जन नानक की आस तू जाणहि हरि दरसनु देखि हरि दरसनि त्रिपताई ॥4॥1॥
ऐसा हरि सेवीऐ नित धिआईऐ जो खिन महि किलविख सभि करे बिनासा ॥
जे हरि तिआगि अवर की आस कीजै ता हरि निहफल सभ घाल गवासा ॥
मेरे मन हरि सेविहु सुखदाता सुआमी जिसु सेविऐ सभ भुख लहासा ॥1॥
मेरे मन हरि ऊपरि कीजै भरवासा ॥
जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी हरि अपनी पैज रखै जन दासा ॥1॥ रहाउ ॥
जे अपनी बिरथा कहहु अवरा पहि ता आगै अपनी बिरथा बहु बहुतु कढासा ॥
अपनी बिरथा कहहु हरि अपुने सुआमी पहि जो तुम॑रे दूख ततकाल कटासा ॥
सो ऐसा प्रभु छोडि अपनी बिरथा अवरा पहि कहीऐ अवरा पहि कहि मन लाज मरासा ॥2॥
जो संसारै के कुटंब मित्र भाई दीसहि मन मेरे ते सभि अपनै सुआइ मिलासा ॥
जितु दिनि उन॑ का सुआउ होइ न आवै तितु दिनि नेड़ै को न ढुकासा ॥
मन मेरे अपना हरि सेवि दिनु राती जो तुधु उपकरै दूखि सुखासा ॥3॥
तिस का भरवासा किउ कीजै मन मेरे जो अंती अउसरि रखि न सकासा ॥
हरि जपु मंतु गुर उपदेसु लै जापहु तिन॑ अंति छडाए जिन॑ हरि प्रीति चितासा ॥
जन नानक अनदिनु नामु जपहु हरि संतहु इहु छूटण का साचा भरवासा ॥4॥2॥
हरि सिमरत सदा होइ अनंदु सुखु अंतरि सांति सीतल मनु अपना ॥
जैसे सकति सूरु बहु जलता गुर ससि देखे लहि जाइ सभ तपना ॥1॥
मेरे मन अनदिनु धिआइ नामु हरि जपना ॥
जहा कहा तुझु राखै सभ ठाई सो ऐसा प्रभु सेवि सदा तू अपना ॥1॥ रहाउ ॥
जा महि सभि निधान सो हरि जपि मन मेरे गुरमुखि खोजि लहहु हरि रतना ॥
जिन हरि धिआइआ तिन हरि पाइआ मेरा सुआमी तिन के चरण मलहु हरि दसना ॥2॥
सबदु पछाणि राम रसु पावहु ओहु ऊतमु संतु भइओ बड बडना ॥
तिसु जन की वडिआई हरि आपि वधाई ओहु घटै न किसै की घटाई इकु तिलु तिलु तिलना ॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मालिक ! किसी भी जीव के वश कुछ नहीं- मुझे तो मेरे गुरू ने ये सूझ बख्शी है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।