खजाना। और सारें जीवों की पालना करने वाला परमात्मा हे नानक ! (अपने) संत जनों को देख के रोम-रोम खुश हो जाता है। 4। 10। 21।
रामकली महला 5 ॥
तेरै काजि न ग्रिहु राजु मालु ॥
तेरै काजि न बिखै जंजालु ॥
इसट मीत जाणु सभ छलै ॥
हरि हरि नामु संगि तेरै चलै ॥1॥
राम नाम गुण गाइ ले मीता हरि सिमरत तेरी लाज रहै ॥
हरि सिमरत जमु कछु न कहै ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु हरि सगल निरारथ काम ॥
सुइना रुपा माटी दाम ॥
गुर का सबदु जापि मन सुखा ॥
ईहा ऊहा तेरो ऊजल मुखा ॥2॥
करि करि थाके वडे वडेरे ॥
किन ही न कीए काज माइआ पूरे ॥
हरि हरि नामु जपै जनु कोइ ॥
ता की आसा पूरन होइ ॥3॥
हरि भगतन को नामु अधारु ॥
संती जीता जनमु अपारु ॥
हरि संतु करे सोई परवाणु ॥
नानक दासु ता कै कुरबाणु ॥4॥11॥22॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे मित्र ! ये घर। हे हकूमत। ये धन (इनमें से कोई भी) आपके (आत्मिक जीवन के) किसी काम नहीं आ सकता। मायावी पदार्थों के झमेले भी आपको आत्मिक जीवन का लाभ नहीं दे सकते। याद रख कि ये सारे प्यारे मित्र (आपके वास्ते) छल रूप ही हैं। सिर्फ परमात्मा का नाम ही आपके साथ साथ निभा सकता है। 1। हे मित्र ! परमात्मा के नाम के गुण (इस वक्त) गा ले। परमात्मा का नाम सिमरने से ही (लोक-परलोक में) आपकी इज्जत बनी रह सकती है। परमात्मा का नाम सिमरने से ही यमराज भी कुछ नहीं कहता। 1। रहाउ। हे मित्र ! परमात्मा के नाम के बिना सारे काम व्यर्थ (हो जाते हैं)। (अगर परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। तो) सोना। चाँदी। रुपया-पैसे (आपके वास्ते) मिट्टी (के समान) है। हे मित्र ! गुरू का शबद याद करता रहा कर। आपके मन को आनंद मिलेगा। इस लोक में और परलोक में आप सुर्खरू होंगे। 2। हे मित्र ! आपके से पहले हैं चुके सभी लोग माया के धंधे कर-कर के थकते रहे। किसी ने भी ये धंधे सिरे नहीं चढ़ाए (किसी की भी तृष्णा खत्म नहीं हुई)। जो कोई विरला मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है। उसकी आशा पूरी हो जाती है (उसकी तृष्णा खत्म हो जाती है)। 3। हे मित्र ! परमात्मा के भक्तों के लिए परमात्मा का नाम ही जीवन का आसरा होता है। तभी तो संत जनों ने ही अमूल्य मानस जनम की बाजी जीती है। परमात्मा का संत जो कुछ करता है। वह (परमात्मा की नजरों में) कबूल होता है। हे नानक ! (कह- मैं) दास उससे बलिहार जाता हॅू। 4। 11। 22।
रामकली महला 5 ॥
सिंचहि दरबु देहि दुखु लोग ॥
तेरै काजि न अवरा जोग ॥
करि अहंकारु होइ वरतहि अंध ॥
जम की जेवड़ी तू आगै बंध ॥1॥
छाडि विडाणी ताति मूड़े ॥
ईहा बसना राति मूड़े ॥
माइआ के माते तै उठि चलना ॥
राचि रहिओ तू संगि सुपना ॥1॥ रहाउ ॥
बाल बिवसथा बारिकु अंध ॥
भरि जोबनि लागा दुरगंध ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे मूर्ख !) आप धन इकट्ठा किए जा रहा है। (और धन जोड़ने के प्रयास में) लोगों को दुख देता है। (मौत आने पर ये धन) आपके काम नहीं आएगा। औरों (के बरतने के) लायक रह जाएगा। (हे मूर्ख ! इस धन का) माण करके (इस धन के नशे में) अंधा हो के आप (लोगों से) व्यवहार करता है। (जब) मौत का फंदा (आपके गले में पड़ा। उस फंदे में) बँधे हुए को आपको परलोक में (ले जाएंगे। और धन यहीं रह जाएगा)। 1। हे मूर्ख ! दूसरों से ईष्या करनी छोड़ दे। हे मूर्ख ! इस दुनिया में (पक्षियों की तरह ही) सिर्फ रात भर के लिए ही बसना है। माया में मस्त हुए हे मूर्ख ! (यहाँ से आखिर) उठ के तूने चले जाना है। (पर) आप (इस जगत-) सपने में व्यस्त हुआ पड़ा है। 1। रहाउ। बाल उम्र में जीव बेसमझ बालक बना रहता है। भरी-जवानी में विकारों में लगा रहता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! उस आत्मिक अवस्था का आसन (माया के आगे) कभी डोलता नहीं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।