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अंग 865

अंग
865
राग गोंड
राग: गोंड · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गोंड महला 5 ॥
राम राम संगि करि बिउहार ॥
राम राम राम प्रान अधार ॥
राम राम राम कीरतनु गाइ ॥
रमत रामु सभ रहिओ समाइ ॥1॥
संत जना मिलि बोलहु राम ॥
सभ ते निरमल पूरन काम ॥1॥ रहाउ ॥
राम राम धनु संचि भंडार ॥
राम राम राम करि आहार ॥
राम राम वीसरि नही जाइ ॥
करि किरपा गुरि दीआ बताइ ॥2॥
राम राम राम सदा सहाइ ॥
राम राम राम लिव लाइ ॥
राम राम जपि निरमल भए ॥
जनम जनम के किलबिख गए ॥3॥
रमत राम जनम मरणु निवारै ॥
उचरत राम भै पारि उतारै ॥
सभ ते ऊच राम परगास ॥
निसि बासुर जपि नानक दास ॥4॥8॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! आप जगत में व्यापार करने आया है) परमात्मा के नाम (की राशि) से (नाम सिमरन का) व्यापार किया कर। परमात्मा के नाम को अपनी जिंद (अपने प्राणों) का आसरा बना ले। हे भाई ! सदा ही उसकी सिफतसालाह किया कर। जो प्रभू हर जगह व्यापक है। सारी सृष्टि में मौजूद है। 1। हे भाई ! संतजनों के साथ मिल के। परमात्मा का नाम सिमरा करो। ये काम अन्य सारे कामों से पवित्र और सफल है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम धन संचित किया कर। खजाने भर ले। परमात्मा के नाम को अपने प्राणों की खुराक बना ले। गुरू ने कृपा करके (मुझे ये बात) बता दी है कि (देखना।) कहीं परमात्मा का नाम आपको भूल ना जाए। 2। हे भाई ! जो परमात्मा सदा ही सहायता करने वाला है। उसके चरणों में सदा ही सुरति जोड़े रख। परमात्मा का नाम जप-जप के जीव पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। उनके अनेक जन्मों के किए हुए पाप दूर हो जाते हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने से (परमात्मा मनुष्य का) जनम-मरण (का चक्र) दूर कर देता है। प्रभू का नाम उचारते हुए (प्रभू जीव को) सहम (-भरे संसार समुंद्र) से पार लंघा देता है। हे दास नानक ! सबसे ऊँचे प्रभू (के नाम) का प्रकाश (अपने अंदर) पैदा कर। दिन-रात उसका नाम जपा कर। 4। 8। 10।
गोंड महला 5 ॥
उन कउ खसमि कीनी ठाकहारे ॥
दास संग ते मारि बिदारे ॥
गोबिंद भगत का महलु न पाइआ ॥
राम जना मिलि मंगलु गाइआ ॥1॥
सगल स्रिसटि के पंच सिकदार ॥
राम भगत के पानीहार ॥1॥ रहाउ ॥
जगत पास ते लेते दानु ॥
गोबिंद भगत कउ करहि सलामु ॥
लूटि लेहि साकत पति खोवहि ॥
साध जना पग मलि मलि धोवहि ॥2॥
पंच पूत जणे इक माइ ॥
उतभुज खेलु करि जगत विआइ ॥
तीनि गुणा कै संगि रचि रसे ॥
इन कउ छोडि ऊपरि जन बसे ॥3॥
करि किरपा जन लीए छडाइ ॥
जिस के से तिनि रखे हटाइ ॥
कहु नानक भगति प्रभ सारु ॥
बिनु भगती सभ होइ खुआरु ॥4॥9॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे भाई ! जब मालिक प्रभू ने उन (पाँच चौधरियों) को मना किया। तब वे (प्रभू के सेवकों के समाने) हार मान गए। अपने सेवकों से (प्रभू ने उनको) मार के भगा दिया। वे चौधरी परमात्मा के भक्तों का ठिकाना ना ढूँढ सके। (क्योंकि) परमात्मा के सेवकों ने (सदा) परमात्मा की सिफत सालाह का गीत गाया है। 1। हे भाई ! (काम। क्रोध। लोभ। मोह। अहंकार- ये) पाँच सारी सृष्टि के चौधरी हैं। पर प्रभू की बंदगी करने वालों के ये नौकर बन के रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! ये पाँच चौधरी दुनिया (के लोगों से) दण्ड (दान। जैसे गुण्डे हफता वगैरा) लेते हैं। पर प्रभू के भक्तों को नमस्कार करते हैं। प्रभू से विछुड़े हुए लोगों की आत्मिक राशि-पूँजी लूट लेते हैं। (साकत। मनमुख यहां अपनी) इज्जत गवा लेते हैं। पर ये चौधरी गुरमुखों के पैर मल-मल के धोते हैं। 2। (हे भाई ! प्रभू के हुकम में) माया ने उतभुज (उत्पक्ति) आदि का खेल रचा के यह जगत पैदा किया है। (यह कामादिक) पाँचों पुत्र भी उसने ही पैदा किए हैं। (दुनिया के लोग माया के) तीन गुणों के साथ रच-मिच के रस भोग रहे हैं। (जबकि) परमात्मा के भगत इनको त्याग के ऊँचे आत्मिक मण्डल में बसते हैं। 3। प्रभू ने मेहर करके संत जनों को इनसे बचा रखा है। (हे भाई ! ये कामादिक) जिस (प्रभू) के बनाए हुए हैं। उसने इनको (संत जनों से) दूर ही रोक के रखा है। हे नानक ! कह- (हे भाई !) प्रभू की भक्ति किया कर। भगती के बिना सारी सृष्टि (इन चौधरियों के वश में पड़ के) दुखी होती है। 4। 9। 11।
गोंड महला 5 ॥
कलि कलेस मिटे हरि नाइ ॥
दुख बिनसे सुख कीनो ठाउ ॥
जपि जपि अंम्रित नामु अघाए ॥
संत प्रसादि सगल फल पाए ॥1॥
राम जपत जन पारि परे ॥
जनम जनम के पाप हरे ॥1॥ रहाउ ॥
गुर के चरन रिदै उरि धारे ॥
अगनि सागर ते उतरे पारे ॥
जनम मरण सभ मिटी उपाधि ॥
प्रभ सिउ लागी सहजि समाधि ॥2॥
थान थनंतरि एको सुआमी ॥
सगल घटा का अंतरजामी ॥
करि किरपा जा कउ मति देइ ॥
आठ पहर प्रभ का नाउ लेइ ॥3॥
जा कै अंतरि वसै प्रभु आपि ॥
ता कै हिरदै होइ प्रगासु ॥
भगति भाइ हरि कीरतनु करीऐ ॥
जपि पारब्रहमु नानक निसतरीऐ ॥4॥10॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए परमात्मा के भगत (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। उनके अनेकों जन्मों के किए हुए पाप दूर हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू के नाम की बरकति से (संतजनों के अंदर से) झगड़े-बखेड़े मिट जाते हैं। उनके सारे दुख नाश हो जाते हैं। सुख उनके अंदर अपना ठिकाना बना लेते हैं। आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जप-जप के (संतजन माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त रहते हैं। गुरू की कृपा से वे सारे फल प्राप्त कर लेते हैं। 1। हे भाई ! संत जन अपने दिल में गुरू के चरण बसाए रखते हैं (पूरी श्रद्धा से गुरू के शबद को मन में टिकाए रखते हैं)। इस तरह वे तृष्णा की आग के समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। वे जनम-मरण के चक्कर का सारा ही बखेड़ा खत्म कर लेते हैं। आत्मिक अडोलता के द्वारा उनकी सुरति प्रभू से जुड़ी रहती है। 2। हे भाई ! जो मालिक प्रभू खुद ही हरेक जगह में बस रहा है और सारे जीवों के दिलों की जानने वाला है। वह प्रभू जिस मनुष्य को मेहर करके समझ बख्शता है। वह मनुष्य आठों पहर (हर वक्त्) परमात्मा का नाम सिमरन करता रहता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू स्वयं आ प्रकट होता है। उस व्यक्ति के हृदय में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो जाता है। हे नानक ! भगती की भावना से परमात्मा की सिफत सालाह करते रहना चाहिए। परमात्मा का नाम जप के (संसार-समुंद्र से) पार लांघा जाता है। 4। 10। 12।
गोंड महला 5 ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! आप जगत में व्यापार करने आया है) परमात्मा के नाम (की राशि) से (नाम सिमरन का) व्यापार किया कर।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।