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अंग 888

अंग
888
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनु कीनो दह दिस बिस्रामु ॥
तिलकु चरावै पाई पाइ ॥
लोक पचारा अंधु कमाइ ॥2॥
खटु करमा अरु आसणु धोती ॥
भागठि ग्रिहि पड़ै नित पोथी ॥
माला फेरै मंगै बिभूत ॥
इह बिधि कोइ न तरिओ मीत ॥3॥
सो पंडितु गुर सबदु कमाइ ॥
त्रै गुण की ओसु उतरी माइ ॥
चतुर बेद पूरन हरि नाइ ॥
नानक तिस की सरणी पाइ ॥4॥6॥17॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पर उसका मन दसों दिशाओं में भटक रहा है। अंधा (मनुष्य अपने माथे पर) तिलक लगाता है। (मूर्ति के) पैरों पर (भी) पड़ता है। पर ये सब कुछ वह सिर्फ दुनिया को रिझाने के लिए ही करता है। 2। (आत्मिक जीवन से अंधा मनुष्य शास्त्रों में बताए हुए) छे धार्मिक कर्म करता है। (देव पूजा करने के लिए उसने ऊन आदि का) आसन (भी रखा हुआ है। पूजा करने के वक्त) धोती (भी पहनता है)। किसी धनाढ के घर (जा के) सदा (अपनी धार्मिक) पुस्तक भी पढ़ता है। (उसके घर बैठ के) माला फेरता है। (फिर उस धनाढ से) धन-पदार्थ माँगता है – हे मित्र ! इस तरीके से कोई मनुष्य कभी संसार-समुंद्र से पार नहीं हुआ। 3। वह मनुष्य (ही) पण्डित है जो गुरू के शबद के अनुसार अपना जीवन ढालता है। तीन गुणों वाली ये माया उस मनुष्य पर अपना जोर नहीं डाल सकती। उसकी बाबत तो परमात्मा के नाम में (ही) चारों वेद पूरी तरह से आ जाते हैं। हे नानक ! (कह- कोई भाग्यशाली मनुष्य) उस (पण्डित) की शरण पड़ता है। 4। 6। 17।
रामकली महला 5 ॥
कोटि बिघन नही आवहि नेरि ॥
अनिक माइआ है ता की चेरि ॥
अनिक पाप ता के पानीहार ॥
जा कउ मइआ भई करतार ॥1॥
जिसहि सहाई होइ भगवान ॥
अनिक जतन उआ कै सरंजाम ॥1॥ रहाउ ॥
करता राखै कीता कउनु ॥
कीरी जीतो सगला भवनु ॥
बेअंत महिमा ता की केतक बरन ॥
बलि बलि जाईऐ ता के चरन ॥2॥
तिन ही कीआ जपु तपु धिआनु ॥
अनिक प्रकार कीआ तिनि दानु ॥
भगतु सोई कलि महि परवानु ॥
जा कउ ठाकुरि दीआ मानु ॥3॥
साधसंगि मिलि भए प्रगास ॥
सहज सूख आस निवास ॥
पूरै सतिगुरि दीआ बिसास ॥
नानक होए दासनि दास ॥4॥7॥18॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (जीवों की जिंदगी के राह में आने वाली) करोड़ों रुकावटें उसके नजदीक नहीं आती। अनेकों (तरीकों से मोहने वाली) माया उसकी दासी बनी रहती है। (जगत के) अनेकों विकार उसका पानी भरने वाले बन जाते हैं (उस पर अपना जोर नहीं डाल सकते)। हे भाई ! जिस मनुष्य पर करतार की मेहर होती है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य का मददगार परमात्मा (खुद) बनता है। उसके घर में (उसके) अनेकों उद्यम सफल हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! करतार जिस मनुष्य की रक्षा करता है। उसका पैदा किया हुआ जीव उस मनुष्य का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। (अगर करतार की मेहर हो। तो) कीड़ी (भी) सारे जगत को जीत लेती है। हे भाई ! उस करतार की बेअंत महिमा है। कितनी बयान की जाए। उसके चरणों से सदा बलिहार जाना चाहिए। 2। उसी मनुष्य ने जप किया समझो। उसी मनुष्य ने तपसाधा जानो। उसी मनुष्य ने समाधि लगाई समझो। उसी मनुष्य ने अनेकों किस्म के दान दिए जानो (वही असल जपी है। वही असल तपी है। वही असल जोगी है। वही असल दानी है) वही असल भगत है। वही जगत में जाना-माना जाता है। हे भाई ! जिस मनुष्य को मालिक प्रभू ने आदर बख्शा। 3। गुरू की संगति में मिल के उन मनुष्यों के अंदर आत्मिक जीवन का प्रकाश हो जाता है। परमात्मा आत्मिक अडोलता और सुखों का श्रोत है। परमात्मा ही सब की आशाएं पूरी करने वाला है। हे नानक ! पूरे गुरू ने जिन मनुष्यों को ये बात दृढ़ करवा दी वह मनुष्य प्रभू के दासों के दास बने रहते हैं। 4। 7। 18।
रामकली महला 5 ॥
दोसु न दीजै काहू लोग ॥
जो कमावनु सोई भोग ॥
आपन करम आपे ही बंध ॥
आवनु जावनु माइआ धंध ॥1॥
ऐसी जानी संत जनी ॥
परगासु भइआ पूरे गुर बचनी ॥1॥ रहाउ ॥
तनु धनु कलतु मिथिआ बिसथार ॥
हैवर गैवर चालनहार ॥
राज रंग रूप सभि कूर ॥
नाम बिना होइ जासी धूर ॥2॥
भरमि भूले बादि अहंकारी ॥
संगि नाही रे सगल पसारी ॥
सोग हरख महि देह बिरधानी ॥
साकत इव ही करत बिहानी ॥3॥
हरि का नामु अंम्रितु कलि माहि ॥
एहु निधाना साधू पाहि ॥
नानक गुरु गोविदु जिसु तूठा ॥
घटि घटि रमईआ तिन ही डीठा ॥4॥8॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! उन संत जनों ने यूँ समझा है कि अपनी मुश्किल के बारे में) किसी और प्राणी को दोष नहीं देना चाहिए। मनुष्य जो कर्म कमाता है। उसी का ही फल भोगता है। अपने किए कर्मों (के संस्कारों) के अनुसार मनुष्य खुद ही (माया के) बंधनों में (जकड़ा रहता है)। माया के धंधों के कारण जनम-मरण का चक्र बना रहता है। 1। उन संत जनों ने (जीवन-जुगति को) इस तरह समझा है। हे भाई ! पूरे गुरू के बचनों पर चल के (जिन मनुष्यों के अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो गया। 1। रहाउ। हे भाई ! शरीर। धन। पत्नी- (मोह के ये सारे) पसारे नाशवान हैं। बढ़िया घोड़े। बढ़िया हाथी- ये भी नाशवान हैं। दुनियां की बादशाहियाँ। रंग-तमाशे और सुंदर नुहारें- ये भी सारे झूठे पसारे हैं। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना हरेक चीज़ मिट्टी हो जाएगी। 2। हे भाई ! जिन पदार्थों की खातिर मनुष्य भटकना में पड़ कर जीवन के गलत रास्ते पर पड़ जाते हैं और व्यर्थ माण करते हैं। वह सारे पसारे किसी के साथ नहीं जा सकते। कभी खुशी में। ग़मी में। (ऐसे ही) शरीर बुड्ढा हो जाता है। परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य की उम्र इस तरह से ही बीत जाती है। 3। हे भाई ! जगत में परमात्मा का नाम ही आत्मिक जीवन देने वाला (पदार्थ) है। ये खजाना गुरू के पास है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर गुरू प्रसन्न होता है। परमात्मा प्रसन्न होता है। उसी मनुष्य ने सुंदर प्रभू को हरेक शरीर में देखा है। 4। 8। 19।
रामकली महला 5 ॥
पंच सबद तह पूरन नाद ॥
अनहद बाजे अचरज बिसमाद ॥
केल करहि संत हरि लोग ॥
पारब्रहम पूरन निरजोग ॥1॥
सूख सहज आनंद भवन ॥
साधसंगि बैसि गुण गावहि तह रोग सोग नही जनम मरन ॥1॥ रहाउ ॥
ऊहा सिमरहि केवल नामु ॥
बिरले पावहि ओहु बिस्रामु ॥
भोजनु भाउ कीरतन आधारु ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! उस आत्मिक अवस्था में (ऐसा प्रतीत होता है जैसे) पाँच किस्मों के साजों की घनघोर आवाज़ हो रही है। (जैसे मनुष्य के अंदर) एक-रस बाजे बज रहे हैं। वह अवस्था आश्चर्य और हैरानी पैदा करने वाली होती है। (हे भाई ! साध-संगति की बरकति से)प्रभू के संतजन (उस अवस्था में पहुँच के) आत्मिक आनंद लेते रहते हैं। जहाँ सर्व-व्यपाक, सम्पूर्ण व् निर्लिप ईश्वर का वास है 1। वह मनुष्य आत्मिक अडोलता। आत्मिक सुख आनंद की अवस्था हासिल कर लेते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की संगति में बैठ के (परमात्मा के) गुण गाते रहते हैं। उस आत्मिक अवस्था में कोई रोग। कोई ग़म। कोई जनम-मरण का चक्कर नहीं व्यापता। 1। रहाउ। हे भाई ! उस आत्मिक अवस्था में (पहुँचे हुए संत जन) सिर्फ (हरी-) नाम सिमरते रहते हैं। पर। ऐसी उच्च आत्मिक अवस्था विरले मनुष्यों को हासिल होती है। हे भाई ! उस अवस्था में प्रभू-प्रेम ही मनुष्य की आत्मिक खुराक हो जाती है। आत्मिक जीवन के लिए मनुष्य को सिफत्सालाह का सहारा होता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर उसका मन दसों दिशाओं में भटक रहा है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।