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अंग 86

अंग
86
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरमती आपु पछाणिआ राम नाम परगासु ॥
सचो सचु कमावणा वडिआई वडे पासि ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सिफति करे अरदासि ॥
सचै सबदि सालाहणा सुखे सुखि निवासु ॥
जपु तपु संजमु मनै माहि बिनु नावै ध्रिगु जीवासु ॥
गुरमती नाउ पाईऐ मनमुख मोहि विणासु ॥
जिउ भावै तिउ राखु तूं नानकु तेरा दासु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: गुरू की मति ले के (वह) स्वै की पहिचान करता है, और हरी के नाम का (उसके अंदर) प्रकाश होता है। वह सिर्फ सदा स्थिर नाम सिमरन की कमाई करता है, (इस करके) प्रभू की दरगाह में (उसको) आदर मिलता है। जिंद और शरीर सब कुछ प्रभू का (जान के वह प्रभू के आगे) विनती व सिफत सलाह करता है। शबद के द्वारा वह सदा स्थिर प्रभू की सिफत करता है, और हर समय आत्मिक आनंद में लीन रहता है। प्रभू की सिफत सलाह मन में बसानी -यही उस के लिए जप, तप और संयम है और नाम विहीन जीवन (उसे) धिक्कारयोग्य (प्रतीत होता है)। (यही) नाम गुरू की मति पे चलने से मिलता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य मोह में (फंस के) नष्ट होता है (भाव, मानस जन्म व्यर्थ गवा लेता है)। (हे प्रभू !) जैसे आपको ठीक लगे, वैसे सहायता कर (और नाम की दाति दे) नानक आपका सेवक है।2।
पउड़ी ॥
सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥
सभि तुधै पासहु मंगदे नित करि अरदासि ॥
जिसु तूं देहि तिसु सभु किछु मिलै इकना दूरि है पासि ॥
तुधु बाझहु थाउ को नाही जिसु पासहु मंगीऐ मनि वेखहु को निरजासि ॥
सभि तुधै नो सालाहदे दरि गुरमुखा नो परगासि ॥9॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे हरी !) हरेक जीव आपका (बनाया हुआ है) आप सबका (मालिक है और) सभी का खजाना है (भाव, राजक, रिजक देने वाला है) इसीलिए सारे जीव अरदास/प्रार्थना करके आपके पास से ही दान मांगते हैं। जिस को आप दान देता है, उसे सब कुछ मिल जाता है (भाव, उसकी भटकना दूर हो जाती है)। (पर, जो और दर ढूँढते हैं, उनके) आप नजदीक होते हुए भी (उनसे) दूर प्रतीत हैं रहा है। कोई पक्ष भी मन में निर्णय करके देख ले (हे हरि !) आपके बगैर और कोई ठिकाना नहीं, जहाँ से कुछ माँग सकें। (वैसे तो) सारे जीव आपकी ही उपमा कर रहे हैं (पर) (जो जीव) गुरू के सन्मुख रहते हैं (उन्हें) आप अपनी दरगाह में प्रकट करता है (भाव, आदर बख्शता है)।9।
सलोक मः 3 ॥
पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥
अंतरि ब्रहमु न चीनई मनि मूरखु गावारु ॥
दूजै भाइ जगतु परबोधदा ना बूझै बीचारु ॥
बिरथा जनमु गवाइआ मरि जंमै वारो वार ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ पढ़ पढ़ के पण्डित (जीभ से वेद आदि का) ऊँची स्वर में उच्चारण करता है (पर) माया के मोह प्यार (उसे व्याप रहा है)। (वह) हृदय में ईश्वर की तलाश नहीं करता, (इस करके) मन से मूर्ख व अनपढ़ (ही है) माया के प्यार में (उसे खुद को तो) समझ नहीं आती, (और) संसार को राय देता है। (ऐसा पंडित) मानस जन्म व्यर्थ गवाता है, और जनम मरण के चक्कर में पड़ जाता है।1।
मः 3 ॥
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥
सदा सांति सुखु मनि वसै चूकै कूक पुकार ॥
आपै नो आपु खाइ मनु निरमलु होवै गुर सबदी वीचारु ॥
नानक सबदि रते से मुकतु है हरि जीउ हेति पिआरु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ विचार करके समझ लो (भाव, देख लो), जिन्होंने सत्गुरू द्वारा दर्शाए हुए कर्म किए हैं उन्हें ही नाम की प्राप्ति हुई है। उनके हृदय में सदा शांति व सुख बसता है और व्याकुलता खत्मब हो जाती है। “अपने आप को खा जाए (अर्थात, स्वै भाव निवारे) तो मन साफ़ होता है” -ये विचार (भी) सतिगुरू के शबद से ही (उपजता है)। हे नानक ! जो मनुष्य सत्गुरू के शबद में रंगे हुए हैं, वे मुक्त हैं, (क्योंकि) प्रभू जी के प्यार में उनकी बिरती जुड़ी रहती है।2।
पउड़ी ॥
हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥
जिसु हरि भावै तिसु गुरु मिलै सो हरि नामु धिआइ ॥
गुर सबदी हरि पाईऐ हरि पारि लघाइ ॥
मनहठि किनै न पाइओ पुछहु वेदा जाइ ॥
नानक हरि की सेवा सो करे जिसु लए हरि लाइ ॥10॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू की बंदगी (वैसे तो हरेक के लिए ही) सफल है (अर्थात, मनुष्य के जन्म को सफल करने वाली है, पर) कबूल उसी की होती है (भाव, पूर्ण सफलता उसे ही मिलती है) जो सत्गुरू के सन्मुख रहता है। उसी मनुष्य को (ही) सत्गुरू मिलता है, जिस पर प्रभू मेहरबान होता है और वही हरी नाम का सिमरन करता है। (जीवों को संसार सागर से जो प्रभू) पार लंघाता है, वह मिलता ही सत्गुरू के शबद द्वारा है। वेद (आदि धार्मिक पुस्तकों) को भी जा के पूछ के देख लो (अर्थात, पुरातन धर्म पुस्तकें भी यही बात बताते हैं) कि अपने मन के हठ से किसी ने प्रभू को नहीं पाया (ये गुरू के द्वारा ही मिलता है)। हे नानक ! हरी की सेवा वही जीव करता है जिसे (गुरू मिला के) प्रभू खुद सेवा में लगाए।10।
सलोक मः 3 ॥
नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥
गुरमुखि नामु सालाहि जनमु सवारिआ ॥
आपि होआ सदा मुकतु सभु कुलु निसतारिआ ॥
सोहनि सचि दुआरि नामु पिआरिआ ॥
मनमुख मरहि अहंकारि मरणु विगाड़िआ ॥
सभो वरतै हुकमु किआ करहि विचारिआ ॥
आपहु दूजै लगि खसमु विसारिआ ॥
नानक बिनु नावै सभु दुखु सुखु विसारिआ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! वह मनुष्य बहादुर शूरवीर है जिस ने (मन) में से दुष्ट अहंकार को दूर किया है और गुरू के सन्मुख हो के (प्रभू के) नाम की सिफत सलाह करके जनम सफला किया है। वह (शूरवीर) स्वयं हमेशा के लिए (विकारों से) छूट जाता है, और (साथ ही) सारे कुल को तार लेता है। ‘नाम’ से प्यार करने वाले लोग सच्चे हरी की दरगाह में शोभा पाते हैं। पर, मनमुख अहंकार में जलते हैं और दुखी हो के मरते हैं। इन बिचारों के बस में भी क्या है? सब (प्रभू का) भाणा बरत रहा है। (मनमुख अपने आप की खोज छोड़ के माया में चित्त जोड़ते हैं, और प्रभू पति को भुला दिया हैं। हे नानक ! नाम से हीन करके उन्हें सदा दुख मिलता है, सुख उन्हें विसर ही जाता है (भाव, सुख का कभी मुंह नहीं देखते)।1।
मः 3 ॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥
राम नामु हरि कीरति गाई करि चानणु मगु दिखाइआ ॥
हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिनके हृदय में पूरे सत्गुरू ने हरि नाम दृढ़ कर दिया है, उनके अंदर से भटकना दूर कर दी है। वे हरी नाम की उपमा करते हैं, और (इस सिफत सलाह को) प्रकाश बना के (सीधा) राह उन्हें दिखाई देने लगता है। वे अहंकार दूर करके एक के साथ नेह लगाते हैं, और हृदय में नाम बसाते हैं।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की मति ले के (वह) स्वै की पहिचान करता है, और हरी के नाम का (उसके अंदर) प्रकाश होता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।