राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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रामकली महला 5 ॥ ओअंकारि एक धुनि एकै एकै रागु अलापै ॥ एका देसी एकु दिखावै एको रहिआ बिआपै ॥ एका सुरति एका ही सेवा एको गुर ते जापै ॥1॥ भलो भलो रे कीरतनीआ ॥ राम रमा रामा गुन गाउ ॥ छोडि माइआ के धंध सुआउ ॥1॥ रहाउ ॥ पंच बजित्र करे संतोखा सात सुरा लै चालै ॥ बाजा माणु ताणु तजि ताना पाउ न बीगा घालै ॥ फेरी फेरु न होवै कब ही एकु सबदु बंधि पालै ॥2॥ नारदी नरहर जाणि हदूरे ॥ घूंघर खड़कु तिआगि विसूरे ॥ सहज अनंद दिखावै भावै ॥ एहु निरतिकारी जनमि न आवै ॥3॥ जे को अपने ठाकुर भावै ॥ कोटि मधि एहु कीरतनु गावै ॥ साधसंगति की जावउ टेक ॥ कहु नानक तिसु कीरतनु एक ॥4॥8॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! प्रभू के दर पर रास डालने वाला वह मनुष्य) सिर्फ एक परमात्मा (के चरणों) में लिव लगाए रखता है। सिर्फ परमात्मा की सिफतसालाह के गीत गाता रहता है। केवल परमात्मा के चरणों में टिका रहता है। औरों को भी एक परमात्मा का उपदेश करता है। (उस रास-धारिए को) एक परमात्मा हर जगह बसता दिखाई देता है। उसकी सुरति सिर्फ परमात्मा में ही लगी रहती है। वह सिर्फ प्रभू की ही भक्ति करता है। गुरू से (शिक्षा ले के) वह सिर्फ परमात्मा का ही नाम जपता रहता है। 1। हे भाई ! वही है सबसे अच्छा रासधारी। जो मनुष्य सर्व व्यापक परमात्मा के गुण माया के धंधे छोड़ के माया का स्वार्थ छोड़ के गाता है।1। रहाउ। (हे भाई ! प्रभू के दर का रासधारिया सत्य-) संतोष (आदि गुणों) को पाँच (किस्म के) साज बनाता है। प्रभू के चरणों में लीन रह के वह दुनिया के काम-काज करता है- यही उसके लिए (सा। रे। गा…आदि) सात सुर (का अलाप) हैं। वह मनुष्य अपनी ताकत का भरोसा त्यागता है- यही उसका बाजा (बजाना) है। वह मनुष्य गलत रास्ते पर पैर नहीं रखता- यही उसके लिए तान पल्टी (आलाप) है। वह मनुष्य गुरू के शबद को अपने पल्ले से बाँध के रखता है (हृदय में बसाए रखता है। इस शबद की बरकति से उसको फिर) कभी तनम-मरन के फेरे नहीं रहते- यही (रास डालने के वक्त) उसकी नृत्य-चक्र है। 2। (हे भाई ! प्रभू के दर का रासधारिया) परमात्मा को (सदा अपने) अंग-संग जानता है- यह है उसके लिए नारदी-भक्ति वाला नृत्य। (इस तरह) वह (दुनिया के सारे) चिंता-फिक्र त्याग देता है- यही है उसके लिए घुंघरूओं की झनकार। (प्रभू के दर का रासधारिया) आत्मिक अडोलता का सुख पाता है (मानो। वह) नृत्यकारी के तेवर दिखा रहा है। हे भाई ! जो भी मनुष्य ये नृत्य करता है। वह जन्मों के चक्कर में नहीं पड़ता। 3। हे भाई ! अगर करोड़ों में कोई व्यक्ति अपने परमात्मा को प्यारा लगने लग जाता है। तब वह (प्रभू का) ये कीर्तन गाता है। हे नानक ! कह- मैं तो साध-संगति की शरण में पड़ता हूँ। क्योंकि साध-संगति को कीर्तन ही (जिंदगी का) एक मात्र आसरा है। 4। 8।
रामकली महला 5 ॥ कोई बोलै राम राम कोई खुदाइ ॥ कोई सेवै गुसईआ कोई अलाहि ॥1॥ कारण करण करीम ॥ किरपा धारि रहीम ॥1॥ रहाउ ॥ कोई नावै तीरथि कोई हज जाइ ॥ कोई करै पूजा कोई सिरु निवाइ ॥2॥ कोई पड़ै बेद कोई कतेब ॥ कोई ओढै नील कोई सुपेद ॥3॥ कोई कहै तुरकु कोई कहै हिंदू ॥ कोई बाछै भिसतु कोई सुरगिंदू ॥4॥ कहु नानक जिनि हुकमु पछाता ॥ प्रभ साहिब का तिनि भेदु जाता ॥5॥9॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! कोई मनुष्य (परमात्मा का नाम) ‘राम राम’ उचारता है। कोई उसको ‘ख़ुदाय खुदाय’ कहता है। कोई मनुष्य उसको ‘गोसाई’ कह के उसकी भक्ति करता है। कोई ‘अल्ला’ कह के बँदगी करता है। 1। हे सारे जगत के मूल ! हे बख्शिंद ! हे कृपालु ! हे रहम करने वाले ! (जीवों ने अपनी-अपनी धर्म-पुस्तकों की बोली के अनुसार आपके अलग-अलग नाम रखे हुए हैं। पर आप सबका सांझा है)। 1। रहाउ। हे भाई ! कोई मनुष्य किसी तीर्थ पर स्नान करता है। कोई मनुष्य (मक्के) हज करने के लिए जाता है। कोई मनुष्य (प्रभू की मूर्ति बना के) पूजा करता है। कोई नमाज़ पढ़ता है। 2। हे भाई ! कोई (हिन्दू) वेद आदि धर्म-पुस्तक पढ़ता है। कोई (मुसलमान आदि) कुरान अंजील आदि पढ़ता है। कोई (मुसलमान हो के) नीले कपड़े पहनता है। कोई (हिंदू) सफेद वस्त्र पहनता है। 3। हे भाई ! कोई मनुष्य कहता है ‘मैं मुसलमान हूँ’। कोई कहता है ‘मैं हिन्दू हूँ’। कोई मनुष्य (परमात्मा से) बहिष्त माँगता है। कोई स्वर्ग मांगता है। 4। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य ने परमात्मा का हुकम पहचाना है। उसने मालिक प्रभू का भेद पा लिया है (कि उसे कैसे प्रसन्न किया जा सकता है)। 5। 9।
रामकली महला 5 ॥ पवनै महि पवनु समाइआ ॥ जोती महि जोति रलि जाइआ ॥ माटी माटी होई एक ॥ रोवनहारे की कवन टेक ॥1॥ कउनु मूआ रे कउनु मूआ ॥ ब्रहम गिआनी मिलि करहु बीचारा इहु तउ चलतु भइआ ॥1॥ रहाउ ॥ अगली किछु खबरि न पाई ॥ रोवनहारु भि ऊठि सिधाई ॥ भरम मोह के बांधे बंध ॥ सुपनु भइआ भखलाए अंध ॥2॥ इहु तउ रचनु रचिआ करतारि ॥ आवत जावत हुकमि अपारि ॥ नह को मूआ न मरणै जोगु ॥ नह बिनसै अबिनासी होगु ॥3॥ जो इहु जाणहु सो इहु नाहि ॥ जानणहारे कउ बलि जाउ ॥ कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥ ना कोई मरै न आवै जाइआ ॥4॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! जब हम ये समझते हैं कि कोई प्राणी मर गया है। दरअसल होता यह है कि उसके पँच-तत्वी शरीर में से) श्वास हवा में मिल जाते हैं। जीवात्मा (सर्व-व्यापक) ज्योति से जा मिलती है। (शरीर की) मिट्टी (धरती की) मिट्टी के साथ मिल जाती है। (मरे हुए को) रोने वाला भुलेखे के कारण ही रोता है। 1। हे भाई ! (असल में) कोई भी जीवात्मा मरती नहीं। ये बात पक्की है। जो कोई गुरमुख परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है उसको मिल के (बेशक) विचार कर लो। (पैदा होने-मरने वाली तो) ये एक खेल बनी हुई है। 1। रहाउ। (हे भाई ! किसी के शरीरिक विछोड़े पर रोने वाला प्राणी उस समय) आगे की (हमेशा) बीतने वाली बात को नहीं समझता कि जो (अब किसी के विछुड़ने पर) रो रहा है (आखिर) उसने भी तो यहाँ से कूच कर जाना है। (हे भाई ! जीवों को) भ्रम और मोह के बँधन बँधे हुए हैं। (जीवात्मा और शरीर का मिलाप तो सपने की तरह है। ये आखिर) सपना हो कर बीत जाता है। माया के मोह में अंधा हुआ जीव (व्यर्थ ही) बड़-बड़ाता है। 2। हे भाई ! ये जगत तो करतार ने एक खेल रची हुई है। उस करतार के कभी समाप्त ना होने वाले हुकम में ही जीव यहाँ आते रहते हैं और यहाँ से जाते रहते हैं। वैसे कोई भी जीवात्मा कभी मरती नहीं। क्योंकि ये मरने-योग्य है ही नहीं। यह जीवात्मा कभी नाश नहीं होती। इसकी अस्लियत जो हमेशा कायम रहने वाली ही हुई। 3। हे भाई ! आप इस जीवात्मा को जिस तरह का समझ रहे हैं। वह उस तरह की नहीं। मैं उस मनुष्य पर से बलिहार जाता हूँ। जिसने इस अस्लियत को समझ लिया है। हे नानक ! कह- गुरू ने जिसका भुलेखा दूर कर दिया है। वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। वह बार-बार पैदा होता मरता नहीं। 4। 10।
रामकली महला 5 ॥ जपि गोबिंदु गोपाल लालु ॥ राम नाम सिमरि तू जीवहि फिरि न खाई महा कालु ॥1॥ रहाउ ॥ कोटि जनम भ्रमि भ्रमि भ्रमि आइओ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! गोबिंद (का नाम) जपा कर। सुंदर गोपाल का नाम जपा कर। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरा कर। (ज्यों ज्यों नाम सिमरेगा) आपको उच्च आत्मिक दर्जा मिला रहेगा। भयानक आत्मिक मौत (आपके आत्मिक जीवन को) फिर कभी खत्म नहीं कर सकेगी। 1। रहाउ। हे भाई ! (अनेकों किस्म के) करोड़ों जन्मों में भटक के (अब आप मनुष्य जनम में) आया है। (और।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 5 ॥ (हे भाई ! प्रभू के दर पर रास डालने वाला वह मनुष्य) सिर्फ एक परमात्मा (के चरणों) में लिव लगाए रखता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।