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अंग 858

अंग
858
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: Bhagat Ravi Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दुख बिसारि सुख अंतरि लीना ॥1॥
गिआन अंजनु मो कउ गुरि दीना ॥
राम नाम बिनु जीवनु मन हीना ॥1॥ रहाउ ॥
नामदेइ सिमरनु करि जानां ॥
जगजीवन सिउ जीउ समानां ॥2॥1॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: मैं अब (जगत के सारे) दुख भुला के (आत्मिक) सुख में लीन हो गया हूँ। 1। मुझे सतिगुरू ने अपने ज्ञान का (ऐसा) सुरमा दिया है कि हे मन ! अब प्रभू की बंदगी के बिना जीना व्यर्थ लगता है। 1। रहाउ। मैं नामदेव ने प्रभू का भजन करके प्रभू से सांझ डाल ली है और जगत-के-आसरे प्रभू में मेरे प्राण लीन हो गए हैं। 2। 1।
बिलावलु बाणी रविदास भगत की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी ॥
असट दसा सिधि कर तलै सभ क्रिपा तुमारी ॥1॥
तू जानत मै किछु नही भव खंडन राम ॥
सगल जीअ सरनागती प्रभ पूरन काम ॥1॥ रहाउ ॥
जो तेरी सरनागता तिन नाही भारु ॥
ऊच नीच तुम ते तरे आलजु संसारु ॥2॥
कहि रविदास अकथ कथा बहु काइ करीजै ॥
जैसा तू तैसा तुही किआ उपमा दीजै ॥3॥1॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु बाणी रविदास भगत की सतिगुर प्रसादि ॥ हरेक आदमी (किसी की) गरीबी देख के मजाक उड़ाता है। (और) ऐसी ही हालत मेरी भी थी (कि लोग मेरी गरीबी पर ठॅठे किया करते थे)। पर अब अठारह सिद्धियां मेरी हथेली पर (नाचती) हैं; हे प्रभू ये सारी आपकी मेहर है। 1। हे जीवों के जनम-मरण के चक्कर खत्म करने वाले राम ! आप जानता है कि मेरी अपनी कोई बिसात नहीं। हे सबकी कामना पूरी करने वाले प्रभू ! सारे जीव-जंतु आपकी ही शरण आते हैं (मैं गरीब भी आपकी ही शरण में हूँ) 1। रहाउ। जो जो भी आपकी शरण आते हैं। उनकी (आत्मा) पर (विकारों का) वज़न भार नहीं रह जाता। चाहे उच्च जाति वाले हों। चाहे नीच जाति वाले। वे आपकी मेहर से इस बखेड़ों भरे संसार (समुंद्र) में से (आसानी से) पार हैं जाते हैं। 2। रविदास कहता है- हे प्रभू ! आपके गुण बयान नहीं किए जा सकते (आप कंगालों को भी शहनशाह बनाने वाला है)। चाहे कितने भी यतन करें। आपके गुण नहीं कहे जा सकते। अपने जैसा तम स्वयं ही है; (जगत) में कोई ऐसा नहीं जिसको आपके जैसा कहा जा सके। 3। 1।
बिलावलु ॥
जिह कुल साधु बैसनौ होइ ॥
बरन अबरन रंकु नही ईसुरु बिमल बासु जानीऐ जगि सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
ब्रहमन बैस सूद अरु ख्यत्री डोम चंडार मलेछ मन सोइ ॥
होइ पुनीत भगवंत भजन ते आपु तारि तारे कुल दोइ ॥1॥
धंनि सु गाउ धंनि सो ठाउ धंनि पुनीत कुटंब सभ लोइ ॥
जिनि पीआ सार रसु तजे आन रस होइ रस मगन डारे बिखु खोइ ॥2॥
पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि अउरु न कोइ ॥
जैसे पुरैन पात रहै जल समीप भनि रविदास जनमे जगि ओइ ॥3॥2॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु ॥ जिस किसी भी कुल में परमात्मा का भक्त पैदा हो जाए। चाहे वह अच्छी जाति का है चाहे नीच जाति का है। चाहे कंगाल है चाहे धनाढ। (उसकी जाति व धन आदि का वर्णन ही) नहीं (छिड़ता)। वह जगत में निर्मल शोभा वाला प्रसिद्ध होता है। 1। रहाउ। कोई ब्राहमण हो। क्षत्रिय हो। डूम-चण्डाल अथवा मलीन मन वाला हो। परमात्मा के भजन से मनुष्य पवित्र हो जाता है; वह अपने आप को (संसार-समुंद्र से) पार करके अपनी दोनों कुलें भी तैरा लेता है। 1। संसार में वह गाँव मुबारक है। वह स्थान धन्य है। वह पवित्र कुल भाग्यशाली है। (जिसमें पैदा हो के) किसी ने परमात्मा के नाम का श्रेष्ठ रस पीया है। अन्य (बुरे) रस छोड़े हैं। और। प्रभू के नाम-रस में मस्त हो के (विकार-वासना का) जहर (अपने अंदर से) नाश कर दिया है। 2। बहुत विद्वान हो चाहे शूरवीर। चाहे छत्रपति राजा हो। कोई भी मनुष्य परमात्मा के भक्त के बराबर का नहीं हो सकता। रविदास कहता है- भक्तों का ही पैदा होना जगत में मुबारक है (वे प्रभू के चरणों में रह के ही जी सकते हैं)। जैसे जल कुदमिनी पानी के समीप रह के ही (हरी) रह सकती है। 3। 2।
बाणी सधने की रागु बिलावलु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
न्रिप कंनिआ के कारनै इकु भइआ भेखधारी ॥
कामारथी सुआरथी वा की पैज सवारी ॥1॥
तव गुन कहा जगत गुरा जउ करमु न नासै ॥
सिंघ सरन कत जाईऐ जउ जंबुकु ग्रासै ॥1॥ रहाउ ॥
एक बूंद जल कारने चात्रिकु दुखु पावै ॥
प्रान गए सागरु मिलै फुनि कामि न आवै ॥2॥
प्रान जु थाके थिरु नही कैसे बिरमावउ ॥
बूडि मूए नउका मिलै कहु काहि चढावउ ॥3॥
मै नाही कछु हउ नही किछु आहि न मोरा ॥
अउसर लजा राखि लेहु सधना जनु तोरा ॥4॥1॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: बाणी सधने की रागु बिलावलु सतिगुर प्रसादि ॥ जिसने एक राजे की लड़की की खातिर (धार्मिक होने का) भेष धारण किया था। हे प्रभू ! तूने तो उस कामी और स्वार्थी व्यक्ति की भी लाज रखी (भाव। तूने उसको काम-वासना के विकार में गिरने से बचाया था) 1। हे जगत के गुरू प्रभू ! अगर मेरे पिछले किए कर्मों का फल नाश ना हुआ (भाव। यदि मैं अब भी पूर्बले किए हुए बुरे कर्मों के संस्कारों के मुताबक ही बुरे काम ही करता रहा) तो आपकी शरण आने का भी क्या लाभ। शेर की शरण आने का भी क्या फायदा। अगर फिर भी गीदड़ खा जाए। 1। रहाउ। पपीहा जल की एक बूँद के लिए दुखी होता है (और चिल्लाता है; पर इन्जार में ही) अगर उसके प्राण चले जाएं तो फिर (बाद में) उसको (पानी का) समुंद्र भी मिल जाए तो उसके किसी काम नहीं आ सकता; (वैसे ही)। हे प्रभू ! अगर आपके नाम-अमृत के बग़ैर मेरी जीवात्मा विकारों में मर गई। तो फिर आपकी मेहर का समुंद्र मेरा क्या सवारेगा। 2। (आपकी मेहरबानियों का इन्तजार कर-करके) मेरी जीवात्मा थकी हुई है। (विकारों में) डोल रही है। इसे किस तरह विकारों से रोकूँ। हे प्रभू ! यदि मैं (विकारों के समुंद्र में) डूब ही गया। तो बाद में आपकी नौका मिल भी गई। तो। बता। उस बेड़ी में मैं किस को चढ़ाऊँगा। 3। हे प्रभू ! मेरी कोई बिसात नहीं। मेरा कोई आसरा नहीं; (ये मानस जनम ही) मेरी लाज रखने का समय है। मैं सधना आपका दास हूँ। मेरी लाज रख (और विकारों के समुंद्र में डूबने से मुझे बचा ले)। 4। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की, जिसने सामाजिक संरचना को अंदर से चुनौती दी।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैं अब (जगत के सारे) दुख भुला के (आत्मिक) सुख में लीन हो गया हूँ।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।