राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिनि कीआ सोई प्रभु जाणै हरि का महलु अपारा ॥ भगति करी हरि के गुण गावा नानक दासु तुमारा ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस परमात्मा ने (यह खेल) बनाया है वह (इसको चलाना) जानता है। उस परमात्मा का ठिकाना अपहुँच है (जीव उस परमात्मा की रजा को मर्जी को समझ नहीं सकता)। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं आपका दास हूँ (मेहर कर) मैं आपकी भक्ति करता रहूँ। मैं आपके गुण गाता रहूँ। 4। 1।
रामकली महला 5 ॥ पवहु चरणा तलि ऊपरि आवहु ऐसी सेव कमावहु ॥ आपस ते ऊपरि सभ जाणहु तउ दरगह सुखु पावहु ॥1॥ संतहु ऐसी कथहु कहाणी ॥ सुर पवित्र नर देव पवित्रा खिनु बोलहु गुरमुखि बाणी ॥1॥ रहाउ ॥ परपंचु छोडि सहज घरि बैसहु झूठा कहहु न कोई ॥ सतिगुर मिलहु नवै निधि पावहु इन बिधि ततु बिलोई ॥2॥ भरमु चुकावहु गुरमुखि लिव लावहु आतमु चीनहु भाई ॥ निकटि करि जाणहु सदा प्रभु हाजरु किसु सिउ करहु बुराई ॥3॥ सतिगुरि मिलिऐ मारगु मुकता सहजे मिले सुआमी ॥ धनु धनु से जन जिनी कलि महि हरि पाइआ जन नानक सद कुरबानी ॥4॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: रागु रामकली महला 5 ॥ हे संत जनो ! सभी के चरणों तले पड़े रहो। अगर ऐसी सेवा-भक्ति की कमाई करेंगे। तो ऊँचे जीवन वाले बन जाएँगे। जब आप सभी को अपने से बेहतर समझने लगोगे। तो परमात्मा की हजूरी में (टिके रह के) आनंद पाएँगे। 1। हे संतजनो ! ऐसे प्रभू की सिफत-सालाह करते रहो। गुरू की शरण पड़ कर हर वक्त परमात्मा की सिफतसालाह की बाणी उचारते रहो। जिसकी बरकति से देवते-मनुष्य सभी पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे संत जनो ! माया का मोह छोड़ के किसी को बुरा ना कहो। (इस तरह) आत्मिक अडोलता में टिके रहो। गुरू की शरण पड़े रहो। इस तरह सही जीवन-राह तलाश के दुनिया के सारे ही खजाने हासिल कर लेंगे (भाव। माया के मोह से मुक्ति हासिल कर लेंगे। बेमुथाज हो जाओगे)। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर गुरू चरणों में प्रीति जोड़ो। (मन में से) भटकना दूर करो। अपने आप की पहचान करो (अपने जीवन का आत्मावलोचन आत्म चिंतन करो)। परमात्मा को सदा अपने नजदीक प्रत्यक्ष अंग’संग बसता समझो। (फिर) किसी के भी साथ कोई बुराई नहीं कर सकोगे (यही है सही जीवन-राह)। 3। हे भाई ! अगर गुरू मिल जाए। तो (जिंदगी का) रास्ता खुला (विकारों की रुकावटों से आजाद) हो जाता है (आत्मिक अडोलता प्राप्त हो जाती है। इस) आत्मिक अडोलता में मालिक-प्रभू मिल जाता है। वे मनुष्य भाग्यशाली हैं। जिन्होंने इस जीवन में प्रभू के साथ मिलाप हासिल कर लिया। हे दास नानक ! (कह- मैं उनसे) सदा बलिहार जाता हूँ। 4। 2।
रामकली महला 5 ॥ आवत हरख न जावत दूखा नह बिआपै मन रोगनी ॥ सदा अनंदु गुरु पूरा पाइआ तउ उतरी सगल बिओगनी ॥1॥ इह बिधि है मनु जोगनी ॥ मोहु सोगु रोगु लोगु न बिआपै तह हरि हरि हरि रस भोगनी ॥1॥ रहाउ ॥ सुरग पवित्रा मिरत पवित्रा पइआल पवित्र अलोगनी ॥ आगिआकारी सदा सुखु भुंचै जत कत पेखउ हरि गुनी ॥2॥ नह सिव सकती जलु नही पवना तह अकारु नही मेदनी ॥ सतिगुर जोग का तहा निवासा जह अविगत नाथु अगम धनी ॥3॥ तनु मनु हरि का धनु सभु हरि का हरि के गुण हउ किआ गनी ॥ कहु नानक हम तुम गुरि खोई है अंभै अंभु मिलोगनी ॥4॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! अब अगर कोई आर्थिक लाभ हो (दुनियावी। मायावी लाभ हो) तो खुशी अपना जोर नहीं डालती। अगर कोई नुकसान हो जाए तो दुख नहीं होता। कोई भी चिंता अपना दबाव नहीं डाल सकती जब से (मुझे) गुरू मिला है। (मेरे अंदर) हर वक्त आनंद बना रहता है। (मेरे अंदर से प्रभू से) सारी दूरी समाप्त हो चुकी है। 1। (हे भाई ! गुरू की कृपा से मेरा) मन इस तरह (प्रभू चरणों में) जुड़ा हुआ है। कि इस पर मोह। गम। रोग। लोक-लाज कोई भी अपना जोर नहीं डाल सकता। इस अवस्था में (यह मेरा मन) परमात्मा के मिलाप का आनंद ले रहा है। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू की कृपा से मेरे इस मन को) स्वर्ग। मातृ-लोक। पाताल (एक जैसे ही) पवित्र दिखाई दे रहे हैं। कोई लोक-लाज भी नहीं सताती। (गुरू की) आज्ञा में रह के (मेरा मन) सदा आनंदित रहता है। अब मैं जिधर देखता हूँ उधर ही सारे गुणों का मालिक प्रभू ही मुझे दिखाई देता है। 2। अब इस मन में रिद्धियां-सिद्धियां। तीर्थ स्नान। प्राणायाम। सांसारिक रूप। धरती के पदार्थ कोई भी नहीं टिक सकते। हे भाई ! अब मेरे इस मन में गुरू के मिलाप का सदा के लिए निवास हो गया है। अदृश्य। अपहुँच मालिक पति-प्रभू भी वहीं बसता दिखाई दे गया है। 3। (अब मुझे समझ आ गई है कि) ये शरीर। ये जिंद। ये धन। सब कुछ उस प्रभू का ही दिया हुआ है (वह बड़ा बख्शिंद क्षमा करने वाला है) मैं उसके कौन-कौन से गुण बयान कर सकता हूँ। हे नानक ! कह- (हे भाई !) गुरू ने (मेरे मन में से) मेर-तेर समाप्त कर दी है (अब मैं प्रभू-चरणों में यूँ मिल गया हूँ। जैसे) पानी में पानी मिल जाता है। 4। 3।
रामकली महला 5 ॥ त्रै गुण रहत रहै निरारी साधिक सिध न जानै ॥ रतन कोठड़ी अंम्रित संपूरन सतिगुर कै खजानै ॥1॥ अचरजु किछु कहणु न जाई ॥ बसतु अगोचर भाई ॥1॥ रहाउ ॥ मोलु नाही कछु करणै जोगा किआ को कहै सुणावै ॥ कथन कहण कउ सोझी नाही जो पेखै तिसु बणि आवै ॥2॥ सोई जाणै करणैहारा कीता किआ बेचारा ॥ आपणी गति मिति आपे जाणै हरि आपे पूर भंडारा ॥3॥ ऐसा रसु अंम्रितु मनि चाखिआ त्रिपति रहे आघाई ॥ कहु नानक मेरी आसा पूरी सतिगुर की सरणाई ॥4॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! वह कीमती पदार्थ माया के तीन गुणों के प्रभाव से अलग ही रहता है। वह पदार्थ योग-साधना करने वालों और साधना में सिद्ध योगियों के साथ भी सांझ नहीं डालता (भाव। जोग-साधना के द्वारा वह नाम-वस्तु नहीं मिलती)। हे भाई ! वह कीमती पदार्थ गुरू के खजाने में है। वह पदार्थ है- प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले गुण-रत्नों से लबा-लब भरी हुई हृदय-कोठरी। 1। हे भाई ! एक अनोखा तमाशा बना हुआ है। जिसकी बाबत कुछ नहीं कहा जा सकता। (आश्चर्यजनक तमाशा ये है कि गुरू के खजाने में ही प्रभू का नाम एक) कीमती चीज है जिस तक (मनुष्य की) ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। 1। रहाउ। हे भाई ! उस नाम-वस्तु का मूल्य कोई भी जीव नहीं आँक सकता। कोई भी जीव उसका मूल्य कह नहीं सकता। बता नहीं सकता। (उस कीमती पदार्थ की तारीफें) बयान करने के लिए किसी की भी बुद्धि काम नहीं कर सकती। हाँ। जो मनुष्य उस वस्तु को देख लेता है। उसका उससे प्यार हो जाता है। 2। हे भाई ! जिस सृजनहार ने वह पदार्थ बनाया है। उसका मूल्य वह स्वयं ही जानता है। उसके पैदा किए हुए जीवों में ऐसी समर्था नहीं। प्रभू स्वयं ही उस कीमती पदार्थ से भरे हुए खजानों का मालिक है। और। वह स्वयं कैसा है। कितना बड़ा है – ये बात वह स्वयं ही जानता है। 3। आत्मिक जीवन देने वाले उस आश्चर्यजनक नाम-रस को (गुरू की कृपा से) मैंने अपने मन में चख लिया है। अब मैं (माया की तृष्णा की ओर से) पूरी तौर पर अघा गया हूँ। हे नानक ! कह- गुरू की शरण पड़ कर मेरी लालसा पूरी हो गई है (मुझे वह कीमती पदार्थ मिल गया है) ।4। 4
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस परमात्मा ने (यह खेल) बनाया है वह (इसको चलाना) जानता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।