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अंग 883 · रामकली

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अंग
883
रामकली
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  1. जिनि कीआ सोई प्रभु जाणै हरि का महलु अपारा ॥
  2. पवहु चरणा तलि ऊपरि आवहु ऐसी सेव कमावहु ॥
  3. आवत हरख न जावत दूखा नह बिआपै मन रोगनी ॥
  4. त्रै गुण रहत रहै निरारी साधिक सिध न जानै ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

जिनि कीआ सोई प्रभु जाणै हरि का महलु अपारा ॥

अंग 882 से चला आ रहा अंश

जिनि कीआ सोई प्रभु जाणै हरि का महलु अपारा ॥
भगति करी हरि के गुण गावा नानक दासु तुमारा ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! जिस परमात्मा ने (यह खेल) बनाया है वह (इसको चलाना) जानता है। उस परमात्मा का ठिकाना अपहुँच है (जीव उस परमात्मा की रजा को मर्जी को समझ नहीं सकता)। हे नानक! (कहें: हे प्रभू!) मैं आपका दास हूँ (मेहर करें) मैं आपकी भक्ति करता रहूँ। मैं आपके गुण गाता रहूँ। 4। 1।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

पवहु चरणा तलि ऊपरि आवहु ऐसी सेव कमावहु ॥

रामकली महला 5 ॥
पवहु चरणा तलि ऊपरि आवहु ऐसी सेव कमावहु ॥
आपस ते ऊपरि सभ जाणहु तउ दरगह सुखु पावहु ॥1॥
संतहु ऐसी कथहु कहाणी ॥ सुर पवित्र नर देव पवित्रा खिनु बोलहु गुरमुखि बाणी ॥1॥ रहाउ ॥
परपंचु छोडि सहज घरि बैसहु झूठा कहहु न कोई ॥
सतिगुर मिलहु नवै निधि पावहु इन बिधि ततु बिलोई ॥2॥
भरमु चुकावहु गुरमुखि लिव लावहु आतमु चीनहु भाई ॥
निकटि करि जाणहु सदा प्रभु हाजरु किसु सिउ करहु बुराई ॥3॥
सतिगुरि मिलिऐ मारगु मुकता सहजे मिले सुआमी ॥
धनु धनु से जन जिनी कलि महि हरि पाइआ जन नानक सद कुरबानी ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: रागु रामकली महला 5 ॥ हे संत जनो! सभी के चरणों तले पड़े रहें। अगर ऐसी सेवा-भक्ति की कमाई करेंगे, तो ऊँचे जीवन वाले बन जाएँगे। जब आप सभी को अपने से बेहतर समझने लगेंगे, तो परमात्मा की हजूरी में (टिके रह के) आनंद पाएँगे। 1। हे संतजनो! ऐसे प्रभू की सिफत-सालाह करते रहें। गुरू की शरण पड़ कर हर वक्त परमात्मा की सिफतसालाह की बाणी उचारते रहें। जिसकी बरकति से देवते-मनुष्य सभी पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे संत जनो! माया का मोह छोड़ के किसी को बुरा ना कहें। (इस तरह) आत्मिक अडोलता में टिके रहें। गुरू की शरण पड़े रहें। इस तरह सही जीवन-राह तलाश के दुनिया के सारे ही खजाने हासिल कर लेंगे (भाव, माया के मोह से मुक्ति हासिल कर लेंगे। बेमुथाज हो जाएँगे)। 2। हे भाई! गुरू की शरण पड़ कर गुरू चरणों में प्रीति जोड़ें। (मन में से) भटकना दूर करें। अपने आप की पहचान करें (अपने जीवन का आत्मावलोचन आत्म चिंतन करें)। परमात्मा को सदा अपने नजदीक प्रत्यक्ष अंग'संग बसता समझें। (फिर) किसी के भी साथ कोई बुराई नहीं कर सकेंगे (यही है सही जीवन-राह)। 3। हे भाई! अगर गुरू मिल जाए, तो (जिंदगी का) रास्ता खुला (विकारों की रुकावटों से आजाद) हो जाता है (आत्मिक अडोलता प्राप्त हो जाती है। इस) आत्मिक अडोलता में मालिक-प्रभू मिल जाता है। वे मनुष्य भाग्यशाली हैं। जिन्होंने इस जीवन में प्रभू के साथ मिलाप हासिल कर लिया। हे दास नानक! (कहें: मैं उनसे) सदा बलिहार जाता हूँ। 4। 2।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

आवत हरख न जावत दूखा नह बिआपै मन रोगनी ॥

रामकली महला 5 ॥
आवत हरख न जावत दूखा नह बिआपै मन रोगनी ॥
सदा अनंदु गुरु पूरा पाइआ तउ उतरी सगल बिओगनी ॥1॥
इह बिधि है मनु जोगनी ॥
मोहु सोगु रोगु लोगु न बिआपै तह हरि हरि हरि रस भोगनी ॥1॥ रहाउ ॥
सुरग पवित्रा मिरत पवित्रा पइआल पवित्र अलोगनी ॥
आगिआकारी सदा सुखु भुंचै जत कत पेखउ हरि गुनी ॥2॥
नह सिव सकती जलु नही पवना तह अकारु नही मेदनी ॥
सतिगुर जोग का तहा निवासा जह अविगत नाथु अगम धनी ॥3॥
तनु मनु हरि का धनु सभु हरि का हरि के गुण हउ किआ गनी ॥
कहु नानक हम तुम गुरि खोई है अंभै अंभु मिलोगनी ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई! अब अगर कोई आर्थिक लाभ हो (दुनियावी। मायावी लाभ हो) तो खुशी अपना जोर नहीं डालती। अगर कोई नुकसान हो जाए तो दुख नहीं होता। कोई भी चिंता अपना दबाव नहीं डाल सकती जब से (मुझे) गुरू मिला है। (मेरे अंदर) हर वक्त आनंद बना रहता है। (मेरे अंदर से प्रभू से) सारी दूरी समाप्त हो चुकी है। 1। (हे भाई! गुरू की कृपा से मेरा) मन इस तरह (प्रभू चरणों में) जुड़ा हुआ है। कि इस पर मोह। गम, रोग। लोक-लाज कोई भी अपना जोर नहीं डाल सकता। इस अवस्था में (यह मेरा मन) परमात्मा के मिलाप का आनंद ले रहा है। 1। रहाउ। (हे भाई! गुरू की कृपा से मेरे इस मन को) स्वर्ग, मातृ-लोक, पाताल (एक जैसे ही) पवित्र दिखाई दे रहे हैं। कोई लोक-लाज भी नहीं सताती। (गुरू की) आज्ञा में रह के (मेरा मन) सदा आनंदित रहता है। अब मैं जिधर देखता हूँ उधर ही सारे गुणों का मालिक प्रभू ही मुझे दिखाई देता है। 2। अब इस मन में रिद्धियां-सिद्धियां। तीर्थ स्नान, प्राणायाम, सांसारिक रूप। धरती के पदार्थ कोई भी नहीं टिक सकते। हे भाई! अब मेरे इस मन में गुरू के मिलाप का सदा के लिए निवास हो गया है। अदृश्य। अपहुँच मालिक पति-प्रभू भी वहीं बसता दिखाई दे गया है। 3। (अब मुझे समझ आ गई है कि) ये शरीर, ये जिंद, ये धन। सब कुछ उस प्रभू का ही दिया हुआ है (वह बड़ा बख्शिंद क्षमा करने वाला है) मैं उसके कौन-कौन से गुण बयान कर सकता हूँ। हे नानक! कहें: (हे भाई!) गुरू ने (मेरे मन में से) मेर-तेर समाप्त कर दी है (अब मैं प्रभू-चरणों में यूँ मिल गया हूँ। जैसे) पानी में पानी मिल जाता है। 4। 3।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग रामकली

त्रै गुण रहत रहै निरारी साधिक सिध न जानै ॥

रामकली महला 5 ॥
त्रै गुण रहत रहै निरारी साधिक सिध न जानै ॥
रतन कोठड़ी अंम्रित संपूरन सतिगुर कै खजानै ॥1॥
अचरजु किछु कहणु न जाई ॥
बसतु अगोचर भाई ॥1॥ रहाउ ॥
मोलु नाही कछु करणै जोगा किआ को कहै सुणावै ॥
कथन कहण कउ सोझी नाही जो पेखै तिसु बणि आवै ॥2॥
सोई जाणै करणैहारा कीता किआ बेचारा ॥
आपणी गति मिति आपे जाणै हरि आपे पूर भंडारा ॥3॥
ऐसा रसु अंम्रितु मनि चाखिआ त्रिपति रहे आघाई ॥
कहु नानक मेरी आसा पूरी सतिगुर की सरणाई ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई! वह कीमती पदार्थ माया के तीन गुणों के प्रभाव से अलग ही रहता है। वह पदार्थ योग-साधना करने वालों और साधना में सिद्ध योगियों के साथ भी सांझ नहीं डालता (भाव, जोग-साधना के द्वारा वह नाम-वस्तु नहीं मिलती)। हे भाई! वह कीमती पदार्थ गुरू के खजाने में है। वह पदार्थ है, प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले गुण-रत्नों से लबा-लब भरी हुई हृदय-कोठरी। 1। हे भाई! एक अनोखा तमाशा बना हुआ है। जिसकी बाबत कुछ नहीं कहा जा सकता। (आश्चर्यजनक तमाशा ये है कि गुरू के खजाने में ही प्रभू का नाम एक) कीमती चीज है जिस तक (मनुष्य की) ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। 1। रहाउ। हे भाई! उस नाम-वस्तु का मूल्य कोई भी जीव नहीं आँक सकता। कोई भी जीव उसका मूल्य कह नहीं सकता। बता नहीं सकता। (उस कीमती पदार्थ की तारीफें) बयान करने के लिए किसी की भी बुद्धि काम नहीं कर सकती। हाँ, जो मनुष्य उस वस्तु को देख लेता है। उसका उससे प्यार हो जाता है। 2। हे भाई! जिस सृजनहार ने वह पदार्थ बनाया है। उसका मूल्य वह स्वयं ही जानता है। उसके पैदा किए हुए जीवों में ऐसी समर्था नहीं। प्रभू स्वयं ही उस कीमती पदार्थ से भरे हुए खजानों का मालिक है। और, वह स्वयं कैसा है। कितना बड़ा है, ये बात वह स्वयं ही जानता है। 3। आत्मिक जीवन देने वाले उस आश्चर्यजनक नाम-रस को (गुरू की कृपा से) मैंने अपने मन में चख लिया है। अब मैं (माया की तृष्णा की ओर से) पूरी तौर पर अघा गया हूँ। हे नानक! कहें: गुरू की शरण पड़ कर मेरी लालसा पूरी हो गई है (मुझे वह कीमती पदार्थ मिल गया है)। 4। 4

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 883 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 883 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।