सचो सचु कमावणा वडिआई वडे पासि ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सिफति करे अरदासि ॥
सचै सबदि सालाहणा सुखे सुखि निवासु ॥
जपु तपु संजमु मनै माहि बिनु नावै ध्रिगु जीवासु ॥
गुरमती नाउ पाईऐ मनमुख मोहि विणासु ॥
जिउ भावै तिउ राखु तूं नानकु तेरा दासु ॥2॥
सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥
सभि तुधै पासहु मंगदे नित करि अरदासि ॥
जिसु तूं देहि तिसु सभु किछु मिलै इकना दूरि है पासि ॥
तुधु बाझहु थाउ को नाही जिसु पासहु मंगीऐ मनि वेखहु को निरजासि ॥
सभि तुधै नो सालाहदे दरि गुरमुखा नो परगासि ॥9॥
पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥
अंतरि ब्रहमु न चीनई मनि मूरखु गावारु ॥
दूजै भाइ जगतु परबोधदा ना बूझै बीचारु ॥
बिरथा जनमु गवाइआ मरि जंमै वारो वार ॥1॥
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥
सदा सांति सुखु मनि वसै चूकै कूक पुकार ॥
आपै नो आपु खाइ मनु निरमलु होवै गुर सबदी वीचारु ॥
नानक सबदि रते से मुकतु है हरि जीउ हेति पिआरु ॥2॥
हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥
जिसु हरि भावै तिसु गुरु मिलै सो हरि नामु धिआइ ॥
गुर सबदी हरि पाईऐ हरि पारि लघाइ ॥
मनहठि किनै न पाइओ पुछहु वेदा जाइ ॥
नानक हरि की सेवा सो करे जिसु लए हरि लाइ ॥10॥
नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥
गुरमुखि नामु सालाहि जनमु सवारिआ ॥
आपि होआ सदा मुकतु सभु कुलु निसतारिआ ॥
सोहनि सचि दुआरि नामु पिआरिआ ॥
मनमुख मरहि अहंकारि मरणु विगाड़िआ ॥
सभो वरतै हुकमु किआ करहि विचारिआ ॥
आपहु दूजै लगि खसमु विसारिआ ॥
नानक बिनु नावै सभु दुखु सुखु विसारिआ ॥1॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥
राम नामु हरि कीरति गाई करि चानणु मगु दिखाइआ ॥
हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की मति ले के (वह) स्वै की पहिचान करता है, और हरी के नाम का (उसके अंदर) प्रकाश होता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।