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अंग 887

अंग
887
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पीवत अमर भए निहकाम ॥
तनु मनु सीतलु अगनि निवारी ॥
अनद रूप प्रगटे संसारी ॥2॥
किआ देवउ जा सभु किछु तेरा ॥
सद बलिहारि जाउ लख बेरा ॥
तनु मनु जीउ पिंडु दे साजिआ ॥
गुर किरपा ते नीचु निवाजिआ ॥3॥
खोलि किवारा महलि बुलाइआ ॥
जैसा सा तैसा दिखलाइआ ॥
कहु नानक सभु पड़दा तूटा ॥
हउ तेरा तू मै मनि वूठा ॥4॥3॥14॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: उस नाम-अमृत को पीते ही मनुष्य अटॅल आत्मिक जीवन वाले और वासना-रहित हो जाते हैं। उनका तन उनका मन शांत हो जाता है। परमात्मा (उनके अंदर से तृष्णा की) आग बुझा देता है। वे हर वक्त आनंद-भरपूर रहते हैं। और जगत में मशहूर हो जाते हैं। 2। (हे प्रभू ! आपका वह नाम-अमृत प्राप्त करने के लिए) मैं आपके आगे क्या ला के रखूँ। कयोंकि (मेरे पास तो) सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! मैं आप पर से हमेशा ही लाखों बार बलिहार जाता हूँ। ये तन ये मन। ये जिंद ये शरीर दे के तूने मुझे पैदा किया है। और गुरू की मेहर से तूने मुझ नकारे को इज्जत दी हुई है। 3। हे नानक ! कह- (हे प्रभू ! मेरे मन के) किवाड़ खोल के तूने मुझे अपने चरणों में जोड़ लिया है। तूने मुझे साक्षात अपने दीदार बख्शे हैं। (आपसे अलग रखने वाला मेरे अंदर से) सारा पर्दा अब टूट चुका है। अब आप मेरे मन में आ बसा है। मैं आपका हैं चुका हूँ। 4। 3। 14।
रामकली महला 5 ॥
सेवकु लाइओ अपुनी सेव ॥
अंम्रितु नामु दीओ मुखि देव ॥
सगली चिंता आपि निवारी ॥
तिसु गुर कउ हउ सद बलिहारी ॥1॥
काज हमारे पूरे सतगुर ॥
बाजे अनहद तूरे सतगुर ॥1॥ रहाउ ॥
महिमा जा की गहिर गंभीर ॥
होइ निहालु देइ जिसु धीर ॥
जा के बंधन काटे राइ ॥
सो नरु बहुरि न जोनी पाइ ॥2॥
जा कै अंतरि प्रगटिओ आप ॥
ता कउ नाही दूख संताप ॥
लालु रतनु तिसु पालै परिआ ॥
सगल कुटंब ओहु जनु लै तरिआ ॥3॥
ना किछु भरमु न दुबिधा दूजा ॥
एको एकु निरंजन पूजा ॥
जत कत देखउ आपि दइआल ॥
कहु नानक प्रभ मिले रसाल ॥4॥4॥15॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! जिसने (मुझे अपना) सेवक (बना के) अपनी (इस) सेवा में लगाया है जिसने प्रकाश-रूप प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम (जपने के लिए) मेरे मुँह में दिया है। जिसने (मेरे अंदर से) सारी चिंता खुद (मेहर करके) दूर कर दी है। मैं उस गुरू से सदा सदके जाता हूँ। 1। हे सतिगुरू ! तूने मेरे सारे काम सिरे चढ़ा दिए हैं (आपकी मेहर से मैं बे-गर्ज हैं गया हूँ)। हे सतिगुरू ! (अब ऐसा प्रतीत हो रहा है। जैसे मेरे अंदर) एक-रस (खुशी के) बाजे बज रहे हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा की महिमा बेअंत अथाह है। वह जिस (मनुष्य) को धैर्य बख्शता है। वह व्यक्ति रोम-रोम प्रसन्न हो जाता है। वह प्रभू-पातशाह जिस मनुष्य के (माया के) बँधन काट देता है। वह मनुष्य दोबारा जन्मों के चक्र में नहीं पड़ता। 2। हे भाई ! परमात्मा खुद जिस मनुष्य के हृदय में अपना प्रकाश करता है। उसको कोई दुख-कलेश छू नहीं सकता। उस मनुष्य को प्रभू का नाम-लाल मिल जाता है। नाम-रतन मिल जाता है। वह मनुष्य अपने सारे परिवार को (भी अपने साथ) लेकर संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 3। उसको कोई भटकना नहीं रहती। उसके अंदर दुचिक्ता-पन नहीं रह जाता। उसके दिल में मेर-तेर नहीं होती। हे भाई ! जो मनुष्य सिर्फ एक माया से निर्लिप प्रभू की बँदगी करता है। अब मैं जिधर-किधर देखता हूँ। मुझे वह दया का घर प्रभू ही दिखाई दे रहा है। हे नानक ! कह- (गुरू की कृपा से मुझे) आनंद के श्रोत प्रभू जी मिल गए हैं। 4। 4। 15।
रामकली महला 5 ॥
तन ते छुटकी अपनी धारी ॥
प्रभ की आगिआ लगी पिआरी ॥
जो किछु करै सु मनि मेरै मीठा ॥
ता इहु अचरजु नैनहु डीठा ॥1॥
अब मोहि जानी रे मेरी गई बलाइ ॥
बुझि गई त्रिसन निवारी ममता गुरि पूरै लीओ समझाइ ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा राखिओ गुरि सरना ॥
गुरि पकराए हरि के चरना ॥
बीस बिसुए जा मन ठहराने ॥
गुर पारब्रहम एकै ही जाने ॥2॥
जो जो कीनो हम तिस के दास ॥
प्रभ मेरे को सगल निवास ॥
ना को दूतु नही बैराई ॥
गलि मिलि चाले एकै भाई ॥3॥
जा कउ गुरि हरि दीए सूखा ॥
ता कउ बहुरि न लागहि दूखा ॥
आपे आपि सरब प्रतिपाल ॥
नानक रातउ रंगि गोपाल ॥4॥5॥16॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू की किरपा से) मेरे शरीर में से ये भुलेखा समाप्त हो गया है कि ये शरीर मेरा है। ये शरीर मेरा है। अब मुझे परमात्मा की रजा मीठी लगने लग गई है। जो कुछ परमात्मा करता है। वह (अब) मेरे मन को मीठा लग रहा है। (इस आत्मिक तब्दीली का) ये आश्चर्यजनक तमाशा मैंने प्रत्यक्ष देख लिया है। 1। हे भाई ! अब मैंने (आत्मिक जीवन की मर्यादा) समझ ली है। मेरे अंदर से (चिरों से चिपकी हुई ममता की) डायन निकल गई है। पूरे गुरू ने मुझे (जीवन की) सूझ बख्श दी है। (मेरे अंदर से) माया के लालच की आग बुझ गई है। गुरू ने मेरा माया का मोह दूर कर दिया है। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू ने मेहर करके मुझे अपनी शरण में रखा हुआ है। गुरू ने प्रभू के चरण पकड़ा दिए हैं। अब जब मेरा मन पूरे तौर पर ठहर गया है। (टिक गया है)। मुझे गुरू और परमात्मा एक-रूप दिखाई दे रहे हैं। 2। मैं हरेक का सेवक बन गया हूँ। (इसलिए) जो जो जीव परमात्मा ने पैदा किया है। (हे भाई ! गुरू की किरपा से मुझे दिखाई दे गया है कि) सारे ही जीवों में मेरे परमात्मा का निवास है। मुझे कोई भी जीव अपना वैरी दुश्मन नहीं दिखता। अब मैं सबके गले से मिलकर चलता हूँ (जैसे हम) एक ही पिता (के पुत्र) भाई हैं। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू ने प्रभू ने (ये) सुख दे दिए। उस पर दुख दोबारा अपना जोर नहीं डाल सकते। (उसको ये दिखाई दे जाता है कि) परमात्मा स्वयं ही सबकी पालना करने वाला है। वह मनुष्य सृष्टि के रक्षक प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। 4। 5। 16।
रामकली महला 5 ॥
मुख ते पड़ता टीका सहित ॥
हिरदै रामु नही पूरन रहत ॥
उपदेसु करे करि लोक द्रिड़ावै ॥
अपना कहिआ आपि न कमावै ॥1॥
पंडित बेदु बीचारि पंडित ॥
मन का क्रोधु निवारि पंडित ॥1॥ रहाउ ॥
आगै राखिओ साल गिरामु ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (जो मनुष्य धर्म-पुस्तकों को) मुंह से अर्थों समेत पढ़ता है। पर उसके हृदय में परमात्मा नहीं बसता। ना ही उसका रहन-सहन बेदाग़ है। और लोगों को (धर्म-पुस्तकों का) उपदेश करता है (और उपदेश) करके उनके मन में (वह उपदेश) पक्की तरह दृढ़ करवाता है। पर अपना ये बताया हुआ उपदेश खुद नहीं कमाता (उसको पण्डित नहीं कहा जा सकता)। 1। हे पण्डित ! वेद (आदि धर्म-पुस्तकों के उपदेश) को (अपने) मन में बसाए रख। और अपने मन का गुस्सा दूर कर दे। 1। रहाउ। (आत्मिक जीवन से) अंधा (मनुष्य) सालिग्राम की मूर्ति अपने आगे रख लेता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस नाम-अमृत को पीते ही मनुष्य अटॅल आत्मिक जीवन वाले और वासना-रहित हो जाते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।