राम राम संगि करि बिउहार ॥
राम राम राम प्रान अधार ॥
राम राम राम कीरतनु गाइ ॥
रमत रामु सभ रहिओ समाइ ॥1॥
संत जना मिलि बोलहु राम ॥
सभ ते निरमल पूरन काम ॥1॥ रहाउ ॥
राम राम धनु संचि भंडार ॥
राम राम राम करि आहार ॥
राम राम वीसरि नही जाइ ॥
करि किरपा गुरि दीआ बताइ ॥2॥
राम राम राम सदा सहाइ ॥
राम राम राम लिव लाइ ॥
राम राम जपि निरमल भए ॥
जनम जनम के किलबिख गए ॥3॥
रमत राम जनम मरणु निवारै ॥
उचरत राम भै पारि उतारै ॥
सभ ते ऊच राम परगास ॥
निसि बासुर जपि नानक दास ॥4॥8॥10॥
उन कउ खसमि कीनी ठाकहारे ॥
दास संग ते मारि बिदारे ॥
गोबिंद भगत का महलु न पाइआ ॥
राम जना मिलि मंगलु गाइआ ॥1॥
सगल स्रिसटि के पंच सिकदार ॥
राम भगत के पानीहार ॥1॥ रहाउ ॥
जगत पास ते लेते दानु ॥
गोबिंद भगत कउ करहि सलामु ॥
लूटि लेहि साकत पति खोवहि ॥
साध जना पग मलि मलि धोवहि ॥2॥
पंच पूत जणे इक माइ ॥
उतभुज खेलु करि जगत विआइ ॥
तीनि गुणा कै संगि रचि रसे ॥
इन कउ छोडि ऊपरि जन बसे ॥3॥
करि किरपा जन लीए छडाइ ॥
जिस के से तिनि रखे हटाइ ॥
कहु नानक भगति प्रभ सारु ॥
बिनु भगती सभ होइ खुआरु ॥4॥9॥11॥
कलि कलेस मिटे हरि नाइ ॥
दुख बिनसे सुख कीनो ठाउ ॥
जपि जपि अंम्रित नामु अघाए ॥
संत प्रसादि सगल फल पाए ॥1॥
राम जपत जन पारि परे ॥
जनम जनम के पाप हरे ॥1॥ रहाउ ॥
गुर के चरन रिदै उरि धारे ॥
अगनि सागर ते उतरे पारे ॥
जनम मरण सभ मिटी उपाधि ॥
प्रभ सिउ लागी सहजि समाधि ॥2॥
थान थनंतरि एको सुआमी ॥
सगल घटा का अंतरजामी ॥
करि किरपा जा कउ मति देइ ॥
आठ पहर प्रभ का नाउ लेइ ॥3॥
जा कै अंतरि वसै प्रभु आपि ॥
ता कै हिरदै होइ प्रगासु ॥
भगति भाइ हरि कीरतनु करीऐ ॥
जपि पारब्रहमु नानक निसतरीऐ ॥4॥10॥12॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! आप जगत में व्यापार करने आया है) परमात्मा के नाम (की राशि) से (नाम सिमरन का) व्यापार किया कर।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।