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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 86 · सिरी राग

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अंग
86
सिरी राग
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  1. गुरमती आपु पछाणिआ राम नाम परगासु ॥
  2. सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥
  3. पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥
  4. जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥
  5. हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥
  6. नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥
  7. गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥

गुरमती आपु पछाणिआ राम नाम परगासु ॥

अंग 85 से चला आ रहा अंश

गुरमती आपु पछाणिआ राम नाम परगासु ॥
सचो सचु कमावणा वडिआई वडे पासि ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सिफति करे अरदासि ॥
सचै सबदि सालाहणा सुखे सुखि निवासु ॥
जपु तपु संजमु मनै माहि बिनु नावै ध्रिगु जीवासु ॥
गुरमती नाउ पाईऐ मनमुख मोहि विणासु ॥
जिउ भावै तिउ राखु तूं नानकु तेरा दासु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: गुरू की मति ले के (वह) स्वै की पहिचान करता है, और हरी के नाम का (उसके अंदर) प्रकाश होता है। वह सिर्फ सदा स्थिर नाम सिमरन की कमाई करता है, (इस करके) प्रभू की दरगाह में (उसको) आदर मिलता है। जिंद और शरीर सब कुछ प्रभू का (जान के वह प्रभू के आगे) विनती व सिफत सलाह करता है। शबद के द्वारा वह सदा स्थिर प्रभू की सिफत करता है, और हर समय आत्मिक आनंद में लीन रहता है। प्रभू की सिफत सलाह मन में बसानी -यही उस के लिए जप, तप और संयम है और नाम विहीन जीवन (उसे) धिक्कारयोग्य (प्रतीत होता है)। (यही) नाम गुरू की मति पे चलने से मिलता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य मोह में (फंस के) नष्ट होता है (भाव, मानस जन्म व्यर्थ गवा लेता है)। (हे प्रभू !) जैसे आपको ठीक लगे, वैसे सहायता कर (और नाम की दाति दे) नानक आपका सेवक है।2।

सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥

पउड़ी ॥
सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥
सभि तुधै पासहु मंगदे नित करि अरदासि ॥
जिसु तूं देहि तिसु सभु किछु मिलै इकना दूरि है पासि ॥
तुधु बाझहु थाउ को नाही जिसु पासहु मंगीऐ मनि वेखहु को निरजासि ॥
सभि तुधै नो सालाहदे दरि गुरमुखा नो परगासि ॥9॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे हरी !) हरेक जीव आपका (बनाया हुआ है) आप सबके (मालिक हैं और) सभी का खजाना हैं (भाव, राजक, रिजक देने वाले हैं) इसीलिए सारे जीव अरदास/प्रार्थना करके आपके पास से ही दान मांगते हैं। जिस को आप दान देते हैं, उसे सब कुछ मिल जाता है (भाव, उसकी भटकना दूर हो जाती है)। (पर, जो और दर ढूँढते हैं, उनके) आप नजदीक होते हुए भी (उनसे) दूर प्रतीत हो रहे हैं। कोई पक्ष भी मन में निर्णय करके देख ले (हे हरि !) आपके बगैर और कोई ठिकाना नहीं, जहाँ से कुछ माँग सकें। (वैसे तो) सारे जीव आपकी ही उपमा कर रहे हैं (पर) (जो जीव) गुरू के सन्मुख रहते हैं (उन्हें) आप अपनी दरगाह में प्रकट करते हैं (भाव, आदर बख्शते हैं)।9।

पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥

सलोक मः 3 ॥
पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥
अंतरि ब्रहमु न चीनई मनि मूरखु गावारु ॥
दूजै भाइ जगतु परबोधदा ना बूझै बीचारु ॥
बिरथा जनमु गवाइआ मरि जंमै वारो वार ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ पढ़ पढ़ के पण्डित (जीभ से वेद आदि का) ऊँची स्वर में उच्चारण करता है (पर) माया के मोह प्यार (उसे व्याप रहा है)। (वह) हृदय में ईश्वर की तलाश नहीं करता, (इस करके) मन से मूर्ख व अनपढ़ (ही है) माया के प्यार में (उसे खुद को तो) समझ नहीं आती, (और) संसार को राय देता है। (ऐसा पंडित) मानस जन्म व्यर्थ गवाता है, और जनम मरण के चक्कर में पड़ जाता है।1।

जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥

मः 3 ॥
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥
सदा सांति सुखु मनि वसै चूकै कूक पुकार ॥
आपै नो आपु खाइ मनु निरमलु होवै गुर सबदी वीचारु ॥
नानक सबदि रते से मुकतु है हरि जीउ हेति पिआरु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ विचार करके समझ लो (भाव, देख लो), जिन्होंने सत्गुरू द्वारा दर्शाए हुए कर्म किए हैं उन्हें ही नाम की प्राप्ति हुई है। उनके हृदय में सदा शांति व सुख बसता है और व्याकुलता खत्मब हो जाती है। “अपने आप को खा जाए (अर्थात, स्वै भाव निवारे) तो मन साफ़ होता है” -ये विचार (भी) सतिगुरू के शबद से ही (उपजता है)। हे नानक ! जो मनुष्य सत्गुरू के शबद में रंगे हुए हैं, वे मुक्त हैं, (क्योंकि) प्रभू जी के प्यार में उनकी बिरती जुड़ी रहती है।2।

हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥

पउड़ी ॥
हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥
जिसु हरि भावै तिसु गुरु मिलै सो हरि नामु धिआइ ॥
गुर सबदी हरि पाईऐ हरि पारि लघाइ ॥
मनहठि किनै न पाइओ पुछहु वेदा जाइ ॥
नानक हरि की सेवा सो करे जिसु लए हरि लाइ ॥10॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू की बंदगी (वैसे तो हरेक के लिए ही) सफल है (अर्थात, मनुष्य के जन्म को सफल करने वाली है, पर) कबूल उसी की होती है (भाव, पूर्ण सफलता उसे ही मिलती है) जो सत्गुरू के सन्मुख रहता है। उसी मनुष्य को (ही) सत्गुरू मिलता है, जिस पर प्रभू मेहरबान होता है और वही हरी नाम का सिमरन करता है। (जीवों को संसार सागर से जो प्रभू) पार लंघाता है, वह मिलता ही सत्गुरू के शबद द्वारा है। वेद (आदि धार्मिक पुस्तकों) को भी जा के पूछ के देख लो (अर्थात, पुरातन धर्म पुस्तकें भी यही बात बताते हैं) कि अपने मन के हठ से किसी ने प्रभू को नहीं पाया (ये गुरू के द्वारा ही मिलता है)। हे नानक ! हरी की सेवा वही जीव करता है जिसे (गुरू मिला के) प्रभू खुद सेवा में लगाए।10।

नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥

सलोक मः 3 ॥
नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥
गुरमुखि नामु सालाहि जनमु सवारिआ ॥
आपि होआ सदा मुकतु सभु कुलु निसतारिआ ॥
सोहनि सचि दुआरि नामु पिआरिआ ॥
मनमुख मरहि अहंकारि मरणु विगाड़िआ ॥
सभो वरतै हुकमु किआ करहि विचारिआ ॥
आपहु दूजै लगि खसमु विसारिआ ॥
नानक बिनु नावै सभु दुखु सुखु विसारिआ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! वह मनुष्य बहादुर शूरवीर है जिस ने (मन) में से दुष्ट अहंकार को दूर किया है और गुरू के सन्मुख हो के (प्रभू के) नाम की सिफत सलाह करके जनम सफला किया है। वह (शूरवीर) स्वयं हमेशा के लिए (विकारों से) छूट जाता है, और (साथ ही) सारे कुल को तार लेता है। ‘नाम’ से प्यार करने वाले लोग सच्चे हरी की दरगाह में शोभा पाते हैं। पर, मनमुख अहंकार में जलते हैं और दुखी हो के मरते हैं। इन बिचारों के बस में भी क्या है? सब (प्रभू का) भाणा बरत रहा है। (मनमुख अपने आप की खोज छोड़ के माया में चित्त जोड़ते हैं, और प्रभू पति को भुला दिया हैं। हे नानक ! नाम से हीन करके उन्हें सदा दुख मिलता है, सुख उन्हें विसर ही जाता है (भाव, सुख का कभी मुंह नहीं देखते)।1।

गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥

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मः 3 ॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥
राम नामु हरि कीरति गाई करि चानणु मगु दिखाइआ ॥
हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जिनके हृदय में पूरे सत्गुरू ने हरि नाम दृढ़ कर दिया है, उनके अंदर से भटकना दूर कर दी है। वे हरी नाम की उपमा करते हैं, और (इस सिफत सलाह को) प्रकाश बना के (सीधा) राह उन्हें दिखाई देने लगता है। वे अहंकार दूर करके एक के साथ नेह लगाते हैं, और हृदय में नाम बसाते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 86 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।