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अंग 88

अंग
88
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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सतिगुरु सेवे आपणा सो सिरु लेखै लाइ ॥
विचहु आपु गवाइ कै रहनि सचि लिव लाइ ॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ तिना बिरथा जनमु गवाइ ॥
नानक जो तिसु भावै सो करे कहणा किछू न जाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य अपने सतिगुरू की बताई सेवा करता है, वह मनुष्य अपना सिर (भाव, मनुष्य जनम) सफल कर लेता है। ऐसे मनुष्य हृदय में से अहंकार दूर करके सच्चे नाम में बिरती जोड़े रखते हैं। जिन्होंने सतिगुरू की बताई हुई सेवा नहीं की, उन्होंने मानस जन्म व्यर्थ गवा लिया है। (पर) हे नानक ! कुछ (अच्छा-बुरा) कहा नहीं जा सकता (क्योंकि) जो उस प्रभू को ठीक लगता है, स्वयं करता है।1।
मः 3 ॥
मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥
दूजै भाइ अगिआनी पूजदे दरगह मिलै सजाइ ॥
आतम देउ पूजीऐ बिनु सतिगुर बूझ न पाइ ॥
जपु तपु संजमु भाणा सतिगुरू का करमी पलै पाइ ॥
नानक सेवा सुरति कमावणी जो हरि भावै सो थाइ पाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (ये कुदरत का तरीका है कि) विकारों में फंसा हुआ मन विकारों वाले कर्म ही करता है। (इस वास्ते) माया के प्यार में (फंसे रह के) जो मनुष्य पूजा करते हैं (इस पूजा का उनको कोई लाभ नहीं होता) दरगाह में सजा ही मिलती है। आत्मा को रौशन करने वाले प्रभू की ही पूजा करनी चाहिए, (पर) सतिगुरू के बगैर समझ नहीं आता। सतिगुरू का भाणा (रजा को) (मानना) -यही जप, तप और संजम है, प्रभू मेहर करे तो ये (रजा मानने की स्मर्था) प्राप्त होती है। हे नानक ! (वैसे तो) जो सेवा प्रभू को ठीक लगे वही परवान होती है, (पर) सेवा भी सुरति द्वारा ही (भावए सुरति को सतिगुरू की रजा में टिका के ही) की जा सकती है।
पउड़ी ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सिमरत सभि किलविख पाप लहाती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जाती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे मुखि गुरमुखि प्रीति लगाती ॥
जितु मुखि भागु लिखिआ धुरि साचै हरि तितु मुखि नामु जपाती ॥13॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे मेरे मन ! हरी नाम का सिमरन कर, जिससे रात-दिन सदा सुख हो। हे मेरे मन ! हरी नाम का सिमरन करके सब पाप दूर हो जाते हैं। हे मेरे मन ! हरि नाम का सिमरन कर, जिससे सब दरिद्रता, दुख व भूख उतर जाएं। हे मेरे मन ! हरि के नाम का सिमरन कर, (जिससे) सतिगुरू के सन्मुख रहके (आपके अंदर) उक्तम प्रीति (अर्थात हरी के नाम की प्रीति) बन जाए। धुर सच्ची दरगाह से जिसके मुंह पे भाग्य लिखा हो, प्रभू उसके मुंह से (ही) अपने नाम का सिमरन करवाता है।13।
सलोक मः 3 ॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥
अंतरि गिआनु न आइओ मिरतकु है संसारि ॥
लख चउरासीह फेरु पइआ मरि जंमै होइ खुआरु ॥
सतिगुर की सेवा सो करे जिस नो आपि कराए सोइ ॥
सतिगुर विचि नामु निधानु है करमि परापति होइ ॥
सचि रते गुर सबद सिउ तिन सची सदा लिव होइ ॥
नानक जिस नो मेले न विछुड़ै सहजि समावै सोइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (मनुष्य जन्म पा के भी) जिन जीवों ने सतिगुरू जी की बतायी हुई सेवा नहीं की और सतिगुरू के शबद से (हरी नाम की) विचार नहीं की, (और इस तरह) हृदय में सच्चा प्रकाश नहीं हुआ, वह जीव संसार में (जीवित होते हुए भी) मरा हुआ है। (चौरासी लाख योनियों) में उसे चक्कर काटना पड़ता है, बारंबार पैदा होता मरता और ख्वार होता है। जिस जीव से प्रभू स्वयं कराए, वही सतिगुरू की बताई कार कर सकता है। सतिगुरू के पास ‘नाम’ का खजाना है, जो प्रभू की मेहर से प्राप्त हो सकता है। जो मनुष्य सतिगुरू के शबद द्वारा सच्चे नाम में रंगे हुये हैं, उनकी बिरती सदा इक तार रहती है। हे नानक ! जिसको (एक बारी) मेल लेता है,वह सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है।1।
मः 3 ॥
सो भगउती जोु भगवंतै जाणै ॥
गुर परसादी आपु पछाणै ॥
धावतु राखै इकतु घरि आणै ॥
जीवतु मरै हरि नामु वखाणै ॥
ऐसा भगउती उतमु होइ ॥
नानक सचि समावै सोइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ भगउती (सच्चा भक्त) वह है जो प्रभू को जानता है (प्रभू से गहरी सांझ डालता है), और सतिगुरू की कृपा से (भाव, सतिगुरू की शिक्षा लेकर) अपने आप को पहचानता है। (वासना की ओर) दौड़ते (मन) को काबू में रखता है, और एक टिकाव में लाता है, और जीवित होते हुए भी (माया की ओर से) मरा रहता है (अर्थात, संसार में विचरता हुआ भी मन को वासना से तोड़े रखता है)। ऐसा भगउती (भगत) उक्तम होता है, हे नानक ! वह सदा स्थिर प्रभू में लीन हो जाता है (और फिर कभी नहीं विछुड़ता)।2।
मः 3 ॥
अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥
पाखंडि पारब्रहमु कदे न पाए ॥
पर निंदा करे अंतरि मलु लाए ॥
बाहरि मलु धोवै मन की जूठि न जाए ॥
सतसंगति सिउ बादु रचाए ॥
अनदिनु दुखीआ दूजै भाइ रचाए ॥
हरि नामु न चेतै बहु करम कमाए ॥
पूरब लिखिआ सु मेटणा न जाए ॥
नानक बिनु सतिगुर सेवे मोखु न पाए ॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ जो मनुष्य दिल में खोट रखे (पर अपने आप को) भगउती (सच्चा भगत) कहलाए, वह (इस) पाखण्ड से परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। (जीव) पराई निंदा करके हृदय पर मैल चढ़ाए जाये, (और) बाहर से (शरीर की) मैल (स्नान वगैरा से) धोता रहे, (इस तरह) मन की जूठ दूर नहीं होती। जो मनुष्य सतिसंगति के साथ टकराव डाले रखता है (भाव, जिसे सतसंगति अच्छी नहीं लगती) वह माया के प्यार में रंगा हुआ हमेशा दुखी रहता है। हरी नाम का सिमरन छोड़ के और चाहे जितने कर्म काण्ड करता रहे (इस तरह) पहले (किए कर्मों के अच्छे बुरे संस्कार जो मन पर) लिखे गए (हैं, और जनम जनम में भटकाते फिरते हैं) मिट नहीं सकते। हे नानक ! (सॅच तो ये है कि) सतिगुरू द्वारा बताए कर्मों को किए बिनां (माया के मोह से) छुटकारा हो ही नहीं सकता।3।
पउड़ी ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ से त्रिपति अघाही ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ तिन जम डरु नाही ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिन्होंने सतिगुरू का ध्यान धरा है, वो नित्य नये सूरज दुखी नहीं होते, (क्योंकि) जिन्होंने सतिगुरू का ध्यान धारण किया है वे (दुनियावी पदार्थों की ओर से) पूरी तौर पे तृप्त रहते हैं, जिन्होंने सतिगुरू का ध्यान धरा है, (इस वास्ते) उन्हें मौत का भी डर नहीं रहता।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य अपने सतिगुरू की बताई सेवा करता है, वह मनुष्य अपना सिर (भाव, मनुष्य जनम) सफल कर लेता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।