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अंग 882

अंग
882
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामकली महला 4 ॥
सतगुर दइआ करहु हरि मेलहु मेरे प्रीतम प्राण हरि राइआ ॥
हम चेरी होइ लगह गुर चरणी जिनि हरि प्रभ मारगु पंथु दिखाइआ ॥1॥
राम मै हरि हरि नामु मनि भाइआ ॥
मै हरि बिनु अवरु न कोई बेली मेरा पिता माता हरि सखाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मेरे इकु खिनु प्रान न रहहि बिनु प्रीतम बिनु देखे मरहि मेरी माइआ ॥
धनु धनु वड भाग गुर सरणी आए हरि गुर मिलि दरसनु पाइआ ॥2॥
मै अवरु न कोई सूझै बूझै मनि हरि जपु जपउ जपाइआ ॥
नामहीण फिरहि से नकटे तिन घसि घसि नक वढाइआ ॥3॥
मो कउ जगजीवन जीवालि लै सुआमी रिद अंतरि नामु वसाइआ ॥
नानक गुरू गुरू है पूरा मिलि सतिगुर नामु धिआइआ ॥4॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 4 ॥ हे हरी ! हे मेरे प्रीतम ! हे मेरी जिंद के पातशाह ! मेहर कर। मुझे गुरू मिला। हे भाई ! जिस गुरू ने (सदा) परमात्मा के मिलाप का रास्ता दिखाया है। मैं उसका दास बन के उसके चरणों में गिरा रहूँ। 1। हे (मेरे) राम ! हे हरी ! मेरे मन को आपका नाम अच्छा लगता है। हे भाई ! परमात्मा के बिना मुझे और कोई मददगार नहीं दिखता। परमात्मा ही मेरी माँ है। परमात्मा ही मेरा पिता है। परमात्मा ही मेरा साथी है। 1। रहाउ। हे मेरी माँ ! प्रीतम (गुरू के मिलाप) के बिना मेरी जिंद एक छिन के लिए भी नहीं रह सकती। गुरू के दर्शन किए बिना मेरी (आत्मिक) मौत होती है। वह मनुष्य धन्य हैं धन्य हैं। बहुत भाग्यों वाले हैं। जो गुरू की शरण आ पड़ते हैं। गुरू को मिल के उन्होंने परमात्मा के दर्शन कर लिए हैं। 2। (हे मेरी माँ ! प्रभू के नाम के जाप के बिना) मुझे कोई भी और काम नहीं सूझता (अच्छा नहीं लगता)। जैसे गुरू जपने के लिए प्रेरित करता है। मैं अपने मन में प्रभू के नाम का जाप ही जपता हूँ। हे भाई ! जो मनुष्य नाम से वंचित रहते हैं। वे बेशर्मों की तरह (दुनियां में) चलते-फिरते हैं। वे अनेकों बार बेईज्जती करा के दुखी होते हैं। 3। हे जगत के जीवन प्रभू ! हे मेरे मालिक प्रभू ! मेरे हृदय में अपना नाम बसाए रख। और मुझे आत्मिक जीवन दिए रख। हे नानक ! (इस नाम की दाति देने का समर्थ) गुरू पूरा ही है गुरू पूरा ही है। गुरू को मिल के ही प्रभू का नाम सिमरा जा सकता है। 4। 5।
रामकली महला 4 ॥
सतगुरु दाता वडा वड पुरखु है जितु मिलिऐ हरि उर धारे ॥
जीअ दानु गुरि पूरै दीआ हरि अंम्रित नामु समारे ॥1॥
राम गुरि हरि हरि नामु कंठि धारे ॥
गुरमुखि कथा सुणी मनि भाई धनु धनु वड भाग हमारे ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि कोटि तेतीस धिआवहि ता का अंतु न पावहि पारे ॥
हिरदै काम कामनी मागहि रिधि मागहि हाथु पसारे ॥2॥
हरि जसु जपि जपु वडा वडेरा गुरमुखि रखउ उरि धारे ॥
जे वड भाग होवहि ता जपीऐ हरि भउजलु पारि उतारे ॥3॥
हरि जन निकटि निकटि हरि जन है हरि राखै कंठि जन धारे ॥
नानक पिता माता है हरि प्रभु हम बारिक हरि प्रतिपारे ॥4॥6॥18॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 4 ॥ हे भाई ! प्रभू के नाम की दाति देने वाला गुरू ही सब से बड़ा व्यक्ति है। गुरू को मिलने से मनुष्य परमात्मा को अपने हृदय में बसा लेता है। जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने आत्मिक जीवन की दाति दे दी। वह मनुष्य प्रभू के जीवन देने वाले नाम को (हृदय में) संभाल के रखता है। 1। हे मेरे राम ! मैं बहुत भाग्यशाली हो गया हूँ। गुरू के द्वारा। हे हरी ! आपका नाम मैंने अपने गले में परो लिया है। गुरू की शरण पड़ कर मैंने आपकी सिफत सालाह सुनी है। और वह मेरे मन को प्यारी लग रही है। 1। रहाउ। हे भाई ! तेतीस करोड़ (देवते) परमात्मा का ध्यान धरते रहते हैं। पर उसके गुणों का अंत। गुणों का परला छोर नहीं पा सकते। (अनेकों ऐसे भी है जो अपने) हृदय में काम-वासना धार के (परमात्मा के दर से) स्त्री (ही) माँगते हैं। (उसके आगे) हाथ पसार के (दुनिया के) धन पदार्थ (ही) माँगते हैं। 2। हे भाई ! परमात्मा की सिफत-सालाह किया कर। परमात्मा के नाम का जाप ही सबसे बड़ा काम है। मैं तो गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम ही अपने हृदय में बसाता हॅूँ। हे भाई ! यदि (कोई) अति भाग्यशाली हो तो ही हरी-नाम जपा जा सकता है (जो मनुष्य जपता है उसको) संसार-समुंद्र से पार लंघा देता है। 3। हे भाई ! संत जन परमात्मा के नजदीक बसते हैं। परमात्मा संतजनों के पास बसता है। परमात्मा अपने सेवकों को अपने गले से लगा के रखता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा हमारा पिता है। परमात्मा हमारी माँ है। हमें बच्चों को परमात्मा ही पालता है। 4। 6। 18।
रागु रामकली महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किरपा करहु दीन के दाते मेरा गुणु अवगणु न बीचारहु कोई ॥
माटी का किआ धोपै सुआमी माणस की गति एही ॥1॥
मेरे मन सतिगुरु सेवि सुखु होई ॥
जो इछहु सोई फलु पावहु फिरि दूखु न विआपै कोई ॥1॥ रहाउ ॥
काचे भाडे साजि निवाजे अंतरि जोति समाई ॥
जैसा लिखतु लिखिआ धुरि करतै हम तैसी किरति कमाई ॥2॥
मनु तनु थापि कीआ सभु अपना एहो आवण जाणा ॥
जिनि दीआ सो चिति न आवै मोहि अंधु लपटाणा ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु रामकली महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे गरीबों पर बख्शिश करने वाले प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर। मेरा कोई गुण ना विचारना। मेरा कोई अवगुण ना बिचारना (मेरे अंदर तो अवगुण ही अवगुण हैं)। (जैसे पानी से धोने पर) मिट्टी को धोया नहीं जा सकता। हे मालिक प्रभू ! हम जीवों की भी यही हालत है। 1। हे मेरे मन ! गुरू की शरण पड़ा रह (गुरू के दर पर रहने से ही) आनंद मिलता है। (गुरू के दर पर रह के) जो कामना (आप) करेगा। वही फल हासिल कर लेगा। (इस तरह) कोई भी दुख अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! (हमारे यह) नाशवंत शरीर बना के (परमात्मा ने ही इनको) बड़प्पन दिया हुआ है (क्योंकि इन नाशवंत शरीरों के) अंदर उसकी ज्योति टिकी हुई है। हे भाई ! (हमारे किए हुए कर्मों के अनुसार) करतार ने धुर-दरगाह से जैसे (संस्कारों के) लेख (हमारे अंदर) लिख दिए हैं। हम जीव (अब भी) वैसे ही कर्मों की कमाई किए जाते हैं। 2। हे भाई ! मनुष्य इस जीवात्मा को। इस शरीर को सदा अपना माने रहता है। यह अपनत्व ही (मनुष्य के लिए) जनम-मरण (के चक्कर का कारण बनी रहती) है। जिस परमात्मा ने ये प्राण (जीवात्मा) दिए हैं ये शरीर दिया है वह उसके चित्त में (कभी) नहीं बसता। अंधा मनुष्य (जिंद और शरीर के) मोह में फसा रहता है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 4 ॥ हे हरी ! हे मेरे प्रीतम ! हे मेरी जिंद के पातशाह ! मेहर कर।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।