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अंग 869

अंग
869
राग गोंड
राग: गोंड · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गोंड महला 5 ॥
संतन कै बलिहारै जाउ ॥
संतन कै संगि राम गुन गाउ ॥
संत प्रसादि किलविख सभि गए ॥
संत सरणि वडभागी पए ॥1॥
रामु जपत कछु बिघनु न विआपै ॥
गुर प्रसादि अपुना प्रभु जापै ॥1॥ रहाउ ॥
पारब्रहमु जब होइ दइआल ॥
साधू जन की करै रवाल ॥
कामु क्रोधु इसु तन ते जाइ ॥
राम रतनु वसै मनि आइ ॥2॥
सफलु जनमु तां का परवाणु ॥
पारब्रहमु निकटि करि जाणु ॥
भाइ भगति प्रभ कीरतनि लागै ॥
जनम जनम का सोइआ जागै ॥3॥
चरन कमल जन का आधारु ॥
गुण गोविंद रउं सचु वापारु ॥
दास जना की मनसा पूरि ॥
नानक सुखु पावै जन धूरि ॥4॥20॥22॥6॥28॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलने वाले) संत जनों से मैं बलिहार जाता हूँ। उन संत जनों की संगति में रह के मैं (भी) परमात्मा के गुण गाता हूँ। हे भाई ! संत जनों की कृपा से सारे पाप दूर हो जाते हैं। बहुत भाग्यशाली लोग ही संत जनों की शरण पड़ते हैं। 1। प्रभू का नाम जपते हुए (किसी किस्म का) कोई बिघ्न (नाम जपने वाले पर) अपना जोर नहीं डाल सकता हे भाई ! गुरू की कृपा से प्यारा प्रभू (हर जगह बसता) दिखाई देने लगता है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा जब (किसी मनुष्य पर) दयावान होता है। (तो उस मनुष्य को) गुरू के (बताए हुए राह पर चलने वाले) सेवकों के चरणों की धूल बनाता है। उसके शरीर में से काम चला जाता है क्रोध चला जाता है। परमात्मा का अमूल्य नाम उस मनुष्य के मन में आ बसता है। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा को अपने पास बसता समझता है) उसकी जिंदगी कामयाब हो जाती है (प्रभू के दर पर) कबूल हो जाती है। परमातमा को (हर वक्त अपने) नजदीक बसता समझ वह मनुष्य भक्ति-भाव से प्रभू की सिफत-सालाह में लग जाता है। और अनेकों जन्मों से (माया की गहरी नींद का) सोया हुआ जाग उठता है। 3। हे भाई ! परमात्मा के सुंदर चरण (गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलने वाले) सेवकों (की जिंदगी) का आसरा बन जाते हैं। मैं भी (सेवकों की संगति की बरकति से) परमात्मा के गुण गाता हूँ। (इसी उद्यम को जिंदगी का) सदा कायम रहने वाला व्यापार समझता हूँ। हे नानक ! परमात्मा अपने सेवकों के मन की कामना पूरी करता है। (प्रभू का सेवक) संत जनों की चरण-धूड़ में आत्मिक आनंद प्राप्त करता है। 4। 20। 22। 6। 28।
रागु गोंड असटपदीआ महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
करि नमसकार पूरे गुरदेव ॥
सफल मूरति सफल जा की सेव ॥
अंतरजामी पुरखु बिधाता ॥
आठ पहर नाम रंगि राता ॥1॥
गुरु गोबिंद गुरू गोपाल ॥
अपने दास कउ राखनहार ॥1॥ रहाउ ॥
पातिसाह साह उमराउ पतीआए ॥
दुसट अहंकारी मारि पचाए ॥
निंदक कै मुखि कीनो रोगु ॥
जै जै कारु करै सभु लोगु ॥2॥
संतन कै मनि महा अनंदु ॥
संत जपहि गुरदेउ भगवंतु ॥
संगति के मुख ऊजल भए ॥
सगल थान निंदक के गए ॥3॥
सासि सासि जनु सदा सलाहे ॥
पारब्रहम गुर बेपरवाहे ॥
सगल भै मिटे जा की सरनि ॥
निंदक मारि पाए सभि धरनि ॥4॥
जन की निंदा करै न कोइ ॥
जो करै सो दुखीआ होइ ॥
आठ पहर जनु एकु धिआए ॥
जमूआ ता कै निकटि न जाए ॥5॥
जन निरवैर निंदक अहंकारी ॥
जन भल मानहि निंदक वेकारी ॥
गुर कै सिखि सतिगुरू धिआइआ ॥
जन उबरे निंदक नरकि पाइआ ॥6॥
सुणि साजन मेरे मीत पिआरे ॥
सति बचन वरतहि हरि दुआरे ॥
जैसा करे सु तैसा पाए ॥
अभिमानी की जड़ सरपर जाए ॥7॥
नीधरिआ सतिगुर धर तेरी ॥
करि किरपा राखहु जन केरी ॥
कहु नानक तिसु गुर बलिहारी ॥
जा कै सिमरनि पैज सवारी ॥8॥1॥29॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु गोंड असटपदीआ महला 5 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! पूरे सतिगुरू के आगे सदा सिर झुकाया कर। उसका दर्शन जीवन-मनोरथ पूरा करता है। उसकी शरण पड़ने से जीवन सफल हो जाता है। जो हरेक के दिल की जानने वाला है। जो सबमें व्यापक है और जो सबको पैदा करने वाला है। हे भाई ! गुरू उस प्रभू के नाम के रंग में रंगा रहता है 1। हे भाई ! गुरू गोबिंद (का रूप) है। गुरू गोपाल (का रूप) है। जो अपने सेवकों को (निंदा आदि से) बचाने योग्य है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू जिन मनुष्यों के अंदर परमात्मा के प्रति प्यार दृढ़ कर देता है वे आत्मिक मण्डल में शाह-पातशाह व अमीर बन जाते हैं। दुष्टों-अहंकारियों को (अपने दर से) दुत्कार के दर-दर भटकने के राह पर डाल देता है। (सेवक की) निंदा करने वाले मनुष्य के मुँह में (निंदा करने की) बीमारी ही बन जाती है। सारा जगत (उस मनुष्य की) सदा शोभा करता है (जो गुरू की शरण पड़ा रहता है)। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़े रहते हैं। उन) संत-जनों के मन में बड़ा आत्मिक आनंद बना रहता है। संत जन गुरू को भगवान को अपने हृदय में बसाए रखते हैं। गुरू के पास रहने वाले सेवक के मुँह (लोक-परलोक में) रौशन हो जाते हैं पर निंदा करने वाले मनुष्य के (लोक-परलोक) सभी जगहें हाथों से निकल जाते हैं। 3। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने वाला) सेवक अपने हरेक सांस के साथ परमात्मा और बेमुथाज (बेपरवाह) गुरू की सिफल-सालाह करता रहता है। हे भाई ! जिस गुरू की शरण पड़ने से सारे डर-सहम दूर हो जाते हैं। वह गुरू सेवकों की निंदा करने वाले लोगों को (अपने दर से) दुत्कार के नीच आचरण के गड्ढे में फेंक देता है (भाव। निंदकों को गुरू का दर पसंद नहीं आता। नतीजतन। वे गुरू दर से टूट के निंदा में पड़ के अपने आचरण में दिन-ब-दिन नीच से नीच होते चले जाते हैं)। 4। हे भाई !) गुरू के सेवक की निंदा किसी भी मनुष्य को करनी ही नहीं चाहिए। जो भी मनुष्य (भले लोगों की) निंदा करता है। वह स्वयं दुखी रहता है। गुरू का सेवक तो हर वक्त एक परमात्मा का ध्यान धरे रखता है। जम-राज भी उसके नजदीक नहीं फटकता। 5। हे भाई ! गुरू के सेवक किसी के साथ बैर नहीं रखते। निंदा करने वाले अहंकारी हैं गुरू के सेवक सब का भला मांगते है पर उनकी निंदा करने वाले मनुष्य उनका बुरा चितवने और कुकर्मों में फंसे रहते हैं। हे भाई ! गुरू के सिख ने तो सदा अपने गुरू (के चरणों) में सुरति जोड़ी होती है। (इसलिए) सेवक तो (निंदा आदि के नर्क में से) बच निकलते हैं। पर निंदक (अपने आप को इस) नर्क में डाले रखते हैं। 6। हे मेरे सज्जन ! हे प्यारे मित्र ! सुन (मैं आपको वह) अटल नियम (बताता हूँ जो) परमात्मा के दर पर (सदा) घटित होते हैं। (वह अटल नियम ये है कि) मनुष्य जिस तरह का कर्म करता है वैसा ही फल पा लेता है। अहंकारी मनुष्य की जड़ अवश्य काटी जाती है। 7। हे सतिगुरू ! निआसरे लोगों को आपका ही आसरा है। आप मेहर करके अपने सेवकों की लाज स्वयं रखता है। हे नानक ! कह- मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ जिसकी ओट चितारने ने मेरी इज्जत रख ली (और। मुझे निंदा आदि से बचा के रखा)। 8। 1। 29।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलने वाले) संत जनों से मैं बलिहार जाता हूँ।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।