कामु क्रोधु इसु तन ते मारि ॥
होइ रहीऐ सगल की रीना ॥
घटि घटि रमईआ सभ महि चीना ॥1॥
इन बिधि रमहु गोपाल गोुबिंदु ॥
तनु धनु प्रभ का प्रभ की जिंदु ॥1॥ रहाउ ॥
आठ पहर हरि के गुण गाउ ॥
जीअ प्रान को इहै सुआउ ॥
तजि अभिमानु जानु प्रभु संगि ॥
साध प्रसादि हरि सिउ मनु रंगि ॥2॥
जिनि तूं कीआ तिस कउ जानु ॥
आगै दरगह पावै मानु ॥
मनु तनु निरमल होइ निहालु ॥
रसना नामु जपत गोपाल ॥3॥
करि किरपा मेरे दीन दइआला ॥
साधू की मनु मंगै रवाला ॥
होहु दइआल देहु प्रभ दानु ॥
नानकु जपि जीवै प्रभ नामु ॥4॥11॥13॥
धूप दीप सेवा गोपाल ॥
अनिक बार बंदन करतार ॥
प्रभ की सरणि गही सभ तिआगि ॥
गुर सुप्रसंन भए वड भागि ॥1॥
आठ पहर गाईऐ गोबिंदु ॥
तनु धनु प्रभ का प्रभ की जिंदु ॥1॥ रहाउ ॥
हरि गुण रमत भए आनंद ॥
पारब्रहम पूरन बखसंद ॥
करि किरपा जन सेवा लाए ॥
जनम मरण दुख मेटि मिलाए ॥2॥
करम धरम इहु ततु गिआनु ॥
साधसंगि जपीऐ हरि नामु ॥
सागर तरि बोहिथ प्रभ चरण ॥
अंतरजामी प्रभ कारण करण ॥3॥
राखि लीए अपनी किरपा धारि ॥
पंच दूत भागे बिकराल ॥
जूऐ जनमु न कबहू हारि ॥
नानक का अंगु कीआ करतारि ॥4॥12॥14॥
करि किरपा सुख अनद करेइ ॥
बालक राखि लीए गुरदेवि ॥
प्रभ किरपाल दइआल गोुबिंद ॥
जीअ जंत सगले बखसिंद ॥1॥
तेरी सरणि प्रभ दीन दइआल ॥
पारब्रहम जपि सदा निहाल ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ दइआल दूसर कोई नाही ॥
घट घट अंतरि सरब समाही ॥
अपने दास का हलतु पलतु सवारै ॥
पतित पावन प्रभ बिरदु तुम॑ारै ॥2॥
अउखध कोटि सिमरि गोबिंद ॥
तंतु मंतु भजीऐ भगवंत ॥
रोग सोग मिटे प्रभ धिआए ॥
मन बांछत पूरन फल पाए ॥3॥
करन कारन समरथ दइआर ॥
सरब निधान महा बीचार ॥
नानक बखसि लीए प्रभि आपि ॥
सदा सदा एको हरि जापि ॥4॥13॥15॥
हरि हरि नामु जपहु मेरे मीत ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (अपने) गुरू के चरणों पर अपना सिर रखा करो।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।