गोंड ॥ धंनु गुपाल धंनु गुरदेव ॥ धंनु अनादि भूखे कवलु टहकेव ॥ धनु ओइ संत जिन ऐसी जानी ॥ तिन कउ मिलिबो सारिंगपानी ॥1॥ आदि पुरख ते होइ अनादि ॥ जपीऐ नामु अंन कै सादि ॥1॥ रहाउ ॥ जपीऐ नामु जपीऐ अंनु ॥ अंभै कै संगि नीका वंनु ॥ अंनै बाहरि जो नर होवहि ॥ तीनि भवन महि अपनी खोवहि ॥2॥ छोडहि अंनु करहि पाखंड ॥ ना सोहागनि ना ओहि रंड ॥ जग महि बकते दूधाधारी ॥ गुपती खावहि वटिका सारी ॥3॥ अंनै बिना न होइ सुकालु ॥ तजिऐ अंनि न मिलै गुपालु ॥ कहु कबीर हम ऐसे जानिआ ॥ धंनु अनादि ठाकुर मनु मानिआ ॥4॥8॥11॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ सो। धन्य है धरती का पालनहार प्रभू (जो अन्न पैदा करता है)। धन्य है सतिगुरू (जो ऐसे प्रभू की समझ बख्शता है)। और धन्य है अन्न जिससे भूखे मनुष्य का हृदय (फूल की तरह) खिल उठता है। वे संत भी भाग्यशाली हैं जिन्हें ये बात समझ आ गई है (कि अन्न निंदनीय नहीं है और अन्न खा के प्रभू का सिमरन करते हैं)। उनको परमात्मा मिलता है। 1। (हे भाई !) अनाज (जिसको त्यागने में आप भक्ति समझते हो) परमात्मा से ही पैदा होता है। और परमात्मा का नाम भी अन्न खा के ही जपा जा सकता है। 1। रहाउ। (इसलिए) प्रभू का नाम सिमरना चाहिए और अनाज को भी प्यार करना चाहिए (भाव। अन्न पर तर्क करने की जगह अन्न को ऐसे सहजे-सहजे प्रीत से खाएं जैसे अडोल हो के प्यार से नाम सिमरना है)। (देखिए। जिस पानी को रोजाना प्रयोग करते हैं। उसी) पानी की संगति से इस अन्न का कैसा सुंदर रंग निकलता है ! (यदि पानी के प्रयोग से कोई पाप नहीं तो अन्न से नफ़रत क्यों।)। जो मनुष्य अन्न से तर्क करते है वे हर जगह अपनी इज्जत गवाते हैं (भाव। अन्न का त्याग कोई ऐसा काम नहीं जिसे दुनिया पसंद करे)। 2। जो लोग अन्न छोड़ देते हैं और (वे) पाखण्ड करते हैं। वे (उन बेमतलब की औरतों की तरह हैं जो) ना सोहगनें हैं ना ही विधवा। (अन्न छोड़ने वाले साधू।) लोगों में कहते-फिरते हैं। हम निरा दूध पी के ही निर्वाह करते हैं। पर चोरी-चोरी सारी की सारी वटिका ही खाते हैं। 3। अन्न के बगैर सुकाल नहीं हो सकता। अन्न के छोड़ने से ईश्वर नहीं मिलता। हे कबीर ! (बेशक) कह-हमें ये यकीन है कि अन्न बड़ा ही सुंदर (व उक्तम) पदार्थ है जिसको खाने से (सिमरन करके) हमारा मन परमात्मा के साथ जुड़ता है। 4। 8। 11।
रागु गोंड बाणी नामदेउ जी की घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ असुमेध जगने ॥ तुला पुरख दाने ॥ प्राग इसनाने ॥1॥ तउ न पुजहि हरि कीरति नामा ॥ अपुने रामहि भजु रे मन आलसीआ ॥1॥ रहाउ ॥ गइआ पिंडु भरता ॥ बनारसि असि बसता ॥ मुखि बेद चतुर पड़ता ॥2॥ सगल धरम अछिता ॥ गुर गिआन इंद्री द्रिड़ता ॥ खटु करम सहित रहता ॥3॥ सिवा सकति संबादं ॥ मन छोडि छोडि सगल भेदं ॥ सिमरि सिमरि गोबिंदं ॥ भजु नामा तरसि भव सिंधं ॥4॥1॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: रागु गोंड बाणी नामदेउ जी की घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ अगर कोई मनुष्य अश्वमेध यज्ञ करे। अपने बराबर का तोल के (सोना चाँदी आदि) दान करे। और प्रयाग आदि तीर्थों पर स्नान करे। 1। तो भी ये सारे काम प्रभू के नाम की। परमात्मा के सिफत सालाह की बराबरी नहीं कर सकते। सो। हे मेरे आलसी मन ! अपने प्यारे प्रभू को सिमर। 1। रहाउ। यदि मनुष्य गया (आदि) तीर्थ पर जाकर पित्रों के नमिक्त पिंड भराए। यदि काशी के साथ बहती असि नदी के तट पर बसता हैं। अगर मुँह से चारों वेद (ज़बानी) पढ़ता हैं। 2। ;अगर मनुष्य सारे धर्म-कर्म करता हैं। अपने गुरू की शिक्षा ले के इन्द्रियों को काबू में रखता हैं। अगर ब्राहमणों वाले खट-करम सदा ही करता रहे। 3। ;रामायण (आदि) का पाठ – हे मेरे मन ! ये सारे करम छोड़ दे। त्याग दे। ये सभ प्रभू से दूरियां बढ़ाने वाले ही हैं। हे नामदेव ! गोबिंद का भजन कर। (प्रभू का) नाम सिमर। (नाम सिमरने से ही) संसार-समुंद्र से पार होंगे। 4। 1।
गोंड ॥ नाद भ्रमे जैसे मिरगाए ॥ प्रान तजे वा को धिआनु न जाए ॥1॥ ऐसे रामा ऐसे हेरउ ॥ रामु छोडि चितु अनत न फेरउ ॥1॥ रहाउ ॥ जिउ मीना हेरै पसूआरा ॥ सोना गढते हिरै सुनारा ॥2॥ जिउ बिखई हेरै पर नारी ॥ कउडा डारत हिरै जुआरी ॥3॥ जह जह देखउ तह तह रामा ॥ हरि के चरन नित धिआवै नामा ॥4॥2॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ जैसे हिरन (अपना आप भुला के) नाद के पीछे दौड़ता है। प्राण दे देता है पर उसे उस नाद का ध्यान नहीं बिसरता। 1। मैं अपने प्यारे प्रभू की याद छोड़ के किसी और तरफ अपने चित्त को नहीं जाने देता। मैं भी प्रभू को यूं ही देखता हूँ। 1। रहाउ। ;जैसे माहीगीर मछलियों की ओर देखता है। जैसे सोना घड़ते हुए सोनारा (सोने की ओर ध्यान से) देखता है। 2। ;जैसे विषयी मनुष्य पराई नारि की ओर ध्यान से देखता है। जैसे (जुआ खेलने के वक्त) जुआरी कौड़ी फेंक के ध्यान से देखता है (कि कौन सा दांव पड़ा है)। 3। मैं नामदेव भी जिधर देखता हूँ प्रभू को ही देखता हूँ (मेरी सुरति सदा प्रभू में ही रहती है)। (इन्हीं की तरह) सदा अपने प्रभू को (एक मन एक चित्त हो के) सिमरता हूँ4। 2।
गोंड ॥ मो कउ तारि ले रामा तारि ले ॥ मै अजानु जनु तरिबे न जानउ बाप बीठुला बाह दे ॥1॥ रहाउ ॥ नर ते सुर होइ जात निमख मै सतिगुर बुधि सिखलाई ॥ नर ते उपजि सुरग कउ जीतिओ सो अवखध मै पाई ॥1॥ जहा जहा धूअ नारदु टेके नैकु टिकावहु मोहि ॥ तेरे नाम अविलंबि बहुतु जन उधरे नामे की निज मति एह ॥2॥3॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ हे मेरे राम ! मुझे (संसार समुंद्र से) तार ले। बचा ले। हे मेरे पिता प्रभू ! मुझे अपनी बाँह पकड़ा। मैं आपका अंजान सेवक हूँ। मैं तैरना नहीं जानता। रहाउ। (हे बीठल पिता ! मुझे भी गुरू से मिला दे) गुरू से मिली हुई बुद्धि की बरकति से आँख झपकने जितने समय में ही मनुष्य से देवता बन जाया जाता है। हे पिता ! (मेहर कर) मैं भी वह दवाई हासिल कर लूँ जिससे मनुष्यों से पैदा हो के (भाव। मनुष्य जाति में से हो के) स्वर्ग को जीता जा सकता है (भाव। स्वर्ग की भी परवाह नहीं रहती)। 1। हे मेरे राम ! तूने जिस-जिस आत्मिक ठिकाने पर धु्रव और नारद (जैसे भक्तों) को पहुँचाया है। मुझे (भी) सदा के लिए पहुँचा दे। मेरा नामदेव का ये पक्का विश्वास है कि आपके नाम के आसरे बेअंत जीव (संसार-समुंद्र के विकारों से) बच निकलते हैं। 2। 3।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे। उनकी वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।