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अंग 864

अंग
864
राग गोंड
राग: गोंड · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दिनु रैणि नानकु नामु धिआए ॥
सूख सहज आनंद हरि नाए ॥4॥4॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! ऐसे संत जनों की संगति में) नानक दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता है। और हरी-नाम की बरकति से (नानक के हृदय में) आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद बने रहते हैं। 4। 4। 6।
गोंड महला 5 ॥
गुर की मूरति मन महि धिआनु ॥
गुर कै सबदि मंत्रु मनु मान ॥
गुर के चरन रिदै लै धारउ ॥
गुरु पारब्रहमु सदा नमसकारउ ॥1॥
मत को भरमि भुलै संसारि ॥
गुर बिनु कोइ न उतरसि पारि ॥1॥ रहाउ ॥
भूले कउ गुरि मारगि पाइआ ॥
अवर तिआगि हरि भगती लाइआ ॥
जनम मरन की त्रास मिटाई ॥
गुर पूरे की बेअंत वडाई ॥2॥
गुर प्रसादि ऊरध कमल बिगास ॥
अंधकार महि भइआ प्रगास ॥
जिनि कीआ सो गुर ते जानिआ ॥
गुर किरपा ते मुगध मनु मानिआ ॥3॥
गुरु करता गुरु करणै जोगु ॥
गुरु परमेसरु है भी होगु ॥
कहु नानक प्रभि इहै जनाई ॥
बिनु गुर मुकति न पाईऐ भाई ॥4॥5॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू का शबद ही गुरू की मूर्ति है) गुरू की (इस) मूर्ति का (मेरे) मन में ध्यान टिका रहता है। गुरू के शबद से मेरा मन नाम-मंत्र को (सब मंत्रों से श्रेष्ठ मंत्र) मान रहा है। गुरू के चरण अपने हृदय में धार के बसाए रखता हूँ। हे भाई !) मैं तो गुरू (को) परमात्मा (का रूप जान के उस) को सदा नमस्कार करता हूँ। 1। हे भाई ! दुनियां में कहीं कोई व्यक्ति भटकना में पड़ कर (ये बात) ना भूल जाए। कि गुरू के बिना कोई और जीव (संसार समुंद्र से) पार लंघा सकता है। 1। रहाउ। गलत रास्ते पर जा रहे मनुष्य को गुरू ने (ही सही जीवन के) रास्ते पर (हमेशा) डाला है। औरों की (देवी-देवताओं की भक्ति) छुड़वा के परमातमा की भक्ति से जोड़ा है (और। इस तरह उसके अंदर से) जनम-मरण के चक्कर का सहम समाप्त कर दिया है। हे भाई ! पूरे गुरू की महिमा का अंत नहीं पाया जा सकता। 2। हे भाई ! (माया की ओर) उलटा हुआ हृदय-कमल। गुरू की कृपा से (पलट के सीधा हो के) खिल उठता है। (माया के मोह के) घोर अंधेरे में (सही ऊँचे आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। गुरू के द्वारा उस परमात्मा से जान-पहचान बन जाती है जिसने (यह सारा जगत) पैदा किया है। (ये) मूर्ख मन गुरू की कृपा से (प्रभू के चरणों में जुड़े रह के) पतीज जाता है। 3। गुरू (आत्मिक अवस्था में ईश्वर से एक-सुर होने के कारण) ईश्वर (करतार) का ही रूप है जो सब कुछ कर सकने के समर्थ है। गुरू उस परमेश्वर का रूप है। जो (पहले भी मौजूद था) अब भी मौजूद है और सदा कायम रहेगा। नानक कहता है की प्रभु ने यही बात समझाई है की हे भाई ! गुरू (की शरण पड़े) बिना (माया के मोह के अंधेरे से) मुक्ति नहीं मिल सकती। 4। 5। 7।
गोंड महला 5 ॥
गुरू गुरू गुरु करि मन मोर ॥
गुरू बिना मै नाही होर ॥
गुर की टेक रहहु दिनु राति ॥
जा की कोइ न मेटै दाति ॥1॥
गुरु परमेसरु एको जाणु ॥
जो तिसु भावै सो परवाणु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर चरणी जा का मनु लागै ॥
दूखु दरदु भ्रमु ता का भागै ॥
गुर की सेवा पाए मानु ॥
गुर ऊपरि सदा कुरबानु ॥2॥
गुर का दरसनु देखि निहाल ॥
गुर के सेवक की पूरन घाल ॥
गुर के सेवक कउ दुखु न बिआपै ॥
गुर का सेवकु दह दिसि जापै ॥3॥
गुर की महिमा कथनु न जाइ ॥
पारब्रहमु गुरु रहिआ समाइ ॥
कहु नानक जा के पूरे भाग ॥
गुर चरणी ता का मनु लाग ॥4॥6॥8॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे मेरे मन ! हर वक्त गुरू (के उपदेश) को याद रख। मुझे गुरू के बिना और कोई आसरा नहीं सूझता। उस गुरू के आसरे दिन-रात टिका रह। हे मन ! जिस गुरू की बख्शी हुई आत्मिक जीवन की दाति को कोई मिटा नहीं सकता। 1। हे भाई ! गुरू और परमात्मा का एक-रूप समझो। जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है। वही गुरू भी (सिर-माथे) कबूल करता है। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य का मन गुरू के चरणों में टिका रहता है। उसकी हरेक भटकना हरेक दुख-दर्द दूर हो जाता है। हे मन ! गुरू की शरण पड़ के मनुष्य (हर जगह) आदर पाता है। हे मेरे मन ! गुरू से सदके हो। 2। हे मेरे मन ! गुरू के दर्शन करके (मनुष्य का तन-मन) खिल उठता है। गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य की मेहनत सफल हो जाती है। कोई भी दुख गुरू के सेवक पर (अपना) जोर नहीं डाल सकता। गुरू की शरण रहने वाला मनुष्य सारे संसार में प्रकट हो जाता है। 3। हे भाई ! गुरू की महिमा बयान नहीं की जा सकती। गुरू उस परमात्मा का रूप है। जो हर जगह व्यापक है। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य के बड़े भाग्य जागते हैं। उसका मन गुरू के चरणों में टिका रहता है। 4। 6। 8।
गोंड महला 5 ॥
गुरु मेरी पूजा गुरु गोबिंदु ॥
गुरु मेरा पारब्रहमु गुरु भगवंतु ॥
गुरु मेरा देउ अलख अभेउ ॥
सरब पूज चरन गुर सेउ ॥1॥
गुर बिनु अवरु नाही मै थाउ ॥
अनदिनु जपउ गुरू गुर नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु मेरा गिआनु गुरु रिदै धिआनु ॥
गुरु गोपालु पुरखु भगवानु ॥
गुर की सरणि रहउ कर जोरि ॥
गुरू बिना मै नाही होरु ॥2॥
गुरु बोहिथु तारे भव पारि ॥
गुर सेवा जम ते छुटकारि ॥
अंधकार महि गुर मंत्रु उजारा ॥
गुर कै संगि सगल निसतारा ॥3॥
गुरु पूरा पाईऐ वडभागी ॥
गुर की सेवा दूखु न लागी ॥
गुर का सबदु न मेटै कोइ ॥
गुरु नानकु नानकु हरि सोइ ॥4॥7॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 5 ॥ हे भाई ! (मेरा) गुरू (गुरू की शरण ही) मेरे वास्ते (देव-) पूजा है। (मेरा) गुरू। गोबिंद (का रूप) है। मेरा गुरू परमात्मा (का रूप) है। गुरू बड़ी ही समर्था का मालिक है। मेरा गुरू उस प्रकाश-रूप प्रभू का रूप है जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता और जिसका भेद पाया नहीं जा सकता। मैं तो उन गुरू-चरणों की शरण पड़ा रहता हूँ जिनको सारी सृष्टि पूजती है। 1। हे भाई ! (माया के मोह के घोर अंधकार से बचने के लिए) गुरू के बिना मुझे और कोई जगह नहीं सूझती (जिसका मैं आसरा ले सकूँ। सो) मैं हर वक्त गुरू का नाम जपता हूँ (गुरू की ओट लिए बैठा हूँ)। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू ही मेरे वास्ते धार्मिक चर्चा है। गुरू (सदा मेरे) हृदय में टिका हुआ है। यही मेरी समाधि है। गुरू उस भगवान का रूप है जो सर्व-व्यापक है और सृष्टि का पालनहार है। मैं (अपने) दोनों हाथ जोड़ के (सदा) गुरू की शरण पड़ा रहता हॅूँ। गुरू के बिना मुझे कोई और आसरा नहीं सूझता। 2। हे भाई ! गुरू जहाज है जो संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। गुरू की शरण पड़ने से जमों (के डर) से खलासी मिल जाती है। (माया के मोह के) घोर अंधकार में गुरू का उपदेश ही (आत्मिक जीवन का) प्रकाश देता है। गुरू की संगति में रहने से सारे जीवों का पार-उतारा हो जाता है। 3। हे भाई ! बहुत ही भाग्यों से पूरा गुरू मिलता है। गुरू की शरण पड़ने से कोई दुख छू भी नहीं सकता। (जिस मनुष्य के हृदय में) गुरू का शबद (बस जाए। उसके अंदर से) कोई मनुष्य (आत्मिक जीवन के उजाले को) मिटा नहीं सकता। हे भाई ! गुरू नानक उस परमात्मा का रूप है। 4। 7। 9।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! ऐसे संत जनों की संगति में) नानक दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।