विचहु आपु गवाइ कै रहनि सचि लिव लाइ ॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ तिना बिरथा जनमु गवाइ ॥
नानक जो तिसु भावै सो करे कहणा किछू न जाइ ॥1॥
मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥
दूजै भाइ अगिआनी पूजदे दरगह मिलै सजाइ ॥
आतम देउ पूजीऐ बिनु सतिगुर बूझ न पाइ ॥
जपु तपु संजमु भाणा सतिगुरू का करमी पलै पाइ ॥
नानक सेवा सुरति कमावणी जो हरि भावै सो थाइ पाइ ॥2॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सिमरत सभि किलविख पाप लहाती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जाती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे मुखि गुरमुखि प्रीति लगाती ॥
जितु मुखि भागु लिखिआ धुरि साचै हरि तितु मुखि नामु जपाती ॥13॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥
अंतरि गिआनु न आइओ मिरतकु है संसारि ॥
लख चउरासीह फेरु पइआ मरि जंमै होइ खुआरु ॥
सतिगुर की सेवा सो करे जिस नो आपि कराए सोइ ॥
सतिगुर विचि नामु निधानु है करमि परापति होइ ॥
सचि रते गुर सबद सिउ तिन सची सदा लिव होइ ॥
नानक जिस नो मेले न विछुड़ै सहजि समावै सोइ ॥1॥
सो भगउती जोु भगवंतै जाणै ॥
गुर परसादी आपु पछाणै ॥
धावतु राखै इकतु घरि आणै ॥
जीवतु मरै हरि नामु वखाणै ॥
ऐसा भगउती उतमु होइ ॥
नानक सचि समावै सोइ ॥2॥
अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥
पाखंडि पारब्रहमु कदे न पाए ॥
पर निंदा करे अंतरि मलु लाए ॥
बाहरि मलु धोवै मन की जूठि न जाए ॥
सतसंगति सिउ बादु रचाए ॥
अनदिनु दुखीआ दूजै भाइ रचाए ॥
हरि नामु न चेतै बहु करम कमाए ॥
पूरब लिखिआ सु मेटणा न जाए ॥
नानक बिनु सतिगुर सेवे मोखु न पाए ॥3॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ से त्रिपति अघाही ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ तिन जम डरु नाही ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य अपने सतिगुरू की बताई सेवा करता है, वह मनुष्य अपना सिर (भाव, मनुष्य जनम) सफल कर लेता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।