गलंी असी चंगीआ आचारी बुरीआह ॥
मनहु कुसुधा कालीआ बाहरि चिटवीआह ॥
रीसा करिह तिनाड़ीआ जो सेवहि दरु खड़ीआह ॥
नालि खसमै रतीआ माणहि सुखि रलीआह ॥
होदै ताणि निताणीआ रहहि निमानणीआह ॥
नानक जनमु सकारथा जे तिन कै संगि मिलाह ॥2॥
तूं आपे जलु मीना है आपे आपे ही आपि जालु ॥
तूं आपे जालु वताइदा आपे विचि सेबालु ॥
तूं आपे कमलु अलिपतु है सै हथा विचि गुलालु ॥
तूं आपे मुकति कराइदा इक निमख घड़ी करि खिआलु ॥
हरि तुधहु बाहरि किछु नही गुर सबदी वेखि निहालु ॥7॥
हुकमु न जाणै बहुता रोवै ॥
अंदरि धोखा नीद न सोवै ॥
जे धन खसमै चलै रजाई ॥ दरि घरि सोभा महलि बुलाई ॥
नानक करमी इह मति पाई ॥
गुर परसादी सचि समाई ॥1॥
मनमुख नाम विहूणिआ रंगु कसुंभा देखि न भुलु ॥
इस का रंगु दिन थोड़िआ छोछा इस दा मुलु ॥
दूजै लगे पचि मुए मूरख अंध गवार ॥
बिसटा अंदरि कीट से पइ पचहि वारो वार ॥
नानक नाम रते से रंगुले गुर कै सहजि सुभाइ ॥
भगती रंगु न उतरै सहजे रहै समाइ ॥2॥
सिसटि उपाई सभ तुधु आपे रिजकु संबाहिआ ॥
इकि वलु छलु करि कै खावदे मुहहु कूड़ु कुसतु तिनी ढाहिआ ॥
तुधु आपे भावै सो करहि तुधु ओतै कंमि ओइ लाइआ ॥
इकना सचु बुझाइओनु तिना अतुट भंडार देवाइआ ॥
हरि चेति खाहि तिना सफलु है अचेता हथ तडाइआ ॥8॥
पड़ि पड़ि पंडित बेद वखाणहि माइआ मोह सुआइ ॥
दूजै भाइ हरि नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥
जिनि जीउ पिंडु दिता तिसु कबहूं न चेतै जो देंदा रिजकु संबाहि ॥
जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवै जाइ ॥
मनमुखि किछू न सूझै अंधुले पूरबि लिखिआ कमाइ ॥
पूरै भागि सतिगुरु मिलै सुखदाता नामु वसै मनि आइ ॥
सुखु माणहि सुखु पैनणा सुखे सुखि विहाइ ॥
नानक सो नाउ मनहु न विसारीऐ जितु दरि सचै सोभा पाइ ॥1॥
सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ सचु नामु गुणतासु ॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का नाम हृदय में संभाल के आत्मिक मौत से बचे रहते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।