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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 884 · रामकली

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अंग
884
रामकली
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  1. अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै बैरी सगले साधे ॥
  2. तू दाना तू अबिचलु तूही तू जाति मेरी पाती ॥
  3. कर करि ताल पखावजु नैनहु माथै वजहि रबाबा ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै बैरी सगले साधे ॥

रामकली महला 5 ॥
अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै बैरी सगले साधे ॥
जिनि बैरी है इहु जगु लूटिआ ते बैरी लै बाधे ॥1॥
सतिगुरु परमेसरु मेरा ॥
अनिक राज भोग रस माणी नाउ जपी भरवासा तेरा ॥1॥ रहाउ ॥
चीति न आवसि दूजी बाता सिर ऊपरि रखवारा ॥
बेपरवाहु रहत है सुआमी इक नाम कै आधारा ॥2॥
पूरन होइ मिलिओ सुखदाई ऊन न काई बाता ॥
ततु सारु परम पदु पाइआ छोडि न कतहू जाता ॥3॥
बरनि न साकउ जैसा तू है साचे अलख अपारा ॥
अतुल अथाह अडोल सुआमी नानक खसमु हमारा ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई! प्यारे प्रभू ने जिस मनुष्य को अपने चरणों से लगा लिया। उसके उसने (कामादिक) सारे ही वैरी वश में कर दिए। (कामादिक) जिस जिस वैरी ने ये जगत लूट लिया है। (प्रभू ने उसके) वह वैरी पकड़ के बाँध दिए। 1। हे भाई! मेरा तो गुरू रखवाला है। परमात्मा रक्षक है (वही) मुझे कामादिक वैरियों से बचाने वाला है। हे प्रभू! मुझे आपका ही आसरा है (मेहर करें) मैं आपका नाम जपता रहूँ (नाम की बरकति से ऐसा प्रतीत होता है कि) मैं राज (-पाट) के अनेकों भोगों के रस ले रहा हूँ। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा (जिस मनुष्य के) सिर पर रखवाला बनता है। उस मनुष्य के चित्त में (परमात्मा के नाम के बिना। काम आदि का) कोई फुरना उठता ही नहीं। हे मालिक प्रभू! सिर्फ आपके नाम के आसरे वह मनुष्य (दुनिया की अन्य गरजों से) बेपरवाह रहता है। 2। हे भाई! जिसको सारे सुख देने वाला प्रभू मिल जाता है। वह (ऊँचे आत्मिक गुणों से) भरपूर हो जाता है। वह किसी बात से मुथाज नहीं रहता। वह मनुष्य जगत के मूल-प्रभू को पा लेता है। वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा पा लेता है। और, इसको छोड़ के किसी ओर तरफ नहीं भटकता। 3। हे सदा कायम रहने वाले! हे अलख! हे बेअंत! मैं बयान नहीं कर सकता कि आप कैसे हैं। हे नानक! (कहें:) हे बेमिसाल प्रभू! हे अथाह! हे अडोल मालिक! आप ही मेरे पति हैं। 4। 5।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

तू दाना तू अबिचलु तूही तू जाति मेरी पाती ॥

रामकली महला 5 ॥
तू दाना तू अबिचलु तूही तू जाति मेरी पाती ॥
तू अडोलु कदे डोलहि नाही ता हम कैसी ताती ॥1॥
एकै एकै एक तूही ॥
एकै एकै तू राइआ ॥
तउ किरपा ते सुखु पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
तू सागरु हम हंस तुमारे तुम महि माणक लाला ॥
तुम देवहु तिलु संक न मानहु हम भुंचह सदा निहाला ॥2॥
हम बारिक तुम पिता हमारे तुम मुखि देवहु खीरा ॥
हम खेलह सभि लाड लडावह तुम सद गुणी गहीरा ॥3॥
तुम पूरन पूरि रहे संपूरन हम भी संगि अघाए ॥
मिलत मिलत मिलत मिलि रहिआ नानक कहणु न जाए ॥4॥6॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे मेरे प्रभू पातशाह! आप मेरे दिल की जानने वाले हैं। आप सदा कायम रहने वाले हैं। आप ही मेरी जाति हैं। आप ही मेरा कुल हैं (ऊँची जाति कुल का गुमान होने की जगह मुझे यही भरोसा है कि आप हर वक्त मेरे अंग-संग हैं)। हे पातशाह! माया के झोंके आपके ऊपर असर नहीं कर सकते। आप (माया के मुकाबले में) कभी डोलते नहीं (अगर मेरे पर आपकी कृपा रहे तो) मुझे भी कोई चिंता-फिक्र नहीं छू सकती। 1। हे प्रभू पातशाह! (हम जीवों के) सिर्फ एक आप ही (पति) हैं। आप ही हैं। आपकी मेहर से ही हम सुख हासिल करते हैं। 1। रहाउ। हे मेरे प्रभू पातशाह! आप समुंद्र हैं। हम आपके हंस हैं। आपके (चरणों) में रह के (आपकी सिफतसालाह के) मोती और लाल प्राप्त करते हैं। (ये मोती-लाल) आप हमें देते हैं (हमारे अवगुणों की तरफ़ देख के) आप रत्ती भर भी झिझक नहीं करते। हम जीव वह मोती-लाल सदा प्रयोग करते हैं और प्रसन्न रहते हैं। 2। हे मेरे प्रभू पातशाह! हम जीव आपके बच्चे हैं। आप हमारे पिता हैं। आप हमारे मुँह में दूध डालते हैं। (आपकी गोद में) हम खेलते हैं। सारे लाड करते हैं। आप गुणों के मालिक हैं और सदा गंभीर रहते हैं (हम बच्चों के अवगुणों की ओर नहीं देखते)। 3। हे मेरे प्रभू-पातशाह! आप सर्व-व्यापक हैं। सम्पूर्ण तौर पर हर जगह मौजूद हैं। हम जीव भी आपके चरणों में रह के (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त रहते हैं। हे नानक! (कहें: प्रभू-पातशाह की मेहर से जो जीव उस प्रभू को) मिलने का यतन हर वक्त करता रहता है। वह हर वक्त उसे मिला रहता है। और, उस जीव की आत्मिक अवस्था का बयान नहीं किया जा सकता। 4। 6।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

कर करि ताल पखावजु नैनहु माथै वजहि रबाबा ॥

रामकली महला 5 ॥
कर करि ताल पखावजु नैनहु माथै वजहि रबाबा ॥
करनहु मधु बासुरी बाजै जिहवा धुनि आगाजा ॥
निरति करे करि मनूआ नाचै आणे घूघर साजा ॥1॥
राम को निरतिकारी ॥
पेखै पेखनहारु दइआला जेता साजु सीगारी ॥1॥ रहाउ ॥
आखार मंडली धरणि सबाई ऊपरि गगनु चंदोआ ॥
पवनु विचोला करत इकेला जल ते ओपति होआ ॥
पंच ततु करि पुतरा कीना किरत मिलावा होआ ॥2॥
चंदु सूरजु दुइ जरे चरागा चहु कुंट भीतरि राखे ॥
दस पातउ पंच संगीता एकै भीतरि साथे ॥
भिंन भिंन होइ भाव दिखावहि सभहु निरारी भाखे ॥3॥
घरि घरि निरति होवै दिनु राती घटि घटि वाजै तूरा ॥
एकि नचावहि एकि भवावहि इकि आइ जाइ होइ धूरा ॥
कहु नानक सो बहुरि न नाचै जिसु गुरु भेटै पूरा ॥4॥7॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई! (हरेक जीव के) माथे पर (लिखे लेख। मानो) रबाब बज रहे हैं। (हरेक जीव के) कानों में (माया ही कर स्रोत। जैसे) मीठी (सुर वाली) बाँसुरी बज रही है। (हरेक जीव को) जीभ का चस्का (मानो) राग बन गया है। (हाथ माया कमाने में लगे हुए हैं। आँखें मायावी पदार्थों को ही देख रही हैं)। (हरेक मनुष्य का) मन (रबाब, बाँसुरी आदि इन साजों से) (मनुष्य के) हाथों को छैणे बना के और आँखों को तबला बना के; (पिछले किए कर्मों के संस्कारों को) घुंघरू आदि साज बना के हर वक्त (माया के हाथ में) नाच रहा है। 1। (हे भाई! जगत में) परमात्मा (की रची हुई रचना) का नाच हो रहा है। (इस नाच को) देखने की समर्था वाला दयावान प्रभू (नाच के) इस सारे साज-श्रृंगार को खुद देख रहा है। 1। रहाउ। (हे भाई! सब जीवों के मनों के नाचने के लिए) सारी धरती अखाड़ा बनी हुई है। इसके ऊपर आकाश चंदोआ (चाँदनी) बन के तना हुआ है। (जो शरीर) पानी से पैदा होता है (उसका और जीवात्मा का) मिलाप कराए रखने वाला (हरेक जीव के अंदर चल रहा हरेक) श्वास है। पाँच तत्वों को मिला के (परमात्मा ने हरेक जीव का) शरीर बनाया हुआ है। (जीव के पिछले किए हुए) कर्मों के अनुसार शरीर का मिलाप प्राप्त होया हुआ है। 2। (हे भाई! नृत्यकारी वाले इस धरती-अखाड़े में) चाँद और सूरज। दो दीए जल रहे हैं। चारों तरफ (रौशनी देने के लिए) टिकाए हुए हैं। (हरेक जीव की) दस इन्द्रियां और पाँचों (कामादिक) संगीतकार एक ही शरीर में इकट्ठे हैं। ये सारे अलग-अलग हो के अपने-अपने भाव (कलोल) दिखा रहे हैं। सब में अलग-अलग प्रेरणा (कामना) है। 3। हे भाई! दिन-रात हरेक (जीव की हरेक) इन्द्रिय में ये नृत्य हो रहा है। हरेक शरीर में माया का बाजा बज रहा है। माया के कई बाजे जीव को नचा रहे हैं। कई बाजे जीव को भटकाते फिरते हैं। बेअंत जीव (इनके प्रभाव तहत) ख्वार हो हो के जनम-मरण के चक्कर में पड़ रहे हैं। हे नानक! कहें: जिस जीव को पूरा गुरू मिल जाता है। वह (माया के हाथों में) बार बार नहीं नाचता। 4। 7।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 884 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 884 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।