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अंग 859

अंग
859
राग गोंड
राग: गोंड · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु गोंड चउपदे महला 4 घरु 1 ॥
जे मनि चिति आस रखहि हरि ऊपरि ता मन चिंदे अनेक अनेक फल पाई ॥
हरि जाणै सभु किछु जो जीइ वरतै प्रभु घालिआ किसै का इकु तिलु न गवाई ॥
हरि तिस की आस कीजै मन मेरे जो सभ महि सुआमी रहिआ समाई ॥1॥
मेरे मन आसा करि जगदीस गुसाई ॥
जो बिनु हरि आस अवर काहू की कीजै सा निहफल आस सभ बिरथी जाई ॥1॥ रहाउ ॥
जो दीसै माइआ मोह कुटंबु सभु मत तिस की आस लगि जनमु गवाई ॥
इन॑ कै किछु हाथि नही कहा करहि इहि बपुड़े इन॑ का वाहिआ कछु न वसाई ॥
मेरे मन आस करि हरि प्रीतम अपुने की जो तुझु तारै तेरा कुटंबु सभु छडाई ॥2॥
जे किछु आस अवर करहि परमित्री मत तूं जाणहि तेरै कितै कंमि आई ॥
इह आस परमित्री भाउ दूजा है खिन महि झूठु बिनसि सभ जाई ॥
मेरे मन आसा करि हरि प्रीतम साचे की जो तेरा घालिआ सभु थाइ पाई ॥3॥
आसा मनसा सभ तेरी मेरे सुआमी जैसी तू आस करावहि तैसी को आस कराई ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: ऑकार एक है, उसका नाम सत्य है, वही संसार का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है,वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा शाश्वत है, वह जन्म-मरण से रहित है, वह स्वयं ही प्रकाशमान हुआ है, जिसे गुरु-कृपा से पाया जा सकता है। रागु गोंड चउपदे महला 4 घरु 1 ॥ हे भाई ! अगर आप अपने मन में अपने चित्त में सिर्फ परमात्मा पर भरोसा रखे। तो आप अनेकों ही मन मांगे फल हासिल कर लेगा। (क्योंकि) परमात्मा वह सब कुछ जानता है जो (हम जीवों के) मन में घटित होता है। परमात्मा किसीकी की हुई मेहनत को रक्ती भर भी व्यर्थ नहीं जाने देता। सो। हे मेरे मन ! उस मालिक परमात्मा की सदा आस रख। जो सब जीवों में मौजूद है। 1। हे मेरे मन ! जगत के मालिक धरती के साई की (सहायता की) आस रखा कर। परमात्मा के बिना जो भी किसी की भी आस की जाती है। वह आस सफल नहीं होती। वह आस व्यर्थ जाती है। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! जो यह सारा परिवार दिखाई दे रहा है। यह माया के मोह (का मूल) है। इस परिवार की आस रख के कहीं अपना जीवन व्यर्थ ना गवा बैठना। इन संबन्धियों के हाथ में कुछ नहीं। ये बेचारे क्या कर सकते हैं। इनका लगाया हुआ जोर सफल नहीं हो सकता। सो। हे मेरे मन ! अपने प्रीतम प्रभू की ही आस रख। वही आपको पार लंघा सकता है। आपके परिवार को भी (हरेक बिपता से) छुड़वा सकता है। 2। हे भाई ! अगर आप (प्रभू को छोड़ के) और माया आदि की आस बनाएगा। कहीं ये ना समझ लेना कि माया आपके किसी काम आएगी। माया वाली आस (प्रभू के बिना) दूसरा प्यार है। ये सारा झूठा प्यार है। ये तो एक छिन में नाश हो जाएगा। हे मेरे मन ! सदा कायम रहने वाले प्रीतम प्रभू की ही आस रख। वह प्रभू आपकी की हुई सारी मेहनत सफल करेगा। 3। पर। हे मेरे मालिक-प्रभू ! आपकी ही प्रेरणा से जीव आशाएं बाँधता है। मन के फुरने बनाता है। हरेक जीव वैसी ही आशा करता है जैसी आप प्रेरणा करता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “ऑकार एक है, उसका नाम सत्य है, वही संसार का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है,वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा शाश्वत है, वह जन्म-मरण से रहित है, वह स्वयं ही प्रकाशमान।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।