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अंग 886

अंग
886
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बडै भागि साधसंगु पाइओ ॥1॥
बिनु गुर पूरे नाही उधारु ॥
बाबा नानकु आखै एहु बीचारु ॥2॥11॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: यहाँ) बड़ी किस्मत से (आपको) गुरू का साथ मिल गया है। 1। पूरे गुरू की शरण पड़े बिना (अनेकों जूनियों से) पार-उतारा नहीं हो सकता – हे भाई ! नानक (आपको) यह विचार की बात बताता है। 2। 11।
रागु रामकली महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चारि पुकारहि ना तू मानहि ॥
खटु भी एका बात वखानहि ॥
दस असटी मिलि एको कहिआ ॥
ता भी जोगी भेदु न लहिआ ॥1॥
किंकुरी अनूप वाजै ॥
जोगीआ मतवारो रे ॥1॥ रहाउ ॥
प्रथमे वसिआ सत का खेड़ा ॥
त्रितीए महि किछु भइआ दुतेड़ा ॥
दुतीआ अरधो अरधि समाइआ ॥
एकु रहिआ ता एकु दिखाइआ ॥2॥
एकै सूति परोए मणीए ॥
गाठी भिनि भिनि भिनि भिनि तणीए ॥
फिरती माला बहु बिधि भाइ ॥
खिंचिआ सूतु त आई थाइ ॥3॥
चहु महि एकै मटु है कीआ ॥
तह बिखड़े थान अनिक खिड़कीआ ॥
खोजत खोजत दुआरे आइआ ॥
ता नानक जोगी महलु घरु पाइआ ॥4॥
इउ किंकुरी आनूप वाजै ॥
सुणि जोगी कै मनि मीठी लागै ॥1॥ रहाउ दूजा ॥1॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु रामकली महला 5 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे जोगी ! चार वेद पुकार-पुकार के कह रहे हैं (कि) सभ जीवों में (परमात्मा की ज्योति-रूप सुंदर किंगरी हर जगह बज रही है) पर आप यकीन नहीं करता। हे जोगी ! छे शास्त्र भी यही बात कह रहे हैं। अठारह पुराणों ने मिल के भी यही वचन किए हैं। पर हे जोगी ! (हरेक के हृदय में बज रही सुंदर किंग का) भेद तूने नहीं समझा। 1। (पहले ही) सुन्दर किंग बड़ी सुरीली बज रही है (हरेक जीव के हृदय में ईश्वरीय रौंअ चल रही है- यही है सुंदर किंग)। (अपनी छोटी सी किंगरी बजाने में) मस्त हे जोगी ! (देख।) 1। रहाउ। (हे जोगी ! आप यही समझता कि) पहले युग (सतियुग) में दान का नगर बसता था (भाव। दान करने का कर्म प्रधान था)। और त्रेते युग में (धर्म के अंदर) कुछ दरार आ गई (धरम-बैल की तीन लातें ही रह गई)। (हे जोगी ! तूने यही यकीन बनाया हुआ है कि) द्वापर युग आधे में (आ के) टिक गया (भाव। द्वापर युग में धरम-बैल की दो लातें रह गई) और (अब जब कलियुग में धरम-बैल सिर्फ) एक (लात वाला हो के) रह गया है। 2। (देख। हे जोगी ! जैसे माला के एक ही धागे में कई मणके परोए हुए होते हैं। और। उस माला को मनुष्य फेरता रहता है। वैसे ही) जगत के सारे जीव-मणके परमात्मा की सक्ता-रूप धागे में परोए हुए हैं (संसार-चक्र की) ये माला कई तरीकों से कई युक्तियों से फिरती रहती है। (जब परमात्मा अपना) सक्ता-रूप धागा (इस जगत-माला में से) खींच लेता है। तब (सारी माला एक ही) जगह में आ जाती है (सारी सृष्टि एक ही परमात्मा में लीन हो जाती है)। 3। (देख। हे जोगी ! जोगियों के मठ की तरह ही ये जगत भी एक मठ है) चारों ही युगों में (हमेशा से ही) यह जगत-मठ एक (परमात्मा) का ही बनाया हुआ है। इस जगत-मठ में जीव को परेशान करने के लिए अनेकों (विकार-रूपी) मुश्किल जगहें हैं (और विकारों में फंसे हुए जीवों के लिए) अनेकों ही जूनियाँ हैं (जिनमें से जीवों को गुजरना पड़ता है। जैसे किसी घर की खिड़की में से गुजरते हैं) जब कोई मनुष्य (परमात्मा के देश की) तलाश करता-करता (गुरू के) दर पर आ पहुँचता है। हे नानक ! (कह- हे जोगी !) तब प्रभू-चरणों में जुड़े उस मनुष्य को परमात्मा का महल परमात्मा का घर मिल जाता है। 4। (हे जोगी !) इस तरह खोज करते-करते गुरू के दर पर पहुँच के मनुष्य को समझ आ जाती है कि हरेक हृदय में (परमात्मा के चेतन-सक्ता की) सुंदर किंगुरी बज रही है। (यह सुंदर किंगरी बजती) सुन-सुन के परमात्मा के चरणों में जुड़े हुए मनुष्य के मन में (यह किंगरी) मीठी लगने लग जाती है। 1। रहाउ दूजा।
रामकली महला 5 ॥
तागा करि कै लाई थिगली ॥
लउ नाड़ी सूआ है असती ॥
अंभै का करि डंडा धरिआ ॥
किआ तू जोगी गरबहि परिआ ॥1॥
जपि नाथु दिनु रैनाई ॥
तेरी खिंथा दो दिहाई ॥1॥ रहाउ ॥
गहरी बिभूत लाइ बैठा ताड़ी ॥
मेरी तेरी मुंद्रा धारी ॥
मागहि टूका त्रिपति न पावै ॥
नाथु छोडि जाचहि लाज न आवै ॥2॥
चल चित जोगी आसणु तेरा ॥
सिंङी वाजै नित उदासेरा ॥
गुर गोरख की तै बूझ न पाई ॥
फिरि फिरि जोगी आवै जाई ॥3॥
जिस नो होआ नाथु क्रिपाला ॥
रहरासि हमारी गुर गोपाला ॥
नामै खिंथा नामै बसतरु ॥
जन नानक जोगी होआ असथिरु ॥4॥
इउ जपिआ नाथु दिनु रैनाई ॥
हुणि पाइआ गुरु गोसाई ॥1॥ रहाउ दूजा ॥2॥13॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे जोगी ! उस जगत-नाथ ने नाड़ियों को) धागा बना के (सारे शारीरिक अंगों की) टाकियाँ जोड़ दी हैं। (इस शरीर गोदड़ी की) नाड़ियां तरोपे का काम कर रही हैं। (और। शरीर की हरेक) हड्डी सुई का काम करती है। (उस ने माता-पिता की) रक्त-बूँद से (शरीर-) डंडा खड़ा कर दिया है। हे जोगी ! आप (अपनी गोदड़ी का) भला क्या मान करता है। 1। हे जोगी ! दिन-रात (जगत के) नाथ-प्रभू का नाम जपा कर। आपका ये शरीर दो दिनों का ही मेहमान है। 1। रहाउ। (हे जोगी ! अपने शरीर पर) खूब सारी राख मल के आप समाधि लगा के बैठस हुआ है। तूने (कानों में) मुंद्राएं (भी) पहनी हुई हैं (पर आपके अंदर) मेर-तेर बस रही है। हे जोगी ! घर-घर से आप टुकड़े माँगता-फिरता है। आपके अंदर शांति नहीं। (सारे जगत के) नाथ को छोड़ के आप (लोगों के दर से) मांगता है। हे जोगी ! आपको (इस बात से) शर्म नहीं आती। 2। हे डावाँडोल मन वाले जोगी ! आपका आसन (जमाना किसी अर्थ का नहीं अर्थात बेमतलब है)। (लोगों को दिखाने के लिए आपकी) सिंगी बज रही है। पर आपका मन सदा भटकता फिरता है (ये सिंगी तो एकाग्रता के लिए थी)। हे जोगी ! (इस तरह) उस सबसे बड़े गोरख (अर्थात जगत-रक्षक प्रभू) की आपको समझ नहीं आई। (ऐसा) जोगी तो बार-बार जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। 3। हे जोगी ! जिस मनुष्य पर (सारे जगत का) नाथ दयावान होता है (वह मनुष्य परमात्मा के आगे ही विनती करता है।और कहता है-) हे गुर गोपाल ! हमारी अरदास आपके दर पर ही है। आपका नाम ही मेरी गोदड़ी है। आपका नाम ही मेरा (भगवा) कपड़ा है। हे दास नानक ! (ऐसा मनुष्य असल) जोगी है। और वह कभी डोलता नहीं। 4। हे जोगी ! जिस मनुष्य ने दिन-रात इस तरह (जगत के) नाथ को सिमरा है। उसने इसी जन्म में सबसे बड़े जगत-नाथ का मिलाप हासिल कर लिया है। 1। रहाउ दूजा। 2। 13।
रामकली महला 5 ॥
करन करावन सोई ॥
आन न दीसै कोई ॥
ठाकुरु मेरा सुघड़ु सुजाना ॥
गुरमुखि मिलिआ रंगु माना ॥1॥
ऐसो रे हरि रसु मीठा ॥
गुरमुखि किनै विरलै डीठा ॥1॥ रहाउ ॥
निरमल जोति अंम्रितु हरि नाम ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! वह परमात्मा ही सब कुछ करने-योग्य है और (सबमें व्यापक हो के सब जीवों से) कराने वाला है। (कहीं भी) उसके बिना कोई दूसरा नहीं दिखता। हे भाई ! मेरा वह मालिक प्रभू गंभीर स्वभाव वाला है और सबके दिल की जानने वाला है। गुरू के द्वारा। जिसको वह मिल जाता है। वह मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है। 1। हे भाई ! परमात्मा के नाम का स्वाद आश्चर्य है। मीठा है। किसी विरले मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर उसका दर्शन किया है। 1। रहाउ। हे भाई ! उस परमात्मा का नूर मैल-रहित है। उसका नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल (अमृत) समझो।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “यहाँ) बड़ी किस्मत से (आपको) गुरू का साथ मिल गया है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।