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अंग 866

अंग
866
राग गोंड
राग: गोंड · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर के चरन कमल नमसकारि ॥
कामु क्रोधु इसु तन ते मारि ॥
होइ रहीऐ सगल की रीना ॥
घटि घटि रमईआ सभ महि चीना ॥1॥
इन बिधि रमहु गोपाल गोुबिंदु ॥
तनु धनु प्रभ का प्रभ की जिंदु ॥1॥ रहाउ ॥
आठ पहर हरि के गुण गाउ ॥
जीअ प्रान को इहै सुआउ ॥
तजि अभिमानु जानु प्रभु संगि ॥
साध प्रसादि हरि सिउ मनु रंगि ॥2॥
जिनि तूं कीआ तिस कउ जानु ॥
आगै दरगह पावै मानु ॥
मनु तनु निरमल होइ निहालु ॥
रसना नामु जपत गोपाल ॥3॥
करि किरपा मेरे दीन दइआला ॥
साधू की मनु मंगै रवाला ॥
होहु दइआल देहु प्रभ दानु ॥
नानकु जपि जीवै प्रभ नामु ॥4॥11॥13॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (अपने) गुरू के चरणों पर अपना सिर रखा करो। (गुरू की कृपा से अपने) इस शरीर में से काम और क्रोध (आदि विकारों) को मार डालो। हे भाई ! सबके चरणों की धूल हो के रहना चाहिए। हरेक शरीर में सुंदर राम को बसता देख। 1। हे भाई ! इस शरीर को। इस धन को। प्रभू की कृपा समझो। इस प्राण को (भी) प्रभू का ही दिया हुआ समझो। इस तरह सृष्ट के पालक गोबिंद का नाम जपते रहो। 1। रहाउ। हे भाई ! आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा के गुण गाते रहा करो। आपकी जिंद-जान का (संसार में) यही (सबसे बड़ा) उद्देश्य है। अहंकार दूर करके प्रभू को अपने अंग-संग बसता समझ। गुरू की कृपा से अपने मन को परमात्मा (के प्रेम-रंग) से रंग ले। 2। हे भाई ! जिस परमात्मा ने आपको पैदा किया है उससे सांझ बनाए रख। (जो मनुष्य ये उद्यम करता है वह) आगे प्रभू की हजूरी में आदर हासिल करता है। हे भाई ! जीभ से परमात्मा का नाम जपते हुए मन-तन पवित्र हो जाता है। मन खिला रहता है। शरीर भी प्रफुल्लित रहता है। 3। हे दीनों पर दया करने वाले मेरे प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर। (मेरा) मन गुरू के चरणों की धूल माँगता है। हे प्रभू (नानक पर) दयावान हो और ये ख़ैर डाल कि (आपका दास) नानक। हे प्रभू ! आपका नाम जप के आत्मिक जीवन प्राप्त करता रहे। 4। 11। 13।
गोंड महला 5 ॥
धूप दीप सेवा गोपाल ॥
अनिक बार बंदन करतार ॥
प्रभ की सरणि गही सभ तिआगि ॥
गुर सुप्रसंन भए वड भागि ॥1॥
आठ पहर गाईऐ गोबिंदु ॥
तनु धनु प्रभ का प्रभ की जिंदु ॥1॥ रहाउ ॥
हरि गुण रमत भए आनंद ॥
पारब्रहम पूरन बखसंद ॥
करि किरपा जन सेवा लाए ॥
जनम मरण दुख मेटि मिलाए ॥2॥
करम धरम इहु ततु गिआनु ॥
साधसंगि जपीऐ हरि नामु ॥
सागर तरि बोहिथ प्रभ चरण ॥
अंतरजामी प्रभ कारण करण ॥3॥
राखि लीए अपनी किरपा धारि ॥
पंच दूत भागे बिकराल ॥
जूऐ जनमु न कबहू हारि ॥
नानक का अंगु कीआ करतारि ॥4॥12॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! कर्म-काण्डी लोग देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। उनके आगे धूप धुखाते हैं और दीए जलाते हैं। पर) वह (धूप-दीप आदि वाली) सारी क्रिया छोड़ के प्रभू का आसरा लेता है। परमात्मा के दर पे हर वक्त सिर झुकाना। परमात्मा की भक्ति करनी ही उस मनुष्य के लिए ‘धूप-दीप’ की क्रिया है। जिस मनुष्य पर अहो-भाग्य से गुरू मेहरवान हो जाए।1। उसकी सिफत सालाह आठों पहर (हर वक्त) करनी चाहिए। हे भाई ! जिस परमात्मा का दिया हुआ ये सारा शरीर है। ये प्राण हैं और ये धन है। 1। रहाउ। परमात्मा के गुण गाते हुए अंदर आनंद बना रहता है। सर्व-व्यापक प्रभु बख्शिंद है हे भाई ! परमात्मा मेहर करके अपने सेवकों को अपनी भक्ति में जोड़ता है। उनके जनम से ले के मरने तक के सारे दुख मिटा के उनको अपने चरणों में मिला लेता है। 2। हे भाई ! यही है धार्मिक कर्म और यही है असल ज्ञान। गुरू की संगति में टिक के परमात्मा का नाम जपते रहना चाहिए। हे भाई ! परमात्मा के चरणों को जहाज बना के इस संसार-समुंद्र से पार हो। वह सबके दिल की जानने वाले और जगत के पैदा करने वाला व् पालने वाला है 3। हे भाई ! प्रभू अपनी मेहर करके जिन की रक्षा करता है। (कामादिक) पाँचों डरावने वैरी उनसे परे भाग जाते हैं। वह मनुष्य (विकारों के) जूए में अपना जीवन कभी नहीं गवाता। हे नानक ! जिस भी मनुष्य का पक्ष परमात्मा ने किया है। 4। 12। 14।
गोंड महला 5 ॥
करि किरपा सुख अनद करेइ ॥
बालक राखि लीए गुरदेवि ॥
प्रभ किरपाल दइआल गोुबिंद ॥
जीअ जंत सगले बखसिंद ॥1॥
तेरी सरणि प्रभ दीन दइआल ॥
पारब्रहम जपि सदा निहाल ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ दइआल दूसर कोई नाही ॥
घट घट अंतरि सरब समाही ॥
अपने दास का हलतु पलतु सवारै ॥
पतित पावन प्रभ बिरदु तुम॑ारै ॥2॥
अउखध कोटि सिमरि गोबिंद ॥
तंतु मंतु भजीऐ भगवंत ॥
रोग सोग मिटे प्रभ धिआए ॥
मन बांछत पूरन फल पाए ॥3॥
करन कारन समरथ दइआर ॥
सरब निधान महा बीचार ॥
नानक बखसि लीए प्रभि आपि ॥
सदा सदा एको हरि जापि ॥4॥13॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे भाई ! मेहर करके (उनके हृदय में) आनंद पैदा करता है। उस सबसे बड़े प्रभू ने (सदा ही शरण पड़े अपने) बच्चों की रक्षा की है। हे भाई ! गोबिंद प्रभू कृपा का घर है। दया का श्रोत है। सारे ही जीवों पर बख्शिश करने वाला है। 1। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! (हम जीव) आपके ही आसरे हैं। हे पारब्रहम ! (आपका नाम) ज पके सदा खिले रहा जा सकता है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आपके जैसा दया का श्रोत (जगत में) और कोई दूसरा नहीं। आप हरेक शरीर में मौजूद है। आप सारे जीवों में व्यापक है। हे भाई ! प्रभू अपने सेवक का ये लोक और परलोक सुंदर बना देता है। हे प्रभू ! आपके घर में यही बिरद है (आपका मूल स्वभाव है) कि आप विकारियों को निर्मल जीवन वाला बना देता है। 2। हे भाई ! गोबिंद का नाम सिमरा कर। ये नाम ही करोड़ों दवाईयों (के बराबर) है। हे भाई ! भगवान का नाम जपना चाहिए। ये नाम (सबसे बढ़िया) तंत्र और मंत्र है। जो मनुष्य इस नाम को सिमरता है। उसके सारे रोग सारी चिंता-फिक्रें मिट जाते हैं। वह मनुष्य सारे ही मन मांगे फल प्राप्त कर लेता है। 3। हे भाई ! परमात्मा जगत का मूल है। सब ताकतों का मालिक है। दया का श्रोत है। उसके उच्च गुणों का विचार करना ही (जीव के लिए) सारे खजाने हैं। हे नानक ! प्रभू ने खुद ही अपने सेवकों पर सदा बख्शिश की है। हे भाई ! सदा ही उस एक परमात्मा का नाम जपा कर। 4। 13। 15।
गोंड महला 5 ॥
हरि हरि नामु जपहु मेरे मीत ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5॥ हे मेरे मित्र ! परमात्मा का नाम सदा जपा कर।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (अपने) गुरू के चरणों पर अपना सिर रखा करो।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।