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880
रामकली
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· शबद · राग रामकली
सतजुगि सचु कहै सभु कोई ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रामकली महला 3 घरु 1 ॥
सतजुगि सचु कहै सभु कोई ॥
घरि घरि भगति गुरमुखि होई ॥
सतजुगि धरमु पैर है चारि ॥
गुरमुखि बूझै को बीचारि ॥1॥
जुग चारे नामि वडिआई होई ॥
जि नामि लागै सो मुकति होवै गुर बिनु नामु न पावै कोई ॥1॥ रहाउ ॥
त्रेतै इक कल कीनी दूरि ॥
पाखंडु वरतिआ हरि जाणनि दूरि ॥
गुरमुखि बूझै सोझी होई ॥
अंतरि नामु वसै सुखु होई ॥2॥
दुआपुरि दूजै दुबिधा होइ ॥
भरमि भुलाने जाणहि दोइ ॥
दुआपुरि धरमि दुइ पैर रखाए ॥
गुरमुखि होवै त नामु द्रिड़ाए ॥3॥
कलजुगि धरम कला इक रहाए ॥
इक पैरि चलै माइआ मोहु वधाए ॥
माइआ मोहु अति गुबारु ॥
सतगुरु भेटै नामि उधारु ॥4॥
सभ जुग महि साचा एको सोई ॥
सभ महि सचु दूजा नही कोई ॥
साची कीरति सचु सुखु होई ॥
गुरमुखि नामु वखाणै कोई ॥5॥
सभ जुग महि नामु ऊतमु होई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
हरि नामु धिआए भगतु जनु सोई ॥
नानक जुगि जुगि नामि वडिआई होई ॥6॥1॥
रामकली महला 3 घरु 1 ॥
सतजुगि सचु कहै सभु कोई ॥
घरि घरि भगति गुरमुखि होई ॥
सतजुगि धरमु पैर है चारि ॥
गुरमुखि बूझै को बीचारि ॥1॥
जुग चारे नामि वडिआई होई ॥
जि नामि लागै सो मुकति होवै गुर बिनु नामु न पावै कोई ॥1॥ रहाउ ॥
त्रेतै इक कल कीनी दूरि ॥
पाखंडु वरतिआ हरि जाणनि दूरि ॥
गुरमुखि बूझै सोझी होई ॥
अंतरि नामु वसै सुखु होई ॥2॥
दुआपुरि दूजै दुबिधा होइ ॥
भरमि भुलाने जाणहि दोइ ॥
दुआपुरि धरमि दुइ पैर रखाए ॥
गुरमुखि होवै त नामु द्रिड़ाए ॥3॥
कलजुगि धरम कला इक रहाए ॥
इक पैरि चलै माइआ मोहु वधाए ॥
माइआ मोहु अति गुबारु ॥
सतगुरु भेटै नामि उधारु ॥4॥
सभ जुग महि साचा एको सोई ॥
सभ महि सचु दूजा नही कोई ॥
साची कीरति सचु सुखु होई ॥
गुरमुखि नामु वखाणै कोई ॥5॥
सभ जुग महि नामु ऊतमु होई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
हरि नामु धिआए भगतु जनु सोई ॥
नानक जुगि जुगि नामि वडिआई होई ॥6॥1॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रामकली महला 3 घरु 1 ॥ हे भाई! ये प्रचलित ख्याल है कि सतियुग में 'सत्य' (बोलने के कर्म को प्रधानता) है। हरेक घर में (सच बोलना ही प्रधान है)। और सतियुग में (धरती को सहारा देने वाला) धर्म (-बैल) चार पैरों वाला रहता है (धर्म अपने संपूर्ण स्वरूप वाला होता है)। (पर, हे भाई!) कोई विरला मनुष्य ही गुरू के माध्यम से विचारवान हो के यह समझता है कि (सतियुग में भी) गुरू की शरण पड़ कर ही प्रभू की भक्ति हो सकती है (और सतियुग में भी परमात्मा की भक्ति ही प्रधान कर्म है)। 1। हे भाई! चारों ही युगों में जीव को (परमात्मा के) नाम में जुड़ने के कारण ही आदर मिलता है। जो भी मनुष्य प्रभू के नाम में सुरति जोड़ता है। उसको विकारों से मुक्ति मिल जाती है। (पर, ये भी याद रखें कि) कोई जीव भी गुरू (की शरण) के बिना (परमात्मा का नाम) प्राप्त नहीं कर सकता। 1। रहाउ। (हे भाई ये विचार भी आम प्रचलित है कि) त्रेते युग में एक कला दूर कर दी गई (धरम बैल का एक पैर नकारा हो गया)। (जगत में) पाखण्ड का बोलबाला हो गया। लोग परमात्मा को कहीं दूर बसता समझने लग पड़े। (पर, हे भाई!) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (जीवन-युक्ति का) ज्ञान प्राप्त करता है। उसको समझ आ जाती है (कि बनाए हुए त्रेते युग में भी तब ही) सुख मिलता है यदि मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम बसता हैं। 2। (हे भाई! ये विचार आम प्रचलित है कि) द्वापर युग में लोग द्वैत में फंस गए। लोगों के हृदय में भेदभाव प्रभावी हो गया। भटकन में पड़ कर लोग गलत राह पर चल पड़े। मेर-तेर को ही (अच्छाई) मानने लगे। द्वापर में धरम (बैल) ने (अपने) दो ही पैर टिकाए हुए थे। पर जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है तब वह (इस कच्चे ख्याल को त्याग के परमात्मा का) नाम अपने दिल में पक्की तरह बैठाता है। 3। (हे भाई! आम तौर पर लोग यही मानते हैं कि) कलियुग में धरम की एक ही कला रह गई है। (धरम-बैल) एक ही पैर के भार पर चलता है। (जगत में) माया (जीव के हृदय में अपना) मोह बढ़ा रही है। (दुनिया में) माया के मोह का घोर अंधकार बना हुआ है। (पर, हे भाई! जिस मनुष्य को) गुरू मिल जाता है। उसको प्रभू के नाम में जोड़ कर (कलियुग में भी माया के घोर अंधेरे से) बचा लेता है। 4। हे भाई! सारे युगों में वह परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला है। सब जीवों में भी वह सदा स्थिर प्रभू ही बसता है। उसके बिना कहीं भी कोई और नहीं। (जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा की) सदा कायम रहने वाली महिमा बसती है। उसको हरेक सुख प्राप्त है। (पर, हाँ) गुरू की शरण पड़ कर ही मनुष्य परमात्मा का नाम जप सकता है। 5। हे भाई! सारे युगों में प्रभू का नाम जपना ही (सब कर्मों से) श्रेष्ठ कर्म है इस बात को कोई वह विरला मनुष्य ही समझता है जो गुरू की शरण पड़ता है। (युग कोई भी हो) वही मनुष्य भगत है जो परमात्मा का नाम जपता है। हे नानक! (ये बात पक्की जान लें कि) हरेक युग में प्रभू के नाम की बरकति से ही आदर मिलता है। 6। 1।
· शबद · राग रामकली
जे वड भाग होवहि वडभागी ता हरि हरि नामु धिआवै ॥
रामकली महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जे वड भाग होवहि वडभागी ता हरि हरि नामु धिआवै ॥
नामु जपत नामे सुखु पावै हरि नामे नामि समावै ॥1॥
गुरमुखि भगति करहु सद प्राणी ॥
हिरदै प्रगासु होवै लिव लागै गुरमति हरि हरि नामि समाणी ॥1॥ रहाउ ॥
हीरा रतन जवेहर माणक बहु सागर भरपूरु कीआ ॥
जिसु वड भागु होवै वड मसतकि तिनि गुरमति कढि कढि लीआ ॥2॥
रतनु जवेहरु लालु हरि नामा गुरि काढि तली दिखलाइआ ॥
भागहीण मनमुखि नही लीआ त्रिण ओलै लाखु छपाइआ ॥3॥
मसतकि भागु होवै धुरि लिखिआ ता सतगुरु सेवा लाए ॥
नानक रतन जवेहर पावै धनु धनु गुरमति हरि पाए ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जे वड भाग होवहि वडभागी ता हरि हरि नामु धिआवै ॥
नामु जपत नामे सुखु पावै हरि नामे नामि समावै ॥1॥
गुरमुखि भगति करहु सद प्राणी ॥
हिरदै प्रगासु होवै लिव लागै गुरमति हरि हरि नामि समाणी ॥1॥ रहाउ ॥
हीरा रतन जवेहर माणक बहु सागर भरपूरु कीआ ॥
जिसु वड भागु होवै वड मसतकि तिनि गुरमति कढि कढि लीआ ॥2॥
रतनु जवेहरु लालु हरि नामा गुरि काढि तली दिखलाइआ ॥
भागहीण मनमुखि नही लीआ त्रिण ओलै लाखु छपाइआ ॥3॥
मसतकि भागु होवै धुरि लिखिआ ता सतगुरु सेवा लाए ॥
नानक रतन जवेहर पावै धनु धनु गुरमति हरि पाए ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 4 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। यदि कोई मनुष्य भाग्यशाली हो। यदि किसी मनुष्य की अति भाग्यशाली किस्मत हो जाए, तो वह सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। नाम जपने से वह मनुष्य नाम में ही आनंद प्राप्त करता है। प्रभू के नाम में ही लीन रहता है। 1। हे भाई! गुरू की शरण पड़ कर (गुरू के बताए हुए जीवन राह पर चल कर) सदा परमात्मा की भक्ति किया करें। (भक्ति की बरकति से) हृदय में (ऊँचे आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। (परमात्मा के चरणों में) सुरति जुड़ जाती है। गुरू के उपदेश से परमात्मा के नाम में लीनता हो जाती है। 1। रहाउ। (परमात्मा के गुण। जैसे) हीरे-रतन-जवाहर-मोती हैं। (परमात्मा ने हरेक मनुष्य का) हृदय-सरोवर इनसे लबालब भर रखा है। (पर सिर्फ) उस मनुष्य ने ही गुरू के उपदेश की बरकति से इनको (अंदर छुपे हुओं को) निकाल के संभाल रखा है। जिसके माथे पर बहुत भाग्य जाग उठे हैं। 2। (हे भाई!) परमात्मा का नाम रतन जवाहर लाल (जैसा कीमती) है (हरेक मनुष्य के अंदर छुपा हुआ है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उसको) गुरू ने (उसके अंदर से ही) निकाल के (उसकी) तली पर (रख के) दिखा दिया है। पर अपने मन के पीछे चलने वाले बद्-किस्मत मनुष्य ने वह रतन नहीं पाया। (उसकी जानिब तो) लाख रुपया तीले के पीछे छुपा हुआ है। 3। (हे भाई!) अगर धुर-दरगाह से लिखे हुए लेख किसी मनुष्य के माथे पर जाग जाएं तो गुरू उसको प्रभू की भक्ति से जोड़ देता है। हे नानक! (वह मनुष्य अंदर छुपे हुए गुण-रूपी) रतन-जवाहर ढूँढ लेता है। वह मनुष्य भाग्यशाली हो जाता है। गुरू की मति ले के वह मनुष्य परमात्मा का मिलाप हासिल कर लेता है। 4। 1।
· शबद · राग रामकली
राम जना मिलि भइआ अनंदा हरि नीकी कथा सुनाइ ॥
रामकली महला 4 ॥
राम जना मिलि भइआ अनंदा हरि नीकी कथा सुनाइ ॥
दुरमति मैलु गई सभ नीकलि सतसंगति मिलि बुधि पाइ ॥1॥
राम जना मिलि भइआ अनंदा हरि नीकी कथा सुनाइ ॥
दुरमति मैलु गई सभ नीकलि सतसंगति मिलि बुधि पाइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला 4 ॥ हे भाई! प्रभू के सेवक को मिल के (मन में) आनंद पैदा होता है। (प्रभू का सेवक) प्रभू की सुंदर सिफत-सालाह सुना के (सुनने वाले के दिल में आनंद पैदा कर देता है)। साध-संगति में मिल के मनुष्य (श्रेष्ठ) मति सीख लेता है। (उसके अंदर से) बुरी बुद्धि वाली सारी मैल दूर हो जाती है। 1।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 880 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 880 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।