अंग 878

अंग
878
रामकली
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
छिअ दरसन की सोझी पाइ ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: इस तरह उस विरक्त को छह ही भेषों की अस्लियत की समझ आ जाती है (भाव। उसे इन छह भेषों की आवश्यक्ता नहीं रह जाती)। 4। 5।
रामकली महला 1 ॥
हम डोलत बेड़ी पाप भरी है पवणु लगै मतु जाई ॥
सनमुख सिध भेटण कउ आए निहचउ देहि वडिआई ॥1॥
गुर तारि तारणहारिआ ॥
देहि भगति पूरन अविनासी हउ तुझ कउ बलिहारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
सिध साधिक जोगी अरु जंगम एकु सिधु जिनी धिआइआ ॥
परसत पैर सिझत ते सुआमी अखरु जिन कउ आइआ ॥2॥
जप तप संजम करम न जाना नामु जपी प्रभ तेरा ॥
गुरु परमेसरु नानक भेटिओ साचै सबदि निबेरा ॥3॥6॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ (हे गुरू !) मेरी जिंदगी की बेड़ी पापों से भरी हुई है। माया का झक्खड़ झूल रहा है। मुझे डर लग रहा है कि कहीं (मेरी बेड़ी) डूब ना जाए। (अच्छा हूँ बुरा हूँ) परमात्मा को मिलने के लिए (प्रभू के चरणों में जुड़ने के वास्ते) मैं शर्म उतार के आपके दर पर आ गया हूँ। हे गुरू ! मुझे अवश्य सिफत-सालाह की दाति दे। 1। (संसार-समुंद्र की विकारों की लहरों में से) उद्धार करने वाले हे गुरू ! मुझे (इन लहरों में से) पार लंघा ले। सदा कायम रहने वाले और सर्व-व्यापक परमात्मा की भक्ति (की दाति) मुझे दे। मैं आपसे सदके जाता हूँ। 1। रहाउ। वे एक परमात्मा को अपने चित्त में बसाते हैं। वही हैं दरअसल। सिद्ध। साधिक। जोगी और जंगम। जिनको गुरू का उपदेश मिल जाता है वे मालिक-प्रभू के चरण छू के (जिंदगी की बाज़ी में) कामयाब हो जाते हैं। 2। हे प्रभू ! (जन्मों-जन्मांतरों से किए कर्मों का लेखा निपटाने के लिए) मैं किसी जप तप संजम वगैरा धार्मिक कर्म को संपूर्ण नहीं समझता। मैं आपका नाम ही सिमरता हूँ। हे नानक ! जिसको गुरू मिल जाता है उसको परमात्मा मिल जाता है (क्योंकि) गुरू के सच्चे शबद से उसके जन्मों-जन्मांतरों के किए कर्मों का लेखा निबड़ जाता है। 3। 6।
रामकली महला 1 ॥
सुरती सुरति रलाईऐ एतु ॥
तनु करि तुलहा लंघहि जेतु ॥
अंतरि भाहि तिसै तू रखु ॥
अहिनिसि दीवा बलै अथकु ॥1॥
ऐसा दीवा नीरि तराइ ॥
जितु दीवै सभ सोझी पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
हछी मिटी सोझी होइ ॥
ता का कीआ मानै सोइ ॥
करणी ते करि चकहु ढालि ॥
ऐथै ओथै निबही नालि ॥2॥
आपे नदरि करे जा सोइ ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोइ ॥
तितु घटि दीवा निहचलु होइ ॥
पाणी मरै न बुझाइआ जाइ ॥
ऐसा दीवा नीरि तराइ ॥3॥
डोलै वाउ न वडा होइ ॥
जापै जिउ सिंघासणि लोइ ॥
खत्री ब्राहमणु सूदु कि वैसु ॥
निरति न पाईआ गणी सहंस ॥
ऐसा दीवा बाले कोइ ॥
नानक सो पारंगति होइ ॥4॥7॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ (पहले तो) इस मनुष्य-जन्म में परमात्मा (के चरणों) में सुरति जोड़नी चाहिए। शरीर को (विकारों के भार से बचा के हल्का फूल कर ले। ऐसे शरीर को) तुलहा बना। जिस (शरीर) की सहायता से आप (संसार-समुंद्र की विकारों की लहरों में से) पार लांघ सकेगा। आपके (अपने) अंदर ब्रहमाग्नि (ब्रहम+अग्नि। ईश्वरीय ज्योति) है। उसको (संभाल के) रख। (इस तरह आपके अंदर) दिन-रात लगातार (ज्ञान का) दीया जलता रहेगा। 1। (हे भाई !) आप पानी पर ऐसा दीया तैरा जिस दीपक से (जिस दीपक के प्रकाश से) आपको जीवन-यात्रा की सारी गुंझलों की समझ पड़ जाए। 1। रहाउ। (अगर सही जीवन-जुगति को समझने वाली) सद्-बुद्धि की मिट्टी हो। उस मिट्टी का बना हुआ दीया परमात्मा स्वीकार करता है। (हे भाई !) ऊँचे आचरण (की लकड़ी) से (चक्का) बना के (उस) चक्के से (दीया) घड़। यह दीया इस लोक में और परलोक में आपका साथ निभाएगा (जीवन-राह में आपकी राहबरी करेगा)। 2। जब प्रभू खुद ही मेहर की नज़र करता है तब मनुष्य (इस आत्मिक दीए के भेद को) समझ लेता है। पर समझता कोई विरला है जो गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है। ऐसे मनुष्य के हृदय में (ये आत्मिक) दीया टिका (रह के जलता रहता) है। (यह आत्मिक जीवन की रौशनी देने वाला दीया) ना पानी में डूबता है और ना ही किसी चीज से बुझाया जा सकता है। हे भाई ! आप भी ऐसा ही (आत्मिक जीवन देने वाला) दीया (रोजाना जीवन की नदी के) पानी में तैरा। 3। (फिर कितने ही विकारों के) तूफान आएं। ये (आत्मिक जीवन देने वाला दीया) डोलता नहीं। यह (आत्मिक दीया) बुझता नहीं। (इस दीए की) (रौशनी से) हृदय-सिंहासन पर बैठा हुआ परमात्मा प्रत्यक्ष दिखाई देने लगता है। कोई क्षत्रिय हो। ब्राहमण हो। शूद्र हो। चाहे वैश्य हो। (सिर्फ ये चार वर्ण ही नहीं) यदि मैं हजारों ही जातियाँ गिनता जाऊँ जिनकी गिनती का लेखा खत्म ही ना हो सके- (इन वर्ण-जातियों में पैदा हुए) जो भी जीव इस तरह का (आत्मिक प्रकाश देने वाला) दीया जगाएगा। हे नानक ! उसकी आत्मिक अवस्था ऐसी बन जाएगी कि वह संसार-समुंद्र की लहरों में से सही-सलामत पार लांघ जाएगा। 4। 7।
रामकली महला 1 ॥
तुधनो निवणु मंनणु तेरा नाउ ॥
साचु भेट बैसण कउ थाउ ॥
सतु संतोखु होवै अरदासि ॥
ता सुणि सदि बहाले पासि ॥1॥
नानक बिरथा कोइ न होइ ॥
ऐसी दरगह साचा सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
प्रापति पोता करमु पसाउ ॥
तू देवहि मंगत जन चाउ ॥
भाडै भाउ पवै तितु आइ ॥
धुरि तै छोडी कीमति पाइ ॥2॥
जिनि किछु कीआ सो किछु करै ॥
अपनी कीमति आपे धरै ॥
गुरमुखि परगटु होआ हरि राइ ॥
ना को आवै ना को जाइ ॥3॥
लोकु धिकारु कहै मंगत जन मागत मानु न पाइआ ॥
सह कीआ गला दर कीआ बाता तै ता कहणु कहाइआ ॥4॥8॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ (हे प्रभू !) आपके नाम से गहरी सांझ डालनी आपके आगे सिर झुकाना है। आपकी सिफत-सालाह (आपके दर पर मंजूर होने वाली) भेट है (जिसकी बरकति से आपकी हजूरी में) बैठने के लिए जगह मिलती है। (हे भाई !) जब मनुष्य संतोष रखता है। (दूसरों की) सेवा करता है (और इस जीवन-मर्यादा में रह के प्रभू-दर से) अरदास करता है। तब (अरदास) सुन के (सवाली को) बुला के प्रभू अपने पास बैठाता है। 1। हे नानक ! (उसकी हजूरी में पहुँच के) कोई (सवाली) खाली नहीं मुड़ता। परमात्मा की दरगाह ऐसी है। वही सदा कायम रहने वाला परमात्मा खुद भी ऐसा है 1। रहाउ। हे प्रभू ! जिस मनुष्य पर आपकी मेहर हैं जिस पर आप बख्शिश करे उसको आपके नाम का खजाना मिलता है। मुझ मंगते की भी यही तमन्ना है कि आप मुझे अपने नाम की दाति दे (ता कि मेरे हृदय में आपके चरणों का प्यार पैदा हो)। हे प्रभू ! सिर्फ उस हृदय में आपके चरणों का प्रेम पैदा होता है जिसमें तूने खुद ही अपने दर से इस प्रेम की कद्र डाल दी है। 2। जिस परमात्मा ने यह जगत रचना बनाई। जीवों के हृदय में प्रेम की खेल भी वह खुद ही खेलता है। जीवों के दिल में अपने नाम की कद्र भी वह खुद ही टिकाता है। परमात्मा गुरू के माध्यम से (जीव के हृदय में) प्रकट होता है। (जिसके अंदर प्रकट होता है उसे ये समझ आ जाती है कि परमात्मा खुद ही जीव-रूप हो के जगत में आता है और फिर चला जाता है। उसके बिना) ना कोई आता है और ना ही कोई जाता है। 3। (जब कोई भिखारी किसी से कुछ मांगता है। तो आमतौर पर) भिखारी को जगत धिक्कारता ही है। मांगने वाले को आदर नहीं मिला करता। पर। हे पति प्रभू ! तूने अपने उदार-चित्त होने की बातें और अपने दर की मर्यादा की बातें कि आपके दर से कोई ख़ाली नहीं जाता तूने खुद ही मेरे मुँह से कहलवाई हैं (आपके दर पर सवाली को आदर भी मिलता है और मुँह-मांगी मुरादें भी)। 4। 8।
रामकली महला 1 ॥
सागर महि बूंद बूंद महि सागरु कवणु बुझै बिधि जाणै ॥
उतभुज चलत आपि करि चीनै आपे ततु पछाणै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ (जैसे) समुंद्र में बूँदें हैं (जैसे) बूँदों में समुंद्र व्यापक है (वैसे ही सारे जीव-जंतु परमात्मा में जीते हैं और सारे जीवों में परमात्मा व्यापक है) उत्भुज (आदि चार खाणियों- अण्डज। जेरज। सेतज व उत्भुज- के द्वारा उत्पक्ति) का तमाशा रच के प्रभू स्वयं ही देख रहा है। और स्वयं ही इस अस्लियत को समझता है – कोई विरला मनुष्य ही इस भेद को जान पाता है और विधि (के विधान) को समझता है। 1।

यह रामकली राग के क्रम का अंग 878 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

मूल गुरमुखी और विस्तृत अर्थ के लिए प्रोफ़ेसर साहिब सिंह का गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 878 देखिए। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ यही अंग संत सिंह खालसा के पाठ में भी उपलब्ध है। किसी शबद की शुरुआत या समापन पास के अंग पर हो तो उसे साथ खोल लीजिए।

इस पन्ने का रूप: देवनागरी लिप्यन्तरण के साथ हिन्दी अर्थ। हिन्दी अर्थ का उपलब्ध आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी, रचना-शीर्षक और दूसरे अनुवाद के लिए ऊपर दिए स्रोत साथ रखिए।
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