तिन ऐथै ओथै मुख उजले हरि दरगह पैधे जाही ॥14॥
जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु दीजै डारि ॥
नानक जिसु पिंजर महि बिरहा नही सो पिंजरु लै जारि ॥1॥
मुंढहु भुली नानका फिरि फिरि जनमि मुईआसु ॥
कसतूरी कै भोलड़ै गंदे डुंमि पईआसु ॥2॥
सो ऐसा हरि नामु धिआईऐ मन मेरे जो सभना उपरि हुकमु चलाए ॥
सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जो अंती अउसरि लए छडाए ॥
सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जु मन की त्रिसना सभ भुख गवाए ॥
सो गुरमुखि नामु जपिआ वडभागी तिन निंदक दुसट सभि पैरी पाए ॥
नानक नामु अराधि सभना ते वडा सभि नावै अगै आणि निवाए ॥15॥
वेस करे कुरूपि कुलखणी मनि खोटै कूड़िआरि ॥
पिर कै भाणै ना चलै हुकमु करे गावारि ॥
गुर कै भाणै जो चलै सभि दुख निवारणहारि ॥
लिखिआ मेटि न सकीऐ जो धुरि लिखिआ करतारि ॥
मनु तनु सउपे कंत कउ सबदे धरे पिआरु ॥
बिनु नावै किनै न पाइआ देखहु रिदै बीचारि ॥
नानक सा सुआलिओ सुलखणी जि रावी सिरजनहारि ॥1॥
माइआ मोहु गुबारु है तिस दा न दिसै उरवारु न पारु ॥
मनमुख अगिआनी महा दुखु पाइदे डुबे हरि नामु विसारि ॥
भलके उठि बहु करम कमावहि दूजै भाइ पिआरु ॥
सतिगुरु सेवहि आपणा भउजलु उतरे पारि ॥
नानक गुरमुखि सचि समावहि सचु नामु उर धारि ॥2॥
हरि जलि थलि महीअलि भरपूरि दूजा नाहि कोइ ॥
हरि आपि बहि करे निआउ कूड़िआर सभ मारि कढोइ ॥
सचिआरा देइ वडिआई हरि धरम निआउ कीओइ ॥
सभ हरि की करहु उसतति जिनि गरीब अनाथ राखि लीओइ ॥
जैकारु कीओ धरमीआ का पापी कउ डंडु दीओइ ॥16॥
मनमुख मैली कामणी कुलखणी कुनारि ॥
पिरु छोडिआ घरि आपणा पर पुरखै नालि पिआरु ॥
त्रिसना कदे न चुकई जलदी करे पूकार ॥
नानक बिनु नावै कुरूपि कुसोहणी परहरि छोडी भतारि ॥1॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सतिगुरू की शरण भी वही लगते हैं, जिन पे हरी स्वयं प्रसन्न होता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।