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अंग 872

अंग
872
राग गोंड
राग: गोंड · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गोंड ॥
ग्रिहि सोभा जा कै रे नाहि ॥
आवत पहीआ खूधे जाहि ॥
वा कै अंतरि नही संतोखु ॥
बिनु सोहागनि लागै दोखु ॥1॥
धनु सोहागनि महा पवीत ॥ तपे तपीसर डोलै चीत ॥1॥ रहाउ ॥
सोहागनि किरपन की पूती ॥
सेवक तजि जगत सिउ सूती ॥
साधू कै ठाढी दरबारि ॥
सरनि तेरी मो कउ निसतारि ॥2॥
सोहागनि है अति सुंदरी ॥
पग नेवर छनक छनहरी ॥
जउ लगु प्रान तऊ लगु संगे ॥
नाहि त चली बेगि उठि नंगे ॥3॥
सोहागनि भवन त्रै लीआ ॥
दस अठ पुराण तीरथ रस कीआ ॥
ब्रहमा बिसनु महेसर बेधे ॥
बडे भूपति राजे है छेधे ॥4॥
सोहागनि उरवारि न पारि ॥
पांच नारद कै संगि बिधवारि ॥
पांच नारद के मिटवे फूटे ॥
कहु कबीर गुर किरपा छूटे ॥5॥5॥8॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के घर में (घर की सुंदरता) माया नहीं। उस घर में आए पांधी (मेहमान) भूखे चले जाते हैं। उस घर के मालिक के हृदय में भी धरवास नहीं बनता। सो। माया के बिना गृहस्त पर गिला आता है। 1। सदा पति-वती रहने वाली माया धन्य है। (ये बुरी नहीं) बड़ी पवित्र है। (इसके बिना) बड़े-बड़े तपस्वियों के मन (भी) डोल जाते हैं (भाव। अगर शरीर के निर्वाह के लिए माया ना मिले तो तपस्वी भी घबरा जाते हैं)। 1। रहाउ। पर ये माया कंजूसों की बेटी बन के रहती है। (भाव। कंजूस इकट्ठी किए जाता है। इस्तेमाल नहीं करता) प्रभू के सेवकों के बिना और सभी को इसने अपने वश में किया हुआ है। भगत-जन के दर पर खड़ी (पुकारती है कि) मैं आपकी शरण आई हूँ। मुझे बचा ले। 2। माया बहुत सुंदर है। इसके पैरों में। मानो। झांझरें छन-छन कर रही हैं। (वैसे) जब तक मनुष्य के अंदर जिंद है तब तक ही इसके साथ रहती है नहीं तो (भाव। प्राण के निकलते ही) ये भी नंगे पैर उठ भागती है (भाव। उसी वक्त साथ छोड़ जाती है)। 3। इस माया ने सारे जगत के जीवों को वश में किया हुआ है। अठारह पुराण पढ़ने वाले और तीर्थों पर जाने वालों को भी मोह लिया है। ब्रहमा। विष्णु और शिव (जैसे देवते) इसने भेद रखे हैं। सभ राजे-महाराजे भी इसने छेद डाले हैं। 4। ये माया बड़े पसारे वाली है। इसका अंत नहीं पाया जा सकता; पाँचों ही ज्ञान-इन्द्रियों के साथ घुल-मिल के रहती है। पर। क्योंकि मेरी पाँचों ही इन्द्रियों के बर्तन टूट चुके हैं (भाव। ज्ञान-इन्द्रियों पर इस माया का प्रभाव नहीं पड़ता)। हे कबीर ! आप कह- मैं सतिगुरू की कृपा से इस (की मार) से बच गया हूँ। 5। 5। 8।
गोंड ॥
जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै ॥
नाम बिना कैसे पारि उतरै ॥
कुंभ बिना जलु ना टीकावै ॥
साधू बिनु ऐसे अबगतु जावै ॥1॥
जारउ तिसै जु रामु न चेतै ॥
तन मन रमत रहै महि खेतै ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे हलहर बिना जिमी नही बोईऐ ॥
सूत बिना कैसे मणी परोईऐ ॥
घुंडी बिनु किआ गंठि चड़्हाईऐ ॥
साधू बिनु तैसे अबगतु जाईऐ ॥2॥
जैसे मात पिता बिनु बालु न होई ॥
बिंब बिना कैसे कपरे धोई ॥
घोर बिना कैसे असवार ॥
साधू बिनु नाही दरवार ॥3॥
जैसे बाजे बिनु नही लीजै फेरी ॥
खसमि दुहागनि तजि अउहेरी ॥
कहै कबीरु एकै करि करना ॥
गुरमुखि होइ बहुरि नही मरना ॥4॥6॥9॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ जैसे घर में शतीर (बाला) है (बाले के बिना घर की छत) नहीं टिक सकती। वैसे ही प्रभू के नाम के बिना (मनुष्य का मन संसार-समुंद्र के बवण्डर में से) पार नहीं लांघ सकता। जैसे घड़े के बिना पानी नहीं टिक सकता। वैसे ही गुरू के बिना (मनुष्य का मन नहीं टिकता और व्यक्ति दुनिया से) बुरे हाल ही जाता है। 1। मैं उस (मन) को जला डालूँ जो उस प्रभू को नहीं सिमरता और सदा शारीरिक भोगों में ही खचित रहता है। 1। रहाउ। जैसे किसान के बिना जमीन नहीं बीजी जा सकती। सूतर के बिना मणके परोए नहीं जा सकते। घुंडी के बिना गाँठ नहीं लगाई जा सकती। वैसे ही गुरू की शरण के बिना मनुष्य बुरे हाल ही जाता है। 2। जैसे माता-पिता (के मेल) के बिना बालक पैदा नहीं होता। पानी के बिना कपड़े नहीं धुलते। घोड़े के बिना मनुष्य असवार नहीं कहलवा सकता। वैसे ही गुरू के बिना प्रभू के दर की प्राप्ति नहीं होती। 3। साजों के बिना जैसे नृत्य नहीं हो सकता (वैसे ही पति के बिना स्त्री सोहागनि नहीं हो सकती) दोहागनि (बुरे स्वभाव वाली स्त्री) को पति ने त्याग के सदा दुत्कारा ही होता है। कबीर कहता है- एक ही करनेयोग्य कार्य कर। गुरू के सन्मुख हो (और नाम सिमर) बार-बार पैदा होना-मरना नहीं पड़ेगा। 4। 6। 9।
गोंड ॥
कूटनु सोइ जु मन कउ कूटै ॥
मन कूटै तउ जम ते छूटै ॥
कुटि कुटि मनु कसवटी लावै ॥
सो कूटनु मुकति बहु पावै ॥1॥
कूटनु किसै कहहु संसार ॥
सगल बोलन के माहि बीचार ॥1॥ रहाउ ॥
नाचनु सोइ जु मन सिउ नाचै ॥
झूठि न पतीऐ परचै साचै ॥
इसु मन आगे पूरै ताल ॥
इसु नाचन के मन रखवाल ॥2॥
बजारी सो जु बजारहि सोधै ॥
पांच पलीतह कउ परबोधै ॥
नउ नाइक की भगति पछानै ॥
सो बाजारी हम गुर माने ॥3॥
तसकरु सोइ जि ताति न करै ॥
इंद्री कै जतनि नामु उचरै ॥
कहु कबीर हम ऐसे लखन ॥
धंनु गुरदेव अति रूप बिचखन ॥4॥7॥10॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: गोंड ॥ (आप ‘कूटन’ ठॅग को कहते हैं। पर) कूटन वह भी है जो अपने मन को मारता है और जो मनुष्य अपने मन को मारता है वह जमों की मार से बच जाता है। जो मनुष्य बार-बार मन को मार के (फिर उसकी) जाँच-पड़ताल करता रहता है। वह (अपने मन को कूटने वाला) ‘कूटन’ मुक्ति हासिल कर लेता है। 1। हे जगत के लोगों ! आप ‘कूटन’ किस को कहते हैं। सब शब्दों के अलग-अलग भाव हो सकते हैं। 1। रहाउ। (आप ‘नाचन’ कंजर को कहते हैं। पर हमारे विचार के अनुसार) ‘नाचन’ वह है जो (शरीर के साथ नहीं) मन से नाचता है। झूठ में नहीं पतीजता। सच से पतीजता है। मन को आत्मिक उमाह में लाने का यतन करता है। ऐसे ‘नाचन’ के मन का रखवाला (प्रभू स्वयं बनता है)। 2। (आप ‘बाजारी’ मसखरे को कहते हैं। पर) ‘बाजारी’ वह है जो अपने शरीर रूपी बाजार को पड़तालता है (आत्मावलोकन। आत्म चिंतन करता है)। पाँचों ही बिगड़ी हुई ज्ञान-इन्द्रियों को जगाता है। नौ-खण्ड धरती के मालिक-प्रभू की बँदगी करने की जाच सीखता है। हम ऐसे ‘बाजारी’ को बड़ा (श्रेष्ठ) मनुष्य मानते हैं। 3। (आप ‘तस्कर’ चोर को कहते हैं। पर) तस्कर वह है जो तात (ईष्या को अपने मन में से चुरा ले जाता है) नहीं करता। जो इन्द्रियों को वश में करके प्रभू का नाम सिमरता है। हे कबीर ! जिसकी बरकति से मैंने ये लक्षण (गुण) प्राप्त किए हैं। मेरा वह गुरू। सुंदर। समझदार व धन्यता का पात्र है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गोंड ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के घर में (घर की सुंदरता) माया नहीं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।