सूख सहज आनंद हरि नाए ॥4॥4॥6॥
गुर की मूरति मन महि धिआनु ॥
गुर कै सबदि मंत्रु मनु मान ॥
गुर के चरन रिदै लै धारउ ॥
गुरु पारब्रहमु सदा नमसकारउ ॥1॥
मत को भरमि भुलै संसारि ॥
गुर बिनु कोइ न उतरसि पारि ॥1॥ रहाउ ॥
भूले कउ गुरि मारगि पाइआ ॥
अवर तिआगि हरि भगती लाइआ ॥
जनम मरन की त्रास मिटाई ॥
गुर पूरे की बेअंत वडाई ॥2॥
गुर प्रसादि ऊरध कमल बिगास ॥
अंधकार महि भइआ प्रगास ॥
जिनि कीआ सो गुर ते जानिआ ॥
गुर किरपा ते मुगध मनु मानिआ ॥3॥
गुरु करता गुरु करणै जोगु ॥
गुरु परमेसरु है भी होगु ॥
कहु नानक प्रभि इहै जनाई ॥
बिनु गुर मुकति न पाईऐ भाई ॥4॥5॥7॥
गुरू गुरू गुरु करि मन मोर ॥
गुरू बिना मै नाही होर ॥
गुर की टेक रहहु दिनु राति ॥
जा की कोइ न मेटै दाति ॥1॥
गुरु परमेसरु एको जाणु ॥
जो तिसु भावै सो परवाणु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर चरणी जा का मनु लागै ॥
दूखु दरदु भ्रमु ता का भागै ॥
गुर की सेवा पाए मानु ॥
गुर ऊपरि सदा कुरबानु ॥2॥
गुर का दरसनु देखि निहाल ॥
गुर के सेवक की पूरन घाल ॥
गुर के सेवक कउ दुखु न बिआपै ॥
गुर का सेवकु दह दिसि जापै ॥3॥
गुर की महिमा कथनु न जाइ ॥
पारब्रहमु गुरु रहिआ समाइ ॥
कहु नानक जा के पूरे भाग ॥
गुर चरणी ता का मनु लाग ॥4॥6॥8॥
गुरु मेरी पूजा गुरु गोबिंदु ॥
गुरु मेरा पारब्रहमु गुरु भगवंतु ॥
गुरु मेरा देउ अलख अभेउ ॥
सरब पूज चरन गुर सेउ ॥1॥
गुर बिनु अवरु नाही मै थाउ ॥
अनदिनु जपउ गुरू गुर नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु मेरा गिआनु गुरु रिदै धिआनु ॥
गुरु गोपालु पुरखु भगवानु ॥
गुर की सरणि रहउ कर जोरि ॥
गुरू बिना मै नाही होरु ॥2॥
गुरु बोहिथु तारे भव पारि ॥
गुर सेवा जम ते छुटकारि ॥
अंधकार महि गुर मंत्रु उजारा ॥
गुर कै संगि सगल निसतारा ॥3॥
गुरु पूरा पाईऐ वडभागी ॥
गुर की सेवा दूखु न लागी ॥
गुर का सबदु न मेटै कोइ ॥
गुरु नानकु नानकु हरि सोइ ॥4॥7॥9॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! ऐसे संत जनों की संगति में) नानक दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।