नाराइण घटि घटि परगास ॥
नाराइण कहते नरकि न जाहि ॥
नाराइण सेवि सगल फल पाहि ॥1॥
नाराइण मन माहि अधार ॥
नाराइण बोहिथ संसार ॥
नाराइण कहत जमु भागि पलाइण ॥
नाराइण दंत भाने डाइण ॥2॥
नाराइण सद सद बखसिंद ॥
नाराइण कीने सूख अनंद ॥
नाराइण प्रगट कीनो परताप ॥
नाराइण संत को माई बाप ॥3॥
नाराइण साधसंगि नराइण ॥
बारं बार नराइण गाइण ॥
बसतु अगोचर गुर मिलि लही ॥
नाराइण ओट नानक दास गही ॥4॥17॥19॥
जा कउ राखै राखणहारु ॥
तिस का अंगु करे निरंकारु ॥1॥ रहाउ ॥
मात गरभ महि अगनि न जोहै ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु न पोहै ॥
साधसंगि जपै निरंकारु ॥
निंदक कै मुहि लागै छारु ॥1॥
राम कवचु दास का संनाहु ॥
दूत दुसट तिसु पोहत नाहि ॥
जो जो गरबु करे सो जाइ ॥
गरीब दास की प्रभु सरणाइ ॥2॥
जो जो सरणि पइआ हरि राइ ॥
सो दासु रखिआ अपणै कंठि लाइ ॥
जे को बहुतु करे अहंकारु ॥
ओहु खिन महि रुलता खाकू नालि ॥3॥
है भी साचा होवणहारु ॥
सदा सदा जाइंी बलिहार ॥
अपणे दास रखे किरपा धारि ॥
नानक के प्रभ प्राण अधार ॥4॥18॥20॥
अचरज कथा महा अनूप ॥ प्रातमा पारब्रहम का रूपु ॥ रहाउ ॥
ना इहु बूढा ना इहु बाला ॥
ना इसु दूखु नही जम जाला ॥
ना इहु बिनसै ना इहु जाइ ॥
आदि जुगादी रहिआ समाइ ॥1॥
ना इसु उसनु नही इसु सीतु ॥
ना इसु दुसमनु ना इसु मीतु ॥
ना इसु हरखु नही इसु सोगु ॥
सभु किछु इस का इहु करनै जोगु ॥2॥
ना इसु बापु नही इसु माइआ ॥
इहु अपरंपरु होता आइआ ॥
पाप पुंन का इसु लेपु न लागै ॥
घट घट अंतरि सद ही जागै ॥3॥
तीनि गुणा इक सकति उपाइआ ॥
महा माइआ ता की है छाइआ ॥
अछल अछेद अभेद दइआल ॥
दीन दइआल सदा किरपाल ॥
ता की गति मिति कछू न पाइ ॥
नानक ता कै बलि बलि जाइ ॥4॥19॥21॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! सब जीवों में नारायण का निवास है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।