Lulla Family

अंग 89

अंग
89
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिन कउ होआ क्रिपालु हरि से सतिगुर पैरी पाही ॥
तिन ऐथै ओथै मुख उजले हरि दरगह पैधे जाही ॥14॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू की शरण भी वही लगते हैं, जिन पे हरी स्वयं प्रसन्न होता है। वे दोनों जहानों से सुर्खरू रहते हैं, और प्रभू की दरगाह में (भी) आदर पाते हैं।14।
सलोक मः 2 ॥
जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु दीजै डारि ॥
नानक जिसु पिंजर महि बिरहा नही सो पिंजरु लै जारि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 2 ॥ जो सिर प्रभू की याद में ना झुके, वह त्याग देने योग्य है (भाव, उसका कोई गुण नहीं)। हे नानक ! जिस शरीर में प्यार नहीं वह शरीर जला दो (भाव, वह भी व्यर्थ है)।1।
मः 5 ॥
मुंढहु भुली नानका फिरि फिरि जनमि मुईआसु ॥
कसतूरी कै भोलड़ै गंदे डुंमि पईआसु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! जिस (जीव-स्त्री) ने (सबसे) मूल (सृजनहार) को विसारा है, वह बारंबार पैदा होती मरती है, (और वह) कस्तूरी (भाव, उक्तम पदार्थ) के भुलेखे में (माया के) गंदे गड्ढे में पड़ी हुई है।2।
पउड़ी ॥
सो ऐसा हरि नामु धिआईऐ मन मेरे जो सभना उपरि हुकमु चलाए ॥
सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जो अंती अउसरि लए छडाए ॥
सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जु मन की त्रिसना सभ भुख गवाए ॥
सो गुरमुखि नामु जपिआ वडभागी तिन निंदक दुसट सभि पैरी पाए ॥
नानक नामु अराधि सभना ते वडा सभि नावै अगै आणि निवाए ॥15॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे मेरे मन ! जो प्रभू सब जीवों पर अपना हुकम चलाता है (अर्थात, जिसके हुकम के आगे सब जीव जन्तु झुकते हैं) उस प्रभू का नाम सिमरना चाहिए। हे मेरे मन ! जो अंत समय (मौत के डर से) छुड़ा लेता है, उस हरी का नाम जपना चाहिए। जो हरी नाम मन की सभी भूखों और तृष्णाओं को मिटा देता है, हे मेरे मन ! उसका जाप करना चाहिए। सब निंदक व दुर्जन उन भाग्यशालियों के चरणों में आ लगते हैं, जिन्होंने सतिगुरू की शरण पड़ के यह नाम जपा है। हे नानक ! प्रभू के नाम का सिमरन कर – यह (साधन) सभी (साधनों) से बड़ा है; नाम के आगे सब को ला के (प्रभू ने) झुका दिया है।15।
सलोक मः 3 ॥
वेस करे कुरूपि कुलखणी मनि खोटै कूड़िआरि ॥
पिर कै भाणै ना चलै हुकमु करे गावारि ॥
गुर कै भाणै जो चलै सभि दुख निवारणहारि ॥
लिखिआ मेटि न सकीऐ जो धुरि लिखिआ करतारि ॥
मनु तनु सउपे कंत कउ सबदे धरे पिआरु ॥
बिनु नावै किनै न पाइआ देखहु रिदै बीचारि ॥
नानक सा सुआलिओ सुलखणी जि रावी सिरजनहारि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ झूठी, मानो खोटी, बुरे लक्षणों वाली और कुरूप स्त्री अपने शरीर को श्रृंगारती है; (पर) पति के हुकम में नहीं चलती, (बल्कि) मूर्ख स्त्री (पति पे) हुकम चलाती है (नतीजा ये होता है कि सदैव दुखी रहती है)। जो (जीव-स्त्री) सतिगुरू की रजा में चलती है वह अपने सारे दुख कलेश निवार लेती है। (पर, कुलक्षणी के भी क्या वश?) (जीवों के किये कर्मों के अनुसार) करतार ने धुर से जो (संस्कारों का लेखा जीवों के माथे पर) लिख दिया है, वह लिखा हुआ लेख मिटाया नहीं जा सकता। (सुलक्षणी) तनमन (हरी-) पति को सौंप देती है, और सतिगुरू के शबद में बिरती जोड़ती है। हृदय में विचार करके देख (भी) लो, कि नाम (जपने) के बिना किसी को प्रभू नहीं मिला। हे नानक ! शुभ लक्षणों वाली व सुंदर (जीव-) स्त्री वही है, जिस पर सृजनहार (पति) ने मेहर की है।1।
मः 3 ॥
माइआ मोहु गुबारु है तिस दा न दिसै उरवारु न पारु ॥
मनमुख अगिआनी महा दुखु पाइदे डुबे हरि नामु विसारि ॥
भलके उठि बहु करम कमावहि दूजै भाइ पिआरु ॥
सतिगुरु सेवहि आपणा भउजलु उतरे पारि ॥
नानक गुरमुखि सचि समावहि सचु नामु उर धारि ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ माया का मोह प्यार (निरा) अंधेरा है, जिसका उरला व परला छोर दिखता नही। सतिगुरू से मुख मोड़ने वाले, ज्ञान से हीन जीव प्रभू का नाम विसार के (उस अंधेरे में) गोते खाते हैं और बड़ा दुख सहते हैं। नित्य नये सूरज (नाम के बिना) और बहत सारे काम करते हैं और माया के प्यार में (ही उनकी) बिरती (जुड़ी रहती है)। (जो जीव) अपने सतिगुरू की बतायी सेवा करते हैं, वह (माया के मोह रूपी) संसार समुंदर से पार हो जाते हैं। हे नानक ! सतिगुरू के सन्मुख रहने वाले (जीव) सच्चे नाम को हृदय में परो के सदा स्थिर प्रभू में लीन हो जाते हैं।2।
पउड़ी ॥
हरि जलि थलि महीअलि भरपूरि दूजा नाहि कोइ ॥
हरि आपि बहि करे निआउ कूड़िआर सभ मारि कढोइ ॥
सचिआरा देइ वडिआई हरि धरम निआउ कीओइ ॥
सभ हरि की करहु उसतति जिनि गरीब अनाथ राखि लीओइ ॥
जैकारु कीओ धरमीआ का पापी कउ डंडु दीओइ ॥16॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू जल में, थल में, पृथ्वी पर हर जगह व्यापक है। उसका कोई शरीक नहीं। प्रभू स्वयं ही बैठ के (गौर से) (जीवों के अच्छे बुरे कर्मों का) न्याय करता है। मन के खोटे सब जीवों कोमार के निकाल देता है (भाव, अपने चरणों से विछोड़ देता है)। सच के व्यापारियों को आदर बख्शता है, हरी ने यह धर्म का न्याय किया है। (हे भाई !) सारे प्रभू की सिफत सलाह करो, जिसने (सदैव) गरीबों अनाथों की रक्षा की है, धर्मियों को आदर दिया है और पापियों को दण्ड दिया है।16।
सलोक मः 3 ॥
मनमुख मैली कामणी कुलखणी कुनारि ॥
पिरु छोडिआ घरि आपणा पर पुरखै नालि पिआरु ॥
त्रिसना कदे न चुकई जलदी करे पूकार ॥
नानक बिनु नावै कुरूपि कुसोहणी परहरि छोडी भतारि ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ मन का मुरीद (जीव उस) खोटी चंदरे लक्षणों वाली मैली स्त्री (जैसा) है (जिसने) घर में (बसता) अपना पति छोड़ दिया है और पराए आदमी के साथ प्यार (डाला हुआ है)। उसकी तृष्णा कभी नहीं मिटती और (तृष्णा में) जलती हुई बिलकती है। हे नानक ! (मनमुख जीव) नाम के बिना बद्-शकल व कुरूप स्त्री के जैसा है और पति द्वारा भी दुतकारी हुई हैं।1।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सतिगुरू की शरण भी वही लगते हैं, जिन पे हरी स्वयं प्रसन्न होता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।