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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 867 · गोंड

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अंग
867
गोंड
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  1. निरमल होइ तुम॑ारा चीत ॥
  2. भव सागर बोहिथ हरि चरण ॥
  3. संत का लीआ धरति बिदारउ ॥
  4. नामु निरंजनु नीरि नराइण ॥

निरमल होइ तुम॑ारा चीत ॥

अंग 866 से चला आ रहा अंश

निरमल होइ तुम॑ारा चीत ॥
मन तन की सभ मिटै बलाइ ॥
दूखु अंधेरा सगला जाइ ॥1॥
हरि गुण गावत तरीऐ संसारु ॥
वड भागी पाईऐ पुरखु अपारु ॥1॥ रहाउ ॥
जो जनु करै कीरतनु गोपाल ॥ तिस कउ पोहि न सकै जमकालु ॥
जग महि आइआ सो परवाणु ॥ गुरमुखि अपना खसमु पछाणु ॥2॥
हरि गुण गावै संत प्रसादि ॥
काम क्रोध मिटहि उनमाद ॥
सदा हजूरि जाणु भगवंत ॥
पूरे गुर का पूरन मंत ॥3॥
हरि धनु खाटि कीए भंडार ॥
मिलि सतिगुर सभि काज सवार ॥
हरि के नाम रंग संगि जागा ॥
हरि चरणी नानक मनु लागा ॥4॥14॥16॥

हिन्दी अर्थ: (नाम की बरकति से) आपका मन पवित्र हो जाएगा। (हे मित्र ! नाम जपने से) मन की शरीर की हरेक बिपता मिट जाती है। हरेक दुख दूर हो जाता है। (माया के मोह का) सारा अंधेरा समाप्त हो जाता है। 1। हे भाई ! परमात्मा के गुण गाते-गाते संसार (-समुंद्र से) पार लांघा जाता है। (भाग्य जाग उठते हैं) बहुत भाग्यों से सर्व-व्यापक बेअंत प्रभू मिल जाता है। 1। रहाउ। हे मेरे मित्र ! जो मनुष्य सृष्टि के पालनहार प्रभू की सिफतसालाह के गीत गाता रहता है। उसको मौत का डर छू नहीं सकता। उस मनुष्य का दुनिया में आना सफल हो जाता है। (हे मित्र ! आप भी) गुरू की शरण पड़ कर अपने मालिक प्रभू के साथ जान-पहचान बनाए रखें। 2। (हे मित्र ! जो मनुष्य) गुरू की कृपा से परमात्मा के गुण गाता रहता है। (उसके अंदर से) काम-क्रोध (आदि) उन्माद खत्म हो जाते हैं। भगवान को सदा अपने अंग-संग बसता समझा करें (हे मित्र ! आप भी) पूरे गुरू का सच्चा उपदेश लें। 3। जिस मनुष्य ने हरी-नाम-धन कमा के खजाने भर लिए। हे नानक ! गुरू को मिल के उसने अपने सारे ही काम सँवार लिए। हरी-नाम के प्रेम की बरकति से उसका मन जाग उठता है (काम-क्रोध आदि विकारों से वह सचेत रहता है) उसका मन परमात्मा के चरणों में जुड़ा रहता है। 4। 14। 16।

भव सागर बोहिथ हरि चरण ॥

गोंड महला 5 ॥
भव सागर बोहिथ हरि चरण ॥
सिमरत नामु नाही फिरि मरण ॥
हरि गुण रमत नाही जम पंथ ॥
महा बीचार पंच दूतह मंथ ॥1॥
तउ सरणाई पूरन नाथ ॥
जंत अपने कउ दीजहि हाथ ॥1॥ रहाउ ॥
सिम्रिति सासत्र बेद पुराण ॥
पारब्रहम का करहि वखिआण ॥
जोगी जती बैसनो रामदास ॥
मिति नाही ब्रहम अबिनास ॥2॥
करण पलाह करहि सिव देव ॥
तिलु नही बूझहि अलख अभेव ॥
प्रेम भगति जिसु आपे देइ ॥
जग महि विरले केई केइ ॥3॥
मोहि निरगुण गुणु किछहू नाहि ॥
सरब निधान तेरी द्रिसटी माहि ॥
नानकु दीनु जाचै तेरी सेव ॥
करि किरपा दीजै गुरदेव ॥4॥15॥17॥

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरण संसार समुंद्र से पार लांघने के लिए जहाज़ हैं। परमात्मा का नाम सिमरने से बार-बार (आत्मिक) मौत नहीं होती। प्रभू के गुण गाने से जमों का रास्ता नहीं पकड़ना पड़ता। (परमात्मा के गुणों की) विचार जो अन्य सारी विचारों से उक्तम है (कामादिक) पाँच वैरियों का नाश कर देती है। 1। हे सारे गुणों से भरपूर पति-प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। (मुझे) अपने पैदा किए गरीब सेवक को कृपा करके अपना हाथ पकड़ा। 1। रहाउ। हे भाई ! स्मृतियां, शास्त्र, वेद, पुराण (आदि सारी धर्म-पुस्तकें) परमात्मा के गुणों का बयान करते हैं। जोगी-जती। वैश्णव साधु। (नृतकारी करने वाले) बैरागी भगत भी प्रभू के गुणों का विचार करते हैं। पर उस अविनाशी प्रभू का कोई भी अंत नहीं पा सकता। 2। हे भाई ! शिव जी व अन्य अनेकों देवते (उस प्रभू का अंत तलाशने के लिए) तरले लेते हैं। पर उसके स्वरूप को रक्ती भर भी नहीं समझ सकते। उस प्रभू का स्वरूप सही तरीके से बयान नहीं किया जा सकता। उस प्रभू का भेद नहीं पाया जा सकता प्रभु प्रेम भक्ति स्वं जिसे देता है जगत में ऐसे कोई ही दुर्लभ होते है । 3। हे प्रभू ! (मैं तो हूँ नाचीज़। भला मैं आपका अंत कैसे पा सकता हूँ।) मुझ गुणहीन में कोई भी गुण नहीं। (हाँ।) आपकी मेहर की निगाह में सारे खजाने हैं (जिस पर नज़र करता है। उसको प्राप्त हो जाते हैं)। (आपका दास) गरीब नानक (आपसे) आपकी भक्ति माँगता है। हे सबसे बड़े देव ! मेहर कर के ये ख़ैर डाल। 4। 15। 17।

संत का लीआ धरति बिदारउ ॥

गोंड महला 5 ॥
संत का लीआ धरति बिदारउ ॥
संत का निंदकु अकास ते टारउ ॥
संत कउ राखउ अपने जीअ नालि ॥
संत उधारउ ततखिण तालि ॥1॥
सोई संतु जि भावै राम ॥
संत गोबिंद कै एकै काम ॥1॥ रहाउ ॥
संत कै ऊपरि देइ प्रभु हाथ ॥
संत कै संगि बसै दिनु राति ॥
सासि सासि संतह प्रतिपालि ॥
संत का दोखी राज ते टालि ॥2॥
संत की निंदा करहु न कोइ ॥
जो निंदै तिस का पतनु होइ ॥
जिस कउ राखै सिरजनहारु ॥
झख मारउ सगल संसारु ॥3॥
प्रभ अपने का भइआ बिसासु ॥
जीउ पिंडु सभु तिस की रासि ॥
नानक कउ उपजी परतीति ॥
मनमुख हार गुरमुख सद जीति ॥4॥16॥18॥

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! परमात्मा कहता है-) जिस मनुष्य को संत धिक्कार दे। मैं उसकी जड़ें उखाड़ देता हूँ। संत की निंदा करने वाले को मैं ऊँचे मरतबे से नीचे गिरा देता हूँ। संत को सदा मैं अपनी जीवात्मा के साथ रखता हूँ। (किसी भी बिपता से) संत को मैं तुरंत उसी वक्त बचा लेता हूँ। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा को प्यारा लगने लगता है। वही है संत। संत के हृदय और गोबिंद के मन एक समान ही काम करने लगते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू अपना हाथ (अपने) संत के ऊपर रखता है। प्रभू अपने संत के साथ दिन-रात (हर वक्त) बसता है। प्रभू अपने संतों की (उनकी) हरेक सांस के साथ रक्षा करता है। संत का बुरा माँगने वाले को प्रभू राज-पाट से (भी) नीचे गिरा देता है। 2। हे भाई ! कोई भी मनुष्य किसी संत की निंदा ना किया करे। जो भी मनुष्य निंदा करता है। वह आत्मिक जीवन से गिर जाता है। करतार खुद जिस मनुष्य की रक्षा करता है। सारा संसार (उसका नुकसान करने के लिए) बेशक झखें मारता फिरे (उसका कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता)। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य को अपने प्रभू पर भरोसा बन जाता है (उसको ये निश्चय हो जाता है कि) ये जीवात्मा और ये शरीर सब कुछ उस प्रभू की दी हुई ही राशि पूँजी है। हे भाई ! नानक के दिल में भी ये विश्वास बन चुका है कि अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (जीवन की बाज़ी) हार जाता है। गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य को सदा जीत प्राप्त होती है। 4। 16। 18।

नामु निरंजनु नीरि नराइण ॥

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गोंड महला 5 ॥
नामु निरंजनु नीरि नराइण ॥
रसना सिमरत पाप बिलाइण ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे भाई ! नारायण का नाम माया की कालिख से बचाने वाला (है। इसको अपने हृदय में) सींच। (ये नाम) जीभ से जपते हुए (सारे) पाप दूर हो जाते हैं। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 867 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।