निरमल होइ तुम॑ारा चीत ॥ मन तन की सभ मिटै बलाइ ॥ दूखु अंधेरा सगला जाइ ॥1॥ हरि गुण गावत तरीऐ संसारु ॥ वड भागी पाईऐ पुरखु अपारु ॥1॥ रहाउ ॥ जो जनु करै कीरतनु गोपाल ॥ तिस कउ पोहि न सकै जमकालु ॥ जग महि आइआ सो परवाणु ॥ गुरमुखि अपना खसमु पछाणु ॥2॥ हरि गुण गावै संत प्रसादि ॥ काम क्रोध मिटहि उनमाद ॥ सदा हजूरि जाणु भगवंत ॥ पूरे गुर का पूरन मंत ॥3॥ हरि धनु खाटि कीए भंडार ॥ मिलि सतिगुर सभि काज सवार ॥ हरि के नाम रंग संगि जागा ॥ हरि चरणी नानक मनु लागा ॥4॥14॥16॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (नाम की बरकति से) आपका मन पवित्र हैं जाएगा। (हे मित्र ! नाम जपने से) मन की शरीर की हरेक बिपता मिट जाती है। हरेक दुख दूर हो जाता है। (माया के मोह का) सारा अंधेरा समाप्त हो जाता है। 1। हे भाई ! परमात्मा के गुण गाते-गाते संसार (-समुंद्र से) पार लांघा जाता है। (भाग्य जाग उठते हैं) बहुत भाग्यों से सर्व-व्यापक बेअंत प्रभू मिल जाता है। 1। रहाउ। हे मेरे मित्र ! जो मनुष्य सृष्टि के पालनहार प्रभू की सिफतसालाह के गीत गाता रहता है। उसको मौत का डर छू नहीं सकता। उस मनुष्य का दुनिया में आना सफल हो जाता है। (हे मित्र ! आप भी) गुरू की शरण पड़ कर अपने मालिक प्रभू के साथ जान-पहचान बनाए रख। 2। (हे मित्र ! जो मनुष्य) गुरू की कृपा से परमात्मा के गुण गाता रहता है। (उसके अंदर से) काम-क्रोध (आदि) उन्माद खत्म हो जाते हैं। भगवान को सदा अपने अंग-संग बसता समझा कर (हे मित्र ! आप भी) पूरे गुरू का सच्चा उपदेश ले । 3। जिस मनुष्य ने हरी-नाम-धन कमा के खजाने भर लिए। हे नानक ! गुरू को मिल के उसने अपने सारे ही काम सँवार लिए। हरी-नाम के प्रेम की बरकति से उसका मन जाग उठता है (काम-क्रोध आदि विकारों से वह सचेत रहता है) उसका मन परमात्मा के चरणों में जुड़ा रहता है। 4। 14। 16।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरण संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए जहाज़ हैं। परमात्मा का नाम सिमरने से बार-बार (आत्मिक) मौत नहीं होती। प्रभू के गुण गाने से जमों का रास्ता नहीं पकड़ना पड़ता। (परमात्मा के गुणों की) विचार जो अन्य सारी विचारों से उक्तम है (कामादिक) पाँच वैरियों का नाश कर देती है। 1। हे सारे गुणों से भरपूर पति-प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। (मुझे) अपने पैदा किए गरीब सेवक को कृपा करके अपना हाथ पकड़ा। 1। रहाउ। हे भाई ! स्मृतियां। शास्त्र। वेद। पुराण (आदि सारी धर्म-पुस्तकें) परमात्मा के गुणों का बयान करते हैं। जोगी-जती। वैश्णव साधु। (नृतकारी करने वाले) बैरागी भगत भी प्रभू के गुणों का विचार करते हैं। पर उस अविनाशी प्रभू का कोई भी अंत नहीं पा सकता। 2। हे भाई ! शिव जी व अन्य अनेकों देवते (उस प्रभू का अंत तलाशने के लिए) तरले लेते हैं। पर उसके स्वरूप को रक्ती भर भी नहीं समझ सकते। उस प्रभू का स्वरूप सही तरीके से बयान नहीं किया जा सकता। उस प्रभू का भेद नहीं पाया जा सकता प्रभु प्रेम भक्ति स्वं जिसे देता है जगत में ऐसे कोई ही दुर्लभ होते है । 3। हे प्रभू ! (मैं तो हूँ नाचीज़। भला मैं आपका अंत कैसे पा सकता हूँ।) मुझ गुणहीन में कोई भी गुण नहीं। (हाँ।) आपकी मेहर की निगाह में सारे खजाने हैं (जिस पर नज़र करता है। उसको प्राप्त हैं जाते हैं)। (आपका दास) गरीब नानक (आपसे) आपकी भक्ति माँगता है। हे सबसे बड़े देव ! मेहर कर के ये ख़ैर डाल। 4। 15। 17।
गोंड महला 5 ॥ संत का लीआ धरति बिदारउ ॥ संत का निंदकु अकास ते टारउ ॥ संत कउ राखउ अपने जीअ नालि ॥ संत उधारउ ततखिण तालि ॥1॥ सोई संतु जि भावै राम ॥ संत गोबिंद कै एकै काम ॥1॥ रहाउ ॥ संत कै ऊपरि देइ प्रभु हाथ ॥ संत कै संगि बसै दिनु राति ॥ सासि सासि संतह प्रतिपालि ॥ संत का दोखी राज ते टालि ॥2॥ संत की निंदा करहु न कोइ ॥ जो निंदै तिस का पतनु होइ ॥ जिस कउ राखै सिरजनहारु ॥ झख मारउ सगल संसारु ॥3॥ प्रभ अपने का भइआ बिसासु ॥ जीउ पिंडु सभु तिस की रासि ॥ नानक कउ उपजी परतीति ॥ मनमुख हार गुरमुख सद जीति ॥4॥16॥18॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! परमात्मा कहता है-) जिस मनुष्य को संत धिक्कार दे। मैं उसकी जड़ें उखाड़ देता हूँ। संत की निंदा करने वाले को मैं ऊँचे मरतबे से नीचे गिरा देता हूँ। संत को सदा मैं अपनी जीवात्मा के साथ रखता हूँ। (किसी भी बिपता से) संत को मैं तुरंत उसी वक्त बचा लेता हूँ। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा को प्यारा लगने लगता है। वही है संत। संत के हृदय और गोबिंद के मन एक समान ही काम करने लगते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू अपना हाथ (अपने) संत के ऊपर रखता है। प्रभू अपने संत के साथ दिन-रात (हर वक्त) बसता है। प्रभू अपने संतों की (उनकी) हरेक सांस के साथ रक्षा करता है। संत का बुरा माँगने वाले को प्रभू राज-पाट से (भी) नीचे गिरा देता है। 2। हे भाई ! कोई भी मनुष्य किसी संत की निंदा ना किया करे। जो भी मनुष्य निंदा करता है। वह आत्मिक जीवन से गिर जाता है। करतार खुद जिस मनुष्य की रक्षा करता है। सारा संसार (उसका नुकसान करने के लिए) बेशक झखें मारता फिरे (उसका कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता)। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य को अपने प्रभू पर भरोसा बन जाता है (उसको ये निश्चय हो जाता है कि) ये जीवात्मा और ये शरीर सब कुछ उस प्रभू की दी हुई ही राशि पूँजी है। हे भाई ! नानक के दिल में भी ये विश्वास बन चुका है कि अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (जीवन की बाज़ी) हार जाता है। गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य को सदा जीत प्राप्त होती है। 4। 16। 18।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे भाई ! नारायण का नाम माया की कालिख से बचाने वाला (है। इसको अपने हृदय में) सींच। (ये नाम) जीभ से जपते हुए (सारे) पाप दूर हो जाते हैं। 1। रहाउ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(नाम की बरकति से) आपका मन पवित्र हैं जाएगा।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।