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अंग 860

अंग
860
राग गोंड
राग: गोंड · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
किछु किसी कै हथि नाही मेरे सुआमी ऐसी मेरै सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
जन नानक की आस तू जाणहि हरि दरसनु देखि हरि दरसनि त्रिपताई ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मालिक ! किसी भी जीव के वश कुछ नहीं- मुझे तो मेरे गुरू ने ये सूझ बख्शी है। हे प्रभू ! (अपने) दास नानक की (धारी हुई) आशा को आप खुद ही जानता है (वह तमन्ना यह है कि) प्रभू के दर्शन करके (नानक का मन) दर्शन की बरकति से (माया की आशाओं की ओर से) अघाया रहे। 4। 1।
गोंड महला 4 ॥
ऐसा हरि सेवीऐ नित धिआईऐ जो खिन महि किलविख सभि करे बिनासा ॥
जे हरि तिआगि अवर की आस कीजै ता हरि निहफल सभ घाल गवासा ॥
मेरे मन हरि सेविहु सुखदाता सुआमी जिसु सेविऐ सभ भुख लहासा ॥1॥
मेरे मन हरि ऊपरि कीजै भरवासा ॥
जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी हरि अपनी पैज रखै जन दासा ॥1॥ रहाउ ॥
जे अपनी बिरथा कहहु अवरा पहि ता आगै अपनी बिरथा बहु बहुतु कढासा ॥
अपनी बिरथा कहहु हरि अपुने सुआमी पहि जो तुम॑रे दूख ततकाल कटासा ॥
सो ऐसा प्रभु छोडि अपनी बिरथा अवरा पहि कहीऐ अवरा पहि कहि मन लाज मरासा ॥2॥
जो संसारै के कुटंब मित्र भाई दीसहि मन मेरे ते सभि अपनै सुआइ मिलासा ॥
जितु दिनि उन॑ का सुआउ होइ न आवै तितु दिनि नेड़ै को न ढुकासा ॥
मन मेरे अपना हरि सेवि दिनु राती जो तुधु उपकरै दूखि सुखासा ॥3॥
तिस का भरवासा किउ कीजै मन मेरे जो अंती अउसरि रखि न सकासा ॥
हरि जपु मंतु गुर उपदेसु लै जापहु तिन॑ अंति छडाए जिन॑ हरि प्रीति चितासा ॥
जन नानक अनदिनु नामु जपहु हरि संतहु इहु छूटण का साचा भरवासा ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 4 ॥ हे मेरे मन ! जो हरी एक छिन में सारे पाप नाश कर सकता है। सदा उसको सिमरना चाहिए। सदा उसका ध्यान धरना चाहिए। हे मन ! अगर परमात्मा को छोड़ के किसी और की (सहायता की) आशा रखें। तो वह परमात्मा (जीव की उस) सारी की हुई मेहनत को असफल कर देता है। बेकार कर देता है। सो। हे मेरे मन ! सारे सुख देने वाले मालिक हरी का सिमरन किया कर। उसका सिमरन करने से सारी तृष्णा भूख उतर जाती है। 1। हे मेरे मन ! (सदा) परमात्मा पर भरोसा रखना चाहिए। क्योंकि। हे मेरे मन ! जहाँ भी जाएं। वह मेरा मालिक प्रभू सदा अंग-संग रहता है। और वह प्रभू अपने दासों की अपने सेवकों की इज्जत रखता है। 1। रहाउ। हे भाई ! अगर आप अपना कोई दुख-दर्द (प्रभू को छोड़ के) औरों के आगे पेश करता फिरेगा। तो वह लोग आगे से अपने अनेकों दुख-दर्द सुना देंगे। हे भाई ! अपना हरेक दुख-दर्द अपने मालिक परमात्मा के पास ही बयान कर। वह तो आपके दुख तुरंत काट के रख देगा। हे भाई ! अगर ऐसे समर्थ प्रभू को छोड़ के अपनी पीड़ा औरों के आगे रखोगे। (तो) औरो के पास कह के। हे मन ! शर्मिंदा ही होना पड़ता है। 2। हे मेरे मन ! दुनियावी ये साक-सम्बंधी। मित्र। भाई जो भी दिखाई देते हैं। ये तो अपनी-अपनी गर्ज की खातिर ही मिलते हैं। जब उनकी गरज़ पूरी ना हो सके। तब उनमें से कोई भी नजदीक नहीं फटकता। सो। हे मेरे मन ! दिन रात हर समय अपने प्रभू का सिमरन करता रह। वही हरेक दुख-सुख में आपको काम आ सकता है। 3। हे मेरे मन ! जो कोई आखिरी समय में (मौत से हमें) बचा नहीं सकता। उसका भरोसा नहीं करना चाहिए। गुरू का उपदेश ले के (गुरू की शिक्षा पर चल के) परमात्मा का नाम-मंत्र जपा कर। जिन मनुष्यों के चित्त में परमात्मा का प्यार बसता है। उन्हें परमात्मा आखिरी समय में (जमों के डर से) छुड़वा लेता है। हे दास नानक ! (कह-) हे संत जनो ! हर वक्त परमात्मा का नाम जपा करो। (दुखों-कलेशों से) बचने का यही पक्का साधन है। 4। 2।
गोंड महला 4 ॥
हरि सिमरत सदा होइ अनंदु सुखु अंतरि सांति सीतल मनु अपना ॥
जैसे सकति सूरु बहु जलता गुर ससि देखे लहि जाइ सभ तपना ॥1॥
मेरे मन अनदिनु धिआइ नामु हरि जपना ॥
जहा कहा तुझु राखै सभ ठाई सो ऐसा प्रभु सेवि सदा तू अपना ॥1॥ रहाउ ॥
जा महि सभि निधान सो हरि जपि मन मेरे गुरमुखि खोजि लहहु हरि रतना ॥
जिन हरि धिआइआ तिन हरि पाइआ मेरा सुआमी तिन के चरण मलहु हरि दसना ॥2॥
सबदु पछाणि राम रसु पावहु ओहु ऊतमु संतु भइओ बड बडना ॥
तिसु जन की वडिआई हरि आपि वधाई ओहु घटै न किसै की घटाई इकु तिलु तिलु तिलना ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: गोंड महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए सदा सुख आनंद बना रहता है। हृदय में शांति टिकी रहती है। मन ठंडा-ठार रहता है। जैसे माया का सूरज बहुत तपता हैं। और। गुरू चंद्रमा का दर्शन करने से (माया के मोह की) सारी तपश दूर हो जाती है। 1। हे मेरे मन ! हर वक्त परमात्मा के नाम का ध्यान धर। प्रभू का नाम जपता रह ! हे मन ! वह प्रभू हर जगह ही आपकी रक्षा करने वाला है। उस अपने प्रभू को सदा ही सिमरता रह। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! उस प्रभू का नाम जपा कर। जिसमें सारे ही खजाने हैं। गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम-रतन को (अपने अंदर से) खोज के तलाश ले। जिस व्यक्ति ने हरी-नाम में ध्यान जोड़ा। उसने हरी का मिलाप हासिल कर लिया। हे मन ! उन हरी के दासों के चरण पलोसा करो। 2। हे मन ! गुरू के शबद से सांझ डाल के हरी-नाम का रस प्राप्त कर। (जो मनुष्य ये नाम-रस हासिल करता है) वह श्रेष्ठ संत है वह बहुत भाग्यशाली बन जाता है। ऐसे मनुष्य की इज्जत प्रभू ने खुद बढ़ाई है। किसी के घटाने से वह इज्जत एक तिल जितनी भी नहीं घट सकती। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मालिक ! किसी भी जीव के वश कुछ नहीं- मुझे तो मेरे गुरू ने ये सूझ बख्शी है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।